सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा (1)
तो उसने कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो (2)
उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद (आराध्य) नहीं (3)
बेशक मुझे तुम पर बड़े दिन के अज़ाब का डर है (4){59}
उसकी क़ौम से सरदार बोले बेशक हम तुम्हें खुली गुमराही में देखते हैं {60} कहा ऐ मेरी क़ौम मुझमें गुमराही नहीं, मैं तो सारे जगत के रब का रसूल हूँ {61} तुम्हें अपने रब की रिसालतें (संदेश) पहुंचाता और तुम्हारा भला चाहता और मैं अल्लाह की तरफ़ से वह इल्म रखता हूँ जो तुम नहीं रखते {62} और क्या तुम्हें इसका अचंभा हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक नसीहत आई तुम में के एक मर्द की मारिफ़त (द्वारा) (5)
कि वह तुम्हें डराए और तुम डरो और कहीं तुमपर रहम हो {63} तो उन्होंने उसे (6)
झुटलाया तो हमने उसे और जो (7)
उसके साथ किश्ती में थे निजात दी और अपनी आयतें झुटलाने वालों को डुबो दिया, बेशक वह अंधा गिरोह था (8){64}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू

(1) हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के वालिद का नाम लमक है. वह मतूशल्ख़ के, वह अख़नूख़ अलैहिस्सलाम के फ़रज़न्द हैं. अख़नूख़ हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम का नाम है. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम चालीस या पचास साल की उम्र में नबुव्वत से सम्मानित किये गए. ऊपर की आयतों में अल्लाह तआला ने अपनी क़ुदरत की दलीलें और अपनी सनअत के चमत्कार बयान फ़रमाए जिनसे उसके एक होने और मअबूद होने का सुबूत मिलता है. और मरने के बाद उठने और ज़िन्दा होने की सेहत पर खुली दलीलें क़ायम कीं. इसके बाद नबियों का ज़िक्र फ़रमाता है और उनके उन मामलों का, जो उन्हें उम्मतों के साथ पेश आए. इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि केवल आप ही की क़ौम ने हक़ क़ुबूल करने से इन्कार नहीं किया, बल्कि पहली उम्मतें भी इन्कार करती रहीं और नबियों को झुटलाने वालों का अंजाम दुनिया में हलाकत और आख़िरत में भारी अज़ाब है. इससे ज़ाहिर है कि नबियों को झुटलाने वाले अल्लाह के ग़ज़ब और प्रकोप के हक़दार होते हैं. जो व्यक्ति सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाएगा, उसका भी यही अंजाम होगा. नबियों के इन तज़किरों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत की ज़बरदस्त दलील है, क्योंकि हुज़ूर उम्मी थे यानी ज़ाहिर में पढ़े लिखे न थे. फिर आपका इन घटनाओ को तफ़सील से बयान करना, ख़ास तौर से ऐसे मुल्क में, जहाँ किताब वालों के उलमा काफ़ी मौजूद थे, और सख़्त विरोधी भी थे, ज़रासी बात पाते तो बहुत शोर मचाते, वहाँ हुज़ूर का इन घटनाओ को बयान करना और किताब वालों का ख़ामोश और स्तब्ध तथा आश्चर्य चकित रह जाना, खुली दलील है कि आप सच्चे नबी हैं और अल्लाह तआला ने आप पर उलूम के दर्वाज़े खोल दिये हैं.

(2) वही इबादत के लायक़ है.

(3) तो उसके सिवा किसी को न पूजों.

(4) क़यामत के दिन का या तूफ़ान के दिन का, अगर तुम मेरी नसीहत क़ुबूल न करो और सीधी राह पर न आओ.

(5) जिसको तुम ख़ूब जानते हो और उसके नसब को पहचानते हो.

(6) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को.

(7) उनपर ईमान लाए और.

(8) जिसे सत्य नज़र न आता था. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि उनके दिल अन्धे थे, मअरिफ़त यानी रब को पहचानने के नूर से उनको फ़ायदा न था.

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