सूरए अअराफ़ – छटा रूकू

सूरए अअराफ़ – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और अअराफ़ वाले कुछ मर्दों को (1)
पुकारेंगे जिन्हें उनकी पेशानी से पहचानते हैं कहेंगे तुम्हें क्या काम आया तुम्हारा जत्था और वह जो तुम घमण्ड करते थे(2){48}
क्या ये हैं वो लोग (3)
जिनपर तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह इनपर अपनी रहमत कुछ न करेगा (4)
इनसे तो कहा गया कि जन्नत में जाओ न तुम को डर न कुछ ग़म {49} और दोज़ख़ वाले जन्नत वालों को पुकारेंगे कि हमें अपने पानी का कुछ फ़ैज़ (लाभ) दो या उस खाने का जो अल्लाह ने तुम्हें दिया (5)
कहेंगे बेशक अल्लाह ने इन दोनों को काफ़िरों पर हराम किया है {50} जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया (6)
और दुनिया की ज़िन्दगी में उन्हें धोखा दिया(7)
तो आज हम उन्हें छोड़ देंगे जैसा हमारी आयतों से इन्कार करते थे {51} और बेशक हम उनके पास एक किताब लाए (8)
जिसे हमने एक बड़े इल्म से मुफ़स्सल (विस्तृत) किया हिदायत व रहमत ईमान वालों के लिये {52} काहे की राह देखते हैं मगर इसकी कि इस किताब का कहा हुआ अनजाम सामने आए जिस दिन इसका बताया हुआ अंजाम वाक़े होगा(9)
बोल उठेंगे वो जो इसे पहले से भुलाए बैठे थे (10)
कि बेशक हमारे रब के रसूल हक़ लाए थे तो हैं कोई हमारे सिफ़ारिशी जो हमारी शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करेंगे या हम वापस भेजे जाएं कि पहले कामों के ख़िलाफ़ करें (11)
बेशक उन्होंने अपनी जानें नुक़सान में डालीं और उनसे खोए गए जो बोहतान (लांछन) उठाते थे(12){43}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – छटा रूकू

(1) काफ़िरों में से.

(2) और अअराफ़ वाले ग़रीब मुसलमानों की तरफ़ इशारा करके काफ़िरों से कहेंगे.

(3) जिनको तुम दुनिया में हक़ीर या तुच्छ समझते थे, और………

(4) अब देख लो कि जन्नत के हमेशा के ऐश और राहत में किस इज़्ज़त और सम्मान के साथ हैं.

(5) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब अअराफ़ वाले जन्नत में चले जाएंगे तो दोज़ख़ियों को भी लालच आएगा और वो अर्ज़ करेंगे, यारब जन्नत में हमारे रिश्तेदार हैं इजाज़त अता फ़रमा कि हम उन्हें देख़ें, उनसे बात करें. इजाज़त दी जाएगी तो वो अपने रिश्तेदारों को जन्नत की नेअमतों में देखेंगे और पहचानेंगे. लेकिन जन्नत वाले उन दोज़ख़ी रिश्तेदारों को न पहचानेंगे क्योंकि दोज़ख़ियों के मुंह काले होंगे, सूरतें बिगडी हुई होंगी. तो वो जन्नतियों का नाम ले लेकर पुकारेंगे. कोई अपने बाप को पुकारेगा, कोई भाई को, और कोई कहेगा, मैं जल गया मुझपर पानी डालो और तुम्हें अल्लाह ने दिया है, खाने को दो, इस पर जन्नत वाले.

(6) कि हलाल और हराम में अपनी नफ़्सानियत के ग़ुलाम हुए, जब ईमान की तरफ़ उन्हें दअवत दी गई तो हंसी उड़ाने लगे.

(7) इसकी लज़्ज़तों में आख़िरत को भूल गए.

(8) क़ुरआन शरीफ़.

(9) और वह क़यामत का दिन है.

(10) न उसपर ईमान लाते थे न उसके अनुसार अमल करते थे.

(11) यानी बजाय कुफ़्र के ईमान लाएं और बजाय बुराई और नाफ़रमानी के ताअत और फ़रमाँबरदारी इख़्तियार करें. मगर न उन्हें शफ़ाअत मिलेगी न दुनिया में वापस भेजे जाएंगे.

(12) और झूठ बकते थे कि बुत ख़ुदा के शरीक हैं और अपने पुजारियों की शफ़ाअत करेंगे. अब आख़िरत में उन्हें मालूम हो गया कि उनके ये दावे झूठे थे.

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