सूरए माइदा – सातवाँ रूकू

सूरए माइदा –  सातवाँ  रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
बेशक हमने तौरात उतारी उसमें हिदायत और नूर है उसके मुताबिक़ यहूद को हुक्म देते थे हमारे फ़रमाँबरदार नबी और आलिम और फ़कीह (धर्मशास्त्री) कि उनसे अल्लाह की किताब की हिफ़ाज़त चाही गई थी (1)
और वो उसपर गवाह थे तो (2)
लोगों से न डरो और मुझसे डरो और मेरी आयतों के बदले ज़लील क़ीमत न लो (3)
और जो अल्लाह के उतारे पर हुक्म न करे  (4)
वही लोग काफ़िर हैं (44) और हमने तौरात में उनपर वाजिब किया (5)
कि जान के बदले जान (6)
और आँख के बदले आँख और नाक के बदले नाक और कान के बदले कान और दांत के बदले दांत और ज़ख़्मों में बदला है (7)
फिर जो दिल की ख़ुशी से बदला करा दे तो वह उसका गुनाह उतार देगा (8)
और जो अल्लाह के उतारे पर हुक्म न करे तो वही लोग ज़ालिम हैं (45) और हम उन नबियों के पीछे उनके निशाने क़दम (पदचिन्ह) पर ईसा मरयम के बेटे को लाए, तस्दीक़ (पुष्टि) करता हुआ तौरात की जो उससे पहले थी (9)
और हमने उसे इंजील दी जिसमें हिदायत और नूर है और तस्दीक़ फ़रमाती है तौरात की कि उससे पहले थे और हिदायत (10)
और नसीहत परहेज़गारी को (46) और चाहिये की इंजिल वाले हुक्म करें उसपर जो अल्लाह ने उसमें उतारा (11)
और जो अल्लाह के उतारे पर हुक्म न करें तो वही लोग फ़ासिक़ (दुराचारी) हैं (47) और ऐ मेहबूब हमने तुम्हारी तरफ़ सच्ची किताब उतारी अगली किताबों की तस्दीक़ फ़रमाती (12)
और उनपर मुहाफिज़ और गवाह तो उनमें फ़ैसला करो अल्लाह के उतारे से  (13)
और  ऐ सुनने वाले उनकी ख़्वाहिशों की पैरवी न करना अपने पास आया हुआ हक़ (सत्य) छोड़कर, हमने तुम सबके लिये एक एक शरीअत और रास्ता रखा  (14)
और अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक ही उम्मत कर देता मगर मंजूर यह है कि जो कुछ तुम्हें दिया उसमें तुम्हें आज़माए (15)
तो भलाईयों की तरफ़ सबक़त (पहल करो) चाहो तुम सबका फिरना अल्लाह ही की तरफ़ है तो वह तुम्हें बता देगा जिस बात में तुम झगड़ते थे (48) और यह कि ऐ मुसलमान  अल्लाह के उतारे पर हुक्म कर और उनकी ख़्वाहिशों पर न चल और उनसे बचता रह कि कहीं तुझे लग़ज़िश  (डगमगा) न दे दें किसी हुक्म  में जो तेरी तरफ़ उतरा फिर अगर वो मुंह फेरें (16)
तो जान लो कि अल्लाह उनके कुछ गुनाहों की (17)
सज़ा उनको पहुंचाता है (18)
और बेशक बहुत आदमी बेहुक्म  (49) हैं तो क्या ज़ाहिलियत (अज्ञानता) का हुक्म चाहते हैं(19)
और अल्लाह से बेहतर किसका हुक्म यक़ीन वालों के लिये (50)

तफसीर
सूरए माइदा – सातवाँ रूकू

(1) कि इसको अपने सीनों मे मेहफ़ूज़ रख़ें और इसके पाठ में लगे है ताकि वह किताब भुलाई न जा सके और उसके आदेश ज़ाया न हों.(ख़ाज़िन) तौरात के मुताबकि़ नबियों का हुक्म देना जो इस आयत में आया है उससे साबित होता है कि हम से पहली शरीअतों के जो अहक़ाम अल्लाह और रसूल ने बयान फ़रमाए हों और उनके छोड़ने का हमें हुक्म न दिया हो, स्थगित न किये गए हों, वो हमपर लाज़िम होते हैं. (जुमल व अबूसऊद)

(2) ऐ यहूदियो, तुम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की प्रशंसा और विशेषताओं और रज्म का हुक्म जो तौरात में आया है, उसके ज़ाहिर करने में.

(3) यानी अल्लाह के आदेशों में हेर फेर हर सूरत मना है, चाहे लोगों के डर और उनकी नाराज़ी के अन्देशे से हो, या माल दौलत और शान व शौकत के लालच से.

(4) इसका इन्कारी होकर.

(5)  इस आयत में अगरचे यह बयान है कि तौरात में यहूदियों पर किसास के ये अहकाम थे लेकिन चूंकि हमें उनके छोड़ देने का हुक्म नहीं दिया गया इसलिये हम पर ये अहकाम लाज़िम रहेंगे, क्योंकि पिछली शरीअतों के जो अहक़ाम ख़ुदा व रसूल के बयान से हम तक पहुंचे और स्थगित न हुए हों वो हमपर लाज़िम हुआ करते हैं जैसा कि ऊपर की आयत से साबित हुआ.

(6) यानी अगर किसी ने किसी को क़त्ल किया तो उसकी जान मक़तूल के बदले में ली जाएगी चाहे वह मक़तूल मर्द हो या औरत, आज़ाद हो या ग़ुलाम, मुस्लिम हो या ज़िम्मी. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि मर्द को औरत के बदले क़त्ल न करते थे. इसपर यह आयत उतरी.  (मदारकि)

(7) यानी एकसा होने और बराबरी की रिआयत ज़रूरी है.

(8) यानी जो क़ातिल या जनाबत करने वाला अपने जुर्म पर शर्मिन्दा होकर गुनाहों के वबाल से बचने के लिये ख़ुशी से अपने ऊपर शरीअत का हुक्म जारी कराए तो किसास उसके जुर्म का कफ़्फ़ारा हो जाएगा और आख़िरत में उसपर अज़ाब न होगा.  (जलालैन व जुमल). कुछ मुफ़स्सिरों ने इसके ये मानी बयान किये हैं कि जो हक़ वाला क़िसास (ख़ून के तावान) को माफ़ कर दे तो यह माफ़ी उसकी लिये कफ़्फ़ारा है. (मदारिक). तफ़सीरे अहमदी में है, यह तमाम क़िसास जब ही होंगे जब कि हक़ वाला माफ़ न करे. और अगर वह माफ़ करदे तो क़िसास साक़ित हो जाएगा.

(9) तौरात के अहकाम के बयान के बाद इंजील के अहकाम का ज़िक्र शुरू हुआ और बताया गया कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम तौरात की तस्दीक़ फ़रमाने वाले थे कि वह अल्लाह की तरफ़ से उतरी और स्थगन से पहले इसपर अमल वाजिब था. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम  की शरीअत में इसके झूठ अहकाम स्थगित हुए.

(10) इस आयत में इंजील के लिये लफ़्ज़ “हुदन” (हिदायत) दो जगह इरशाद हुआ, पहली जगह गुमराही व जिहालत से बचाने के लिये रहनुमाई मुराद है, दूसरी जगह “हुदन” से नबियों के सरदार अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी की बशारत मुराद है. जो हुज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम की नबुव्वत की तरफ़ लोगो की राहयाबी का सबब है.

(11) यानी नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने और आपकी नबुव्व्त की तस्दीक़ करने का हुक्म.

(12) जो इससे पहले नबियों पर उतरीं.

(13) यानी जब किताब वाले अपने मुक़दमे आपके पास लाएं तो आप क़ुरआने पाक से फ़ैसला फ़रमाएं.

(14) यानी व्यवहार और कर्म हर एक के ख़ास है और अस्ल दीन सबका एक. हज़रत अली मुर्तज़ा रदीयल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि ईमान हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से यही है कि “ला इलाहा इल्लल्लाह” की शहादत और जो अल्लाह तआला की तरफ़ से आया है उसका इक़रार करना और शरीअत व तरीक़ा हर उम्मत का ख़ास है.

(15) और इम्तिहान में डाले ताकि ज़ाहिर होजाए कि हर ज़माने के मुनासिब जो अहकाम दिये, क्या तुम उनपर इस यक़ीन और अक़ीदे के साथ अमल करते हो कि उनका विराध अल्लाह तआला की मर्ज़ी से हिकमत और दुनिया व आख़िरत की लाभदायक मसलिहतों पर आधारित है या सत्य को छोड़कर नफ़्सके बहकावे का अनुकरण करते हो. (तफ़सीरे अबूसऊद)

(16) अल्लाह के उतारे हुए हुक्म से.

(17) जिन में यह एराज़ यानी अवज़ा भी है.

(18) दुनिया में क़त्ल व गिरफ़्तारी और जिला – वतनी के साथ और तमाम गुनाहों की सज़ा आख़िरत में देगा.

(19) जो सरदार गुमराही और ज़ुल्म और अल्लाह के अहकाम के विरूद्ध होता था. बनी नुज़ैर और बनी क़ुरैज़ा यहुदियों के दो क़बीले थे. उनमें आपस में एक दूसरे का क़त्ल होता रहता था, जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मदीनए तैय्यिबह तशरीफ़ लाए तो ये लोग अपना मुक़दमा हुज़ूर की ख़िदमत में लाए और बनी क़ुरैज़ा ने कहा कि बनी नूज़ैर हमारे भाई हैं. हम वो एक ही दादा की औलाद हैं. एक दीन रखते हैं, एक किताब  (तौरात) मानते हैं, लेकिन अगर बनी नुज़ैर हम में से किसी को क़त्ल करें तो उसके तावान में हम सत्तर वसक़ खजूरें देते हैं, और अगर हममें से कोई उनके किसी आदमी को क़त्ल करे तो हमसे उसके बदले में एक सौ चालीस वसक़ लेते हैं. आप इसका फ़ैसला फ़रमादें. हुज़ूर ने फ़रमाया, मैं हुक्म देता हूँ कि क़ुरैज़ा वालों और नुज़ैर वालों का ख़ून बराबर है. किसी को दूसरे पर बरतरी नहीं. इसपर बनी नुज़ैर बहुत नाराज़ हुए और कहने लगे हम आपके फ़ैसले से राज़ी नहीं हैं, आप हमारे दुश्मन हैं, हमें ज़लील करना चाहते हैं. इस पर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि क्या जाहिलियत की गुमराही और ज़ुल्म का हुक्म चाहते हैं.

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