सूरए अनआम – छटा रूकू

सूरए अनआम – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और इस क़ुरआन से उन्हें डराओ जिन्हें ख़ौफ़ (भय) हो कि अपने रब की तरफ़ यूं उठाए जाएं कि अल्लाह के सिवा न उनका कोई हिमायती हो न कोई सिफ़ारिशी इस उम्मीद पर कि वो परहेज़गार हो जाएं (51) और दूर न करो उन्हें जो अपने रब को पुकारते हैं सुबह और शाम उसकी रज़ा चाहते (1)
तुमपर उनके हिसाब से कुछ नहीं और उनपर तुम्हारे हिसाब से कुछ नहीं (2)
फिर उन्हें तुम दूर करो तो यह काम इन्साफ़ से कुछ नहीं फिर उन्हें तुम दूर करो तो यह काम इन्साफ़ से परे है (52) और यूंही हमने उन्हें एक को दूसरे के लिये फ़ितना (मुसीबत) बनाया कि मालदार काफ़िर मोहताज मुसलमानों को देखकर (3)
कहें क्या ये है जिनपर अल्लाह ने एहसान किया हम में से(4)
क्या अल्लाह ख़ूब नहीं जानता हक़ मानने वालों को (53) और जब तुम्हारे हुज़ूर वो हाज़िर हों जो हमारी आयतों पर ईमान लाते हैं तो उनसे फ़रमाओ तुमपर सलाम हो तुम्हारे रब ने अपने करम के ज़िम्मे पर रहमत लाज़िम कर ली है(5)
कि तुममें जो कोई नादानी से कुछ बुराई कर बैठे फिर उसके बाद तौबा करें और संवर जाए तो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (54) और इसी तरह हम आयतों को तफ़सील से बयान फ़रमाते हैं (6)
और इसलिये कि मुजरिमों का रास्ता ज़ाहिर हो जाए (7) (55)

तफ़सीर सूरए अनआम – छटा रूकू

(1) काफ़िरों की एक जमाअत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में आई तो उन्होंने देखा कि हुज़ूर के चारों तरफ़ ग़रीब सहाबा की एक जमाअत हाज़िर है जो मामूली दर्जे के लिबास पहने हुए हैं. यह देखकर वो कहने लगे कि हमें इन लोगों के पास बैठते शर्म आती है. अगर आप इन्हें अपनी मजलिस से निकाल दें तो हम आप पर ईमान ले आएं और आप की ख़िदमत में हाज़िर रहें. हुज़ूर ने इसको स्वीकार न फ़रमाया. इस पर यह आयत उतरी.

(2) सब का हिसाब अल्लाह पर है, वही सारी सृष्टि को रोज़ी देने वाला है. उसके सिवा किसी के ज़िम्मे किसी का हिसाब नहीं. मतलब यह कि वह कमज़ोर फ़क़ीर जिनका ज़िक्र ऊपर हुआ आपके दरबार में क़ुर्ब पाने के मुस्तहिक हैं. उन्हें दूर न करना ही ठीक है.

(3) हसद के तौर पर.

(4) कि उन्हें ईमान और हिदायत नसीब की, इसके बावुजूद कि वो लोग फ़क़ीर ग़रीब हैं. और हम रईस और सरदार हैं. इससे उनका मतलब अल्लाह तआला पर ऐतिराज़ करना है कि ग़रीब अमीर पर सबक़त का हक़ नहीं रखते तो अगर वह हक़ होता जिस पर ये ग़रीब हैं तो वो हमसे ऊंचे न होते.

(5) अपने फ़ज़्ल व करम से वादा फ़रमाया.

(6) ताकि सच्चाई ज़ाहिर हो और उस पर अमल किया जाए.

(7) ताकि उससे परहेज़ किया जाए, दूर रहा जाए.

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