सूरए माइदा – दूसरा रूकू

सूरए माइदा – दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ ईमान वालो जब नमाज़ को खङे होना चाहो (1)
तो अपना मुंह धोओ और कोहनियों तक हाथ (2)
और सरों का मसह करो (3)
और गट्टों तक पाँव धोओ (4)
और अगर तुम्हें नहाने की हालत जो तो ख़ूब सुथरे हो लो (5)
और अगर तुम बीमार हो या सफ़र में हो या तुम में से कोई पेशाब पाख़ाने से आया या तुमने औरतों से सोहबत की और उन सूरतों में पानी न पाया तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करो तो अपने मुंह और हाथों का उससे मसह करो अल्लाह नहीं चाहता कि तुम पर कुछ तंगी रखे, हाँ यह चाहता है कि तुम्हें ख़ूब सुथरा कर दे और अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दे कि कहीं तुम एहसान मानो (6)
और याद करो अल्लाह का एहसान अपने ऊपर (6)
और वह एहद जो उसने तुम से लिया (7)
जब कि तुमने कहा हमने सुना और माना (8)
और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह दिलों की बात जानता है (7)
ऐ ईमान वालो अल्लाह के हुक्म पर ख़ूब क़ायम हो जाओ इन्साफ़ के साथ गवाही देते (9)
और तुम को किसी क़ौम की दुश्मनी इसपर न उभारे कि इन्साफ़ न करो, इन्साफ़ करो वह परहेज़गारी से ज़्यादा क़रीब है और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है (8)
ईमान वाले नेकी करने वालों से अल्लाह का वादा है कि उनके लिये बख़्शिश और बङा सवाब है (9)
और जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाई, वही दोज़ख़ वाले हैं (10) (10)
ऐ ईमान वालो, अल्लाह का एहसान अपने ऊपर याद करो जब एक क़ौम ने चाहा कि तुम पर दस्तदराज़ी (अत्याचार) करें तो उसने हाथ तुमपर से रोक दिये (11)
और अल्लाह से डरो और मुसलमानों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये (11)

तफ़सीर :
सूरए माइदा – दूसरा रूकू

(1) और तुम बेवज़ू हो तो तुम पर वुज़ू फ़र्ज़ है और वुज़ू के फ़राइज़ ये चार हैं जो आगे बयान किए जाते हैं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा हर नमाज़ के लिए ताज़ा वुज़ू करते थे. अगरचे एक वुज़ू से भी बहुत सी नमाज़े, फर्ज़ हों या नफ़्ल, पढ़ी जा सकती हैं मगर हर नमाज़ के लिए अलग वुज़ू करना ज़्यादा बरकत और सवाब दिलाता है. कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि इस्लाम की शुरूआत में हर नमाज़ के लिए अलग वुज़ू फ़र्ज़ था, बाद में मनसूख़ यानी स्थगित किया गया और जब तक हदस वाक़े न हो, एक ही वुज़ू से फ़र्ज़ और नफ़्ल नमाज़ अदा करना जायज़ हुआ.

(2) कोहनियाँ भी धोने के हुक्म में दाख़िल हैं जैसा कि हदीस से साबित है. अकसर उलमा इसी पर हैं.

(3) चौथाई सर का मसह फ़र्ज़ है. यह मिक़दार हदीसे मुग़ीरा से साबित है और यह हदीस आयत का बयान है.

(4) यह वुज़ू का चौथा फ़र्ज़ है. सही हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कुछ लोगों को पाँव पर मसह करते देखा तो मना फरमाया और अता से रिवायत है वह कसम खाकर फ़रमाते हैं कि मेरी जानकारी में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा में से किसी ने भी वुज़ू में पाँव का मसह न किया.

(5) जनाबत यानी शारीरिक तौर से नापाक हो जाने से पूरी तहारत लाज़िम होती है. जनाबत कभी जागते में जोश या वासना के साथ वीर्य के निकलने से होती है और कभी नींद में वीर्य निकलने से. जिसके बाद असर पाया जाए. यहाँ तक कि अगर ख़्वाब याद आया मगर तरी न पाई तो गुस्ल वाजिब न होगा. और कभी आगे पीछे की जगहों में लिंग के अगले भाग के दाख़िल किये जाने से काम करने वाले दोनों व्यक्तियों के हक़ में, चाहे वीर्य निकले या न निकले, ये तमाम सूरतें जनाबत (नापाकी) में दाख़िल हैं. इनमें ग़ुस्ल वाजिब हो जाता है. हैज़ (माहवारी) और ज़चगी के बाद की नापाकी से भी ग़ुस्ल वाजिब हो जाता है. माहवारी का मसअला सूरए बक़रह में गुज़र चुका और ज़चगी की नापाकी का मूजिबे ग़ुस्ल होना इजमाअ से साबित है. तयम्मुम का बयान सूरए निसा में गुज़र चुका.

(6) कि तुम्हें मुसलमान किया.

(7) नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बैअत करते वक़्त अक़बा की रात और बैअते रिज़वान में.

(8) नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का हर हुक्म हर हाल में.

(9) इस तरह कि क़राबत और दुश्मनी का कोई असर तुम्हें इन्साफ़ से न हटा सके.

(10) यह आयत पुख़्ता प्रमाण है इस पर कि दौज़ख़ में दाख़ला सिवाए काफ़िर के और किसी के लिये नहीं.

(11) एक बार नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने एक मन्ज़िल में क़याम किया. सहाबा अलग अलग दरख़्तों के साए में आराम करने लगे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी तलवार एक पेड़ में लटका दी. एक अअराबी मौक़ा पाकर आया और छुपकर उसने तलवार ली और तलवार खींच कर हुज़ूर से कहने लगा, ऐ मुहम्मद, तुम्हें मुझसे कौन बचाएगा. हुज़ूर ने फ़रमाया, अल्लाह. यह फ़रमाना था कि हज़रत जिब्रील ने उसके हाथ से तलवार गिरा दी. नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तलवार लेकर फ़रमाया कि तुझे मुझसे कौन बचाएगा. कहने लगा, कोई नहीं. मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं और गवाही देता हूँ कि मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसके रसूल हैं. (तफ़सीरे अबुस्सऊद)

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