सूरए अनआम – आठवाँ रूकू

सूरए अनआम – आठवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला


और वही ग़ालिब (बलवान) है अपने बन्दों पर और तुमपर निगहबान भेजता है (1)
यहां तक कि जब तुम में किसी को मौत आती है हमारे फ़रिश्ते उसकी रूह निकालते हैं (2)
और वो क़ुसूर (ग़लती) नहीं करते (3)(61)
फिर फेरे जाते हैं अपने सच्चे मौला अल्लाह की तरफ़, सुनता है उसी का हुक्म है (4)
और वह सबसे जल्द हिसाब करने वाला (5) (62)
तुम फ़रमाओ वह कौन है जो तुम्हें निजात (छुटकारा) देता है जंगल और दरिया की आफ़तों से जिसे पुकारते हो गिड़गिड़ा कर और आहिस्ता कि अगर वह हमें इससे बचावे तो हम ज़रूर एहसान मानेंगे(6) (63)
तुम फ़रमाओ अल्लाह तुम्हें निजात देता है उस से और हर बेचैनी से फिर तुम शरीक ठहराते हो(7) (64)
तुम फ़रमाओ वह क़ादिर है कि तुमपर अज़ाब भेजे तुम्हारे ऊपर से या तुम्हारे पांव के तले (नीचे) से या तुम्हें भिड़ा दे मुख़्तलिफ़ गिरोह करके और एक को दूसरे की सख़्ती चखाए, देखो हम कैसे तरह तरह से आयतें बयान करते हैं कि कहीं उनको समझ हो (8) (65)
और उसे(9)
झुटलाया तुम्हारी क़ौम ने और यही हक़ (सत्य) है, तुम फ़रमाओ मैं तुम पर कुछ करोड़ा नहीं (10) (66)
हर चीज़ का एक वक़्त मुक़र्रर (निश्चित) है (11)
और बहुत जल्द जान जाओगे (67) और ऐ सुनने वाले जब तू उन्हें देखे जो हमारी आयतों में पड़ते हैं (12)
तो उनसे मुंह फेर ले (13)
जब तक और बात में पड़ें और जो कहीं तुझे शैतान भुला दे तो याद आए पर ज़ालिमों के पास न बैठ (68) और परहेज़गारों पर उनके हिसाब से कुछ नहीं (14)
हां नसीहत देना शायद वो बाज़ आएं (15) (69)
और छोड़ दे उनको जिन्हों ने अपना दीन हंसी खेल बना लिया और उन्हें दुनिया की ज़िन्दगी ने धोखा दिया और क़ुरआन से नसीहत दो (16)
कि कहीं कोई जान अपने किये पर पकड़ी न जाए (17)
अल्लाह के सिवा न उसका कोई हिमायती हो न सिफ़ारशी और अगर अपने इवज़ सारे बदले दे तो उससे न लिये जाएं, ये हैं (18)
वो जो अपने किये पर पकड़े गए उन्हें पीने का खौलता पानी और दर्दनाक अज़ाब बदला उनके कुफ़्र का (70)

तफ़सीर सूरए अनआम – आठवाँ रूकू

(1) फ़रिश्ते, जिनको किरामन कातिबीन कहते हैं. वो आदमी की नेकी और बदी लिखते रहते हैं. हर आदमी के साथ दो फ़रिश्ते हैं, एक दाएं एक बाएं. दाएं तरफ़ का फ़रिश्ता नेकियाँ लिखता है और बाएं तरफ़ का फ़रिश्ता बुराईयाँ. बन्दों को चाहिये कि होशियार रहें और बुराइयों और गुनाहों से बचें क्योंकि हर एक काम लिखा जा रहा है और क़यामत के दिन वह लेखा तमाम सृष्टि के सामने पढ़ा जाएगा तो गुनाह कितनी रूसवाई का कारण होंगे. अल्लाह पनाह दे. आमीन.

(2) इन फ़रिश्तों से मुराद या तो अकेले मलकुल मौत हैं. उस सूरत में बहुवचन आदर और सम्मान के लिये है. या मलकुल मौत उन फ़रिश्तों समेत मुराद हैं जो उनके सहायक हैं. जब किसी की मौत का वक़्त क़रीब आता है तो मौत का फ़रिश्ता अल्लाह के हुक्म से अपने सहायक फ़रिश्तों को उसकी रूह निकालने का हुक्म देता है. जब रूह हलक़ तक पहुंचती है तो ख़ुद मलकुल मौत रूह निकालते हैं.  (ख़ाज़िन)

(3)  और अल्लाह के हुक्म को पूरा करने में उनसे कोताही नहीं होती और उनके कामों में सुस्ती और विलम्ब का सवाल नहीं होता. वो अपने कर्तव्य ठीक वक़्त पर अदा करते हैं.

(4) और उस दिन उसके सिवा कोई हुक्म करने वाला नहीं.

(5) क्योंकि उसको सोचने, जांचने या गिन्ती करने की ज़रूरत नहीं जिस में देर हों.

(6) इस आयत में काफ़िरों को चेतावनी दी गई है कि ख़ुश्की और तरी के सफ़र में जब वो आफ़तों में मुबतिला होकर परेशान होते हैं और ऐसी सख़्तियाँ पेश आती हैं जिनसे दिल काँप जाते हैं और ख़तरे दिलों को बेचैन कर देते हैं, उस वक़्त बुत परस्त भी बुतों को भूल जाता है और अल्लाह तआला ही से दुआ करता है, उसी के समक्ष गिड़गिड़ाता है और कहता है कि इस मुसीबत से अगर तूने मुझे छुटकारा दिलाया तो मैं शुक्रगुज़ार होऊंगा और तेरी नेअमत का हक़ बजा लाऊंगा.

(7) और शुक्रगुज़ारी के बजाय ऐसी बड़ी नाशुक्री करते हो, यह जानते हुए कि बुत निकम्मे हैं, किसी काम के नहीं, फिर उन्हें अल्लाह का शरीक करते हो, कितनी बड़ी गुमराही है.

(8) मुफ़स्सिरों का इसमें मतभेद है कि इस आयत में कौन लोग मुराद हैं. एक जमाअत ने कहा कि इससे हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत मुराद है और आयत उन्हीं के बारे में उतरी है. बुख़ारी की हदीस में है कि जब यह उतरा कि वह क़ादिर है, तुम पर अज़ाब भेजे तुम्हारे ऊपर से, तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया तेरी ही पनाह माँगता हूँ. और जब यह उतरा क्या तुम्हारे पाँव के नीचे से, तो फ़रमाया मैं तेरी ही पनाह माँगता हूँ. और जब यह उतरा, या तुम्हें भिड़ा दे मुख़्तलिफ़ गिरोह करके और एक को दूसरे की सख़्ती चखाए, तो फ़रमाया यह आसान है. मुस्लिम की हदीस में है कि एक दिन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मस्जिदे बनी मुआविया में दो रकअत नमाज़ अदा फ़रमाई और इसके बाद लम्बी दुआ की. फिर सहाबा की तरफ़ मुतवज्जेह होकर फ़रमाया, मैंने अपने रब से तीन सवाल किये, इन में से सिर्फ़ दो क़ुबूल फ़रमाए गए. एक सवाल तो यह था कि मेरी उम्मत को आम अकाल से हलाक न फ़रमाए, यह क़ुबूल हुआ. एक यह था कि उन्हें ग़र्क़ यानी पानी में डुबोकर हलाक न फ़रमाए, यह भी क़ुबूल हुआ. तीसरा सवाल यह था कि उनमें आपस में जंग और झगड़ा न हो, यह कु़बूल न हुआ.

(9) यानी क़ुरआन शरीफ़ को, या अज़ाब के उतरने को.

(10) मेरा काम हिदायत है, दिलों की ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं.

(11) यानी अल्लाह तआला ने जो ख़बरें दीं उनके लिये समय निश्चित हैं. वो ठीक उसी समय घटेंगी.

(12) तानों, गालियों और हंसी मज़ाक़ के साथ.

(13) और उनके साथ उठना बैठना छोड़कर. इस आयत से मालूम हुआ कि बेदीनों की जिस मजलिस में दीन का सत्कार न किया जाता हो, मुसलमान को वहाँ बैठना जायज़ नहीं. इससे साबित हो गया कि काफ़िरों और बेदीनों के जलसे, जिनमें वो दीन के ख़िलाफ़ बोलते हैं, उनमें जाना, उन्हें सुनना जायज़ नहीं और उनके रद और जवाब के लिये जाना उनके साथ उठने बैठने में शामिल नहीं, बल्कि यह सच्चाई ज़ाहिर करता है, और यह मना नहीं जैसा कि अगली आयत में आता है.

(14) यानी ताना देने और मज़ाक उड़ाने वालों के गुनाह उन्हीं पर हैं, उन्हीं से इसका हिसाब होगा, परहेज़गारों पर नहीं. मुसलमानों ने कहा था कि हमें गुनाह का डर है, जबकि हम उन्हें छोड़ दें और मना न करें. इस पर यह आयत नाज़िल हुई.

(15) इस आयत से मालूम हुआ कि नसीहत और उपदेश और सच्चाई के इज़हार के लिये उनके पास बैठना जायज़ है.

(16) और शरीअत के आदेश बताओ.

(17) और अपने जुर्मों के कारण जहन्नम के अज़ाब में गिरफ़्तार न हो.

(18) दीन को हंसी खेल बनाने वाले और दुनिया के दीवाने.

Advertisements

सूरए अनआम – नवाँ रूकू

सूरए अनआम – नवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ (1)
क्या हम अल्लाह के सिवा उसको पूजें जो हमारा न भला करे न बुरा (2)
और उलटे पांव पलटा दिये जाएं बाद इसके कि अल्लाह ने हमें राह दिखाई (3)
उसकी तरह जिसे शैतान ने ज़मीन में राह भुला दी (4)
हैरान है उसके साथी उसे राह की तरफ़ बुला रहे हैं कि इधर आ तुम फ़रमाओ कि अल्लाह ही की हिदायत हिदायत है (5)
और हमें हुक्म है कि हम उसके लिये गर्दन रख दें (6)
जो रब है सारे संसार का(71) और यह कि नमाज़ क़ायम रखो और उस से डरो और वही है जिसकी तरफ़ तुम्हें उठना है (72) और वही है जिसने आसमान और ज़मीन ठीक बनाए(7)
और जिस दिन फ़ना (नष्ट) हुई हर चीज़ को कहेगा हो जा वह फ़ौरन हो जाएगी, उसकी बात सच्ची है और उसी की सल्तनत है जिस दिन सूर (शंख) फुंका जाएगा (8)
हर छुपे और ज़ाहिर का जानने वाला और वही है हिकमत वाला ख़बरदार (73) और याद करो जब इब्राहीम ने अपने बाप (9)
आज़र से कहा क्या तुम बुतों को ख़ुदा बनाते हो, बेशक मैं तुम्हें और तुम्हारी क़ौम को खुली गुमराही में पाता हूँ (10) (74)
और इसी तरह हम इब्राहीम को दिखाते हैं सारी बादशाही आसमानों और ज़मीन की (11)
और इसलिये कि वह आँखो देखे यक़ीन वालों में हो जाए (12) (75)
फिर जब उनपर रात का अन्धेरा आया एक तारा देखा (13)
बोले इसे मेरा रब ठहराते हो, फिर जब वह डूब गया बोले मुझे ख़ुश नहीं आते डूबने वाले(76)  फिर जब चांद चमकता देखा बोले इसे मेरा रब बताते हो फिर जब वह डूब गया कहा अगर मुझे मेरा रब हिदायत न करता तो मैं भी इन्हीं गुमराहों में होता(14) (77)
फिर जब सूरज जगमगाता देखा बोले इसे मेरा रब कहते हो (15)
यह तो इन सब से बड़ा है फिर जब वह डूब गया कहा ऐ क़ौम मैं बेज़ार हूँ इन चीज़ों से जिन्हें तुम शरीक ठहराते हो (16) (78)
मैं ने अपना मुंह उसकी तरफ़ किया जिसने आसमान और ज़मीन बनाए एक उसीका होकर (17)
और मैं मुश्रिकों में नहीं (79) और उनकी क़ौम उनसे झगड़ने लगी कहा क्या अल्लाह के बारे में मुझसे झगड़ते हो तो वह मुझे राह बता चुका (18)
और मुझे उनका डर नहीं जिन्हें तुम शरीक बताते हो (19)
हां जो मेरा ही रब कोई बात चाहे(20)
मेरे रब का इल्म हर चीज़ को घेरे हुए है, तो क्या तुम नसीहत नहीं मानते (80) और मैं तुम्हारे शरीकों से कैसे डरूं (21)
और तुम नहीं डरते कि तुमने अल्लाह का शरीक उसको ठहराया जिसकी तुमपर उसने कोई सनद न उतारी, तो दोनों गिराहों में अमान का ज़्यादा हक़दार कौन है (22)
अगर तुम जानते हो (81) वो जो ईमान लाए और अपने ईमान में किसी नाहक़ चीज़ की आमेज़िश (मिश्रण) न की उन्हीं के लिये अमान है और वही राह पर हैं (82)

तफ़सीर सूरए अनआम – नवाँ रूकू

(1) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, उन मुश्रिकों से जो अपने बाप दादा के दीन की तरफ़ आपको बुलाते है.

(2) और उसमें कोई क़ुदरत नहीं.

(3) और इस्लाम और तौहीद की नेअमत अता फ़रमाई और बुतपरस्ती के बदतरीन वबाल से बचाया.

(4) इस आयत में सच और झूठ की तरफ़ बुलाने वालों की एक उपमा बयान फ़रमाई गई कि जिस तरह मुसाफ़िर अपने साथियों के साथ था, जंगल में भूतों और शैतानों ने उसको रास्ता बहका दिया और कहा मंज़िले मक़सूद की यही राह है और उसके साथी उसको सीधी राह की तरफ़ बुलाने लगे. वह हैरान रह गया, किधर जाए. अंजाम उसका यही होगा कि अगर वह भूतों की राह पर चल दे तो हलाक़ हो जाए या और साथियों का कहा माने तो सलामत रहेगा और मंज़िल पर पहुंच जाएगा. यही हाल उस शख़्स का है जो इस्लाम के तरीक़े से बहका और शैतान की राह पर चला. मुसलमान उसको सीधे रास्ते की तरफ़ बुलाते हैं. अगर उनकी बात मानेगा, राह पाएगा वरना हलाक हो जाएगा.

(5) यानी जो रास्ता अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिये साफ़ और खुला फ़रमा दिया और जो दीन (इस्लाम) उनके लिये निश्चित किया वही हिदायत व नूर है और जो इसके सिवा है वह बातिल दीन है.

(6) और उसी की फ़रमाँबरदारी करें और ख़ास उसी की इबादत करें.

(7) जिनसे उसकी भरपूर क़ुदरत और उसका सम्पूर्ण इल्म और उसकी हिकमत और कारीगरी ज़ाहिर है.

(8) कि नाम को भी कोई सल्तनत का दावा करने वाला न होगा. सारे शासक सारे बादशाह और सब दुनिया की सल्तनत का घमण्ड करने वाले देखेंगे कि दुनिया में जो वो सल्तनत का दावा करते थे, वह ग़लत और झूटा था.

(9) क़ामूस में है कि आज़र हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के चचा का नाम है. इमाम अल्लामा जलालुद्दीन सियूती ने “मसालिकुल हुनफ़ा” में भी ऐसा ही लिखा है. चचा को बाप कहना सारे मुल्कों में आम है ख़ासकर अरब में. क़ुरआने करीम में है, “नअबुदो इलाहका व इलाहा आबाइका इब्राहीमा व इस्माईला व इस्हाक़ा इलाहौं वाहिदन” यानी बोले हम पूजेंगे उसे जो खुदा है आपका और आपके बाप के आबा इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़ का एक खुदा. (सूरए बक़रह, आयत 133) इसमें हज़रत इस्माईल को हज़रत याकूब के “आबा” में ज़िक्र किया गया है जब कि आप चचा हैं. हदीस शरीफ़ में भी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा को “अब” फ़रमाया. चुनांचे इरशाद किया “रूद्दू अलैया अबी” और यहाँ अबी से हज़रत अब्बास मुराद हैं.

(10) यह आयत अरब के मुश्रिकों पर हुज्जत है जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बुज़ुर्ग जानते थे और उनकी बुज़ुर्गी को मानते थे. उन्हें दिखाया जाता है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बुतपरस्ती को कितना बड़ा ऐब और गुमराही बताते हैं. अगर तुम उन्हें मानते हो तो बुत परस्ती तुम भी छोड़ दो.

(11) यानी जिस तरह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को दीन में समझ अता फ़रमाई ऐसे ही उन्हें आसमानों और ज़मीन के मुल्क दिखाते हैं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया इससे आसमानों और ज़मीनों की उत्पत्ति मुराद है. मुजाहिद और सईद बिन जुबैर कहते है यह इस तरह कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को पत्थर पर खड़ा किया गया और आपके लिये आसमानों के पर्दे खोल दिये गए यहाँ तक कि आपने अर्श व कुर्सी और आसमानों के सारे चमत्कार और जन्नत में अपने मक़ाम को देखा. आपके लिये ज़मीन के पर्दे उठा दिये गए यहाँ तक कि आपने सब से नीचे की ज़मीन तक नज़र की और ज़मीनों के तमाम चमत्कार देखे. मुफ़स्सिरों का इसमें मतभेद है कि यह देखना सर की आँखों से था या दिल की आँखों से. (दुर्रे मन्सूर, ख़ाज़िन वग़ैरह)

(12) क्योंकि हर ज़ाहिर और छुपी चीज़ उनके सामने कर दी गई और इन्सानों के कर्मों में से कुछ भी उनसे छुपा न रहा.

(13) तफ़सीरे के जानकार और सीरत के माहिरों का बयान है कि नमरूद इब्ने कनआन बड़ा अत्याचारी बादशाह था. सबसे पहले उसीने ताज सर पर रखा. यह बादशाह लोगों से अपनी पूजा कराता था. उसके दरबार में ज्योतिषी और जादूगर बहुत से थे. नमरूद ने ख़्वाब देखा कि एक सितारा निकला है, उसकी रौशनी के सामने चाँद सरज बिल्कुल बेनूर हो गए. इससे वह बहुत डरा. जादूगरों से इसकी ताबीर पूछी. उन्होंने कहा कि इस साल तेरे राज्य में एक लड़का पैदा होगा जो तेरे पतन का कारण बनेगा और तेरे दीन वाले उसके हाथ से हलाक होंगे. यह ख़बर सुनकर वह परेशान हुआ और उसने हुक्म दिया कि जो बच्चा पैदा हो, क़त्ल कर दिया जाए और मर्द औरतों से अलग रहें और इसकी चौकसी के लिये एक विभाग क़ायम कर दिया गया. अल्लाह के हुक्म को कौन टाल सकता है. हज़रत इब्राहीम की वालिदा गर्भवती हुई और जादूगरों ने नमरूद को इसकी ख़बर भी दे दी कि वह बच्चा गर्भ में आ गया है. लेकिन चूंकि हज़रत की वालिदा की उम्र कम थी, उनका गर्भ किसी तरह पहचाना ही न गया.  जब ज़चगी का समय निकट आया तो आपकी वालिदा एक तहख़ाने में चली गई जो आपके वालिद ने शहर से दूर खोदकर तैयार किया था. वहाँ आप की पैदायश हुई और वहीं आप रहे. पत्थरों से उस तहख़ाने का दर्वाज़ा बन्द कर दिया जाता था. रोज़ाना वालिदा साहिबा दूध पिला आती थीं और जब वहाँ पहुंचती तो देखतीं कि आप अपनी उंगली के पोर चूस रहे हैं और उनसे दूध निकल रहा है. आप बहुत जल्द बढ़ते थे, एक महीने मैं इतना जितने दूसरे बच्चे एक साल में. इसमें मतभेद है कि आप तहख़ाने में कितने साल रहे. कुछ कहते हैं सात साल, कुछ तेरह बरस, कुछ सत्तरह बरस. यह बात यक़ीनी है कि नबी हर हाल में मासूम होते हैं और वो अपनी ज़िन्दगी की शुरूआत से आख़िर तक अल्लाह वाले होते हैं. एक दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी वालिदा से पूछा मेरा रब (पालने वाला) कौन है ? उन्होंने फ़रमाया, मैं. फ़रमाया, तुम्हारा पालने वाला कौन है ? कहा, तुम्हारे वालिद. फ़रमाया, उनका रब कौन है. वालिदा ने कहा, ख़ामोश रहो. और अपने शौहर से जाकर कहा कि जिस लड़के की निस्बत यह मशहूर है कि वह ज़मीन वालों का दीन बदल देगा. वह तुम्हारा ही बेटा है. और सारी बातचीत बयान की. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने शुरू ही से तौहीद की हिमायत और कुफ़्र का रद शुरू फ़रमा दिया और जब एक सूराख़ की राह से रात के वक़्त आपने ज़ोहरा या मुश्तरी सितारा देखा तो हुज्जत क़ायम करनी शुरू कर दी. क्योंकि उस ज़माने के लोग बुतों और सितारों की पूजा करते थे. आपने एक अत्यन्त उमदा तरीक़े से उन्हें प्रमाण की तरफ़ बुलाया जिससे वो इस नतीजे पर पहुंचे कि सारा जगत किसी का पैदा किया हुआ है और ऐसी चीज़ मअबूद नहीं हो सकती. मअबूद वही है जिसके इख़्तियार और क़ुदरत से जगत में परिवर्तन होते रहते हैं.

(14) इसमें क़ौम को चेतावनी है कि चाँद को मअबूद ठहराए वह गुमराह है. क्योंकि उसका एक हालत से दूसरी हालत में बदलना इस बात का सुबूत है कि वह किसी का पैदा किया हुआ है, अपने में कोई क़ुदरत नहीं रखता.

(15) “शम्स” यानी सूरज के लिये अरबी में पुल्लिंग व स्त्रीलिंग दोनों ही इस्तेमाल किये जा सकते हैं यहाँ “हाज़ा” पुल्लिंग लाया गया. इसमें सम्मान की सीख है कि “रब” शब्द की रिआयत के लिये स्त्रीलिंग न लाया गया.

(16) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने साबित कर दिया कि सितारों में छोटे से बड़े तक कोई भी रब होने की योग्यता नहीं रखता. उनका मअबूद होना बातिल है और क़ौम जिस शिर्क में गिरफ़तार है आपने उससे बेज़ारी ज़ाहिर की और इसके बाद सच्चे दीन का बयान फ़रमाया जो आगे आता है.

(17) यानी इस्लाम के, बाक़ी सब धर्मों से अलग रहकर. इससे मालूम हुआ कि सच्चे दीन की स्थापना और मज़बूती तब ही हो सकती है जब कि झूठे धर्मों से बेज़ारी हो.

(18) अपनी तौहीद और पहचान की.

(19) क्योंकि वो बेजान बुत हैं, न नुक़सान पहुंचा सकते है न नफ़ा दे सकते हैं उनसे क्या डरना. आपने मुश्रिकों से जवाब में फ़रमाया था जिन्होंने आपसे कहा था कि बुतों से डरो, उनको बुरा कहने से कहीं आपको कुछ नुक़सान न पहुंच जाए.

(20) वह होगी क्योंकि मेरा रब हर चीज़ पर भरपूर क़ुदरत रखता है.

(21) जो बेजान और नफ़ा नुक़सान पहुंचाने से मेहरूम हैं.

(22) अल्लाह के एक होने में विश्वास रखने वाला या उसके साथ शरीक ठहराने वाला.

सूरए अनआम – दसवाँ रूकू

सूरए अनआम – दसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और यह हमारी दलील है कि हमने इब्राहीम को उसकी क़ौम पर अता फ़रमाई हम जिसे चाहे दर्जों बलन्द करें(1)
बेशक तुम्हारा रब हिकमत व इल्म वाला है (83) और हमने उन्हें इस्हाक़ और यअक़ूब अता किये, उन सबको हमने राह दिखाई और उनसे पहले नूह को राह दिखाई और उसकी औलाद में से दाऊद और सुलैमान और अय्यूब और यूसुफ़ और मूसा और हारून को और हम ऐसा ही बदला देते हैं नेकी करने वालों को (84) और ज़करिया और यहया और ईसा और इलियास को ये सब हमारे क़ुर्ब के लायक़ हैं, (85) और इस्माईल और यसअ और यूनुस और लूत को और हमने हर एक को उसके वक़्त में सबपर फ़ज़ीलत (बुज़ुर्गी) दी (2)(86)
और कुछ उनके बाप दादा और औलाद और भाईयों में से कुछ को (3)
और हमने उन्हें चुन लिया और सीधी राह दिखाई (87) यह अल्लाह की हिदायत है कि अपने बन्दों में  जिसे चाहे दे और अगर वो शिर्क करते तो ज़रूर उनका किया अकारत जाता (88) ये हैं जिनको हमने किताब और हुक्म और नबुव्वत (पैग़म्बरी) अता की तो अगर ये लोग (4)
इससे इन्कारी हों तो हमने उसके लिये एक ऐसी क़ौम लगा रखी है जो इन्कार वाली नहीं (5)(89)
ये है जिनको अल्लाह ने हिदायत की तो तुम उन्हीं की राह चलो (6)
तुम फ़रमाओ मैं क़ुरआन पर तुम से कोई उजरत (वेतन) नहीं मांगता, वह तो नहीं मगर नसीहत सारे जगत को (7) (90)

तफ़सीर सूरए अनआम – दसवाँ रूकू

(1) इल्म और सूझ बूझ, समझदारी और बुज़ुर्गी के साथ जैसे कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दर्जें ऊंचे किये दुनिया में इल्म व हिकमत व नबुव्वत के साथ और आख़िरत में क़ुर्ब और सवाब के साथ.

(2) नबुव्वत और रिसालत के साथ. इस आयत से इस पर सनद लाई जाती है कि नबी फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं क्योंकि आलम अल्लाह के सिवा सारी मौजूद चीज़ों को शामिल है. फ़रिश्ते भी इसमें दाख़िल हैं तो जब तमाम जगत वालों पर फ़ज़ीलत दी तो फ़रिश्तों पर भी फ़ज़ीलत साबित हो गई. यहाँ अल्लाह तआला ने अठ्ठारह नबियों का ज़िक्र फ़रमाया और इस ज़िक्र में तरतीब या क्रम न ज़माने के ऐतिबार से है न बुज़ुर्गी के. लेकिन जिस शान से नबियों के नाम बयान फ़रमाए गए हैं उसमें एक अजीब लतीफ़ा है, वह यह कि अल्लाह तआला ने नबियों की हर एक जमाअत को एक ख़ास तरह की करामत और बुज़ुर्गी के साथ मुमताज़ फ़रमाया तो हज़रत नूह व इब्राहीम व इस्हाक़ व याक़ूब का पहले ज़िक्र किया क्योंकि ये नबियों के उसूल हैं यानी उनकी औलाद में बहुत से नबी हुए जिनका नसब उन्हीं की तरफ़ पलटता है. नबुव्वत के बाद दर्जों के लिहाज़ से मुल्क, इख़्तियार और सल्तनत और सत्ता है. अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद और सुलैमान को इनमें से बहुत कुछ अता फ़रमाया. ऊंचे दर्जों में मुसीबत और बला पर सब्र करना भी शामिल है. अल्लाह तआला ने हज़रत अय्यूब को इसके साथ मुमताज़ किया. फिर मुल्क और सब्र के दोनों दर्जे हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को बख़्शे कि आपने मुद्दतों सख़्तियों और तकलीफ़ों पर सब्र फ़रमाया. फिर अल्लाह तआला ने नबुव्वत के साथ मिस्त्र प्रदेश अता किया. चमत्कार और ताक़त भी ऊंचे दर्जों में आती है. अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा और हज़रत हारून को ये दोनों चीज़ें अता फ़रमाई. पाकबाज़ी और माया मोह का त्याग भी ऊंचे दर्जें की निशानी है. हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया और हज़रत ईसा और हज़रत इलियास को इसके साथ मख़सूस फ़रमाया. इन नबियों के बाद अल्लाह तआला ने उन नबियों का बयान फ़रमाया कि जिनके न अनुयायी बाक़ी रहे न उनकी शरीअत, जैसे कि हज़रत इस्माईल, हज़रत यसअ, हज़रत यूनुस, हज़रत लूत अलैहिस्सलाम. इस शान से नबियों का बयान फ़रमाने में उनकी करामतों और विशेषताओं का एक अदभुत क्रम नज़र आता है.

(3) हमने बुज़ुर्गी दी.

(4) यानी मक्का वाले.

(5) इस क़ौम से या ईसाई मुराद हैं या मुहाजिर या रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा या हुज़ूर पर ईमान लाने वाले सब लोग. इस आयत से साबित है कि अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मदद फ़रमाएगा और आपके दीन को क़ुव्वत देगा और उसको दूसरे तमाम दीनों पर ग़ालिब करेगा. चुनांचे ऐसा ही हुआ और यह ग़ैबी ख़बर सच हुई.

(6) उलमा ने इस आयत से यह मअसला साबित किया है कि सैयदे आलम सल्लललाहो अलैहे वसल्लम तमाम नबियों से अफ़ज़ल हैं क्योंकि जो विशेषताएं, चमत्कार और गुण अलग अलग दूसरे नबियों को दिये गए थे, नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिये उन सब को जमा फ़रमा दिया और आपको हुक्म दिया “फ़बिहुदाहुमुक़्तदिह” यानी तो तुम उन्हीं की राह चलों. (सूरए अनआम, आयत 90) तो जब आप तमाम नबियों की विशेषताएं रखते हैं तो बेशक सबसे अफ़ज़ल हुए.

(7) इस आयत से साबित हुआ कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तमाम सृष्टि की तरफ़ भेजे गए हैं और आपकी दावत सारी सृष्टि को आम है और सारा जगत आपकी उम्मत है. (ख़ाज़िन)

सूरए अनआम ग्यारहवाँ रूकू

सूरए अनआम ग्यारहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और यहूद ने अल्लाह की क़द्र न जानी जैसी चाहिये थी(1 )
जब बोले अल्लाह ने किसी आदमी पर कुछ नहीं उतारा तुम फ़रमाओ किसने उतारी वह किताब जो मूसा लाए थे रौशनी और लोगों के लिये हिदायत जिसके तुमने अलग अलग क़ाग़ज़ बनाए ज़ाहिर करते हो (2)
और बहुत से छुपा लेते हो (3)
और तुम्हें वह सिखाया जाता है (4)
जो न तुमको मालूम था न तुम्हारे बाप दादा को, अल्लाह कहो(5)
फिर उन्हें छोड़ दो उनकी बेहूदगी में उन्हें खेलता (6) (91)
और यह है बरकत वाली किताब कि हमने उतारी (7)
तस्दीक़ (पुष्टि) फ़रमाती उन किताबों की जो आगे थीं और इसलिये कि तुम डर सुनाओ सब बस्तियों के सरदार को (8)
और जो कोई सारे जगत में उसके गिर्द हैं और जो आख़िरत पर ईमान लाते हैं (9)
उस किताब पर ईमान लाते हैं और अपनी नमाज़ की हिफ़ाज़त करते हैं (92) और उस से बढ़ कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूठ बांधे (10)
या कहे मुझे वही (देववाणी) हुई और वही न हुई (11)
और जो कहे अभी मैं डराता हूँ ऐसा जैसा अल्लाह ने उतारा (12)
और कभी तुम देखो जिस वक़्त ज़ालिम मौत की सख़्तियों में हैं फ़रिश्ते हाथ फैलाए हुए हैं (13)
कि निकालो अपनी जानें, आज तुम्हें ख़्वारी का अज़ाब दिया जाएगा बदला उसका कि अल्लाह पर झूठ लगाते थे(14)
और उसकी आयतों से तकब्बुर (घमण्ड) करते (93)
और बेशक तुम हमारे पास अकेले आये जैसा हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था (15)
और पीठ पीछे छोड़ आए जो माल व मत्ता हमने तुम्हें दिया था और हम तुम्हारे साथ तुम्हारे उन सिफ़ारिशियों को नहीं देखते जिनका तुम अपने में साझा बताते थे  (16)
बेशक तुम्हारे आपस की डोर कट गई  (17)
और तुम से गये जो दावे करते थे (18) (94)

तफसीर सूरए-अनआम ग्यारहवाँ रूकू

(1)  और उसको पहचानने से मेहरूम रहे और अपने बन्दों पर उसकी जो रहमत और क़रम है उसको न जाना, यहूदियों की एक जमाअत अपने बड़े पादरी मालिक इब्ने सैफ़ को लेकर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बहस करने आई. हुज़ूर ने फ़रमाया मैं तुझे उस परवर्दिगार की क़सम देता हूँ जिसने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरात उतारी, क्या तौरात में तूने यह देखा है “इन्नल्लाहा यबग़दुल हिब्रल समीन” यानी अल्लाह को मोटा आलिम नापसन्द है. कहने लगा, हाँ यह तौरात मैं है. हुज़ूर ने फ़रमाया तू मोटा आलिम ही तो है. इसपर वह ग़ुस्से में भरकर कहने लगा कि अल्लाह ने किसी आदमी पर कुछ नहीं उतारा. इसपर यह आयत उतरी और इसमें फ़रमाया गया, किसने उतारी वह किताब जो मूसा लाए थे, तो वह लाजवाब हो गया और यहूदी उस से नाराज़ हो गए और उसको झिड़कने लगे और उसको पादरी के ओहदे से हटा दिया. (मदारिक और ख़ाज़िन)

(2) इन में से कुछ को जिसका इज़हार अपनी इच्छा के अनुसार समझते हो.

(3)  जो तुम्हारी इच्छा के खिलाफ़ करते हैं जैसे कि तौरात के वो हिस्से जिनमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और उनकी विशेषताओं का बयान है.

(4) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तालीम और क़ुरआन शरीफ़ से.

(5) यानी जब वो इसका जवाब न दे सकें कि वह किताब किसने उतारी तो आप फ़रमा दीजिये कि अल्लाह ने.

(6) क्योंकि जब आपने तर्क पूरा कर दिया और उपदेश और संदेश अन्त तक पहुंचा दिया और उनके लिये बहाने बनाने की कोई गुंजायश न छोड़ी, इसपर भी वो बाज़ न आएं, तो उन्हें उनकी बेहूदगी में छोड़ दीजिये. यह काफ़िरों के हित में फिटकार है.

(7) यानी क़ुरआन शरीफ.

(8) “बस्तियों का सरदार” मक्कए मुकर्रमा है, क्योंकि वह तमाम ज़मीन वालों का क़िबला है.

(9) और क़यामत व आख़िरत और मरने के बाद उठने का यक़ीन रखते है और अपने अंजाम से ग़ाफ़िल और बेख़बर नहीं है.

(10) और नबुव्वत का झूटा दावा करे.

(11) यह आयत मुसैलमा कज़्ज़ाब के बारे में उतरी जिसने यमामा यमन प्रदेश में नबुव्वत का झूटा दावा किया था. बनी हनीफ़ा क़बीले के कुछ लोग उसके धोखे में आ गए थे. यह कज़्ज़ाब हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ की ख़िलाफ़त के ज़माने में अमीर हमज़ा रदियल्लाहो अन्हो के क़ातिल बहशी के हाथों मारा गया.

(12)  यह आयत अब्दुल्लाह बिन अबी सरह, जो वही की किताबत करता था, उसके बारे में उतरी, जब आयत “वलक़द ख़लक़नल इन्साना” उतरी उसने इसे लिखा और आख़िर तक पहुंचते पहुंचते इन्सान की पैदायश की तफ़सील पर सूचित होकर आश्चर्य में पड़ गया और इस हालत में आयत का आख़िरी हिस्सा “तबारकल्लाहो अहसनुल ख़ालिक़ीन” बेइख़्तियार उसकी ज़बान पर जारी हो गया. इसपर उसको यह घमण्ड हुआ कि मुझपर वही आने लगी और वह इस्लाम से फिर गया. यह न समझा कि वही के नूर और कलाम की शक्ति और हुस्न से आयत का आख़िरी कलिमा ज़बान पर आ गया, इसमें उसकी योग्यता का कोई दख़्ल न था. कलाम की शक्ति ख़ुद अपने आख़िर को बता दिया करती है. जैसे कभी कोई शायर अच्छा मज़मून पढे, वह मज़मून ख़ुद क़ाफ़िया बता देता है और सुनने वाले शायर से पहले क़ाफ़िया पढ़ देते हैं. उनमें ऐसे लोग भी होते हैं जो हरगिज़ वैसा शेर कहने की क्षमता नहीं रखते, तो क़ाफ़िया बताना उनकी योग्यता नहीं, कलाम की शक्ति है. और यहाँ तो वही का नूर और नबी के नूर से सीने में रौशनी आती थी. चुनांचे मजलिस शरीफ़ से जुदा होने और इस्लाम से फिर जाने के बाद फिर वह एक जुमला भी ऐसा बनाने पर क़ादिर न हुआ, जो क़ुरआन के कलाम से मिल सकता, अन्त में हुज़ूर के ज़माने में ही मक्का की विजय से पहले फिर इस्लाम ले आया.

(13) आत्माएं निकालने के लिये झिड़के जाते हैं और कहते जाते हैं.

(14) नबुव्वत और वही के झूठे दावे करके और अल्लाह के लिये शरीक और बीवी बच्चे बताकर.

(15) न तुम्हारे साथ माल है न ऐश्वर्य, न औलाद, जिनकी महब्बत में तुम उम्र भर गिरफ़्तार रहे, न वो बुत, जिन्हें पूजा किये. आज उनमें से कोई तुम्हारे काम न आया, यह काफ़िरों से क़यामत के दिन फ़रमाया जाएगा.

(16) कि वो इबादत के हक़दार होने में अल्लाह के शरीक हैं (मआज़ल्लाह)

(17) और इलाक़े टूट गए, जमाअत बिखर गई.

(18) तुम्हारे वो तमाम झूठे दावे जो तुम दुनिया में किया करते थे, बातिल हो गए.

सूरए अनआम बारहवाँ रूकू

सूरए अनआम बारहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक अल्लाह दाने और गुठली को चीरने वाला है (1)
ज़िन्दा को मुर्दे से निकालने (2)
और मुर्दा को ज़िन्दा से निकालने (3)
यह है अल्लाह, तुम कहां औंधे जाते हो (4) (95)
तारीक़ी (अंधेरा) चाक करके सुबह निकालने वाला और उसने रात को चैन बनाया (5)
और सूरज और चांद को हिसाब (6)
यह साधा है ज़बरदस्त जानने वाले का (96)  और वही है जिसने तुम्हारे लिये तारे बनाए कि उनसे राह पाओ ख़ुश्की और तरी के अंधेरों में हमने निशानियां तफ़सील से (विस्तार से) बयान कर दीं इल्म वालों के लिये (97)  और वही है जिसने तुमको एक जान से पैदा किया (7)
फिर कहीं तुम्हें ठहरना है (8)
और कहीं अमानत रहना (9)
बेशक हमने तफ़सील से आयतें बयान कर दीं समझ वालों के लिये (98)  और वही है जिसने आसमान से पानी उतारा तो हमने उससे हर उगने वाली चीज़ निकाली (10)
तो हमने उससे निकाली सब्ज़ी जिसमें से दाने निकलते हैं एक दूसरे पर चढ़े हुए और खजूर के गाभे से पास पास अच्छे और अंगूर के बाग़ और ज़ैतून और अनार किसी बात में मिलते और किसी बात में अलग, उसका फल देखो जब फले और उसका पकना बेशक उसमें निशानियां है ईमान वालों के लिये (99)   और(11)
अल्लाह का शरीक ठहराया जिन्नों को (12)
हालांकि उसी ने उनको बनाया और उसके लिये बेटे और बेटियाँ घड़ लीं जिहालत से, पाकी और बरतरी है उसको उनकी बातों से (100)

तफसीर सूरए – अनआम बारहवाँ रूकू

(1) तौहीद और नबुव्वत के बाद अल्लाह तआला ने अपनी भरपूर क़ुदरत व इल्म और हिकमत की दलीलें बयान फ़रमाई क्योंकि सबसे बड़ा लक्ष्य अल्लाह तआला और उसकी सिफ़त और अहकाम की पहचान है, और यह जानना कि वही सारी चीज़ों को पैदा करने वाला है और जो ऐसा हो वही पूजने के क़ाबिल हो सकता है, न कि वो बुत जिन्हें मुश्रिक पूजतें हैं. ख़ुश्क दाना और गुठली चीर कर उनसे सब्ज़ा और दरख़्त पैदा करना और ऐसी पथरीली ज़मीनों में उनके गर्म रेशों को रवाँ करना जहाँ लोहे की सलाखें और कुदालें भी काम न कर सके, उसकी कुदरत के कैसे चमत्कार है.

(2) जानदार सब्ज़े को बेजान दाने और गुठली से, और इन्सान व हैवान को वीर्य से और चिड़िया को अन्डे से.

(3) जानदार दरख़्त से बेजान गुठली और दाने को, और इन्सान और हैवान से नुत्फ़े को, और चिड़िया से अन्डे को, यह उसके चमत्कार और क़ुदरत  और हिकमत है.

(4) और ऐसे प्रमाण क़ायम होने के बाद क्यों ईमान नहीं लाते और मौत के बाद उठने का यकीन नहीं करते. जो बेजान नुत्फे से जानदार हैवान पैदा करता है, उसकी क़ुदरत से मुर्दे को ज़िन्दा करना क्या दूर है.

(5)  कि आदमी उसमें चैन पाता है और दिन की थकान और कसलमन्दी को सुकून से दूर करती है और रातों को जागने वाले इबादत गुज़ार एकान्त में अपने रब की इबादत से चैन पाते हैं.

(6) कि उनके दौर और सैर से इबादतों और मामलात के समय मालूम हो.

(7) यानी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से.

(8) माँ के गर्भ में या ज़मीन के ऊपर.

(9) बाप की पीठ में या क़ब्र के अन्दर.

(10) पानी एक और उससे जो चीज़ें उगाई वो क़िस्म क़िस्म की और रंगारंग.

(11) इसके बावजूद कि क़ुदरत, हिकमत और चमत्कारों की इन दलीलों और इस इनआम और इकराम और इन नेअमतों के पैदा करने और अता फ़रमाने का तका़ज़ा यह था कि उस मेहरबान बिगड़ी बनाने वाले रब पर ईमान लाते, इसके बजाय बुत परस्तों ने यह सितम किया. (जो आयत में आगे दिया है) कि….

(12) कि उनकी फ़रमाँबरदारी और अनुकरण करके मूर्तिपूजक हो गए.

सूरए अनआम तैरहवाँ रूकू

सूरए अनआम तैरहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

वे किसी नमूने के आसमानों और ज़मीन का बनाने वाला, उसके बच्चा कहाँ से हो हालांकि उसकी औरत नहीं (1)
और उसने हर चीज़ पैदा की(2)
और वह सब कुछ जानता है (101) यह है अल्लाह तुम्हारा रब (3)
और उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं हर चीज़ का बनाने वाला तो उसे पूजो वह जो हर चीज़ पर निगहबान है (4) (102)
आँखें उसे इहाता (घिराव) नहीं करतीं (5)
और सब आँखें उसके इहाते (घेरे) में हैं, और वही है पूरा बातिन पूरा ख़बरदार (103) तुम्हारे पास आँखें खोलने वाली दलीलें आई तुम्हारे रब की तरफ़ से तो जिसने देखा तो अपने भले को और जो अंधा हुआ अपने बुरे को और मैं तुमपर निगहबान नहीं (104)  और हम इसी तरह आयतें तरह तरह से बयान करते हैं(6)
और इसलिये कि काफ़िर बोल उठें कि तुम तो पढ़े हो और इसलिये कि उसे इल्म वालों पर वाज़ेह (स्पष्ट) कर दें (105) उसपर चलो जो तुम्हें तुम्हारे रब की तरफ़ से वही होती है(7)
उसके सिवा कोई मअबूद (पूजनीय) नहीं और मुश्रिकों से मुंह फेर लो (106) और अल्लाह चाहता तो वो शिर्क नहीं करते और हमने तुम्हें उनपर निगहबान नहीं किया और तुम उनपर करोड़े नहीं (107)  और उन्हें गाली न दो जिनको वो अल्लाह के सिवा पूजते हैं कि वो अल्लाह की शान में बेअदबी करेंगे ज़ियादती और जिहालत से (8)
यूं ही हमने हर उम्मत की निगाह में उसके अमल (कर्म) भले कर दिये हैं फिर उन्हें अपने रब की तरफ़ फिरना है और वह उन्हें बता देगा जो करते थे (108) और उन्होंने अल्लाह की क़सम खाई अपने हलफ़ में पूरी कोशिश से कि अगर उनके पास कोई निशानी आई तो ज़रूर उस पर ईमान लाएंगे, तुम फ़रमादो कि निशानियाँ तो अल्लाह के पास हैं (9)
और तुम्हें (10)
क्या ख़बर कि जब वो आएं तो ये ईमान न लाएंगे (109) और हम फेर देते हैं उनके दिलों और आँखों को (11)
जैसा कि वो पहली बार ईमान न लाए थे (12)
और उन्हें छोड़ देते हैं कि अपनी सरकशी (बग़ावत) में भटका करें (110)

तफसीर सूरए – अनआम तैरहवाँ रूकू

(1)  और वे औरत औलाद नहीं होती और पत्नी  उसकी शान के लायक़ नहीं क्योंकि कोई चीज़ उस जैसी नहीं.

(2) तो जो हैं वह उसकी मख़लूक़ यानी उसकी पैदा की हुई है. और मख़लूक़ औलाद नहीं हो सकती तो किसी मख़लूक़ को औलाद बताना ग़लत और बातिल है.

(3) जिसकी विशेषताएं बयान हुई और जिसकी ये विशेषताएं हों वही पूजनीय है.

(4) चाहे वो रिज़्क़ हो, या मौत या गर्भ.

(5) “इदराक” यानी इहाता करने के मानी हैं कि जो चीज़ देखें, उसके हर तरफ़ और सारी हदों की जानकारी रखना. इदराक की यही तफ़सीर हज़रत सईद बिन मुसैयब और हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से नक़्ल की गई है. और मुफ़स्सिरों की बड़ी जमाअत इदराक की तफ़सीर इहाते से करती है और इहाता उसी चीज़ का हो सकता है जिसकी दिशाएं और सीमाएं हो. अल्लाह तआला के लिये दिशा और सीमा असंभव है तो उसका इदराक और इहाता भी संभव नहीं. यही एहले सुन्न्त का मज़हब है. ख़ारिज़ी और मोअतज़िली वग़ैरह गुमराह फ़िरके इदराक और रिवायत में फ़र्क़ नहीं करते इसलिये वो इस गुमराही में गिरफ़्तार हो गए कि उन्होंने दीदारे इलाही को मुहाले अक़ली क़रार दे दिया, इसके बावुजूद कि न देख सकना न जानने के लिये लाज़िम है. वरना जैसा कि अल्लाह तआला तमाम मौजूदात के विपरीत बिला कैफ़ियत व दिशा जाना जा सकता है, ऐसे ही देखा भी जा सकता है, क्योंकि अगर दूसरी चीज़ें बग़ैर कैफ़ियत और दिशा के देखी नहीं जा सकतीं तो जानी भी नहीं जा सकतीं. राज़ इसका यह है कि रूयत और दीद अर्थात दर्शन के मानी ये हैं कि नज़र किसी चीज़ को, जैसी कि वह हो, वैसा जाने तो जो चीज़ दिशा वाली होगी उसकी दीद या दर्शन दिशा अर्थात आकार में होगा और जिसके लिये आकार न होगा उसका दर्शन बिना आकार होगा. अल्लाह का दीदार आख़िरत में ईमान वालों को होगा, यह एहले सुन्नत का अक़ीदा और क़ुरआन व हदीस और सहाबा के क़ौल और बहुत सी दलीलों से साबित है. क़ुरआन शरीफ़ में फ़रमाया “वुजूहुंई यौमइज़िन नादिरतुन इला रब्बिहा नाज़िरह” कुछ मुंह उस दिन तरो ताज़ा होंगे अपने रब को देखते. (सूरए क़ियामह, आयत 22). इससे साबित है कि ईमान वालों को क़यामत के दिन उनके रब का दीदार उपलब्ध होगा. इसके अलावा और बहुत सी आयतों और कई सही हदीसों की रिवायतों से साबित है, अगर अल्लाह का दीदार असंभव होता तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम दीदार का सवाल न करते “रब्बे अरिनी उन्ज़ुर इलैका” (ऐ रब में तुझे देखना चाहता हूँ)  इरशाद न करते और उनके जवाब में “इनिस तक़र्रा मकानहू फ़सौफ़ा तरानी” न फ़रमाया जाता. इन दलीलों से साबित हो गया कि आख़िरत में ईमान वालों के  लिये अल्लाह का दीदार शरीअत में साबित है और इसका इन्कार गुमराही है.

(6) कि हुज्जत या तर्क लाज़िम हो.

(7) और काफ़िरों की फ़ुज़ूल बातों पर ध्यान न दो. इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि आप काफ़िरों की बकवास से दुखी न हों. यह उनकी बदनसीबी है कि ऐसी रौशन दलीलों से फ़ायदा न उठाएं.

(8) क़तादा का क़ौल है कि मुसलमान काफ़िरों के बुतों की बुराई किया करते थे ताकि काफ़िरों को नसीहत हो और वो बुत परस्ती की बुराई जान जाएं मगर उन जाहिलों ने बजाए नसीहत पकड़ने के अल्लाह की शान में बेअदबी के साथ ज़बान खोलनी शुरू की. इस पर यह आयत नाज़िल हुई. अगरचे बुतों को बुरा कहना और उनकी हक़ीक़त का इज़हार ताअत और सवाब है, लेकिन अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में काफ़िरों की बेअदबी को रोकने के लिये इसको मना फ़रमाया गया. इब्ने अंबारी का क़ौल है कि यह हुक्म पहले ज़माने में था, जब अल्लाह तआला ने इस्लाम को क़ुव्वत अता फ़रमाई, यह हुक्म स्थगित हो गया.

(9) वह जब चाहता है अपनी हिकमत के हिसाब से उतारता है.

(10) ऐ मुसलमाना!

(11) सच्चाई के मानने और देखने से.

(12) उन निशानियों पर जो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुबारक हाथ पर ज़ाहिर हुई थीं, जैसे चाँद का दो टुकड़ों में चिर जाना, वगैरह जैसे खुले चमत्कार.

पारा सात समाप्त

सूरए अनआम चौदहवाँ रूकू

सूरए अनआम चौदहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

आठवाँ पारा- वलौ-अन्नना
(सूरए अनआम जारी)
चौदहवाँ रूकू

और अगर हम उनकी तरफ़ फ़रिश्ते उतारते (1)
और उनसे मुर्दे बातें करते और हम हर चीज़ उनके सामने उठा लाते जब भी वो ईमान लाने वाले न थे(2)
मगर यह कि ख़ुदा चाहता(3)
मगर उनमें बहुत निरे जाहिल हैं  (4) (111)
और इसी तरह हमने हर नबी के दुश्मन किये हैं आदमियों और जिन्नों में के शैतान कि उनमें से एक दूसरे पर छुपवां डालता है बनावट की बात (5)
धोखे को और तुम्हारा रब चाहता तो वो ऐसा न करते(6)
तो उन्हें उनकी बनावटों पर छोड़ दो (7) (112)
और इसलिये कि उस (8)
की तरफ़ उनके दिल झुकें जिन्हें आख़िरत पर ईमान नहीं और उसे पसन्द करें और गुनाह कमाएं जो उन्हें गुनाह कमाना है (113) तो क्या अल्लाह के सिवा मैं किसी और का फ़ैसला चाहूँ और वही है जिसने तुम्हारी तरफ़ मुफ़स्सल  (विस्तार से) किताब उतारी (9)
और जिनको हमने किताब दी वो जानते हैं कि यह तेरे रब की तरफ़ से सच उतरा है(10)
तो ऐ सुनने वाले तू कभी शक वालों में न हो (114) और पूरी है तेरे रब की बात सच और इन्साफ़ में उसकी बातों का कोई बदलने वाला नहीं (11)
और वही है सुनता जानता (115) और ऐ सुनने वाले ज़मीन में अक्सर वो हैं कि तू उनके कहे पे चले तो तुझे अल्लाह की राह से बहकादें, वो सिर्फ़ गुमान के पीछे हैं (12)
और निरी अटकलें दौड़ाते हैं (13)(116)
तेरा रब ख़ूब जानता है कि कौन बहका उसकी राह से और ख़ूब जानता है हिदायत वालों को (117) तो खाओ उसमें से जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया (14)
अगर तुम उसकी आयतें मानते हो  (118) और तुम्हें क्या हुआ कि उसमें से न खाओ जिस (15)
पर अल्लाह का नाम लिया गया वह तुम से मुफ़स्सल  (स्पष्ट) बयान कर चुका जो कुछ तुमपर हराम हुआ(16)
मगर जब तुम्हें उससे मजबूरी हो (17)
और बेशक बहुतेरे अपनी ख़्वाहिशों से गुमराह करते हैं बे जाने, बेशक तेरा रब हद से बढ़ने वालों को ख़ूब जानता है (119) और छोड़दो खुला और छुपा गुनाह, वो जो गुनाह कमाते हैं जल्द ही अपनी कमाई की सज़ा पाएंगे (120) और उसे न खाओ जिस पर अल्लाह का नाम न लिया गया (18)
और वह बेशक नाफ़रमानी है, और बेशक शैतान अपने दोस्तों के दिलों में डालते हैं कि तुम से झगड़ें और अगर तुम उनका कहना मानो  (19)
तो उस वक़्त तुम मुश्रिक  हो (20)(121)

तफसीर सूरए
अनआम चौदहवाँ रूकू

(1)  इब्ने जरीर का क़ौल है कि यह आयत हंसी बनाने वाले क़ुरैश के बारे में उतरी, उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि ऐ मुहम्मद, आप हमारे मुर्दों को उठा लाइये, हम उनसे पूछ लें कि आप जो कहते हैं वह सच है या नहीं. और हमें फ़रिश्ते दिखाइये जो आपके रसूल होने की गवाही दें या अल्लाह और फ़रिश्तों को हमारे सामने लाइये, इसके जवाब में यह आयत उतरी.

(2) वो सख़्त दिल वाले हैं.

(3) उसकी मर्ज़ी जो होती है वही होता है. जो उसके इल्म में ख़ुशनसीब हैं वो ईमान से माला माल होते हैं.

(4) नहीं जानते कि ये लोग वो निशानियाँ बल्कि इससे भी ज़्यादा देखकर ईमान लाने वाले नहीं.  (जुमल व मदारिक)

(5) यानी वसवसे और छलकपट की बातें बहकाने के लिये.

(6) लेकिन अल्लाह तआला अपने बन्दों में से जिसे चाहता है परीक्षा में डालता है ताकि उसके मेहनत पर सब्र करने से ज़ाहिर हो जाए कि यह बड़े सवाब पाने वाला है.

(7) अल्लाह उन्हें बदला देगा, रूस्वा करेगा और आपकी मदद फ़रमाएगा.

(8) बनावट की बात.

(9) यानी क़ुरआन शरीफ़ जिसमें अच्छे कामों का हुक्म, बुरे कामों से दूर रहने के आदेश, सवाब के वादे, अज़ाब की चेतावनी, सच और झूट का फ़ैसला और मेरी सच्चाई की गवाही और तुम्हारे झूटे इल्ज़ामों का बयान है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मुश्रिक कहा करते थे कि आप हमारे और अपने बीच एक मध्यस्थ मुक़र्रर कर लीजिये. उनके जवाब में यह आयत उतरी.

(10)  क्योंकि उनके पास इसकी दलीलें हैं.

(11) न कोई उसके निश्चय को बदलने वाला, न हुक्म को रद करने वाला, न उसका वादा झूठा हो सके. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि कलाम जब सम्पूर्ण है तो उसमें दोष या तबदीली हो ही नहीं सकती और वह क़यामत तक हर क़िस्म के रद्दोंबदल से मेहफ़ूज़ है. कुछ मुफ़स्सिर फ़रमाते हैं मानी ये हैं कि किसी की क़ुदरत नहीं कि क़ुरआने पाक में तहरीफ़ यानी रद्दोबदल कर सके क्योंकि अल्लाह तआला ने इसकी हिफ़ाज़त की ज़मानत अपने करम के ज़िम्मे ले ली है.  (तफ़सीरे अबू सऊद)

(12) अपने जाहिल और गुमराह बाप दादा का अनुकरण करते है, दूरदृष्टि और सच्चाई को पहचानने से मेहरूम हैं.

(13) कि यह हलाल है और यह हराम और अटकल से कोई चीज़ हलाल हराम नहीं हो जाती जिसे अल्लाह और उसके रसूल ने हलाल किया वह हलाल, और जिसे हराम किया वह हराम.

(14) यानी जो अल्लाह के नाम पर ज़िब्ह किया गया, न वह जो अपनी मौत मरा या बुतों के नाम पर ज़िब्ह किया गया, वह हराम है. हलाल होना अल्लाह के नाम पर ज़िब्ह होने से जुड़ा हुआ है. यह मुश्रिकों के उस ऐतिराज़ का जवाब है जो उन्होंने मुसलमानों पर किया था तुम अपना क़त्ल किया हुआ खाते हो और अल्लाह का मारा हुआ यानी जो अपनी मौत मरे, उसको हराम जानते हो.

(15) ज़बीहा.

(16) इससे साबित हुआ कि हराम चीज़ों का तफ़सील से ज़िक्र  होता है और हराम होने के सुबूत के लिये हराम किये जाने का हुक्म दरकार है और जिस चीज़ पर शरीअत में हराम होने का हुक्म न हो वह मुबाह यानी हलाल है.

(17) तो बहुत ही मजबूरी की हालत में या अगर जान जाने का ख़ौफ़ है तो जान बचाने भर की ज़रूरत के लिये जायज़ है.

(18) ज़िब्ह के वक़्त. चाहे इस तरह कि वह जानवर अपनी मौत मर गया हो या इस तरह कि उसको बग़ैर बिस्मिल्लाह के या ग़ैर ख़ुदा के नाम पर ज़िब्ह किया गया हो, ये सब हराम हैं. लेकिन जहाँ मुसलमान ज़िब्ह करने वाला ज़िब्ह के वक़्त “बिस्मिल्लाहे अल्लाहो अकबर” कहना भूल गया, वह ज़िब्ह जायज़ है.