सूरए अनआम – सातवाँ रूकू

सूरए अनआम – सातवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ मुझे मना किया गया है कि उन्हें पूजूं जिनको तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो (1)
तुम फ़रमाओ मैं तुम्हारी ख़्वाहिश पर नहीं चलता (2)
यूं हो तो मैं बहक जाऊं और राह पर न रहूं (56) तुम फ़रमाओ मैं तो अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील (प्रमाण) पर हूँ(3)
और तुम उसे झुटलाते हो, मेरे पास नहीं जिसकी तुम जल्दी मचा रहे हो (4)
हुक्म नहीं मगर अल्लाह का वह हक़ फ़रमाता है और वह सबसे बेहतर फ़ैसला करने वाला (57) तुम फ़रमाओ अगर मेरे पास होती वह चीज़ जिसकी तुम जल्दी कर रहे हो (5)
तो मुझमें तुम में काम ख़त्म हो चुका होता (6)
और अल्लाह ख़ूब जानता है सितम करने वालों को (58) और उसी के पास हैं कुंजिया ग़ैब (अज्ञात) की उन्हें वही जानता है (7)
और जानता है जो कुछ ख़ुश्की और तरी में है, और जो पत्ता गिरता है वह उसे जानता है और कोई दाना नहीं ज़मीन की अंधेरियों में और न कोई तर और ख़ुश्क जो एक रौशन किताब में न लिखा हो (8)(59)
और वही है जो रात को तुम्हारी रूहें निकालता है (9)
और जानता है जो कुछ दिन में कमाओ फिर तुम्हें दिन में उठाता है कि ठहराई हुई मीआद पूरी हो (10)
फिर उसीकी तरफ़ फिरना है (11)
फिर वह बता देगा जो कुछ तुम करते थे (60)

तफ़सीर सूरए अनआम – सातवाँ रूकू

(1) क्योंकि यह अक़्ल और नक़्ल दोनों के ख़िलाफ़ है.

(2) यानी तुम्हारा तरीक़ा नफ़्स का अनुकरण है न कि दलील का अनुकरण, इसलिये तुम्हारे तरीक़े को अपनाया नहीं जा सकता.

(3) और मुझे उसकी पहचान हासिल है. मैं जानता हूँ कि उसके सिवा कोई पूजे जाने के क़ाबिल नहीं. रौशन दलील क़ुरआन शरीफ़ और चमत्कार और तौहीद के प्रमाण सबको शामिल है.

(4) काफ़िर हंसी में हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा करते थे कि हम पर जल्दी अज़ाब उतरवाइये. इस आयत में उन्हें जवाब दिया गया और ज़ाहिर कर दिया गया कि हुज़ूर से यह सवाल करना निहायत बेजा है.

(5) यानी अज़ाब.

(6) मैं तुम्हें एक घड़ी की मोहलत न देता और तुम्हें रब का मुख़ालिफ़ देखकर बेधड़क हलाक कर डालता. लेकिन अल्लाह तआला हिल्म वाला है, अज़ाब देने में जल्दी नहीं फ़रमाता.

(7) तो जिसे वह चाहे, वही ग़ैब पर सूचित हो सकता है. बिना उसके बताए कोई ग़ैब नहीं जान सकता. (वाहिदी)

(8) रौशन किताब से लौहे मेहफ़ूज मुराद है. अल्लाह तआला ने पिछले और अगरे सारे उलूम इसमें दर्ज फ़रमा दिये.

(9) तो तुमपर नींद छा जाती है और तुम्हारी क्षमताएं अपने हाल पर बाक़ी नहीं रहती हैं.

(10) और उम्र अपनी हद को पहुंचे.

(11) आख़िरत में. इस आयत में मरने के बाद ज़िन्दा होने पर दलील ज़िक्र फ़रमाई गई. जिस तरह रोज़ सोने के वक़्त एक तरह की मौत तुमपर भेजी जाती है जिससे तुम्हारे हवास मुअत्तल हो जाते हैं और चलना फिरना पकड़ना और जागते के सारे काम शिथिल हो जाते हैं, उसके बाद बेदारी के वक़्त अल्लाह तआला सारे अंगों को उनकी क्षमताएं प्रदान करता है. यह खुला प्रमाण है इस बात का कि वह तमाम ज़िन्दगानी की क्षमताओं को मौत के बाद अता करने पर इसी तरह की क़ुदरत रखता है.

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