सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू

सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ आदम की औलाद बेशक हमने तुम्हारी तरफ़ एक लिबास वह उतारा कि तुम्हारी शर्म की चीज़ें छुपाए और एक वह कि तुम्हारी आरायश (सजावट) हो(1)
और परहेज़गारी का लिबास वह सबसे भला (2)
यह अल्लाह की निशानीयों में से है कि कहीं वो नसीहत मानें {26} ऐ आदम की औलाद(3)
ख़बरदार तुम्हें शैतान फ़ितने (मुसीबत) में न डाले जैसा तुम्हारे मां बाप को बहिश्त (स्वर्ग) से निकाला उतरवा दिये उनके लिबास कि उनकी शर्म की चीज़ें उन्हें नज़र पड़ीं, बेशक वह और उसका कुम्बा तुम्हें वहां से देखते हैं कि तुम उन्हें नहीं देखते(4)
बेशक हमने शैतानों को उनका दोस्त किया है जो ईमान नहीं लाते {27} और जब कोई बेहयाई करें(5)
तो कहते हैं हमने इसपर अपने बाप दादा को पाया और अल्लाह ने हमें इसका हुक्म दिया(6)
तो फ़रमाओ बेशक अल्लाह बेहयाई का हुक्म नहीं देता, क्या अल्लाह पर वह बात लगाते हो जिसकी तुम्हें ख़बर नहीं {28} तुम फ़रमाओ मेरे रब ने इन्साफ़ का हुक्म दिया है और अपने मुंह सीधे करो हर नमाज़ के वक़्त और उसकी इबादत करो निरे उसके वैसे होकर जैसे उसने तुम्हारा आगाज़ (आरम्भ) किया वैसे ही पलटोगे (7){29}
एक फ़िरके (समुदाय)को राह दिखाई (8)
और एक फ़िरके की गुमराही साबित हुई (9)
उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतान को वाली (सरपरस्त) बनाया (10)
और समझते यह हैं कि वो राह पर हैं {30} ऐ आदम की औलाद, अपनी ज़ीनत (सजावट) लो जब मस्जिद में आओ (11)
और खाओ पियो (12)
और हद से न बढ़ो, बेशक हद से बढने वाले उसे पसन्द नहीं {31}

सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू

(1) यानी एक लिबास तो वह है जिससे बदन छुपाया जाए और गुप्तांग ढके जाएं और एक लिबास वह है जिससे ज़ीनत और श्रंगार हो और यह भी उचित कारण है.

(2) परहेज़गारी का लिबास ईमान, शर्म, नेक आदतें, अच्छे कर्म हैं. यह बेशक ज़ाहिरी श्रंगार के लिबास से बेहतर हैं.
(3) शैतान की हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के साथ दुश्मनी का बयान फ़रमाकर बनी आदम को चेतावनी दी जा रही है और होशियार किया जा रहा है कि वह शैतान के वसवसे और उसके छलकपट और बहकावे से बचते रहें. जो हज़रत आदम के साथ ऐसा धोखा कर चुका है वह उनकी औलाद के साथ कब चूकने वाला है.

(4) अल्लाह तआला ने जिन्नों को ऐसी समझ दी है कि वो इन्सानों को देखते हैं और इन्सानों को ऐसी दृष्टि नहीं मिली कि वो जिन्नों को देख सकें. हदीस शरीफ़ में है कि शैतान इन्सान के जिस्म में ख़ून की राहों में पैर जाता है. हज़रत ज़ुन्नून मिस्त्री रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि अगर शैतान ऐसा है कि वह तुम्हें देखता है तुम उसे नहीं देख सकते, तो तुम ऐसे से मदद चाहो जो उसको देखता है और वह उसे न देख सके यानी अल्लाह करीम, सत्तार, रहीम, ग़फ़्फ़ार से मदद चाहो.

(5) और कोई बुरा काम या गुनाह उनसे हो, जैसा कि जिहालत के दौर में लोग, मर्द और औरत, नंगे होकर काबे का तवाफ़ करते थे. अता का कौल है कि बेहयाई शिर्क है और हकीक़त यह है कि हर बुरा काम और तमाम गुनाह छोटे बड़े इसमें दाख़िल हैं. अगरचे यह आयत ख़ास नंगे होकर तवाफ़ करने के बारे में आई हो. जब काफ़िरों की ऐसी बेहयाई के कामों पर उनकी कटु आलोचना की गई तो इस पर उन्होंने जो कहा वह आगे आता है.

(6) काफ़िरों ने अपने बुरे कामों के दो बहाने बयान किये, एक तो यह कि उन्होंने अपने बाप दादा को यही काम करते पाया, लिहाज़ा उनके अनुकरण में ये भी करते हैं. यह तो जाहिल बदकार का अनुकरण हुआ और यह किसी समझ वाले के नज़दीक जायज़ नहीं. अनुकरण किया जाता है इल्म और तक़वा वालों का, न कि जाहिल गुमराह का. दूसरा बहाना उनका यह था कि अल्लाह ने उन्हें इन कामों का हुक्म दिया है. यह केवल झूठ और बोहतान था. चुनांचे अल्लाह तआला रद फ़रमाता है.

(7)यानी जैसे उसने तुम्हें शून्य से अस्तित्व दिया ऐसे ही मौत के बाद ज़िन्दा फ़रमाएगा. ये आख़िरत की ज़िन्दगी का इन्कार करने वालों पर तर्क है और इससे यह भी मालूम होता है कि जब उसीकी तरफ़ पलटना है और वह कर्मों को बदला देगा तो फ़रमाँबरदारी और इबादतों को उसके लिये विशेष करना ज़रूरी है.

(8) ईमान और अल्लाह की पहचान की और उन्हें फ़रमाँबरदारी और इबादत की तौफ़ीक़ दी.

(9) वो काफ़िर है.

(10) उनकी फ़रमाँबरदारी की, उनके कहे पर चले, उनके हुक्म से कुफ़्र और गुनाहों का रास्ता अपनाया.

(11) यानी सजधज और श्रंगार का लिबास. और एक कथन यह है कि कंघी करना, खुश्बू लगाना श्रंगार में दाख़िल है. और सुन्नत यह है कि आदमी अच्छी सूरत के साथ नमाज़ के लिये हाज़िर हो क्योंकि नमाज़ में रब से मांगना होता है, तो इसके लिये श्रंगार करना, इत्र लगाना मुस्तहब, जैसा कि गुप्तांग ढाँपना और पाकी वाजिब है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, जाहिलियत के दौर में दिन में मर्द और औरतें नंगे होकर तवाफ़ करते थे. इस आयत में गुप्तांग छुपाने और कपड़े पहनने का हुक्म दिया गया और इसमें दलील है कि गुप्तांग का ढाँपना नमाज़ व तवाफ़ और हर हाल में वाजिब है.

(12) कल्बी का क़ौल है कि बनी आमिर हज के ज़माने में अपनी ख़ुराक बहुत ही कम कर देते थे और गोश्त व चिकनाई तो बिल्कुल ही न छुते थे और इसको हज का आदर जानते थे. मुसलमानों ने उन्हें देखकर अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, हमें ऐसा करने का ज़्यादा हक़ है. इस पर उतरा कि खाओ और पियो, गोश्त हो या सिर्फ़ चिकनाई. और फ़ुज़ूल ख़र्ची न करो और वह यह है कि पेट भर जाने के बाद भी खाते रहो या हराम की पर्वाह न करो और यह भी फ़ुज़ूल ख़र्ची है कि जो चीज़ अल्लाह तआला ने हराम नहीं की, उसको हराम कर लो. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अनहुमा ने फ़रमाया जो चाहे खा और जो चाहे पहन, फ़ुज़ूल ख़र्ची और घमण्ड से बचता रह. इस आयत में दलील है कि खाने पीने की तमाम चीज़ें हलाल हैं, सिवाय उनके जिनपर शरीअत में हुरमत की दलील क़ायम हो क्योंकि यह क़ायदा निश्चत और सर्वमान्य है कि अस्ल तमाम चीज़ों में अबाहत है मगर जिसपर शरीअत ने पाबन्दी लगाई हो और उसकी हुरमत दलीले मुस्तक़िल से साबित हो.

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