सूरए माइदा- पाँचवा रूकू

सूरए माइदा- पाँचवा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
और उन्हें पढ़कर सुनाओ आदम के दो बेटों की सच्ची ख़बर (1)
जब दोनों ने एक नियाज़ (भेंट) पेश की तो एक की क़ुबूल हुई और दूसरे की क़ुबूल न हुई बोलो क़सम है मैं तुझे क़त्ल कर दूंगा (2)
कहा अल्लाह उसी से क़ुबूल करता है जिसे डर है (3)(27)
बेशक अगर तू अपना हाथ मुझपर बढ़ाऊंगा कि मुझे क़त्ल करे तो मैं अपना हाथ तुमपर न बढ़ाऊंगा कि तुझे क़त्ल करूं (4)
मैं अल्लाह से डरता हूँ जो मालिक है सारे संसार का (28) मैं तो यह चाहता हूँ कि मेरा (5)
और तेरे गुनाह (6)
दोनों तेरे ही पल्ले पङे तो तू दोज़ख़ी हो जाए और बेइन्साफ़ों की यही सज़ा है (29) तो उसके नफ़्स ने उसे भाई के क़त्ल का चाव दिलाया तो उसे क़त्ल करदिया तो रह गया नुक़सान में (7)(30)
तो अल्लाह ने एक कौवा भेजा ज़मीन कुरेदता कि उसे दिखाए कैसे अपने भाई की लाश छुपाए (8)
बोला हाय ख़राबी, मैं इस कौवे जैसा भी न होसका कि मैं अपने भाई की लाश छुपाता तो पछताता रह गया (9)(31)
इस सबब से हमने बनी इस्त्राईल पर लिख दिया कि जिसने कोई जान क़त्ल की बग़ैर जान के बदले या ज़मीन में फ़साद किये (10)
तो जैसे उसने सब लोगों को क़त्ल किया (11)
और जिसने एक जान को जिला लिया उसने जैसे सब लोगों को जिला लिया (12)
और बेशक उनके (13)
पास हमारे रसूल रौशन दलिलों के साथ आए (13)
फिर बेशक उनमें बहुत उसके बाद ज़मीन में ज़ियादती करने वाले हैं (14)(32)
वो कि अल्लाह और उसके रसूल से लङते (15)
और मुल्क में फ़साद करते फिरते हैं उनका बदला यही है कि गिन गिन कर क़त्ल किये जाएं या सूली दिये जाएं या उनके एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव काटे जाएं या ज़मीन से दूर कर दिये जाएं, यह दुनिया में उनकी रूस्वाई है और आख़िरत में उनके लिये बङा अज़ाब (33)
मगर वो जिन्होंने तौबह करली इससे पहले कि तुम उनपर क़ाबू पाओ (16)
तो जान लो कि अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (34)

तफसीर
सूरए माइदा – पाँचवा रूकू

(1)  जिनका नाम हाबील और क़ाबील था. इस ख़बर को सुनाने से मक़सद यह है कि हसद की बुराई मालूम हो और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से हसद करने वालों को इस से सबक़ हासिल करने का मौक़ा मिले. सीरत वग़ैरह के उलमा का बयान है कि हज़रत हव्वा के हमल में एक लड़का एक लड़की पैदा होते थे और एक हमल के लड़के का दूसरे हमल की लड़की के साथ निकाह किया जाता था और जबकि आदमी सिर्फ़ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की औलाद में सीमित थे, तो निकाह की और कोई विधि ही न थी. इसी तरीके़ के अनुसार हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने क़ाबील का निकाह ल्यूज़ा से, जो हाबील के साथ पैदा हुई थी, और हाबील का इक़लीमा से, जो क़ाबील के साथ पैदा हुई थी, करना चाहा. क़ाबील इस पर राज़ी न हुआ और चूंकि इक़लीमा ज़्यादा ख़ूबसूरत थी इसलिये उसका तलबगार हुआ. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि वह तेरे साथ पैदा हुई है, इसलिये तेरी बहन है, उसके साथ तेरा निकाह हलाल नहीं है. कहने लगा यह तो आपकी राय है. अल्लाह ने यह हुक्म नहीं दिया. आपने फ़रमाया, तो तुम दोनों क़ुरबानीयाँ लाओ जिसकी क़ुरबानी क़ुबूल हो जाए वही इक़लीमा का हक़दार है. उस ज़माने में जो क़ुरबानी मक़बूल होती थी, आसमान से एक आग उतरकर उसको खा लिया करती थी. क़ाबील ने एक बोरी गेहूँ और हाबील ने एक बकरी क़ुरबानी के लिये पेश की. आसमानी आग ने हाबील की क़ुरबानी को ले लिया और क़ाबील के गेहूँ छोड़ गई. इस पर क़ाबील के दिल में बहुत जलन और हसद पैदा हुआ.

(2) जब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम हज के लिये मक्कए मुकर्रमा तशरीफ़ ले गए तो क़ाबील ने हाबील से कहा, मैं तुझको क़त्ल करूंगा. हाबिल ने कहा क्यों ? कहने लगा, इसलिये कि तेरी क़ुरबानी क़ुबूल हुई, मेरी न हुई और तू इक़लीमा का हक़दार ठहरा, इसमें मेरी ज़िल्लत है.

(3) हाबील के इस कहने का यह मतलब है कि क़ुरबानी का कुबूल फ़रमाना अल्लाह का काम है. वह परहेज़गारों की क़ुरबानी क़ुबूल फ़रमाता है. तू परहेज़गार होता तो तेरी क़ुरबानी क़ुबूल होती. यह ख़ुद तेरे कर्मों का नतीजा है, इसमें मेरा क्या दख़ल है.

(4) और मेरी तरफ़ से शुरूआत हो जबकि मैं तुझ से ज़्यादा मज़बूत और ताक़त वाला हूँ, यह सिर्फ इसलिये है कि……

(5) यानी मुझे क़त्ल करने का.

(6) जो इससे पहले तूने किया कि वालिद की नाफ़रमानी की, हसद किया और अल्लाह के फ़ैसले को न माना.

(7) और परेशानी में पड़ा कि इस लाश को क्या करें क्योंकि उस वक़्त तक कोई इन्सान मरा ही न था. एक मुद्दत तक लाश को पीठ पर लादे फिरा.

(8) रिवायत है कि दो कौए आपस में लड़े उनमें से एक ने दूसरे को मार डाला फिर ज़िन्दा कौए ने अपनी चोंच से ज़मीन कुरेद कर गढ़ा किया, उसमें मरे हुए कौए को डाल कर मिट्टी से दबा दिया. यह देखकर क़ाबील को मालूम हुआ कि लाश को दफ़्न करना चाहिये. चुनांचे उसने ज़मीन खोद कर दफ़्न कर दिया. (ज़लालैन, मदारिक वग़ैरह)

(9) अपनी नादानी और परेशानी पर, और यह शर्मिन्दगी गुनाह पर न थी कि तौबह में शुमार हो सकती या शर्मिन्दगी का तौबह होना सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत के साथ ख़ास हो. (मदारिक)

(10) यानी नाहक़ ख़ून किया कि न तो मक़तूल को किसी ख़ून के बदले क़िसास के तौर पर मारा न शिर्क व कुफ़्र या कानून तोड़ने वग़ैरह किसी सख़्त जुर्म के कारण मारा.

(11) क्योंकि उसने अल्लाह तआला की रिआयत और शरीअत की हदों का लिहाज़ न रखा.

(12) इस तरह कि क़त्ल होने या डूबने या जलाने जैसे हलाकत के कारणों से बचाया.

(13) यानी बनी इस्त्राईल के.

(14) खुले चमत्कार भी लाए और अल्लाह के एहकाम और शरीअत भी.

(15) कि कुफ़्र और क़त्ल वग़ैरह जुर्म करके सीमाओ का उल्लंघन करते हैं.

(16) अल्लाह तआला से लड़ना यही है कि उसके वलियों से दुश्मनी करे जैसे कि हदीस शरीफ़ में आया. इस आयत में डाकुओं की सज़ा का बयान है. सन 6 हिजरी में अरीना के कुछ लोग मदीनए तैय्यिबह आकर इस्लाम लाए और बीमार हो गए. उनके रंग पीले हो गए, पेट बढ़ गए. हुज़ूर ने हुक्म दिया कि सदक़े के ऊंटों का दूध और पेशाब मिलाकर पिया करें. ऐसा करने से वो तन्दुरूस्त हो गए, अच्छे होकर वो मुर्तद हो गए और पन्द्रह ऊंट लेकर अपने वतन को चलते बने, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनकी तलाश में हज़रत यसार को भेजा. उन लोगों ने उनके हाथ पाँव काटे और तकलीफ़े देकर उन्हें शहीद कर डाला, फिर जब ये लोग हुज़ूर की खिदमत में गिरफ़्तार करके हाज़िर किये गए तो उनके बारे में यह आयत उतरी. (तफ़सीरे अहमदी)

(17) यानी गिरफ़्तारी से पहले तौबह कर लेने से वह आख़िरत के अज़ाब और डकैती की सज़ा से तो बच जाएंगे मगर माल की वापसी और किसास बन्दों का हक़ है, यह बाक़ी रहेगा. (तफ़सीरे अहमदी)

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