सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक तुम्हारा रब अल्लाह है जिसने आसमान और ज़मीन (1)
छ दिन में बनाए (2)
फिर अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया जेसा उसकी शान के लायक़ है (3)
रात दिन को एक दूसरे से ढांकता है कि जल्द उसके पीछे लगा आता है और सूरज और चांद और तारों को बनाया सब उसके हुक्म के दबे हुए, सुन लो उसी के हाथ है पैदा करना और हुक्म देना बड़ी बरकत वाला है अल्लाह रब सारे जगत का {54} अपने रब से दुआ करो गिड़गिड़ाते और आहिस्ता बेशक हद से बढ़ने वाले उसे पसन्द नहीं (4){55}
और ज़मीन में फ़साद न फैलाओ (5)
उसके संवरने के बाद(6)
और उससे दुआ करो डरते और तमा(लालच) करते, बेशक अल्लाह की रहमत नेकों से क़रीब है {56} और वही है कि हवाएं भेजता है उसकी रहमत के आगे ख़ुशख़बरी सुनाती(7)
यहां तक कि जब उठा लाएं भारी बादल हमने उसे किसी मुर्दा शहर की तरफ़ चलाया(8)
फिर उससे पानी उतारा फिर उससे तरह तरह के फल निकाले, इसी तरह हम मुर्दों को निकालेंगे(9)
कहीं तुम नसीहत मानो {57} और जो अच्छी ज़मीन है उसका सब्ज़ा अल्लाह के हुक्म से निकलता है (10)
और जो ख़राब है उसमें नहीं निकलता मगर थोड़ा मुश्किल(11)
से हम यूंही तरह तरह से आयतें बयान करते हैं(12)
उनके लिये जो एहसान मानें {58}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू

(1) उन तमाम चीज़ों समेत जो उनके बीच है, जैसा कि दूसरी आयत में आया “वलक़द ख़लक़नस समावाते वल अर्दा वमा बैनहुमा फ़ी सित्तते अय्यामिन” (बेशक हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है छ: दिन में बनाया – सूरए क़ाफ़, आयत 38)

(2) छ: दिन से दुनिया के छ: दिनों की मिक़दार मुराद है क्योंकि ये दिन तो उस वक़्त थे नहीं. सूरज ही न था, जिससे दिन होता और अल्लाह तआला क़ादिर था कि एक क्षण में या उससे कम में पैदा फ़रमाता. लेकिन इतने अर्से में उनकी पैदाइश फ़रमाना उसकी हिकमत का तक़ाज़ा है और इससे बन्दों को अपने काम एक के बाद एक करने का सबक़ मिलता है.

(3) यह इस्तिवा मुतशाबिहात में से है, यानी क़ुरआन के वो राज़ जिनका इल्म सिर्फ़ अल्लाह तआला को और उसके बताए से किसी और को है. हम इसपर ईमान लाते हैं कि अल्लाह तआला की इस “इस्तिवा” से जो मुराद है, वह हक़ है. हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि इस्तिवा मालूम है और उसकी कैफ़ियत मजहूल और उस पर ईमान लाना वाजिब. आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया इसके मानी ये हैं कि आफ़रीनश का ख़ात्मा अर्श पर जा ठहरा. अपने कलाम के राज़ अल्लाह ही बेहतर जाने.

(4) दुआ अल्लाह तआला से भलाई तलब करने को कहते हैं और यह इबादत में दाख़िल है, क्योंकि यह दुआ करने वाला अपने आपको आजिज़ व मोहताज और अपने परवर्दिगार को हक़ीक़ी क़ुदरत वाला और हाजत पूरी करने वाला मानता है, इसीलिये हदीस शरीफ़ में आया “अद दुआओ मुख़्खुल इबादते” यानी दुआ इबादत का गूदा है. गिड़गिड़ाने से अपनी आजिज़ी और फ़रियाद मुराद है और दुआ का अदब यह है कि आहिस्ता दुआ करना, खुलेआम दुआ करने से सत्तर दर्जा ज़्यादा अफ़ज़ल है. इसमें उलमा का इख़्तिलाफ़ है कि इबादतों में इज़हार अफ़ज़ल है, या इख़फ़ा. कुछ कहते है कि इख़्फ़ा यानी छुपाना अफ़ज़ल है क्योंकि वह रिया यानी दिखावे से बहुत दूर है. कुछ कहते है कि इज़हार यानी ज़ाहिर करना, खोलना अफ़ज़ल है इसलिये कि इससे दूसरों को इबादत की रूचि पैदा होती है. तिरमिज़ी ने कहा कि अगर आदमी अपने नफ़्स पर रिया का अन्देशा रखता हो तो उसके लिये इख़्फ़ा यानी छुपाना अफ़ज़ल है. और अगर दिल साफ़ हो, रिया का अन्देशा न हो तो इज़हार अफ़ज़ल है. कुछ हज़रात ये फ़रमाते हैं कि फ़र्ज़ इबादतों में इज़हार अफ़ज़ल है. फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद ही में बेहतर है और ज़कात का इज़हार करके देना ही अफ़ज़ल और नफ़्ल इबादतों में, चाहे वह नमाज़ हो या सदक़ा वग़ैरह, इनमें इख़्फ़ा बेहतर है. दुआ में हद से बढ़ना कई तरह होता है, इसमें से एक यह भी है कि बहुत बलन्द आवाज़ से चीख़े.

(5) कुफ़्र और बुराई और ज़ुल्म करके.

(6) नबियों के तशरीफ़ लाने, हक़ की दअवत फ़रमाने, अहकाम बयान करने, इन्साफ़ क़ायम फ़रमाने के बाद.

(7) बारिश और रहमत से यहाँ मेंह मुराद है.

(8) जहाँ बारिश न हुई थी, सब्जा न जमा था.

(9) यानी जिस तरह मुर्दा ज़मीन को वीरानी के बाद ज़िन्दगी अता फ़रमाता और उसको हराभरा और तरो ताज़ा करता है और उसमें खेती, दरख़्त, फल फूल पैदा करता है, ऐसे ही मुर्दों को क़ब्रों से ज़िन्दा करके उठाएगा, क्योंकि जो ख़ुश्क लकड़ी से तरो ताज़ा फल पैदा करने पर क़ादिर है उसे मुर्दों का ज़िन्दा करना क्या मुश्किल है. क़ुदरत की निशानी देख लेने के बाद अक़्ल वाले और सही समझ वाले को मुर्दों के ज़िन्दा किये जाने में कोई शक बाक़ी नहीं रहता.

(10) यह ईमान वाले की मिसाल है. जिस तरह उमदा ज़मीन पानी से नफ़ा पाती है और उसमें फूल फल पैदा होते है उसी तरह जब मूमिन के दिल पर क़ुरआनी नूर की बारिश होती है तो वह उससे नफ़ा पाता है, ईमान लाता है, ताअतों और इबादतों से फलता फूलता है.

(11) यह काफ़िर की मिसाल है, जैसे ख़राब ज़मीन बारिश से नफ़ा नहीं पाती, ऐसे ही काफ़िर क़ुरआने पाक से फ़ायदा नहीं उठा पाता.

(12) जो तौहीद और ईमान पर तर्क और प्रमाण हैं.

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