सूरए अअराफ़ – उन्नीसवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – उन्नीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक वो जो बछड़ा ले बैठे बहुत जल्द उन्हें उनके रब का ग़ज़ब (क्रोध) और ज़िल्लत पहुंचना है दुनिया की ज़िन्दगी में, और हम ऐसा ही बदला देते हैं बोहतान हायों (आरोपियों) को {152} और जिन्होंने बुराइयां कीं और  उनके बाद तौबा की और ईमान लाए तो उसके बाद तुम्हारा रब बख़्शने वाला मेहरबान है (1){153}
और जब मूसा का ग़ुस्सा थमा तख़्तियाँ उठालीं और उनकी तहरीर (लेख) मैं हिदायत और रहमत है उनके लिये जो अपने रब से डरते हैं {154} और मूसा ने अपनी क़ौम से सत्तर मर्द हमारे वादे के लिये चुने (2)
फिर जब उन्हें ज़लज़ले ने लिया (3)
मूसा ने अर्ज़ की ऐ मेरे रब तू चाहता तो पहले ही इन्हें और मुझे हलाक कर देता (4)
कया तू हमें उस काम पर हलाक फ़रमाएगा जो हमारे बेअक़लों ने किया (5)
वह नहीं मगर तेरा आज़माना, तू उससे बहकाए जिसे चाहे और राह दिखाए जिसे चाहे, तू हमारा मौला (मालिक) है तो हमें बख़्श दे और हम पर मेहर (कृपा) कर और तू सबसे बेहतर बख़्शने वाला है {155} और हमारे लिये इस दुनिया में भलाई लिख (6)
और आख़िरत में बेशक हम तेरी तरफ़ रूजू लाएं फ़रमाया (7)
मेरा अज़ाब जिसे चाहूँ दूँ और मेरी रहमत हर चीज़ को घेरे है (8)
तो बहुत जल्द मैं (9)
नेमतों को (10)
उनके लिये लिख दूंगा जो डरते और ज़कात देते हैं और वो हमारी आयतों पर ईमान लाते हैं {156} वो जो ग़ुलामी करेंगे उस रसूल बेपढ़े ग़ैब की ख़बरें देने वाले की (11)
जिसे लिखा हुआ पाएंगे अपने पास तौरात और इंजील में (12)
वो उन्हें भलाई का हुक्म देगा और बुराई से मना फ़रमाएगा और सुथरी चीज़ें उनके लिये हलाल फ़रमाएगा गन्दी चीज़ें उनपर हराम करेगा और उनपर से वो बोझ (13)
और गले के फंदे (14)
जो उनपर (15)
थे उतारेगा तो वो जो उसपर ईमान लाएं और उसकी ताज़ीम (आदर) करें और उसे मदद दें और उस नूर की पैरवी (अनुकरण) करें जो उसके साथ उतरा (16)
वही बामुराद हुए {157}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – उन्नीसवाँ रूकू

(1) इस आयत से साबित हुआ कि गुनाह, चाहे छोटे हों या बड़े. जब बन्दा उनसे तौबह करता है तो अल्लाह तबारक व तआला अपने फ़ज़्ल व रहमत से उन सबको माफ़ कर देता है.

(2) कि वो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ अल्लाह के समक्ष हाज़िर होकर क़ौम की गौपूजा की ख़ता पर माफ़ी माँगें. चुनांचे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उन्हें लेकर हाज़िर हुए.

(3) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि भूकम्प में जकड़े जाने का कारण यह था कि क़ौम ने जब बछड़ा क़ायम किया था, ये उनसे अलग न हुए थे. (ख़ाज़िन)

(4) यानी मीक़ात में हाज़िर होने से पहले, ताकि बनी इस्त्राईल उन सबकी हलाकत अपनी आँखों से देख लेते और उन्हें मुझ पर क़त्ल की तोहमत लगाने का मौक़ा न मिलता.

(5) यानी हमें हलाक़ न कर, और अपनी मेहरबानी फ़रमा.

(6) और हमें फ़रमाँबरदारी की तौफ़ीक़ अता फ़रमा.

(7) अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से.

(8) मुझे इख़्तियार है, सब मेरे ममलूक और बन्दे हैं, किसी को ऐतिराज़ की मजाल नहीं.

(9) दुनिया में नेक और बद सब को पहुंचती है.

(10) आख़िरत की.

(11) यहाँ मुफ़स्सिरों की सहमति के अनुसार, रसूल से सैयदे आलम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुराद हैं. आपका ज़िक्र रिसालत के गुण से किया गया, क्योंकि आप अल्लाह और उसकी सृष्टि के बीच माध्यम हैं. रिसालत के कर्तव्य अदा करते हैं. अल्लाह तआला के आदेश, शरीअत और वैद्य-अवैद्य बातों के अहकाम बन्दों तक पहुंचाते हैं. इसके बाद आपकी प्रशंसा में नबी फ़रमाया गया. इसका अनुवाद आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैहे ने अज्ञात की ख़बरें देने वाले किया है, और यह अत्यन्त दुरूस्त अनुवाद है, क्योंकि “नबा” ख़बर को कहते हैं, जो जानकारी की नज़र से मुफ़ीद हो और झूट से ख़ाली. क़ुरआन शरीफ़ में यह शब्द इस अर्थ में कसरत से इस्तेमाल हुआ है. एक जगह इरशाद हुआ “कुल हुवा नबऊन अज़ीमुन”  (तुम फ़रमाओ वह बड़ी ख़बर है – सूरए स्वॉद, आयत 67) एक जगह फ़रमाया “तिल्का मिन अम्बाइल ग़ैबे नूहीहा इलैक” (ये ग़ैब की ख़बरें हम तुम्हारी तरफ़ वही करते हैं- सूरए हूद, आयत 49) एक जगह फ़रमाया “फ़लम्मा अम्बाअहुम बि अस्माइहिम” (जब उसने यानी आदम ने उन्हें सबके नाम बता दिये – सूरए बक़रह – आयत 33) और कई आयतें हैं जिनमें यह शब्द इस मानी में आया है. फिर यह शब्द या कर्ता के मानी में होगा या कर्म के मानी में. पहली सूरत में इसके मानी ग़ैब की ख़बरें देने वाले और दूसरी सूरत में इसके मानी होंगे ग़ैब की ख़बरें दिये हुए, और दोनों मानी को क़ुरआन शरीफ़ से पुष्टि मिलती है. पहले अर्थ की पुष्टि इस आयत से होती है “नब्बिअ इबादी” (यानी ख़बर दो मेरे बन्दों को  – सूरए हिजर, आयत 49). दूसरी आयत में फ़रमाया “क़ुल अउ नब्बिउकुम” (तुम फ़रमाओ क्या मैं तुम्हें उस से बेहतर चीज़ बता दूं – सूरए आले इमरान, आयत 15). और इसी प्रकार का है हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम का इरशाद जो क़ुरआन शरीफ़ में आया “उनब्बिउकुम बिमा ताकुलूना वमा तद्दख़िरून” (और तुम्हें बताता हूं जो तुम खाते हो और जो अपने घरों में जमा कर रखते हो – सूरए आले इमरान, आयत 49). और दूसरी सूरत की ताईद इस आयत से होती है “नब्बानियल अलीमुल ख़बीर” (मुझे इल्म वाले ख़बरदार ने बताया – सूरए तहरीम, आयत 3). और हक़ीक़त में नबी ग़ैब की ख़बरें देने वाले ही होते हैं. तफ़सीरे ख़ाज़िन में है कि आपके गुण में नबी फ़रमाया क्योंकि नबी होना महान और उत्तम दर्जों में से है और यह इसका प्रमाण है कि आप अल्लाह के नज़दीक बहुत बलन्द दर्जा रखने वाले और उसकी तरफ़ से ख़बर देने वाले हैं. उम्मी का अनुवाद आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने बे पढ़े फ़रमाया. यह अनुवाद बिल्कुल हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा के इरशाद के मुताबिक है और यक़ीनन उम्मी होना आपके चमत्कारों में से एक चमत्कार है कि दुनिया में किसी से पढ़े नहीं और किताब वह लाए जिसमें पिछलों और आने वालों और अज्ञात की जानकारी है. (ख़ाज़िन)

(12) यानी तौरात व इंजील में आपकी नात और प्रशंसा और आपका नबी होना लिखा पाएंगे. हज़रत अता इब्ने यसार ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रदियल्लाहो अन्हो से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के वो गुण दरियाफ़्त किये जो तौरात में बयान किये गए हैं. उन्होंने फ़रमाया कि हुज़ूर के जो औसाफ़ अर्थात गुण और विशेषताएं क़ुरआन शरीफ़ में आए हैं उन्हीं में की कुछ विशेषताएं तौरात में बयान की गई है. इसके बाद उन्होंने पढ़ना शुरू किया ” ऐ नबी हमने तुम्हें भेजा गवाह और ख़ुशख़बरी देने और डराने वाला और उम्मतों का निगहबान बनाकर. तुम मेरे बन्दे और मेरे रसूल हो. मैं ने तुम्हारा नाम मुतवक्कल रखा, न बुरे व्यवहार वाले हो, न सख़्त मिज़ाज, न बाज़ारों में आवाज़ बलन्द करने वाले, न बुराई से बुराई को दूर करो, लेकिन ख़ताकारों को माफ़ करते हो और उनपर एहसान फ़रमाते हो. अल्लाह तआला तुम्हें न उठाएगा जबतक कि तुम्हारी बरकत से ग़ैर मुस्तक़ीम मिल्लत को इस तरह रास्त न फ़रमादे कि लोग सच्चाई और विशवास के साथ “लाइलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” पुकारने लगें और तुम्हारी बदौलत अंधी आँखें देखने वाली और बेहरे कान सुनने वाले और पर्दों में लिपटे हुए दिल कुशादा हो जाएंगे.” हज़रत कअब अहबार से हुज़ूर की विशेषताओं में तौरात शरीफ़ का यह मज़मून भी नक़्ल हुआ कि अल्लाह तआला ने आपकी प्रशंसा में फ़रमाया कि मैं उन्हें हर ख़ूबी के क़ाबिल करूंगा और हर अच्छी सिफ़त और आदत अता फ़रमाऊंगा और दिल के इत्मीनान और प्रतिष्ठा को उनका लिबास बनाऊंगा और ताअतों व एहसान को उनका तरीक़ा करूंगा और तक़वा को उनका ज़मीर और हिकमत को उनका राज़दार और सच्चाई और निष्ठा को उनकी तबीअत और माफ़ करने तथा मेहरबान होने को उनकी आदत और इन्साफ़ को उनकी प्रकृति और हक़ के इज़हार को उनकी शरीअत और हिदायत को उनका इमाम और इस्लाम को उनकी मिल्लत बनाऊंगा. अहमद उनका नाम है. सृष्टि को उनके सदक़े में गुमराही के बाद हिदायत और जिहालत के बाद इल्म व मअरिफ़त और गुमनामी के बाद बलन्दी और इज़्ज़त अता करूंगा और उन्हीं की बरकत से क़िल्लत के बाद महब्बत इनायत करूंगा. उन्हीं की बदौलत विभिन्न क़बीलों, अलग अलग ख़्वाहिशों और विरोध रखने वाले दिलों में उल्फ़त पैदा करूंगा और उनकी उम्मत को सारी उम्मतों से बेहतर करूंगा. एक और हदीस में तौरात शरीफ़ से हुज़ूर की ये विशेषताएं नक़्ल की गई हैं. मेरे बन्दे अहमदे मुख़्तार, उनका जन्मस्थान मक्कए मुकर्रमा और हिजरत स्थल मदीनए तैय्यिबह है, उनकी उम्मत हर हाल में अल्लाह की बहुत प्रशंसा करने वाली है. ये कुछ नक़्ले अहादीस से पेश की गई. आसमानी किताबे हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की प्रशंसा और गुणगान से भरी हुई थीं. किताब वाले हर ज़माने में अपनी किताबों में काट छाँट करते रहे और उनकी बड़ी कोशिश इसी में रही कि हुज़ूर का ज़िक्र अपनी किताबों में नाम को न छोड़ें. तौरात व इंजील वग़ैरह उनके हाथ में थीं इसलिये उन्हें इसमें कुछ मुश्किल न थी, लेकिन हज़ारों परिवर्तन करने के बाद भी मौजूदा ज़माने की बायबल में हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बशारत का कुछ न कुछ निशान बाक़ी रह ही गया. चुनांचे ब्रिटिश एन्ड फॉरेन बायबल सोसायटी लाहौर 1931 ई. की छपी हुई बायबल में यूहन्ना को इंजील के बाब चौदह की सोलहवीं आयत में है : और मैं बाप से दरख़्वास्त करूंगा तो वह तुम्हें दूसरा मददगार बख़्शेगा कि अबद तक तुम्हारे साथ रहे.” “मददगार” शब्द पर टिप्पणी है उसमें इसके मानी वकील या शफ़ीअ लिखे तो अब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद ऐसा आने वाला जो शफ़ीअ हो, और अबदुल आबाद तक रहे यानी उसका दीन कभी स्थगित न हो, सिवाय सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कौन है.
फिर उन्तीसवीं और तीसवीं आयत में है : “और अब मैंने तुमसे उसके होने से पहले कह दिया है ताकि जब हो जाए तो तुम यक़ीन करो इसके बाद मैं तुमसे बहुत सी बातें नहीं करूंगा क्योंकि दुनिया का सरदार आता है और मुझ में उसका कुछ नहीं”. कैसी साफ़ बशारत है और हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम ने अपनी उम्मत को हुज़ूर की विलादत का कैसा मुन्तज़िर बनाया और शौक़ दिलाया है, और दुनिया का सरदार ख़ास सैयदे आलम का अनुवाद है और यह फ़रमाना कि मुझ में उसका कुछ नहीं, हुज़ूर की महानता का इज़हार और उनके हुज़ूर अपना भरपूर अदब और विनम्रता है. फिर इसी किताब के अध्याय सोलह की सातवीं आयत में है : “लेकिन मैं तुमसे सच कहता हूँ कि मेरा जाना तुम्हारे लिये फ़ायदेमन्द है क्योंकि अगर मैं न जाऊं तो वह मददगार तुम्हारे पास न आएगा लेकिन अगर जाऊं तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा”. इसमें हुज़ूर की बशारत के साथ इसका भी साफ़ इज़हार है कि हुज़ूर ख़ातीमुल अम्बिया हैं. आपका ज़ुहूर जब ही होगा जब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी तशरीफ़ ले जाएं.
इसकी तेरहवीं आयत में है : लेकिन जब वह यानी सच्चाई की रूह आएगा तो तुमको सारी सच्चाई की राह दिखाएगा, इसलिये कि वह अपनी तरफ़ से न कहेगा. लेकिन जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा और तुम्हें आयन्दा की ख़बरें देगा. “ इस आयत में बताया गया कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के आगमन पर दीने इलाही की तकमील हो जाएगी और आप सच्चाई की राह यानी सच्चे दीन को पूरा कर देंगे. इससे यही नतीजा निकलता है कि उनके बाद कोई नबी न होगा और ये कलिमे कि अपनी तरफ़ से न कहेगा जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, ख़ास “मा यन्तिक़ो अनिल हवा इन हुवा इल्ला वहयुंय यूहा “  (और वह कोई बात अपनी ख़्वाहिश से नहीं करते, वह तो नहीं मगर वही जो उन्हें की जाती है – सूरए नज्म, आयत 3) का अनुवाद है, और यह जुमला कि तुम्हें आयंदा की ख़बर देगा, इसमें साफ़ बयान है कि वह नबीये अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़ैबी उलूम तालीम फ़रमाएंगे जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में फ़रमाया : युअल्लिमुकुम मालम तकूनू तअलमून (और तुम्हें वो सिखाया जो तुम नहीं जानते थे) और “मा हुवा अलल ग़ैबे बिदनीन” (और यह नबी ग़ैब बताने में कंजूस नहीं – सूरए तकवीर, आयत 24).

(13) यानी सख़्त तकलीफ़ें जैसे कि तौबह में अपने आप को क़त्ल करना और शरीर के जिन अंगों से गुनाह हुए हों, उनको काट डालना.

(14) यानी मुश्किल आदेश जैसे कि बदन और कपड़े के जिस स्थान को नापाकी लगे उसको कैंची से काट डालना और गुनीमतों का जलाना और गुनाहों का मकानों के दरवाज़ों पर ज़ाहिर होना वग़ैरह.

(15) यानी मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर.

(16) इस नूर से क़ुरआन शरीफ़ मुराद है, जिससे मूमिन का दिल रौशन होता है और शक व जिहालत की अंधेरियाँ दूर होती हैं और शक व यक़ीन का प्रकाश फैलता है.

सूरए अअराफ़ – बीसवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – बीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ ऐ लोगो मैं तुम सबकी तरफ़ उस अल्लाह का रसूल हूँ(1)
कि आसमानों और ज़मीन की बादशाही उसी को है, उसके सिवा कोई मअबूद नहीं, जिलाए और मारे, तो ईमान लाओ अल्लाह और उसके रसूल बेपढ़े ग़ैब बताने वाले पर कि अल्लाह और उसकी बातों पर ईमान लाते हैं और उनकी गुलामी करो कि तुम राह पाओ {158} और मूसा की क़ौम से एक गिरोह है कि हक़ की राह बताता और उसी से (2)
इन्साफ़ करता {159} और हमने उन्हें बाँट दिया बारह क़बीले गिरोह गिरोह और हमने वही भेजी मूसा को जब उससे उसकी क़ौम ने (3)
पानी मांगा कि उस पत्थर पर अपना असा (लाठी) मारो तो उसमें से बारह चश्में फूट निकले(4)
हर गिरोह ने अपना घाट पहचान लिया और हमने उन पर  अब्र(बादल) सायबान किया (5)
और उनपर मन्नो सलवा उतारा, खाओ हमारी दी हुई पाक चीज़ें और उन्होंने(6)
हमारा कुछ नुक़सान न किया लेकिन अपनी ही जानों का बुरा करते थे {160}  और याद करो जब उन (7)
से फ़रमाया गया इस शहर में बसो(8)
और इसमें जो चाहो खाओ और कहो गुनाह उतरे और दर्वाज़े में सिजदा करते दाख़िल हो हम तुम्हारे गुनाह बख़्श देंगे, बहुत जल्द नेकों को ज़्यादा अता फ़रमाएंगे {161} तो उनमे के ज़ालिमों ने बात बदल दी उसके ख़िलाफ़ जिसका उन्हें हुक्म था (9)
तो हमने उनपर आसमान से अज़ाब भेजा बदला उनके जुल्म का (10) {162}


तफ़सीर सूरए अअराफ़ -बीसवाँ रूकू

(1) यह आयत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की आम नबुव्वत की दलील है कि आप सारे जगत के रसूल है और कुल सृष्टि आपकी उम्मत. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस है, हुज़ूर फ़रमाते है, पाँच चीज़ें मुझे ऐसी अता हुई जो मुझसे पहले किसी को न मिली (1) हर नबी ख़ास क़ौम की तरफ़ भेजा जाता था, और मैं लाल और काले की तरफ़ भेजा गया. (2) मेरे लिये ग़नीमतें हलाल की गई और मुझसे पहले किसी के लिये नहीं हुई थीं. (3) मेरे लिये ज़मीन पाक और पाक करने वाली (तयम्मुम के क़ाबिल) और मस्जिद की गई, जिस किसी को कहीं नमाज़ का वक़्त आए वहीं पढ़ ले. (4) दुश्मन पर एक महीने की मुसाफ़त तक मेरा रोब डाल कर मेरी मदद फ़रमाई गई. (5) और मुझे शफ़ाअत अता फ़रमाई गई. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में यह भी है कि मैं तमाम सृष्टि की तरफ़ रसूल बनाकर भेजा गया और मेरे साथ अम्बिया ख़त्म किये गए.

(2) यानी सच्चाई से.

(3) तेह में.

(4) हर गिरोह के लिये एक चश्मा.

(5) ताकि धूप से अम्न में रहें.

(6) नाशुक्री करके.

(7) बनी इस्त्राईल

(8) यानी बैतुल मक़दिस में.

(9) यानी हुक्म तो यह था कि “हित्ततुन” कहते हुए दरवाज़े में दाख़िल हों. हित्तत तौबह और इस्तग़फ़ार का कलिमा है, लेकिन वो बजाय इसके हंसी से “हिन्तत फ़ी शईरा” कहते हुए दाख़िल हुए.

(10) यानी अज़ाब भेजने का कारण उनका ज़ुल्म और अल्लाह के अहकाम का विरोध करना है.

सूरए अअराफ़ – इक्कीसवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – इक्कीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और उनसे हाल पूछो उस बस्ती का कि दरिया किनारे थी (1)
जब वो हफ़्ते के बारे मे हद से बढ़ते (2)
जब हफ़्ते के दिन उनकी मछलियां पानी पर तैरती उनके सामने आती और जो दिन हफ़्ते का न होता, न आतीं, इस तरह हम उन्हें आज़माते थे उनकी बेहुक्मी के कारण{163} और जब उनमें से एक गिरोह ने कहा क्यों नसीहत करते हो उन लोगों को जिन्हें अल्लाह हलाक करने वाला है या उन्हें सख़्त अज़ाब देने वाला, बोले तुम्हारे रब के हुज़ूर माज़िरत (क्षमा याचना) को (3)
और शायद उन्हें डर हो (4){164}
फिर जब भूला बैठे जो नसीहत उन्हें हुई थी हमने बचा लिये वो जो बुराई से मना करते थे और ज़ालिमों को बुरे अज़ाब में पकड़ा बदला उनकी नाफ़रमानी का {165} फिर जब उन्हों ने मुमानिअत (निषेध) के हुक्म से सरकशी (बग़ावत) की हमने उनसे फ़रमाया हो जाओ बन्दर धुतकारे हुए (5){166}
और जब तुम्हारे रब ने हुक्म सुना दिया कि ज़रूर क़यामत के दिन तक उन (6)
पर ऐसे को भेजता रहूंगा जो उन्हें बुरी मार चखाए(7)
बेशक तुम्हारा रब ज़रूर ज़ल्द अज़ाब वाला है (8)
और बेशक वह बख़्शने वाला मेहरबान है(9){167}
और उन्हें हमने ज़मीन में बिखेर दिया गिरोह गिरोह, उनमें कुछ नेक हैं (10)
और कुछ और तरह के(11)
और हमने उन्हें भलाईयों और बुराईयों से आज़माया कि कहीं वो रूजू लाएं (12){168}
फिर उनकी जगह उनके बाद वो (13)
नाख़लफ़ आए कि किताब के वारिस हुए (14)
इस दुनिया का माल लेते हैं (15)
और कहते अब हमारी बख़्शिश होगी (16)
और अगर वैसा ही माल उनके पास और आए तो ले लें (17)
क्या उनपर किताब में अहद न लिया गया कि अल्लाह की तरफ़ निस्बत न करें मगर हक़ और उन्होंने इसे पढ़ा (18)
और बेशक पिछला घर बेहतर है परहेज़गारों को (19)
तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं {169} और वो जो किताब को मज़बूत थामते हैं (20)
और उन्होंने नमाज़ क़ायम रखी, और हम नेको का नेग नहीं गंवाते {170}
और जब हमने पहाड़ उनपर उठाया मानो वह सायबान (छप्पर) है और समझो कि वह उनपर गिर पड़ेगा (21)
लो जो हमने तुम्हें दिया ज़ोर से (22)
और याद करो जो उसमें है कि कहीं परहेज़गार हो {171}

सूरए अअराफ़ – इक्कीसवाँ रूकू

(1)  हज़रत नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ख़िताब है कि आप अपने क़रीब रहने वाले यहूदियों से इस बस्ती वालों का हाल पूछें. इस सवाल का मकसद यह था कि क़ाफ़िरों पर ज़ाहिर कर दिया जाय कि कुफ़्र और बुराई उनका पुराना तरीका है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और हुज़ूर के चमत्कारों का इन्कार करना, यह उनके लिये कोई नई बात नहीं है. उनके पहले भी कुफ़्र पर अड़े रहे हैं. इसके बाद उनके पूर्वजों का हाल बयान फ़रमाया, कि वो अल्लाह के हुक्म के विरोध के कारण बन्दरों और सुअरों की शक्ल में बिगाड़ दिये गए. इस बस्ती में इख़्तिलाफ़ है कि वह कौन सी थी, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वह एक गाँव मिस्र और मदीना के बीच है. एक क़ौल है कि मदयन व तूर के बीच. ज़हरी ने कहा कि वह गाँव तबर्रियए शाम है ओर हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा की एक रिवायत में है कि वह मदयन है. कुछ ने कहा ईला है. हक़ीक़त का इल्म अल्लाह तआला को है.

(2) कि पाबन्दी के बावुजूद शनिवार के रोज़ शिकार करते. इस बस्ती के लोग तीन गिरोहों में बंट गए थे. एक तिहाई ऐसे लोग थे जो शिकार से बाज़ रहे और शिकार करने वालों को मना करते थे और एक तिहाई ख़ामोश थे,  दूसरों को मना न करते थे, और मना करने वालों से कहते थे, ऐसी क़ौम को क्यों, नसीहत करते हो जिन्हें अल्लाह हलाक करने वाला है. और एक गिरोह वो ख़ताकार लोग थे जिन्हों ने अल्लाह के हुक्म का विरोध किया और शिकार किया और खाया और बेचा और जब वो इस बुराई से बाज़ न आए तो मना करने वाले गिरोह ने कहा कि हम तुम्हारे साथ रहन सहन न रखेंगे और गांव को तक़सीम करके बीच में एक दीवार खींच दी. मना करने वालों का एक दरवाज़ा अलग था, जिससे आते जाते थे. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने ख़ताकारों पर लअनत की. एक रोज़ मना करने वालों ने देखा कि ख़ताकारों में से कोई न निकला, तो उन्होंने ख़्याल किया कि शायद आज शराब के नशे में मदहोश हो गए होंगे. उन्हें देखने के लिये दीवार पर चढ़े तो देखा कि वो बन्दरों की शक्ल कर दिये गए थे.  अब ये लोग दरवाज़ा खोल कर दाख़िल हुए तो वो बन्दर अपने रिश्तेदारों को पहचानते थे, और उनके पास आकर कपड़े सूंघते थे और ये लोग इन बन्दर हो जाने वालों को नहीं पहचानते थे. इन लोगों ने उनसे कहा, क्या हम लोगों ने तुम से मना नहीं किया था, उन्होंने सर के इशारे से कहा हाँ. और वो सब हलाक हो गए और मना करने वाले सलामत रहे.

(3) ताकि हमपर बुरी बातों से रोकना छोड़ने का इल्ज़ाम न रहे.

(4) और वो नसीहत से नफ़ा उठा सके.

(5) वो बन्दर हो गए और तीन रोज़ इसी हाल में रहकर हलाक हो गए.

(6)  यहूदी लोग.
(7) चुनांचे उनपर अल्लाह तआला ने बख़्त नस्सर और संजारेब और रोम के बादशाहों को भेजा जिन्होंने उन्हें सख़्त तकलीफ़ें दीं और क़यामत तक के लिये उनपर जिज़िया और ज़िल्लत लाज़िम हुई.

(8) उनके लिये, जो कुफ़्र पर क़ायम रहे. इस आयत से साबित हुआ कि उनपर अज़ाब हमेशा रहेगा, दूनिया में भी और आख़िरत में भी.

(9) उनको, जो अल्लाह की फ़रमाँबरदारी करें और ईमान लाएं.

(10) जो अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए और दीन पर जमे रहे.

(11) जिन्हों ने नाफ़रमानी की और जिन्हों ने कुफ़्र किया और दीन को बदला.

(12) भलाइयों से नेअमत व राहत, और बुराइयों से सख़्ती और तकलीफ़ मुराद है.

(13) जिनकी दो क़िस्में बयान फ़रमाई गई.

(14) यानी तौरात के, जो उन्होंने अपने पूर्वजों से पाई और इसके हलाल व हराम से सम्बन्धित आदेशों को जाना. मदारिक में है कि ये लोग हैं जो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने में थे उनकी हालत यह है कि…

(15) अहकाम में हेर फेर और कलाम में रद्दोबदल के लिये रिश्वत के तौर पर. और वो जानते भी हैं कि यह हराम है, फिर भी  इस महापाप पर डटे हैं.

(16) और इन गुनाहों पर हम से कुछ हिसाब न लिया जाएगा.

(17) और आयन्दा भी गुनाह करते चले जाएं. सदी ने कहा कि बनी इस्राईल में कोई क़ाज़ी ऐसा न था जो रिश्वत न ले. जब उससे कहा जाता था कि तुम रिश्वत लेते हो तो कहता था कि यह गुनाह बख़्श दिया जाएगा. उसके ज़माने में दूसरे उसको ताना देते बुरा भला कहते, लेकिन जब वह मर जाता या ओहदे से हटा दिया और वही बुरा भला कहने वाले उसकी जगह हाकिम या काज़ी बनते तो वो भी उसी तरह रिश्वत लेते.

(18) लेकिन इसके बावुज़ूद उन्होंने इसके ख़िलाफ़ किया. तौरात में गुनाह पर जमने वालों के लिये माफ़ी का वादा न था. तो उनका गुनाह किये जाना, तौबह न करना और उसपर यह कहना कि हमारी पकड़ न होगी, यह अल्लाह पर झूट बांधना है.

(19) जो अल्लाह के अज़ाब से डरें और रिश्वत व हराम से बचें और उसकी फ़रमाँबरदारी करें.

(20) और उसके अनुसार अमल करते हैं और उसके सारे आदेशों को मानते हैं और उसमें परिवर्तन और तबदीली रवा नहीं रखते. यह आयत एहले किताब में से हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम वग़ैरह ऐसे लोगों के हक़ में नाज़िल हुई जिन्होंने पहली किताब का अनुकरण किया, उसमें फेर बदल न किया. उसकी विषय सामग्री को यानी मज़मून को न छुपाया और उस किताब के अनुकरण की बदौलत उन्हें क़ुरआन शरीफ़ पर ईमान नसीब हुआ. (ख़ाज़िन व मदारिक)

(21) जब बनी इस्राईल ने सख़्त तक़लीफ़ों की वजह से तौरात के अहक़ाम के क़ुबूल करने से इन्कार किया तो हज़रत जिब्रील ने अल्लाह के हुक्म से एक पहाड़ जिसका आकार उनके लश्कर के बराबर यानी एक फ़रसंग लम्बाई और एक फ़रसंग चौड़ाई थी, उठाकर सायबान की तरह उनके सरों के क़रीब कर दिया और उनसे कहा गया कि तौरात के आदेश क़ुबूल करो वरना यह पहाड़ तुम पर गिरा दिया जाएगा, पहाड़ को सरों पर देखकर सब सिज्दे में गिर गए मगर इस तरह कि बायाँ गाल और भौं तो उन्हें सिज्दे में रख दी और दाईं आँख से पहाड़ को देखते रहे कि कहीं गिर न पड़े. चुनांचे अब तक यहूदियों के सज्दे की यही शान है.

(22) इरादे और कोशिश से.

सूरए अअराफ़ – बाईसवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – बाईसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और ऐ मेहबूब याद करो जब तुम्हारे रब ने आदम की औलाद की पीठ से उनकी नस्ल निकाली और उन्हें ख़ुद उनपर गवाह किया, क्या मैं तुम्हारा रब नहीं (1)
सब बोले क्यों नहीं हम गवाह हुए (2)
कि कहीं क़यामत के दिन कहो कि हमें इसकी ख़बर न थी (3){172}
या कहो कि शिर्क तो पहले हमारे बाप दादा ने किया और हम उनके बाद बचे हुए (4)
तो क्या तू हमें उसपर हलाक फ़रमाएगा जो बातिल वालों ने किया (5){173}
और हम इसी तरह आयतें रंग रंग से बयान करते हैं (6)
और इसलिये कि कहीं वो फिर आएं (7){174}
और ऐ मेहबूब उन्हें उसका अहवाल सुनाओ जिसे हमने अपनी आयतें दीं (8)
तो वह उनसे साफ़ निकल गया(9){175}
और हम चाहते तो आयतों के कारण उसे उठा लेते (10)
मगर वह तो ज़मीन पकड़ गया (11)
और अपनी ख़्वाहिश का ताबे (अधीन) हुआ, तो उसका हाल कुत्ते की तरह है तू उसपर हमला करे तो ज़बान निकाले और छोड़ दे तो ज़बान निकाले (12)
यह हाल है उनका जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाईं तो तुम नसीहत सुनाओ कि कहीं वो ध्यान करें {176} क्या बुरी कहावत है उनकी जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई और अपनी ही जान का बुरा करते थे{177} जिसे अल्लाह राह दिखाए तो वही राह पर है और जिसे गुमराह करे तो वही नुक़सान में रहे {178} और बेशक हमने जहन्नम के लिये पैदा किये बहुत जिन्न और आदमी (13)
वो दिल रखते हैं जिन में समझ नहीं (14)
और वो आँखें जिन से देखते नहीं (15)
और वो कान जिन से सुनते नहीं (16)
वो चौपायों की तरह है (17)
बल्कि उनसे बढ़कर गुमराह (18)
वही ग़फ़लत में पड़े हैं {179} और अल्लाह ही के हैं बहुत अच्छे नाम(19)
तो उसे उनसे पुकारो और उन्हें छोड़ दो जो उसके नामों में हक़ से निकलते हैं (20)
वो जल्द अपना किया पाएंगे {180} और हमारे बनाए हुओ में एक गिरोह वह है कि हक़ बताएं और उसपर इन्साफ़ करें (21) {181}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – बाईसवाँ रूकू

(1) हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की पीठ से उनकी सन्तान निकाली और उनसे एहद लिया. आयतों और हदीसों दोनों पर नज़र करने से यह मालूम होता है कि सन्तान का निकालना इस सिलसिले के साथ था जिस तरह कि दुनिया में एक दूसरे से पैदा होंगे और उनके लिये रबूबियत और वहदानियत की दलीलें क़ायम फ़रमा कर और अक्ल देकर उनसे अपनी रबूबियत की शहादत तलब फ़रमाई.

(2) अपने ऊपर, और हमने तेरी रबूबियत और वहदानियत का इक़रार किया. यह गवाह होना इसलिये है…

(3) हमें कोई चेतावनी नहीं दी गई थी.

(4) जैसा उन्हें देखा, उनके अनुकरण और शासन में वैसा ही करते रहे.

(5) यह उज़्र करने का मौक़ा न रहा, जब कि उनसे एहद ले लिया गया और उनके पास रसूल आए और उन्होंने उस एहद को याद दिलाया और तौहीद पर प्रमाण क़ायम हुए.

(6) ताकि बन्दे समझ से काम लेकर और विचार करके सत्य और ईमान क़ुबूल करें.

(7) शिर्क व कुफ़्र से तौहीद व ईमान की तरफ़ और चमत्कार वाले नबी के बताने से अपने एहदे मीसाक़ को याद करें और उसके अनुसार अमल करें.

(8) यानी बलअम बाऊर जिसका वाक़िआ मुफ़स्सिरों ने इस तरह बयान किया है कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जब्बारीन से जंग करने का इरादा किया और साम प्रदेश में तशरीफ़ लाए तो बलअम बाऊर की क़ौम उसके पास आई और उससे कहने लगी कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बहुत तेज़ मिज़ाज हैं और उनके साथ बड़ा लश्कर है. वो यहाँ आए हैं, हमें हमारे क्षेत्र से निकाल देंगे और क़त्ल करेंगे और हमारी जगह बनी इस्राईल को इस प्रदेश में आबाद करेंगे, तेरे पास इस्मे आज़म है और तेरी दुआ क़ुबूल होती है तो निकल और अल्लाह तआला से दुआ कर कि अल्लाह तआला उन्हें यहाँ से हटा दे. बलअम बाऊर ने कहा, तुम्हारा बुरा हो, हज़रत मूसा नबी हैं और उनके साथ फ़रिश्ते हैं और ईमानदार लोग हैं, मैं कैसे उनपर दुआ करूं. मैं जानता हूँ, जो अल्लाह तआला के नज़दीक उनका दर्जा है, अगर मैं ऐसा करूं तो मेरी दुनिया और आख़िरत बर्बाद हो जाएगी. मगर क़ौम उसपर ज़ोर देती रही और बहुत रोई पीटी. बलअम बाऊर ने कहा कि मैं अपने रब की मर्ज़ी मालूम कर लूं और उसका यही तरीक़ा था कि जब कोई दुआ करता, पहले अल्लाह की मर्ज़ी मालूम कर लेता और ख़्वाब में उसका जवाब मिल जाता. चुनांचे इस बार भी उसको यही जवाब मिला कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनके साथियों के ख़िलाफ़ दुआ न करना. उसने क़ौम से कह दिया कि मैंने अपने रब से इजाज़त चाही थी मगर मेरे रब ने उनपर दुआ करने की मुमानिअत फ़रमा दी. तब क़ौम ने उसको तोहफ़े और नज़राने दिये जो उसने क़ुबूल किये. और क़ौम ने अपना सवाल जारी रखा तो फिर दूसरी बार बलअम बाऊर ने रब तबारक व तआला से इजाज़त चाही. उसका कुछ जवाब न मिला. उसने क़ौम से कह दिया कि मुझे इस बार कुछ जवाब ही न मिला. क़ौम के लोग कहने लगे कि अगर अल्लाह को मंजूर न होता तो वह पहले की तरह दोबारा भी मना फ़रमाता और क़ौम का जोर और भी ज़्यादा हुआ. यहाँ तक कि उन्होंने उसको फ़ितने में डाल दिया और आख़िरकार वह बददुआ करने के लिये पहाड़ पर चढ़ा तो जो बददुआ करता था, अल्लाह तआला उसकी ज़बान उसकी क़ौम की तरफ़ फेर देता था और अपनी क़ौम के लिये जो भलाई की दुआ करता था, बजाय क़ौम के बनी इस्राईल का नाम उसकी ज़बान पर आता था. क़ौम ने कहा ऐ बलअम यह क्या कर रहा है, बनी इस्राईल के लिये दुआ कर रहा है और हमारे लिये बददुआ. कहा यह मेरे इख़्तियार की बात नहीं, मेरी ज़बान मेरे क़ाबू में नहीं है. और उसकी ज़बान बाहर निकल पड़ी तो उसने अपनी क़ौम से कहा, मेरी दुनिया और आख़िरत दोनो बर्बाद हो गई. इस आयत में उसका बयान है.

(9) और उनका अनुकरण न किया.

(10) और ऊंचा दर्जा अता फ़रमा कर नेकों की मंजिल में पहुंचाते.

(11) और दुनिया के जादू में आ गया.

(12) यह एक ज़लील जानवर के साथ तशबीह है कि दुनिया का लालच रखने वाला अगर उसको नसीहत करो तो मुफ़ीद नहीं, वह लालच में जकड़ा रहता है, छोड़ दो तो उसी लालच मे गिरफ़्तार. जिस तरह ज़बान निकालना कुत्ते की लाज़मी तबीअत है, ऐसे ही लालच उनके लिये लाज़िम हो गया.

(13) यानी काफ़िर जो अल्लाह की निशानियों को अच्छी तरह जान कर उनसे मुंह फेरते हैं और उनका काफ़िर होना अल्लाह के इल्मे अज़ली में है.

(14) यानी सच्चाई से मुंह फेर के अल्लाह की निशानियों के देखने समझने से मेहरूम हो गए और यही दिल का ख़ास काम था.

(15) सच्चाई और हिदायत की राह और अल्लाह की निशानियाँ और उसके एक होने के प्रमाण.

(16) उपदेश और नसीहत को मानने वाले कानों से सुनने और दिल व हवास रखने के बावूजूद वो दीन की बातों में उनसे नफ़ा नहीं उठाते, लिहाज़ा.

(17) कि अपने दिल और सोचने, देखने, समझने की शक्तियों से अल्लाह तआला की पहचान नहीं करते है. खाने पीने के दुनियावी कामों में सारे हैवानात भी अपने हवास से काम लेते हैं. इन्सान भी इतना ही करता रहा तो उसको जानवरों पर क्या बरतरी और बुज़ुर्गी.

(18) क्योंकि चौपाया भी अपने फ़ायदे की तरफ़ बढ़ता है और नुक़सान से बचता और उससे पीछे हटता है. और काफ़िर जहन्नम की राह चलकर अपना नुक़सान इख़्तियार करता है, तो उससे बदतर हुआ. जब आदमी की रूह शहवात यानी वासनाओ पर ग़ालिब आ जाती है तो वह फ़रिश्तों से बढ़ जाता है, और जब वासनाएं रूह पर ग़ालिब आ जाती है तो ज़मीन के जानवरों से बदतर हो जाता है.

(19) हदीस शरीफ़ में है, अल्लाह तआला के निनानवे नाम जिस किसी ने याद कर लिये, जन्नती हुआ. उलमा की इसपर सहमित है कि अल्लाह के नाम निनानवे की संख्या में घिरे नहीं हैं, हदीस का मतलब सिर्फ़ यह है कि इतने नामों के याद करने से इन्सान जन्नती हो जाता है. अबू जहल ने कहा था कि मुहम्मद का दावा तो यह है कि यह एक परवर्दिगार की इबादत करते हैं फिर वह अल्लाह और रहमान दो को क्यों पुकारते हैं. इस पर यह आयत उतरी और उस कम अक्ल़ जाहिल को बताया गया कि मअबूद तो एक ही है, नाम उसके बहुत है.

(20) उसके नामों में हक़ और इस्तिक़ामत से निकलना कई तरह पर है. एक तो यह है कि उसके नामों को कुछ बिगाड़ कर ग़ैरों पर लागू करना, जैसे कि मुश्रिकों ने इलाह का लात, और अज़ीज़ का उज्ज़ा, और मन्नान का मनात करके अपने बुतों के नाम रखे थे, यह नामों में सच्चाई से मुंह फेरना और नाजायज़ है. दूसरे यह कि अल्लाह तआला के लिये ऐसा नाम मुक़र्रर किया जाए जो क़ुरआन व हदीस में न आया हो, यह भी जायज़ नहीं. जैसे कि सख़ी या रफ़ीक़ कहना. तीसरे हुस्ने अदब की रिआयत करना, तो फ़क़त या-दारों, या-मानिओ कहना जायज़ नहीं. बल्कि दूसरे नामों के साथ मिलाकर कहा जाएगा, या दारों, या नाफ़िओ, या मुअतियो, या ख़ालिक़ुल ख़ल्क़. चौथे यह कि अल्लाह तआला के लिये कोई ऐसा नाम मुक़र्रर किया जाए, जिसके मानी ग़लत हों, यह भी सख़्त नाजायज़ है. पाँचवें, ऐसे नाम रखना जिनका मतलब मालूम नहीं, और यह नहीं जाना जा सकता कि वो अल्लाह तआला की शान के लायक़ हैं या नहीं.

(21) यह गिरोह सच्चाई की राह दिखाने वाले उलमा का है. इस आयत से मसअला साबित हुआ कि हर ज़माने के एहले हक़ की सहमति हुज्जत है. और यह भी साबित हुआ कि कोई ज़माना हक़ परस्तों और दीन की हिदायत देने वालों से ख़ाली न होगा, जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि मेरी उम्मत का एक गिरोह क़यामत तक सच्चे दीन पर क़ायम रहेगा, उसको किसी की दुश्मनी और विरोध नुक़सान न पहुंचा सकेगी.

सूरए अअराफ़ – तेईसवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – तेईसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाईं जल्द हम उन्हें आहिस्ता आहिस्ता(1)
अज़ाब की तरफ़ ले जाएंगे जहाँ से उन्हें ख़बर न होगी {182} और में उन्हें ढील दूंगा(2)
बेशक मेरी छुपवाँ तदबीर (युक्ति) बहुत पक्की है(3){183}
क्या सोचते नहीं कि उनके साहब को जुनून से कोई इलाक़ा नहीं, वो तो साफ़ डर सुनाने वाले हैं (3){184}
क्या उन्होंने निगाह की आसमानों और ज़मीन की सल्तनत में और जो चीज़ अल्लाह ने बनाई (5)
और यह कि शायद उनका वादा नज़दीक आ गया हो (6)
तो इसके बाद और कौन सी बात पर यक़ीन लाएंगे(7){185}
जिसे अल्लाह गुमराह करे उसे कोई राह दिखाने वाला नहीं और उन्हें छोड़ता है कि अपनी सरकशी में भटका करें{186} तुम से क़यामत को पूछते हैं (8)
कि वह कब को ठहरी है, तुम फ़रमाओ इसका इल्म तो मेरे रब के पास है उसे वही उसके वक़्त पर ज़ाहिर करेगा (9)
भारी पड़ रही है आसमानों और ज़मीन में, तुम पर न आएगी मगर अचानक, तुम से ऐसा पूछते हैं मानो तुमने उसे ख़ूब तहक़ीक़ कर (खोज) रखा है तुम फ़रमाओ इसका इल्म तो अल्लाह ही के पास है लेकिन बहुत लोग जानते नहीं(10){187}
तुम फ़रमाओ मैं अपनी जान के भले बुरे का ख़ुद मुख़्तार नहीं (11)
मगर जो अल्लाह चाहे (12)
और अगर मैं ग़ैब जान लिया करता तो यूं होता कि मैंने बहुत भलाई जमा करली और मुझे कोई बुराई न पहुंची(13)
मैं तो यही डर (14)
और ख़ुशी सुनाने वाला हूँ उन्हें जो ईमान रखते हैं {188}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – तेईसवाँ रूकू

(1)  यानी एक के बाद एक, दर्जा ब दर्जा.

(2) उनकी उम्रें लम्बी करके.

(3) जब नबीये अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सफ़ा पहाड़ी पर चढ़ कर रात के वक़्त एक एक क़बीले को पुकारा  और फ़रमाया कि मैं तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से डराने वाला हूँ और आपने उन्हें अल्लाह का ख़ौफ़ दिलाया और पेश आने वाले वाक़िआत और घटनाऔ का ज़िक्र किया तो उनमें से किसी ने आपकी तरफ़ जुनून की निस्बत की. इसपर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया क्या उन्हों ने सोच और समझदारी से काम न लिया और आक़िबत अन्देशी और दूरदर्शता बिल्कुल छोड़ दी और यह देखकर कि नबियों के सरदार मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बातों और कामों में उनके विपरीत हैं और दुनिया और इसकी लज़्ज़तों से आपने मुंह फेर लिया है और आख़िरत की तरफ़ ध्यान लगा दिया है और अल्लाह तआला की तरफ़ बुलाने और उसका ख़ौफ़ दिलाने में रात दिन मशग़ूल हैं, उन लोगों ने आपकी तरफ़ जुनून की निस्बत करदी, यह उनकी ग़लती है.

(5) इन सब में उसकी वहदानियत और भरपूर हिकमत और क़ुदरत की रौशन दलीलें हैं.

(6) और वो कुफ़्र पर मर जाएं और हमेशा के लिये जहन्नमी हो जाएं, ऐसे हाल में समझ वाले पर ज़रूरी है कि वह सोचे समझे, दलीलों पर नज़र करे.

(7) यानी क़ुरआन शरीफ़ के बाद और कोई रसूल आने वाला नहीं जिसका इन्तिज़ार हो, क्योंकि आप पर नबियों का सिलसिला ख़त्म हो गया.

(8) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि यहूदियों ने नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप नबी हैं तो हमें बताईये कि क़यामत कब क़ायम होगी, क्योंकि हमें उसका वक़्त मालूम है. इसपर यह आयत उतरी.

(9) क़यामत के वक़्त का बताना रिसालत के लवाज़िम से नहीं है जैसा कि तुमने क़रार दिया और ऐ यहूदियों तुम ने जो उसका वक़्त जानने का दावा किया, ये भी ग़लत है. अल्लाह तआला ने इसको छुपा कर रखा है, और इसमें उसकी हिकमत है.

(10) इसके छुपा कर रखे जाने की हिकमत तफ़सीरे रूहुल बयान में है कि कुछ बुज़ुर्ग इस तरफ़ गए हैं कि नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला के बताए से क़यामत का वक़्त मालूम है और ये इस आयत के विषय के विरूध्द नहीं.

(11) ग़ज़वए बनी मुस्तलक़ से वापसी के वक़्त राह में तेज़ हवा चली. चौपाए भागे तो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़बर दी कि मदीनए तैय्यिबह में रिफ़ाआ का इन्तिक़ाल हो गया और यह भी फ़रमाया कि देखो मेरी ऊंटनी कहाँ है. अब्दुल्लाह बिन उबई मुनाफ़िक़ अपनी क़ौम से कहने लगा इनका कैसा अजब हाल है कि मदीने में मरने वाले की ख़बर तो दे रहे हैं और अपनी ऊंटनी का पता नहीं मालूम कि कहाँ है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर उसका यह क़ौल भी छुपा न रहा. हुज़ूर ने फ़रमाया मुनाफ़िक़ लोग ऐसा ऐसा कहते हैं और मेरी ऊंटनी उस घाटी में है और उसकी नकेल एक दरख़्त में उलझ गई है. चुनांचे जैसा फ़रमाया था उसी शान से ऊंटनी पाई गई. इस पर यह आयत उतरी. ऐसा (तफ़सीरे कबीर)

(12) वह हक़ीक़ी मालिक है, जो कुछ है उसकी अता से है.

(13) यह कलाम अदब और विनम्रता के तौर पर है. मानी ये हैं कि मैं अपनी ज़ात से ग़ैब नहीं जानता. जो जानता हूँ वह अल्लाह तआला के बताए से और उसकी अता से. (ख़ाज़िन). आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया, भलाई जमा करना और बुराई न पहुंचना उसी के इख़्तियार में हो सकता है जो ज़ाती क़ुदरत रखे और ज़ाती क़ुदरत वही रखेगा जिसका इल्म भी ज़ाती हो, क्योंकि जिसकी एक सिफ़त ज़ाती है, उसकी सारी सिफ़ात ज़ाती. तो मानी ये हुए कि अगर मुझे ग़ैब का इल्म ज़ाती होता तो क़ुदरत भी ज़ाती होती और मैं भलाई जमा कर लेता और बुराई न पहुंचने देता. भलाई से मुराद राहतें और कामयाबियाँ और दुश्मनों पर ग़ल्बा है. यह भी हो सकता है कि भलाई से मुराद सरकशों का मुतीअ, और नाफ़रमानों का फ़रमाँबरदार, और काफ़िरों का मूमिन कर लेना हो और बुराई से बदबख़्त लोगों का बावुजूद दावत के मेहरूम रह जाना. तो हासिले कलाम यह होगा कि अगर मैं नफ़ा नुक़सान का ज़ाती इख़्तियार रखता तो ऐ मुनाफ़िकों  और काफ़िरों, तुम सबको मूमिन कर डालता और तुम्हारी कुफ़्र की हालत देखने की तकलीफ़ मुझे न पहुंचती.

(14) सुनाने वाला हूँ काफ़िरों को.

सूरए अअराफ़ – चौबीसवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – चौबीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
वही है जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया(1)
और उसी में से उसका जोड़ा बनाया(2)
कि उससे चैन पाए, फिर जब मर्द उसपर छाया उसे एक हलका सा पेट रह गया (3)
तो उसे लिये फिरा कि, फिर जब बोझल पड़ी, दोनो ने अपने रब से दुआ की – ज़रूर अगर तू हमें जैसा चाहे बच्चा देगा तो बेशक हम शुक्रगुजार होंगे {189} फिर जब उसने उन्हें जैसा चाहिये बच्चा अता फ़रमाया, उन्होंने उसकी अता में उसके साझी ठहराए, तो अल्लाह बरतरी है उनके शिर्क से (4){190}
क्या उसे शरीक करते हैं जो कुछ न बनाए(5)
और वो ख़ुद बनाए हुए हैं {191} और न उनको कोई मदद पहुंचा सकें और न अपनी जानों की मदद करें (6){192}और अगर तुम उन्हें (7)
राह की तरफ़ बुलाओ तो तुम्हारे पीछे न आए (8)
तुमपर एक सा है चाहे उन्हें पुकारो या चुप रहो (9){193}
बेशक वो जिनको तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो तुम्हारी तरह बन्दे हैं (10)
तो उन्हें पुकारो फिर वो तुम्हें जवाब दें अगर तुम सच्चे हो {194} क्या उनके पाँव हैं जिनसे चलें या उनके हाथ हैं जिनसे गिरफ़तार (पकड़) करें या उनकी आँखें हैं जिनसे देखें या उनके कान हैं जिनसे सुनें (11)
तुम फ़रमाओ कि अपने शरीकों को पुकारो और मुझपर दाव चलो और मुझे मोहलत न दो (12){195}
बेशक मेरा वाली अल्लाह है जिसने किताब उतारी (13)
और वह नेको को दोस्त रखता है (14){196}
और जिन्हें उसके सिवा पूजते हो वो तुम्हारी मदद नहीं कर सकते और न ख़ुद अपनी मदद करें (15){197}
और अगर तुम उन्हें राह की तरफ़ बुलाओ तो न सुनें और तू उन्हें देखे कि वो तेरी तरफ़ देख रहे हैं (16)
और उन्हें कुछ भी नहीं सूझता{198} ऐ मेहबूब माफ़ करना इख़्तियार करो और भलाई का हुक्म दो और जाहिलों से मुंह फेर लो {199} और ऐ सुनने वाले अगर शैतान तुझे कोई कौंचा (17)
दे तो अल्लाह की पनाह मांग बेशक वही सुनता जानता है {200} बेशक वो जो डर वाले हैं जब उन्हें किसी शैतानी ख़याल की ठेस लगती है होशियार हो जाते हैं उसी वक़्त उनकी आँखें खुल जाती हैं (18){201}
और वो जो शैतानों के भाई हैं (19)
शैतान उन्हें गुमराही में खींचते हैं फिर कमी नहीं करते {202} और ऐ मेहबूब जब तुम उनके पास कोई आयत न लाओ तो कहते हैं तुमने दिल से क्यों न बनाई तुम फ़रमाओ मैं तो उसी की पैरवी करता हूँ जो मेरी तरफ़ मेरे रब से वही (देववाणी) होती है, यह तुम्हारे रब की तरफ़ से आँखें खोलना है और हिदायत और रहमत मुसलमानों के लिये {203} और जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे कान लगाकर सुनो और ख़ामोश रहो कि तुम पर रहम हो (20){204}
और अपने रब को अपने दिल मे याद करो (21)
ज़ारी (विलाप) और डर से और बे आवाज़ निकले ज़बान से सुबह और शाम (22)
और ग़ाफ़िलों मे न होना {205} बेशक वो जो तेरे रब के पास हैं (23)
उसकी इबादत से घमण्ड नहीं करते और उसकी पाकी बोलते और उसी को सज्दा करते हैं (24){206}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ चौबीसवाँ रूकू

(1) अकरमा का क़ौल है कि इस आयत में आम ख़िताब है हर एक शख़्स को, और मानी ये हैं कि अल्लाह वही है जिसने तुममें से हर एक को एक जान से यानी उसके बाप से पैदा किया और उसकी जिन्स से उसकी बीवी को बनाया, फिर जब वो दोनो जमा हुए और गर्भ ज़ाहिर हुआ और इन दोनों ने तन्दुरूस्त बच्चे की दुआ की और ऐसा बच्चा मिलने पर शुक्र अदा करने का एहद किया फिर अल्लाह तआला ने उन्हें वैसा ही बच्चा इनायत फ़रमाया, उनकी हालत यह हुई कि कभी तो वो उस बच्चे की निस्बत प्राकृतिक तत्वों की तरफ़ करते जैसा कि दहरियों का हाल है. कभी सितारों की तरफ़, जैसे सितारों की पूजा करने वालों का हाल है, कभी बुतों की तरफ़, जैसा कि बुत परस्तों का तरीक़ा है. अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि वह उनके शिर्क से बरतर है. (तफ़सीरे कबीर)

(2) यानी उसके बाप की जिन्स से उसकी बीवी बनाई.

(3) मर्द का छाना इशारा है हमबिस्तर होने से और हलका सा पेट रहना, गर्भ के शुरू की हालत का बयान है.

(4) कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि इस आयत में क़ुरैश को ख़िताब है जो क़ुसई की औलाद हैं उनसे फ़रमाया गया कि तुम्हें एक शख़्स क़ुसई से पैदा किया और उसकी बीबी उसी की जिन्स से अरबी क़र्शी की, ताकि उससे चैन व आराम पाए, फिर जब उनकी दरख़्वास्त के मुताबिक उन्हें तन्दुरूस्त बच्चा इनायत किया तो उन्होंने अल्लाह की इस अता में दूसरों को शरीक बनाया और अपने चारों बेटों का नाम अबदे मनाफ़, अब्दुल उज़्ज़ा, अब्दे क़ुसई और अब्दुद दार रखा.

(5) यानी बुतों को, जिन्हों ने कुछ नहीं बनाया.

(6) इसमें बुतों की बेक़ुदरती, शिर्क के ग़लत होने का बयान और मुश्रिकों की भरपूर जिहालत का इज़हार है, और बताया गया है कि इबादत का मुस्तहक़ वही हो सकता है जो इबादत करने वाले को नफ़ा पहुंचाए और उसका नुक़सान दूर करने की क़ुदरत रखता हो, मुश्रिक जिन बुतों को पूजते हैं उनकी बेक़ुदरती इस दर्जें की है कि वो किसी चीज़ के बनाने वाले नहीं, किसी चीज़ के बनाने वाले तो क्या होते, ख़ुद अपनी ज़ात में दूसरे से बेनियाज़ नहीं, आप मख़लूक़ है, बनाने वाले के मोहताज हैं. इससे बढ़कर बेइख़्तियारी यह है कि वो किसी की मदद नहीं कर सकते और किसी की क्या मदद करें, खुद उन्हें नुक़सान पहुंचे तो दूर नहीं कर सकते. कोई उन्हों तोड़ दे, गिरा दे, जो चाहे करे, वो उससे अपनी हिफ़ाज़त नहीं कर सकते, ऐसे मजबूर, बेइख़्तियार को पूजना इन्तिहा दर्जे की जिहालत है.

(7) यानी बुतों को .

(8) क्योंकि वो न सुन सकते हैं, न समझ सकते हैं.

(9) वो हर हाल में मजबूर व बेबस हैं. ऐसे को पूजना और मअबूद बनाना बड़ी कम अक़्ली है.

(10) और अल्लाह के बन्दे और मख़लुक़ किसी तरह पूजने के क़ाबिल नहीं, इसपर भी अगर तुम उन्हें मअबूद कहते हो.

(11) यह कुछ भी नहीं, तो फिर अपने से कमतर को पूजकर क्यों ज़लील होते हो.

(12) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जब बुत परस्ती की आलोचना और त्रस्कार किया और बुतों की बेइख़्तियारी का बयान फ़रमाया, तो मुश्रिकों ने धमकाया और कहा कि बुतों को बुरा कहने वाले तबाह हो जाते हैं, बर्बाद हो जाते हैं, ये बूत उन्हें हलाक कर देते हैं. इसपर यह आयत उतरी कि अगर बुतों में कुछ क़ुदरत समझते हो तो उन्हें पुकारो और मुझे नुक़सान पहुंचाने में उनसे मदद लो. और तुम भी जो धोखा धड़ी कर सकते हो, वह मेरे मुक़ाबले में करो और उसमें देर न करो मुझे तुम्हारी और तुम्हारे मअबूदों की कुछ भी परवाह नहीं. और तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते.

(13) और मेरी तरफ़ वही भेजी, और मेरी इज़्ज़त की.

(14) और उनकी रक्षा और सहायता करने वाला है. उसपर भरोसा रखने वालों को मुश्रिकों वग़ैरह का क्या डर. तुम और तुम्हारे मअबूद मुझे कुछ नुक़सान नहीं पहुंचा सकते.

(15) तो मेरा क्या बिगाड़ सकेंगे.

(16) क्योंकि बुतों की तस्वीरें इस शक्ल की बनाई जाती थीं जैसे कोई देख रहा है.

(17) कोई वसवसा डाले.

(18) और वो इस वसवसे को दूर कर देते हैं और अल्लाह तआला की तरफ़ रूजू करते हैं.

(19) यानी काफ़िर लोग.

(20) इस आयत से साबित हुआ कि जिस वक़्त क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा जाए, चाहे नमाज़ में या नमाज़ से बाहर, उस वक़्त सुनना और ख़ामोश रहना वाजिब है. सारे सहाबए किराम इस तरफ़ हैं कि यह आयत मुक़तदी के सुनने और  ख़ामोश रहने के बारे में है. और एक क़ौल यह भी है कि इस से नमाज़ व ख़ुत्बा दोनों में ग़ौर से सुनना और ख़ामोश रहना वाजिब साबित होता है. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो की हदीस में है, आपने कुछ लोगों को सुना कि वो नमाज़ में इमाम के साथ क़िरअत करते हैं तो नमाज़ से फ़ारिग़ होकर फ़रमाया, क्या अभी वक़्त नहीं आया कि तुम इस आयत के मानी समझो. ग़रज़ इस आयत से इमाम के पीछे क़िरअत करने की मुमानियत साबित होती है. और कोई हदीस ऐसी नहीं है जिसको इसके मु्क़ाबले में तर्क क़रार दिया जा सके. इमाम के पीछे क़िरअत की ताईद में सबसे ज़्यादा भरोसा जिस हदीस पर किया जाता है वह है “ला सलाता इल्ला बि फ़ातिहतल किताब” मगर इस हदीस से इमाम के पीछे क़िरअत वाजिब होना तो साबित नहीं होता सिर्फ़ इतना साबित होता है कि बिना फ़ातिहा नमाज़ कामिल नहीं होती. तो जबकि हदीस “क़िरअतुल इमाम लहू क़िरअतुन” से साबित है कि इमाम का क़िरअत करना ही मुक़्तदी का क़िरअत करना है तो जब इमाम ने क़िरअत की और मुक़्तदी ख़ामोश रहा तो उसकी क़िरअत हुक्मिया हुई, उसकी नमाज़ बे क़िरअत कहाँ रही. यह क़िरअते  हुक्मिया है तो इमाम के पीछे क़िरअत न करने से क़ुरआन व हदीस दोनों पर अमल हो जाता है. और क़िरअत करने से आयत के अनुकरण से दूरी होती है लिहाज़ा ज़रूरी है कि इमाम के पीछे फ़ातिहा वग़ैरह कुछ न पढ़े.

(21) ऊपर की आयत के बाद इस आयत के देखने से मालूम होता है कि क़ुरआन शरीफ़ सुनने वाले को ख़ामोश रहना और आवाज़ निकाले बिना दिल में ज़िक्र करना लाज़िम है. (तफ़सीरे इब्ने जरीर). इससे इमाम के पीछे ऊंची या नीची आवाज़ से क़िरअत की मुमानिअत साबित होती है. और दिल में अल्लाह की अज़मत और जलाल का तसव्वुर ज़िक्रे क़ल्बी है. ज़िक्र-बिल-जहर और ज़िक्र -बिल-इख़्फ़ा दोनों के खुले प्रमाण हैं. जिस शख़्स को जिस क़िस्म के ज़िक्र में ज़ौक़-शौक़ और भरपूर एकाग्रता मिले, उसके लिये वही अफ़ज़ल है.   (रहुल मोहतार वग़ैरह)

(22) शाम, अस्र और मग़रिब के बीच का वक़्त है. इन दोनो वक़्तों में ज़िक्र अफ़ज़ल है, क्योंकि फ़ज्र की नमाज़ के बाद सूरज निकलने तक, इसी तरह अस्र नमाज़ के बाद सूरज डूबने तक, नमाज़ मना है. इसलिये इन वक़्तों में ज़िक्र मुस्तहब हुआ, ताकि बन्दे के तमाम औक़ात क़ुर्बत और ताअत में मश्ग़ूल रहें.

(23) यानी मलायकए मुक़र्रबीन. बुज़ुर्गी वाले फ़रिश्ते.

(24) यह आयत सज्दे वाली आयतों में से है जिनके पढ़ने और सुनने से सज्दा लाज़िम आता है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, जब आदमी सज्दे की आयत पढ़कर सज्दा करता है तो शैतान रोता है और कहता है, अफ़सोस, बनी आदम को सज्दे का हुक्म दिया गया. इस सज्दा करके जन्नती हो गया और मुझे सज्दे का हुक्म दिया गया तो मैं इन्कार करके जहन्नमी हो गया.