सूरए अनआम तैरहवाँ रूकू

सूरए अनआम तैरहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

वे किसी नमूने के आसमानों और ज़मीन का बनाने वाला, उसके बच्चा कहाँ से हो हालांकि उसकी औरत नहीं (1)
और उसने हर चीज़ पैदा की(2)
और वह सब कुछ जानता है (101) यह है अल्लाह तुम्हारा रब (3)
और उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं हर चीज़ का बनाने वाला तो उसे पूजो वह जो हर चीज़ पर निगहबान है (4) (102)
आँखें उसे इहाता (घिराव) नहीं करतीं (5)
और सब आँखें उसके इहाते (घेरे) में हैं, और वही है पूरा बातिन पूरा ख़बरदार (103) तुम्हारे पास आँखें खोलने वाली दलीलें आई तुम्हारे रब की तरफ़ से तो जिसने देखा तो अपने भले को और जो अंधा हुआ अपने बुरे को और मैं तुमपर निगहबान नहीं (104)  और हम इसी तरह आयतें तरह तरह से बयान करते हैं(6)
और इसलिये कि काफ़िर बोल उठें कि तुम तो पढ़े हो और इसलिये कि उसे इल्म वालों पर वाज़ेह (स्पष्ट) कर दें (105) उसपर चलो जो तुम्हें तुम्हारे रब की तरफ़ से वही होती है(7)
उसके सिवा कोई मअबूद (पूजनीय) नहीं और मुश्रिकों से मुंह फेर लो (106) और अल्लाह चाहता तो वो शिर्क नहीं करते और हमने तुम्हें उनपर निगहबान नहीं किया और तुम उनपर करोड़े नहीं (107)  और उन्हें गाली न दो जिनको वो अल्लाह के सिवा पूजते हैं कि वो अल्लाह की शान में बेअदबी करेंगे ज़ियादती और जिहालत से (8)
यूं ही हमने हर उम्मत की निगाह में उसके अमल (कर्म) भले कर दिये हैं फिर उन्हें अपने रब की तरफ़ फिरना है और वह उन्हें बता देगा जो करते थे (108) और उन्होंने अल्लाह की क़सम खाई अपने हलफ़ में पूरी कोशिश से कि अगर उनके पास कोई निशानी आई तो ज़रूर उस पर ईमान लाएंगे, तुम फ़रमादो कि निशानियाँ तो अल्लाह के पास हैं (9)
और तुम्हें (10)
क्या ख़बर कि जब वो आएं तो ये ईमान न लाएंगे (109) और हम फेर देते हैं उनके दिलों और आँखों को (11)
जैसा कि वो पहली बार ईमान न लाए थे (12)
और उन्हें छोड़ देते हैं कि अपनी सरकशी (बग़ावत) में भटका करें (110)

तफसीर सूरए – अनआम तैरहवाँ रूकू

(1)  और वे औरत औलाद नहीं होती और पत्नी  उसकी शान के लायक़ नहीं क्योंकि कोई चीज़ उस जैसी नहीं.

(2) तो जो हैं वह उसकी मख़लूक़ यानी उसकी पैदा की हुई है. और मख़लूक़ औलाद नहीं हो सकती तो किसी मख़लूक़ को औलाद बताना ग़लत और बातिल है.

(3) जिसकी विशेषताएं बयान हुई और जिसकी ये विशेषताएं हों वही पूजनीय है.

(4) चाहे वो रिज़्क़ हो, या मौत या गर्भ.

(5) “इदराक” यानी इहाता करने के मानी हैं कि जो चीज़ देखें, उसके हर तरफ़ और सारी हदों की जानकारी रखना. इदराक की यही तफ़सीर हज़रत सईद बिन मुसैयब और हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से नक़्ल की गई है. और मुफ़स्सिरों की बड़ी जमाअत इदराक की तफ़सीर इहाते से करती है और इहाता उसी चीज़ का हो सकता है जिसकी दिशाएं और सीमाएं हो. अल्लाह तआला के लिये दिशा और सीमा असंभव है तो उसका इदराक और इहाता भी संभव नहीं. यही एहले सुन्न्त का मज़हब है. ख़ारिज़ी और मोअतज़िली वग़ैरह गुमराह फ़िरके इदराक और रिवायत में फ़र्क़ नहीं करते इसलिये वो इस गुमराही में गिरफ़्तार हो गए कि उन्होंने दीदारे इलाही को मुहाले अक़ली क़रार दे दिया, इसके बावुजूद कि न देख सकना न जानने के लिये लाज़िम है. वरना जैसा कि अल्लाह तआला तमाम मौजूदात के विपरीत बिला कैफ़ियत व दिशा जाना जा सकता है, ऐसे ही देखा भी जा सकता है, क्योंकि अगर दूसरी चीज़ें बग़ैर कैफ़ियत और दिशा के देखी नहीं जा सकतीं तो जानी भी नहीं जा सकतीं. राज़ इसका यह है कि रूयत और दीद अर्थात दर्शन के मानी ये हैं कि नज़र किसी चीज़ को, जैसी कि वह हो, वैसा जाने तो जो चीज़ दिशा वाली होगी उसकी दीद या दर्शन दिशा अर्थात आकार में होगा और जिसके लिये आकार न होगा उसका दर्शन बिना आकार होगा. अल्लाह का दीदार आख़िरत में ईमान वालों को होगा, यह एहले सुन्नत का अक़ीदा और क़ुरआन व हदीस और सहाबा के क़ौल और बहुत सी दलीलों से साबित है. क़ुरआन शरीफ़ में फ़रमाया “वुजूहुंई यौमइज़िन नादिरतुन इला रब्बिहा नाज़िरह” कुछ मुंह उस दिन तरो ताज़ा होंगे अपने रब को देखते. (सूरए क़ियामह, आयत 22). इससे साबित है कि ईमान वालों को क़यामत के दिन उनके रब का दीदार उपलब्ध होगा. इसके अलावा और बहुत सी आयतों और कई सही हदीसों की रिवायतों से साबित है, अगर अल्लाह का दीदार असंभव होता तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम दीदार का सवाल न करते “रब्बे अरिनी उन्ज़ुर इलैका” (ऐ रब में तुझे देखना चाहता हूँ)  इरशाद न करते और उनके जवाब में “इनिस तक़र्रा मकानहू फ़सौफ़ा तरानी” न फ़रमाया जाता. इन दलीलों से साबित हो गया कि आख़िरत में ईमान वालों के  लिये अल्लाह का दीदार शरीअत में साबित है और इसका इन्कार गुमराही है.

(6) कि हुज्जत या तर्क लाज़िम हो.

(7) और काफ़िरों की फ़ुज़ूल बातों पर ध्यान न दो. इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि आप काफ़िरों की बकवास से दुखी न हों. यह उनकी बदनसीबी है कि ऐसी रौशन दलीलों से फ़ायदा न उठाएं.

(8) क़तादा का क़ौल है कि मुसलमान काफ़िरों के बुतों की बुराई किया करते थे ताकि काफ़िरों को नसीहत हो और वो बुत परस्ती की बुराई जान जाएं मगर उन जाहिलों ने बजाए नसीहत पकड़ने के अल्लाह की शान में बेअदबी के साथ ज़बान खोलनी शुरू की. इस पर यह आयत नाज़िल हुई. अगरचे बुतों को बुरा कहना और उनकी हक़ीक़त का इज़हार ताअत और सवाब है, लेकिन अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में काफ़िरों की बेअदबी को रोकने के लिये इसको मना फ़रमाया गया. इब्ने अंबारी का क़ौल है कि यह हुक्म पहले ज़माने में था, जब अल्लाह तआला ने इस्लाम को क़ुव्वत अता फ़रमाई, यह हुक्म स्थगित हो गया.

(9) वह जब चाहता है अपनी हिकमत के हिसाब से उतारता है.

(10) ऐ मुसलमाना!

(11) सच्चाई के मानने और देखने से.

(12) उन निशानियों पर जो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुबारक हाथ पर ज़ाहिर हुई थीं, जैसे चाँद का दो टुकड़ों में चिर जाना, वगैरह जैसे खुले चमत्कार.

पारा सात समाप्त

सूरए अनआम चौदहवाँ रूकू

सूरए अनआम चौदहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

आठवाँ पारा- वलौ-अन्नना
(सूरए अनआम जारी)
चौदहवाँ रूकू

और अगर हम उनकी तरफ़ फ़रिश्ते उतारते (1)
और उनसे मुर्दे बातें करते और हम हर चीज़ उनके सामने उठा लाते जब भी वो ईमान लाने वाले न थे(2)
मगर यह कि ख़ुदा चाहता(3)
मगर उनमें बहुत निरे जाहिल हैं  (4) (111)
और इसी तरह हमने हर नबी के दुश्मन किये हैं आदमियों और जिन्नों में के शैतान कि उनमें से एक दूसरे पर छुपवां डालता है बनावट की बात (5)
धोखे को और तुम्हारा रब चाहता तो वो ऐसा न करते(6)
तो उन्हें उनकी बनावटों पर छोड़ दो (7) (112)
और इसलिये कि उस (8)
की तरफ़ उनके दिल झुकें जिन्हें आख़िरत पर ईमान नहीं और उसे पसन्द करें और गुनाह कमाएं जो उन्हें गुनाह कमाना है (113) तो क्या अल्लाह के सिवा मैं किसी और का फ़ैसला चाहूँ और वही है जिसने तुम्हारी तरफ़ मुफ़स्सल  (विस्तार से) किताब उतारी (9)
और जिनको हमने किताब दी वो जानते हैं कि यह तेरे रब की तरफ़ से सच उतरा है(10)
तो ऐ सुनने वाले तू कभी शक वालों में न हो (114) और पूरी है तेरे रब की बात सच और इन्साफ़ में उसकी बातों का कोई बदलने वाला नहीं (11)
और वही है सुनता जानता (115) और ऐ सुनने वाले ज़मीन में अक्सर वो हैं कि तू उनके कहे पे चले तो तुझे अल्लाह की राह से बहकादें, वो सिर्फ़ गुमान के पीछे हैं (12)
और निरी अटकलें दौड़ाते हैं (13)(116)
तेरा रब ख़ूब जानता है कि कौन बहका उसकी राह से और ख़ूब जानता है हिदायत वालों को (117) तो खाओ उसमें से जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया (14)
अगर तुम उसकी आयतें मानते हो  (118) और तुम्हें क्या हुआ कि उसमें से न खाओ जिस (15)
पर अल्लाह का नाम लिया गया वह तुम से मुफ़स्सल  (स्पष्ट) बयान कर चुका जो कुछ तुमपर हराम हुआ(16)
मगर जब तुम्हें उससे मजबूरी हो (17)
और बेशक बहुतेरे अपनी ख़्वाहिशों से गुमराह करते हैं बे जाने, बेशक तेरा रब हद से बढ़ने वालों को ख़ूब जानता है (119) और छोड़दो खुला और छुपा गुनाह, वो जो गुनाह कमाते हैं जल्द ही अपनी कमाई की सज़ा पाएंगे (120) और उसे न खाओ जिस पर अल्लाह का नाम न लिया गया (18)
और वह बेशक नाफ़रमानी है, और बेशक शैतान अपने दोस्तों के दिलों में डालते हैं कि तुम से झगड़ें और अगर तुम उनका कहना मानो  (19)
तो उस वक़्त तुम मुश्रिक  हो (20)(121)

तफसीर सूरए
अनआम चौदहवाँ रूकू

(1)  इब्ने जरीर का क़ौल है कि यह आयत हंसी बनाने वाले क़ुरैश के बारे में उतरी, उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि ऐ मुहम्मद, आप हमारे मुर्दों को उठा लाइये, हम उनसे पूछ लें कि आप जो कहते हैं वह सच है या नहीं. और हमें फ़रिश्ते दिखाइये जो आपके रसूल होने की गवाही दें या अल्लाह और फ़रिश्तों को हमारे सामने लाइये, इसके जवाब में यह आयत उतरी.

(2) वो सख़्त दिल वाले हैं.

(3) उसकी मर्ज़ी जो होती है वही होता है. जो उसके इल्म में ख़ुशनसीब हैं वो ईमान से माला माल होते हैं.

(4) नहीं जानते कि ये लोग वो निशानियाँ बल्कि इससे भी ज़्यादा देखकर ईमान लाने वाले नहीं.  (जुमल व मदारिक)

(5) यानी वसवसे और छलकपट की बातें बहकाने के लिये.

(6) लेकिन अल्लाह तआला अपने बन्दों में से जिसे चाहता है परीक्षा में डालता है ताकि उसके मेहनत पर सब्र करने से ज़ाहिर हो जाए कि यह बड़े सवाब पाने वाला है.

(7) अल्लाह उन्हें बदला देगा, रूस्वा करेगा और आपकी मदद फ़रमाएगा.

(8) बनावट की बात.

(9) यानी क़ुरआन शरीफ़ जिसमें अच्छे कामों का हुक्म, बुरे कामों से दूर रहने के आदेश, सवाब के वादे, अज़ाब की चेतावनी, सच और झूट का फ़ैसला और मेरी सच्चाई की गवाही और तुम्हारे झूटे इल्ज़ामों का बयान है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मुश्रिक कहा करते थे कि आप हमारे और अपने बीच एक मध्यस्थ मुक़र्रर कर लीजिये. उनके जवाब में यह आयत उतरी.

(10)  क्योंकि उनके पास इसकी दलीलें हैं.

(11) न कोई उसके निश्चय को बदलने वाला, न हुक्म को रद करने वाला, न उसका वादा झूठा हो सके. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि कलाम जब सम्पूर्ण है तो उसमें दोष या तबदीली हो ही नहीं सकती और वह क़यामत तक हर क़िस्म के रद्दोंबदल से मेहफ़ूज़ है. कुछ मुफ़स्सिर फ़रमाते हैं मानी ये हैं कि किसी की क़ुदरत नहीं कि क़ुरआने पाक में तहरीफ़ यानी रद्दोबदल कर सके क्योंकि अल्लाह तआला ने इसकी हिफ़ाज़त की ज़मानत अपने करम के ज़िम्मे ले ली है.  (तफ़सीरे अबू सऊद)

(12) अपने जाहिल और गुमराह बाप दादा का अनुकरण करते है, दूरदृष्टि और सच्चाई को पहचानने से मेहरूम हैं.

(13) कि यह हलाल है और यह हराम और अटकल से कोई चीज़ हलाल हराम नहीं हो जाती जिसे अल्लाह और उसके रसूल ने हलाल किया वह हलाल, और जिसे हराम किया वह हराम.

(14) यानी जो अल्लाह के नाम पर ज़िब्ह किया गया, न वह जो अपनी मौत मरा या बुतों के नाम पर ज़िब्ह किया गया, वह हराम है. हलाल होना अल्लाह के नाम पर ज़िब्ह होने से जुड़ा हुआ है. यह मुश्रिकों के उस ऐतिराज़ का जवाब है जो उन्होंने मुसलमानों पर किया था तुम अपना क़त्ल किया हुआ खाते हो और अल्लाह का मारा हुआ यानी जो अपनी मौत मरे, उसको हराम जानते हो.

(15) ज़बीहा.

(16) इससे साबित हुआ कि हराम चीज़ों का तफ़सील से ज़िक्र  होता है और हराम होने के सुबूत के लिये हराम किये जाने का हुक्म दरकार है और जिस चीज़ पर शरीअत में हराम होने का हुक्म न हो वह मुबाह यानी हलाल है.

(17) तो बहुत ही मजबूरी की हालत में या अगर जान जाने का ख़ौफ़ है तो जान बचाने भर की ज़रूरत के लिये जायज़ है.

(18) ज़िब्ह के वक़्त. चाहे इस तरह कि वह जानवर अपनी मौत मर गया हो या इस तरह कि उसको बग़ैर बिस्मिल्लाह के या ग़ैर ख़ुदा के नाम पर ज़िब्ह किया गया हो, ये सब हराम हैं. लेकिन जहाँ मुसलमान ज़िब्ह करने वाला ज़िब्ह के वक़्त “बिस्मिल्लाहे अल्लाहो अकबर” कहना भूल गया, वह ज़िब्ह जायज़ है.

सूरए अनआम पन्द्रहवाँ रूकू

सूरए अनआम पन्द्रहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और क्या वह कि मुर्दा था हमने उसे ज़िन्दा किया (1)
और उसके लिये एक नूर कर दिया (2)
जिससे लोगों में चलाता है(3)
वह उस जैसा हो जाएगा जो अधेरियों में है (4)
उनसे निकलने वाला नहीं, यूंही काफ़िरों की आंख में उनके कर्म भले कर दिये गए हैं (122) और इसी तरह हमने हर बस्ती में उसके मुजरिमों के सरग़ने (सरदार) किये कि उसमें दाव खेलें (5)
और दाव नहीं खेलते मगर अपनी जानों पर और उन्हें समझ नहीं (6) (123)
और जब उनके पास कोई निशानी आए तो कहते हैं हम कभी ईमान न लाएंगे जब तक हमें भी वैसा न मिले जैसा अल्लाह के रसूलों को मिला (7)
अल्लाह ख़ूब जानता है जहाँ अपनी रिसालत रखे (8)
जल्द ही मुजरिमों को अल्लाह कें यहाँ ज़िल्लत पहुंचेगी और सख़्त अज़ाब, बदला उनके मक्र (मक्कारी) का (124)  और जिसे अल्लाह राह दिखाना चाहे उसका सीना इस्लाम के लिये खोल देता है (9)
और जिसे गुमराह करना चाहे उसका सीना तंग ख़ुब रूका हुआ कर देता है (10)
जैसे किसी की ज़बरदस्ती से आसमान पर चढ़ रहा है, अल्लाह यूंही अज़ाब डालता है ईमान न लाने वालों को (125)  और यह (11)
तुम्हारे रब की सीधी राह है, हमने आयतें तफ़सील से बयान कर दीं नसीहत वालों के लिये (126) उनके लिये सलामती का घर है अपने रब के यहां और वह उनका मौला है यह उनके कामों का फल है (127)  और जिस दिन उन सब को उठाएगा और फ़रमाएगा ऐ जिन्न के गिरोह तुमने बहुत आदमी घेर लिये (12)
और उनके दोस्त आदमी अर्ज़ करेंगे ऐ हमारे रब हम में एक ने दूसरे से फ़ायदा उठाया (13)
और हम अपनी उस मीआद (मुद्दत) को पहुंच गए जो तूने हमारे लिये मुक़र्रर फ़रमाई थी (14)
फ़रमाएगा आग तुम्हारा ठिकाना है हमेशा उसमें रहो मगर जिसे ख़ुदा चाहे (15)
ऐ मेहबूब बेशक तुम्हारा रब हिकमत वाला इल्म वाला है (128) और यूंही हम ज़ालिमों में एक को दूसरे पर मुसल्लत (सवार) करते हैं बदला उनके किये का (16) (129)

तफसीर सूरए
अनआम पन्द्रहवाँ रूकू

(1) मुर्दों से काफ़िर और ज़िन्दा से मुमिन मुराद है, क्योंकि कुफ़्र दिलों के लिये मौत है और ईमान ज़िन्दगी.

(2) नूर से ईमान मुराद है जिसकी बदौलत आदमी कुफ़्र की अंधेरियों से छुटकारा पाता है. क़तादा का क़ौल है कि नूर से अल्लाह की किताब यानी क़ुरआन मुराद है.

(3) और बीनाई यानी दृष्टि हासिल करके सच्चाई की राह पहचान लेता है.

(4) कुफ़्र व जिहालत और दिल के अंधेपन की यह एक मिसाल है जिसमें मूमिन और काफ़िर का हाल बयान फ़रमाया गया है कि हिदायत पाने वाला मूमिन उस मुर्दे की तरह है जिसने ज़िन्दगी पाई और उसको नूर मिला जिससे वह अपनी मंज़िल की राह पाता है. और काफ़िर की मिसाल उसकी तरह है जो तरह तरह की अंधेरियों में गिरफ़्तार हुआ और उनसे निकल न सके, हमेशा हैरत में पड़ा रहे. ये दोनों मिसालें हर मूमिन और काफ़िर के लिये आम है, अगरचे हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा के क़ौल के मुताबिक इनके उतरने की परिस्थिति यह है कि अबू जहल ने एक रोज़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर कोई नापाक चीज़ फैंकी थी, उस रोज़ हज़रत अमीर हमज़ा रदियल्लाहो अन्हो शिकार को गए हुए थे, जिस वक़्त वह हाथ में कमान लिये हुए शिकार से वापस आए तो उन्हें इस घटना की सूचना मिली, अगरचे वह अभी तक ईमान नहीं लाए थे, मगर यह ख़बर सुनकर उन्हें बहुत गुस्सा आया. वह अबू जहल पर चढ़ गए, और उसको कमान से मारने लगे और अबू जहल आजिज़ी और ख़ुशामद करने लगा और कहने लगा, अबू युअला  (हज़रत अमीर हमज़ा की कुन्नियत है) क्या आप ने नहीं देखा कि मुहम्मद कैसा दीन लाए और उन्होंने हमारे मअबूदों को बुरा कहा और हमारे बाप दादा की मुख़ालिफ़त की और हमे बदअक़्ल बताया. इसपर हज़रत अमीर हमज़ा ने फ़रमाया तुम्हारे बराबर बदअक़्ल कौन है कि अल्लाह को छोड़कर पत्थरों को पूजते हो. मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं. और मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह के रसूल है. उसी वक़्त हज़रत अमीर हमज़ा इस्लाम ले आए. इसपर यह आयत उतरी, तो हज़रत अमीर हमज़ा का हाल उसके जैसा है जो मुर्दा था, ईमान न रखता था, अल्लाह तआला ने उसको ज़िन्दा किया और अन्दर का नूर अता किया और अबू जहल का हाल यही है कि वह कुफ़्र और जिहालत की तारीकी में गिरफ़्तार रहे और………

(5) और तरह तरह के बहानों और धोखे और मक्कारी से लोगों को बहकाते और बातिल को रिवाज देने की कोशिश करते है.

(6) कि उसका वबाल उन्हीं पर पड़ता है.

(7) यानी जबतक हमारे पास वही न आए और हमें नबी न बनाया जाए. वलीद बिन मुग़ीरा ने कहा था कि अगर नबुव्वत हक़ हो तो उसका ज़्यादा हक़दार मैं हूँ क्योंकि मेरी उम्र मुहम्मद से ज़्यादा है, और माल भी, इस पर यह आयत उतरी.

(8) यानी अल्लाह जानता है कि नबुव्वत की योग्यता और इसका हक़ किसको है, किसको नहीं, उम्र और माल से कोई नबुव्वत का हक़दार नहीं हो सकता. ये नबुव्वत के तलबगार तो हसद, छलकपट, बद एहदी वग़ैरह बुरे कामों में गिरफ़्तार हैं, ये कहाँ और नबुव्वत की महान उपाधि कहाँ.

(9) उसको ईमान की तौफ़ीक़ देता है और उसके दिल में रौशनी पैदा करता है.

(10) कि उसमें इल्म और तौहीद और  ईमान की दलीलों की गुंजायश न हो तो उसकी ऐसी हालत होती है कि जब उसका ईमान की दअवत दी जाती है और इस्लाम की तरफ़ बुलाया जाता है तो वह उसपर भारी गुज़रता है और उसको बहुत दुशवार मालुम होता है.

(11) दीने इस्लाम.

(12) उनको बहकाया और अपने रास्ते पर ले गए.

(13) इस तरह कि इन्सानों ने वासनाओ और गुनाहों में उनसे मदद पाई और जिन्नों ने इन्सानों को अपना मुतीअ बनाया आख़िरकार उसका नतीजा पाया.

(14) वक़्त गुज़र गया. क़यामत का दिन आ गया, हसरत और शर्मिन्दगी बाक़ी रह गई.

(15) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया  कि यह छूट उस क़ौम की तरफ़ पलटती है जिसकी निस्बत अल्लाह के इल्म में है कि वो इस्लाम लाएंगे और नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तस्दीक़ करेंगे और जहन्नम से निकाले जाएंगे.

(16) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह जब किसी क़ौम की भलाई चाहता है तो अच्छों को उनपर मुसल्लत करता है, बुराई चाहता है तो बुरों को. इससे यह नतीजा निकलता है कि जो क़ौम ज़ालिम होती है उसपर ज़ालिम बादशाह मुसल्लत किया जाता है. तो जो उस ज़ालिम के पंजे से रिहाई चाहें उन्हें चाहिये कि ज़ुल्म करना छोड़ दें.

सूरए अनआम सोलहवाँ रूकू

सूरए अनआम  सोलहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ  जिन्नों और आदमियों के गिरोह, क्या तुम्हारे पास तुम में के रसूल न आए थे तुमपर मेरी आयतें पढ़ते और तुम्हे ये दिन (1)
देखने से डराते (2)
कहेंगे हमने अपनी जानों पर गवाही दी (3)
और उन्हें दुनिया की ज़िन्दगी ने फ़रेब दिया और ख़ुद अपनी जानों पर गवाही देंगे कि वो काफ़िर थे (4)(130)
यह(5)
इसलिये कि तेरा रब बस्तियों को (6)
ज़ुल्म से तबाह नहीं करता कि उनके लोग बेख़बर हों (7) (131)
और हर एक के लिये (8)
उनके कामों से दर्जें है और तेरा रब उनके आमाल (कर्मों) से बेख़बर नहीं (132) और ऐ मेहबूब तुम्हारा रब बेपर्वाह है रहमत वाला, ऐ लोगों वह चाहे तो तुम्हें ले जाए (9)
और जिसे चाहे तुम्हारी जगह लादे जैसे तुम्हें ओरों की औलाद से पैदा किया  (10) (133)
बेशक जिसका तुम्हें वादा किया जाता है (11)
ज़रूर आने वाली है और तुम थका नहीं सकते (134) तुम फ़रमाओ ऐ मेरी क़ौम तुम अपनी जगह पर काम किये जाओ मैं अपना काम करता हूँ तो अब जानना चाहते हो किसका रहता है आख़िरत का घर, बेशक ज़ालिम फ़लाह (भलाई) नहीं पाते (135) और (12)
अल्लाह ने जो खेती और मवेशी पैदा किये उनमें उसे एक हिस्सेदार ठहराया तो बोले यह अल्लाह का है उनके ख़्याल में और यह हमारे शरीकों का (13)
तो वह जो उनके शरीकों का है  वह तो ख़ुदा को नहीं पहुंचता, और जो ख़ुदा का है वह उनके शरीकों को पहुंचता है क्या ही बुरा हुक्म लगाते हैं (14)(136)
और यूं ही बहुत मुश्रिकों की निगाह में उनके शरीकों ने औलाद का क़त्ल भला कर दिखाया है (15)
कि उन्हें हलाक करें और उनका दीन उनपर मुशतवह (संदिग्ध) करदें  (16)
और अल्लाह चाहता तो ऐसा न करते तो तुम उन्हें छोउ़ दो वो हैं और उनके इफ़तिरा (मिथ्यारोप)  (137) और बोले (17) ये मवेशी और खेती रोकी  (18)
हुई है इसे वही खाए जिसे हम चाहें अपने झूठे ख़्याल से (19)
और  कुछ मवेशी हैं जिनपर चढ़ना हराम ठहराया (20)
और कुछ मवेशी के ज़िब्ह पर अल्लाह का नाम नहीं लेते (21)
यह सब अल्लाह पर झूठ बांधना है बहुत जल्द वह उन्हें बदला देगा उनके इफ़तिराओ (आरोप) का (138) और बोले जो उन मवेशी के पेट में है वह निरा हमारे मर्दों का है (22)
और हमारी औरतों पर हराम है, और मरा हुआ निकले तो वह सब (23)
उसमें शरीक हैं, क़रीब है कि अल्लाह उन्हें उनकी बातों का बदला देगा बेशक वह हिकमत व इल्म वाला है (139) बेशक तबाह हुए वो जो अपनी औलाद को क़त्ल करते हैं अहमक़ाना (मुर्खपना) जिहालत से (24)
और हराम ठहराते हैं वह जो अल्लाह ने उन्हें रोज़ी दी (25)
अल्लाह पर झूट बांधने को (26)
बेशक वो बहके और राह न पाई (27)  (140)

तफसीर सूरए
अनआम सोलहवाँ रूकू

(1) यानी क़यामत का दिन.

(2) और अल्लाह के अज़ाब का डर दिलाते.

(3) क़ाफ़िर, जिन्न और इन्सान इक़रार करेंगे कि रसूल उनके पास आए और उन्होंने ज़बानी संदेश पहुंचाए और उस दिन के पेश आने वाले हालात का ख़ौफ़ दिलाया, लेकिन क़ाफ़िरों ने उनको झुटलाया और उनपर ईमान न लाए, क़ाफ़िरों का यह इक़रार उस वक़्त होगा जबकि उनके शरीर के सारे अंग उनके शिर्क और कुफ़्र की गवाही देंगे.

(4) क़यामत का दिन बहुत लम्बा होगा और इसमें हालात बहुत मुख़्तलिफ़ पेश आएंगे. जब काफ़िर ईमान वालों के इनआम और इज़्ज़त व सम्मान को देखेंगे तो अपने कुफ़्र और शिर्क से इन्क़ारी हो जाएंगे और इस ख़्याल से कि शायद इन्क़ारी हो जाने से कुछ काम बने, यह कहेंगे “वल्लाहे सब्बिना मा कुन्न मुश्रिकीन” यानी ख़ुदा की क़सम हम मुश्रिक न थे. उस वक़्त उनके मुंहो पर मोहरे लगा दी जाएंगी और उनके शरीर के अंग उनके कुफ़्र और शिर्क की गवाही देंगे. इसी के बारे में इस आयत में इरशाद फ़रमाया “व शहिदू अला अन्फ़ुसिहिम अन्नहुम कानू काफ़िरीन” (और ख़ुद अपनी जानों पर गवाही देंगे कि वो काफ़िर थे)

(5) यानी रसूलों का भेजा जाना.

(6) उनकी पाप करने की प्रवृत्ति और……

(7) बल्कि रसूल भेजे जाते हैं, वो उन्हें हिदायतें फ़रमाते हैं, तर्क स्थापित करते हैं इसपर भी वो सरकशी करते हैं, तब हलाक किये जाते हैं.

(8) चाहे वह नेक हो या बुरे. नेकी और बदी के दर्जें हैं. उन्हीं के मुताबिक सवाब और अज़ाब होगा.

(9) यानी हलाक कर दे.

(10) और उनका उत्तराधिकारी बनाया.

(11) वह चीज़ चाहे क़यामत हो या मरने के बाद या हिसाब या सवाब और अज़ाब.

(12) जिहालत के ज़माने में मुश्रिकों का तरीक़ा था कि वो अपनी खेतियों और दरख़्तों के फलों और चौपायों और तमाम मालों में से एक हिस्सा तो अल्लाह के लिये मुक़र्रर करते थे. उसको तो मेहमानों और दरिद्रों पर ख़र्च कर देते थे. और जो बुतों के लिये मुक़र्रर करते थे, वह ख़ास उनपर और उनके सेवकों पर ख़र्च करते. जो हिस्सा अल्लाह के लिये मुक़र्रर करते, अगर उसमें से कुछ बुतों वाले हिस्से में मिल जाता तो उसे छोड़ देते. और अगर बुतों वाले हिस्से में से कुछ इसमें मिलता तो उसको निकाल कर फिर बुतों ही के हिस्से में शामिल कर देते. इस आयत में उनकी इस जिहालत और बदअक़ली का बयान फ़रमा कर उनपर तंबीह फ़रमाई गई.

(13) यानी बुतों का.

(14) और अत्यंत दर्जे की अज्ञानता में गिरफ़्तार हैं. अपने पैदा करने वाले, नअमतें देने वाले रब की इज़्ज़त और जलाल की उन्हें ज़रा भी पहचान नहीं. और उनकी मुर्खता इस हद तक पहुंच गई कि उन्होंने बेजान बुतों, पत्थर की तस्वीरों को जगत के सारे काम बनाने वाले के बराबर कर दिया और जैसा उसके लिये हिस्सा मुक़र्रर किया, वैसा ही बुतों के लिये भी किया. बेशक यह बहुत ही बुरा काम और अत्यन्त गुमराही है. इसके बाद उनकी अज्ञानता और गुमराही की एक और हालत बयान की जाती है.

(15) यहाँ शरीकों से मुराद वो शैतान हैं जिनकी फ़रमाँबरदारी के शौक़ में मुश्रिक अल्लाह तआला की नाफ़रमानी गवारा करते थे और ऐसे बुरे काम और जिहालत की बातें करते थे जिनको सही बुद्धि कभी गवारा न कर सके और जिनके बुरे होने में मामूली समझ के आदमी को भी हिचकिचाहट न हो. बुत परस्ती की शामत से वो भ्रष्ट बुद्धि में गिरफ़्तार हुए कि जानवरों से बदतर हो गए और औलाद, जिसके साथ हर जानवर को क़ुदरती प्यार होता है, शैतान के अनुकरण में उसका बे गुनाह ख़ून करना उन्होंने गवारा किया और इसको अच्छा समझने लगे.

(16) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि ये लोग पहले हज़रत इस्माईल के दीन पर थे, शैतानों ने उनको बहका कर इन गुमराहियों में डाला ताकि उन्हें हज़रत इस्माईल के रास्ते से फेर दें.

(17) मुश्रिक लोग अपने कुछ मवेशियों और खेतियों को अपने झूटे मअबूदों के साथ नामज़द करके कि…

(18) वर्जित यानी इसके इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध है.

(19) यानी बुतों की सेवा करने वाले वग़ैरह.

(20) जिनको वहीरा, सायबा, हामी कहते हैं.

(21) बल्कि उन बुतों के नाम पर ज़िब्ह करते हैं और इन तमाम कामों की निस्बत ख़्याल करते हैं कि उन्हें अल्लाह ने इसका हुक्म दिया है.

(22) सिर्फ़ उन्हीं के लिये हलाल है, अगर ज़िन्दा पैदा हो.

(23) मर्द और औरत.

(24) यह आयत जिहालत के दौर के उन लोगों के बारे में नाज़िल हुई जो अपनी लड़कियों को निहायत संगदिली और बेरहमी के साथ ज़िन्दा ज़मीन में गाड़ दिया करते थे. रबीआ और भुदिर वग़ैरह क़बीलों में इसका बहुत रिवाज था और जिहालत के ज़माने के कुछ लोग लड़को को भी क़त्ल करते थे. और बेरहमी का यह आलम था कि कुत्तों का पालन पोषण करते और औलाद को क़त्ल करते थे. उनकी निस्बत यह इरशाद हुआ कि तबाह हुए. इसमें शक नहीं कि औलाद अल्लाह तआला की नेअमत है और इसकी हलाकत से अपनी संख्या कम होती है. अपनी नस्ल मिटती है. यह दुनिया का घाटा है, घर की तबाही है, और आख़िरत में उसपर बड़ा अज़ाब है, तो यह अमल दुनिया और आख़िरत दोनों में तबाही का कारण हुआ और अपनी दुनिया और आख़िरत को तबाह कर लेना और औलाद जैसी प्यारी चीज़ के साथ इस तरह की बेरहमी और क्रुरता गवारा करना बहुत बड़ी अज्ञानता और मुर्खता है.

(25) यानी बहीरें सायबा हामी वग़ैरह जो बयान हो चुके.

(26) क्योंकि वो ये गुमान करते हैं कि ऐसे बुरे कामों का अल्लाह ने हुक्म दिया है और उनका यह ख़्याल अल्लाह पर झूट बांधना है.

(27) सच्चाई की.

सूरए अनआम सत्तरहवाँ रूकू

सूरए अनआम  सत्तरहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और वही है जिसने पैदा किये बाग़ कुछ ज़मीन पर छए हुएं (1)
और कुछ बे छए (फैले) और खजूर और खेती जिसमें रंग रंग के खाने (2)
और ज़ैतून और अनार किसी बात में मिलते (3)
और किसी में अलग (4)
खाओ उसका फल जब फल लाए और उसका हक़ दो जिस दिन कटे(5)
और बेजा न ख़र्चों (6)
बेशक बेजा ख़र्चने वाले उसे पसन्द नहीं   (141) और मवेशी में से कुछ बोझ उठाने वाले और कुछ ज़मीन पर बिछे (7)
खाओ उसमें से जो अल्लाह ने तुम्हें रोज़ी दी और शैतान के क़दमों पर न चलो बेशक वह तुम्हारा खुला दुश्मन है (142) आठ नर और मादा एक जोड़ भेड़ का और एक जोड़ बकरी का तुम फ़रमाओ क्या उसने दोनो नर हराम किये या दोनो मादा या वह जिसे दोनों मादा पेट में लिये हैं (8)
किसी इल्म से बताओ अगर तुम सच्चे हो (143) और एक जोड़ ऊंट का और एक जोड़ गाय का तुम फ़रमाओ क्या उसने दोनों नर हराम किये या दोनों मादा या वह जिसे दोनों मादा पेट में लिये हैं  (9)
क्या तुम मौजूद थे जब अल्लाह ने तुम्हें यह हुक्म दिया (10) तो उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूठ बांधे कि लोगों को अपनी जिहालत से गुमराह करे बेशक अल्लाह ज़ालिमों को राह नहीं दिखाता  (144)

तफसीर सूरए
अनआम सत्तरहवाँ रूकू

(1) यानी टटिट्यों पर क़ायम किये हुए अंगूर वग़ैरह क़िस्म के.

(2) रंग और मज़े और मात्रा और ख़ुश्बू में आपस में मुख़्तलिफ़.

(3) जैसे कि रंग में या पत्तों में.

(4) जैसे मज़े और असर में.

(5) मानी ये हैं कि ये चीज़ें जब फलें, खाना तो उसी वक़्त से तुम्हारे लिये जायज़ है और उसकी ज़कात यानी दसवाँ हिस्सा उसके पूरे होने के बाद वाजिब होता है, जब खेती काटी जाए या फल तोङे जाएं. लकड़ी, बाँस, घास के सिवा ज़मीन की बाक़ी पैदावार में, अगर यह पैदावार बारिश से हो, तो उसमें दसवाँ हिस्सा वाजिब होता है. और अगर रहट वग़ैरह से हो तो पांचवाँ हिस्सा.

(6) इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ रेहमतुल्लाह अलैह ने इसराफ़ का अनुवाद बेजा ख़र्च करना फ़रमाया. बहुत उमदा अनुवाद है. अगर कुल माल ख़र्च कर डाला और अपने बाल बच्चों को कुछ ना दिया और ख़ुद फ़क़ीर बन बैठा तो सदी का क़ौल है कि यह बेजा ख़र्च है. और अगर सदक़ा देने ही से हाथ रोक लिया तो यह बेजा है, जैसा कि सईद बिन मुसैयब रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया. सुफ़ियान का क़ौल है कि अल्लाह की इताअत के सिवा और काम में जो माल ख़र्च किया जाए वह कम भी हो तो बेजा ख़र्च है. ज़हरी का क़ौल है कि इसके मानी ये हैं कि  बुराई में ख़र्च न करो. मुजाहिद ने कहा कि अल्लाह के हक़ में कमी करना बेजा ख़र्च है. अगर बूक़ुबैस पहाड़ सोना हो और उस पूरे को खुदा की राह में ख़र्च करदो तो बेजा ख़र्च न हो और एक दरहम बुरे काम में ख़र्च करो तो बेजा ख़र्च कहलाए.

(7) चौपाए दो क़िस्म के होते हैं, कुछ बड़े जो लादने के काम में आते हैं, कुछ छोटे जैसे कि बकरी वग़ैरह जो इस क़ाबिल नहीं. उनमें से जो अल्लाह तआला ने हलाल किये, उन्हें खाओ और जिहालत के दौर के लोगों की तरह अल्लाह की हलाल की हुई चीज़ो को हराम न ठहराओ.

(8) यानी अल्लाह ताआला ने न भेड़ बकरी के नर हराम किये, न उनकी मादाएं हराम कीं. न उनकी औलाद. तुम्हारा यह काम कि कभी नर हराम ठहराओ, कभी मादा कभी उनके बच्चे, ये सब तुम्हारे दिमाग़ की उपज है और नफ़्स के बहकावे का अनुकरण. कोई हलाल चीज़ किसी के हराम करने से हराम नहीं होती.

(9) इस आयत में जिहालत के दौर के लोगों को फटकार गया, जो अपनी तरफ़ से हलाल ठहरा लिया करते थे, जिनका बयान ऊपर की आयतों में आचुका है. जब इस्लाम में अहकाम का बयान हुआ तो उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से झगड़ा किया और उनका वक्ता मालिक बिन औफ़ जिश्मी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर कहने लगा कि या मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम), हमने सुना है आप उन चीज़ों को हराम करते हैं जो हमारे बाप दादा करते आए हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया, तुमने बग़ैर किसी अस्ल के कुछ क़िस्में चौपायों की हराम करलीं और अल्लाह ताआला ने आठ नर और मादा अपने बन्दों के खाने और उनसे नफ़ा उठाने के लिये पैदा किये. तुमने कहाँ से इन्हें हराम किया. इन में नापाकी नर की तरफ़ से आई या मादा की तरफ़ से. मालिक बिन औफ़ यह सुनकर स्तब्ध और भौंचक्का रह गया, कुछ बोल न सका. नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, बोलता क्यों नहीं? कहने लगा, आप फ़रमाइए, मैं सुनूंगा. सुब्हानल्लाह, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कलाम की क़ुव्वत और ज़ोर ने जिहालत वालों के वक्ता को साकित और हैरान कर दिया और वह बोल ही क्या सकता था. अगर कहता कि नर की तरफ़ से नापाकी आई, तो लाज़िम होता कि सारे नर हराम हों. अगर कहता कि मादा की तरफ़ से, तो ज़रूरी होता कि हर एक मादा हराम हो और अगर कहता कि जो पेट में हैं वह हराम हैं, तो फिर सब ही हराम हो जाते, क्योंकि जो पेट में रहता है वह नर होता है या मादा. वो जो सीमाएं क़ायम करते थे और कुछ को हराम और कुछ को हलाल ठहराते थे. इस तर्क ने उनके इस दावे को झूटा साबित कर दिया. इसके अलावा उनसे ये पूछना कि अल्लाह ने नर हराम किये हैं या मादा या उनके बच्चे, यह नबुव्वत के इन्कार करने वाले विरोधी को नबुव्वत का इक़रार करने पर मजबूर करता था क्योंकि जब तक नबुव्वत का वास्ता न हो तो अल्लाह ताअला की मर्ज़ी और उसका किसी चीज़ को हराम फ़रमाना कैसे जाना जा सकता है. चुनांचे अगले वाक्य ने इसको साफ़ किया है.

(10) जब यह नहीं है और नबुव्वत का तो इक़रार नहीं करते, तो हलाल हराम के इन अहकाम के अल्लाह की तरफ़ जोड़ना खुला झूट और ख़ालिस मन घडन्त है.

सूरए अनआम अठ्ठारहवाँ रूकू

सूरए अनआम अठ्ठारहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ  (1)
मैं नहीं पाता उसमें जो मेरी तरफ़ वही (देववाणी) हुई किसी खाने वाले पर कोई खाना हराम (2)
मगर यह की मुर्दार हो या रगों का बहता हुआ ख़ून (3)
या बद जानवर (सुअर) का गोश्त वह निजासत (अपवित्रता) है या वह बेहुक्मी का जानवर जिसके ज़िब्ह में ग़ैर ख़ुदा का नाम पुकारा गया तो जो नाचार हुआ (4)
न यूं कि आप ख़्वाहिश करे और न यूं कि ज़रूरत से बढ़े तो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (5){145}
और यहूदियों पर हमने हराम किया हर नाख़ून वाला जानवर  (6)
और गाय और बकरी की चर्बी उन पर हराम की मगर जो उनकी पीठ में लगी हो या आँत या हड्डी से मिली हो, हमने यह उनकी सरकशी (विद्रोह) का बदला दिया  (7)
और बेशक हम ज़रूर सच्चे है {146} फिर अगर वो तुम्हें झुटलाएं तो तुम फ़रमाओ कि तुम्हारा रब वसीअ (व्यापक) रहमत वाला है  (8)
और उसका अज़ाब मुजरिमों पर से नहीं टाला जाता (9) {147}
अब कहेंगे मुश्रिक कि (10)
अल्लाह चाहता तो न हम शिर्क करते न हमारे बाप दादा न हम कुछ हराम ठहराते  (11)
ऐसा ही उनसे अगलों ने झुटलाया था यहां तक कि हमारा अज़ाब चखा  (12)
तुम फ़रमाओ क्या तुम्हारे पास कोई इल्म है कि उसे हमारे लिये निकालो, तुम तो निरे गुमान के पीछे हो और तुम यूंही तख़मीने (अनुमान) करते हो  (13){148}
तुम फ़रमाओ तो अल्लाह ही की हुज्जत (तर्क) पूरी है (14)
तो वह चाहता तो तुम सबकी हिदायत फ़रमाता {149} तुम फ़रमाओ लाओ अपने वो गवाह जो गवाही दें  कि अल्लाह ने उसे हराम किया(15)
फिर अगर वो गवाही दे बैठें (16)
तो तू ऐ सुनने वाले उनके साथ गवाही न देना और उनकी ख़्वाहिशों के पीछे न चलना जो हमारी आयतें झुटलाते हैं और जो आख़िरत पर ईमान लाते और अपने रब का बराबर वाला ठहराते हैं (17){150}

तफसीर सूरए अनआम अठ्ठारहवाँ रुकू

(1) इन जाहिल मुश्रिकों से जो हलाल चीज़ों को अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिश से हराम कर लेते हैं.

(2) इसमें चेतावनी है कि किसी चीज़ का हराम होना शरीअत के हुक्म से होता है न कि नफ़्स की ख़्वाहिश से, तो जिस चीज़ का हराम होना शरीअत में न आए उसको नाजायज़ और हराम कहना ग़लत है. हराम होने का सुबूत चाहे क़ुरआन से हो या हदीस से, यही विश्वसनीय है.

(3) तो जो ख़ून बहता न हो जैसे कि जिगर, तिल्ली, वह हराम नहीं है.

(4) और ज़रूरत ने उसे उन चीज़ों में से किसी के खाने पर मजबूर किया, ऐसी हालत में बेचैन होकर उसने कुछ खाया.

(5) उसपर पकड़ न फ़रमाएगा.

(6) जो उंगीली रखता हो, चाहे चौपाया हो या पक्षी, इसमें ऊंट और शुतूर मुर्ग़ दाख़िल हैं. (मदारिक) कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि यहा  शुतुर मुर्ग़ और बतख़ और ऊंट ख़ास तौर से मुराद हैं.

(7) यहूदी अपनी सरकशी के कारण इन चीज़ों से मेहरूम किये गए, लिहाज़ा ये चीज़ें उनपर हराम नहीं और हमारी शरीअत में गाय बकरी की चर्बी बतख़ और शुतुर मुर्ग़ हलाल है. इसी पर सहाबा और ताबईन की सहमति है. (तफ़सीरे अहमदी)

(8) झूठों को मोहलत देता है और अज़ाब में जल्दी नहीं फ़रमाता, ताकि उन्हें ईमान लाने का मौक़ा मिले.

(9) अपने वक़्त पर आ ही जाता है.

(10) यह ख़बर ग़ैब है कि जो बात वो कहने वाले थे वह बात पहले से बयान फ़रमा दी.

(11) हमने जो कुछ किया, यह सब अल्लाह की मर्ज़ी से हुआ, यह दलील है इसकी कि वह उससे राज़ी है.

(12) और यह झूट बहाना उनके कुछ काम न आया, क्योंकि किसी काम का मशीयत अर्थात मर्ज़ी में होना उसकी इच्छा और निश्चित होने को लाज़िम नहीं. मर्ज़ी वही है जो नबियों के वास्ते से बताई गई और उसका हुक्म फ़रमाया गया.

(13) और ग़लत अटकलें चलाते हो.

(14) कि उसने रसूल भेजे, किताबें उतारीं और सच्ची राह साफ़ कर दी.

(15) जिसे तुम अपने लिये हराम क़रार देते हो और कहते हो कि अल्लाह तआला ने  हमें इसका हुक्म दिया है. यह गवाही इसलिये तलब की गई कि ज़ाहिर हो जाए कि काफ़िरों के पास कोई गवाह नहीं है और जो वो कहते हैं वह उनकी बनाई हुई बात है.

(16) इसमें चेतावनी है कि अगर यह गवाही वाक़े हो भी तो वह केवल अनुकरण हुआ और झुट और बातिल होगा.

(17) बुतों को मअबूद मानते हैं और शिर्क़ में गिरफ़्तार हैं.

सूरए अनआम उन्नीसवाँ रूकू

सूरए अनआम उन्नीसवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ आओ मैं तुम्हें पढ़ सुनाऊं जो तुमपर तुम्हारे रब ने हराम किया (1)
यह कि उसका कोई शरीक न करो और माँ बाप के साथ भलाई करो (2)
और अपनी औलाद क़त्ल न करो मुफ़लिसी के कारण, हम तुम्हें और उन्हें सबको रिज़्क़ देंगे (3)
और बेहयाइयों के पास न जाओ जो उसमें खुली हैं और जो छुपी (4)
और जिस जान की अल्लाह ने हुरमत (इज़्ज़त) रखी उसे नाहक़ न मारो (5)
यह तुम्हें हुक्म फ़रमाया है कि तुम्हें अक़्ल हो  {151} और यतीमों के माल के पास न जाओ मगर बहुत अच्छे तरीक़े से (6)
जब तक वह अपनी जवानी को पहुंचे (7)
और नाप और तौल इन्साफ़ के साथ पूरी करो, हम किसी जान पर बोझ नहीं डालते मगर उसकी ताक़त भर और जब बात कहो तो इन्साफ़ की कहो अगरचे तुम्हारे रिश्तेदार का मामला हो, और अल्लाह का अहद पूरा करो यह तुम्हें ताकीद फ़रमाई कि कहीं तुम नसीहत मानो {152}  और यह कि(8)
यह है मेरा सीधा रास्ता तो इसपर चलो और ओर राहें न चलो (9)
कि तुम्हें उसकी राह से जुदा कर देंगी यह तुम्हें हुक्म फ़रमाया कि कहीं तुम्हें परहेज़गारी मिले {153} फिर हमने मूसा को किताब अता फ़रमाई  (10)
पूरा एहसान करने को उसपर जो नेकी करने वाला है और हर चीज़ की तफ़सील और हिदायत और रहमत कि कहीं वो (11)
अपने रब से मिलने पर ईमान लाएं (12){154}

तफसीर सूरए अनआम उन्नीसवाँ रूकू

(1) उसका बयान यह है.

(2) क्योंकि तुमपर उनके बहुत अधिकार हैं. उन्होने तुम्हारा पालन पोषण किया, तुम्हारी तरबियत की, तुम्हारे साथ शफ़्क़त और मेहरबानी का सुलूक किया, तुम्हारी हर ख़तरे से चौकसी की. उनके अधिकारो का ख़्याल न करना और उनके साथ अच्छे सुलूक न करना हराम है.

(3) इसमें औलाद ज़िन्दा ज़मीन में गाड़ देने और मार डालने की हुरमत यानी अवैधता बयान फ़रमाई गई है जिसका जाहिलों में रिवाज़ था कि वो अक्सर दरिद्रता के डर से औलाद को हलाक करते थे. उन्हें बताया गया कि रोज़ी देने वाला तुम्हारा उनका सबका अल्लाह है फिर क्यों क़त्ल जैसे सख़्त जुर्म में पड़ते हो.

(4) क्योंकि इन्सान जब खुले और ज़ाहिर गुनाह से बचे और छुपे गुनाह से परहेज़ न करे तो उसका ज़ाहिर गुनाह से बचना भी अल्लाह के लिये नहीं. लोगों को दिखाने और उनकी बदगोई अर्थात आलोचना से बचने के लिये है. और अल्लाह की रज़ा और सवाब का हक़दार वह है जो उसके डर से गुनाह छोड़ दे.

(5) वो काम जिनसे क़त्ल जायज़ होता है, यह हैं :- मुर्तद होना यानी इस्लाम से फिर जाना या क़िसास या ब्याहे हुए का ज़िना करना बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है कि सेयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, कोई मुसलमान जो लाइलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलल्लाह की गवाही देता हो उसका ख़ून हलाल नहीं, मगर इन तीन कारणों में से, कि एक कारण से या तो ब्याहे होने के बावुजूद उससे ज़िना सरज़द हुआ हो, या उसने किसी को नाहक़ क़त्ल किया हो और उसका बदला उसपर आता हो या वह दीन छोड़कर मुर्तद हो गया हो.

(6) जिससे उसका फ़ायदा हो.

(7) उस वक़्त उसका माल उसके सुपुर्द कर दो.

(8) इन दोनों आयतों में जो हुक्म दिया गया.

(9) जो इस्लाम के ख़िलाफ़ हों,यहूदियत हो या ईसाईयत या कोई और मिल्लत

(10) तौरात शरीफ़.

(11) यानी बनी इस्राईल.

(12) और मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब होने और सवाब और अज़ाब दिये जाने और अल्लाह का दीदार होने की तस्दीक़ करें.