सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू

सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और बेशक हमने तुम्हें पैदा किया फिर तुम्हारे नक़्शे बनाए फिर हमने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि आदम को सज्दा करो तो वो सब सज्दे में गिरे मगर इब्लीस, यह सज्दे वालों में न हुआ{11} फ़रमाया किस चीज़ ने तुझे रोका कि तूने सज्दा न किया जब मैंने हुक्म दिया था (1)
बोला मैं उससे बेहतर हूँ तूने मुझे आग से बनाया और उसे मिट्टी से बनाया (2){12}
फ़रमाया तू यहाँ से उतर जा तुझे नहीं पहुंचता कि यहां रहकर घमण्ड करे निकल (3)
तू है ज़िल्लत वालों में (4){13}
बोला मुझे फ़ुरसत दे उस दिन तक कि लोग उठाए जाएं {14} फ़रमाया तुझे मोहलत है (5){15}
बोला तो क़सम इसकी कि तूने मुझे गुमराह किया मैं ज़रूर तेरे सीधे रास्ते पर उनकी ताक में बैठूंगा (6){16}
फिर ज़रूर मैं उनके पास आऊंगा उनके आगे और उनके पीछे और उनके दाऐं और उनके बाएं से(7)
और तू उनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार न पाएगा (8){17}
फ़रमाया यहाँ से निकल जा रद किया गया, रोंदा हुआ, ज़रूर जो उनमें से तेरे कहे पर चला मैं तुम सबसे जहन्नम भर दूंगा (9){18}
और ऐ आदम तू और तेरा जोड़ा (10)
जन्नत में रहो तो उससे जहां चाहो खाओ और उस पेड़ के पास न जाना कि हद से बढ़ने वालों में होगे {19} फिर शैतान ने उनके जी में ख़तरा डाला कि उनपर खोलदे उनकी शर्म की चीज़े (11)
जो उनसे छुपी थीं (12)
और बोला तुम्हें तुम्हारे रब ने इस पेड़ से इसलिये मना फ़रमाया है कि कहीं तुम दो फ़रिश्ते हो जाओ या हमेशा जीने वाले (13) {20}
और उनसे क़सम खाई कि मैं तुम दोनो का भला चाहने वाला हूँ {21} तो उतार लाया उन्हें धोखे से (14)
फिर जब उन्होंने वह पेड़ चखा उनपर उनकी शर्म की चीज़ें खुल गईं (15)
और अपने बदन पर जन्नत के पत्ते चिपटाने लगे, और उन्हें उनके रब ने फ़रमाया क्या मैं ने तुम्हें इस पेड़ से मना न किया और न फ़रमाया था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है {22} दोनों ने अर्ज़ की ऐ रब हमारे हमने अपना आप बुरा किया तो अगर तू हमें बख़्शे और हमपर रहम न करें तो हम ज़रूर नुक़सान वालों में हुए {23} फ़रमाया उतरो (16)
तुम में एक दूसरे का दुश्मन है और तुम्हें ज़मीन में एक वक़्त तक ठहरना और बरतना है {24} फ़रमाया उसी में जियोगे और उसी में उठाए जाओगे (17){25}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू

(1) इससे साबित होता है कि हुक्म अनिवार्यता के लिये होता है और सज्दा न करने का कारण दरियाफ़्त फ़रमाना तौबीख़ के लिये है, और इसलिये कि शैतान की दुश्मनी और उसका कुफ़्र और घमण्ड और अपनी अस्ल पर गर्व करना और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के अस्ल का निरादर करना ज़ाहिर हो जाए.

(2) इससे उसकी मुराद यह थी कि आग मिट्टी से उत्तम और महान है तो जिसकी अस्ल आग होगी वह उससे उत्तम होगा जिसकी अस्ल मिट्टी हो. और उस ख़बीस का यह ख़याल ग़लत और बातिल है, क्योंकि अफ़ज़ल वह है जिसे मालिक व मौला फ़ज़ीलत दे. फ़ज़ीलत का आधार अस्ल व जौहर पर नहीं. बल्कि मालिक की फ़रमाँबरदारी पर है. और आग का मिट्टी से उत्तम होना, यह भी सही नहीं है, क्योंकि आग में क्रोध और तेज़ी और ऊंचाई छूने की हविस है. यह कारण घमण्ड का होता है. और मिट्टी से इल्म, हया और सब्र का आदर प्राप्त होता है. मिट्टी से मुल्क आबाद होते हैं, आग से नष्ट, मिट्टी अमानतदार है, जो चीज़ उसमें रखी जाए, उसको मेहफूज़ रखे और बढ़ाए. आग फ़ना कर देती है. इसके बावुजूद लुत्फ़ यह है कि मिट्टी आग को बुझा देती है और आग मिट्टी को फ़ना नहीं कर सकती. इसके अलावा इब्लीस की मूर्खता और कटुता यह कि उसने खुले प्रमाण के होते हुए उसके मुक़ाबले में अपने अन्दाज़े से काम लेना चाहा और जो अन्दाज़ा खुले हुक्म और प्रमाण के खिलाफ़ हो वह ज़रूर मरदूद हैं.

(3) जन्नत से, कि यह जगह फ़रमाँबरदारी और विनम्रता वालों के लिये है, इन्कार और सरकशी करने वालों की नहीं.

(4) कि इन्सान तेरा त्रस्कार करेगा और हर ज़बान तुझपर लअनत करेगी और यही घमण्ड वाले का अंजाम है.

(5) और इस मुद्दत की मोहलत सूरए हिज्र मे बयान फ़रमाई गई “इन्नका मिनल मुन्ज़रीना इला यौमिल वक़्तिल मअलूम” तू उनमें है जिनको उस मअलूम वक़्त के दिन तक मोहलत है. (सूरए हिज्र, आयत 37). और यह वक़्त पहली बार के सूर फूंके जाने का है, जब सब लोग मर जाएंगे. शैतान ने मुर्दों के ज़िन्दा होने के वक़्त तक की मोहलत चाही थी और इससे उसका मतलब यह था कि मौत की सख़्ती से बच जाए. यह क़ुबूल न हुआ और पहले सूर तक की मोहलत दी गई.

(6) कि बनी आदम के दिल में वसवसे डालूं और उन्हें बातिल की तरफ़ माइल करूं, गुनाहों की रूचि दिलाऊं, तेरी इताअत और इबादत से रोकूं, और गुमराही में डालूं.

(7) यानी चारों तरफ़ से उन्हें घेर कर सीधी राह से रोकूंगा.

(8) चूंकि शैतान बनी आदम को गुमराह करने और वासनाओं तथा बुराइयों में गिरफ़्तार करने में अपनी अत्यन्त कोशिश ख़र्च करने का इरादा कर चुका था, इसलिये उसे गुमान था कि वह बनी आदम को बहका लेगा, उन्हें धोखा देकर अल्लाह की नेअमतों के शुक्र और उसकी फ़रमाँबरदारी से रोक देगा.

(9) तूझको भी और तेरी सन्तान को भी, और तेरा अनुकरण करने वाले आदमियों को भी, सबको जहन्नम में दाख़िल किया जाएगा. शैतान को जन्नत से निकाल देने के बाद हज़रत आदम को ख़िताब फ़रमाया जो आगे आता है.

(10) यानी हज़रत हव्वा.

(11) यानी ऐसा वसवसा डाला कि जिसका नतीजा यह हो कि वो दोनों आपस में एक दूसरे के सामने नंगे हो जाएं. इस आयत से यह मसअला साबित हुआ कि वह जिस्म जिसको औरत कहते हैं उसका छुपाना ज़रूरी और खोलना मना है. और यह भी साबित हुआ कि उसका खोलना हमेशा से अक़्ल के नज़दीक ख़राब और तबीअत के नागवार रहा है.

(12) इससे मालूम हुआ कि इन दोनों साहिबों ने अबतक एक दूसरे का मुंह न देखा था.

(13) कि जन्नत में रहो और कभी न मरो.

(14) मानी ये हैं कि इब्लीस मलऊन ने झूठी क़सम खाकर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को धोखा दिया और पहला झूठी क़सम खाने वाला इब्लीस ही है. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को गुमान भी न था कि कोई अल्लाह की क़सम खाकर झूठ बोल सकता है.

(15) और जन्नती लिबास जिस्म से अलग हो गए और उनमें एक दूसरे से अपना बदन छुपा न सका. उस वक़्त तक उनमें से किसी ने ख़ुद भी अपना छुपा हुआ बदन न देखा था और न उस वक़्त तक इसकी ज़रूरत ही पेश आई थी.

(16) ऐ आदम और हव्वा, अपनी सन्तान समेत जो तुम में है.

(17) क़यामत के दिन हिसाब के लिये.

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