सूरए माइदा – छटा रूकू

सूरए माइदा – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ ईमान वालो अल्लाह से डरो और उसकी तरफ़ वसीला ढूंडो (1)
और उसकी राह में जिहाद करो इस उम्मीद पर कि फ़लाह (भलाई) पाओ (35) बेशक वा जो काफ़िर हुए जो कुछ ज़मीन में हैं सब और उसकी बराबर और अगर उनकी मिल्क हो कि उसे देकर क़यामत के अज़ाब से अपनी जान छुङाएं तो उनसे न किया जाएगा और उनके लिये दुख का अज़ाब है (2)(36)
दोज़ख़ से निकलना चाहेंगे और वो उससे न निकलेंगे और उनको दवामी (स्थाई) सज़ा है (37)और जो मर्द या औरत चोर हो (3)
तो उनके हाथ काटो (4)
उनके किये का बदला अल्लाह की तरफ़ से सज़ा और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला  है (38) तो जो अपने ज़ुल्म के बाद तौबह करे और संवर जाए तो अल्लाह अपनी मेहर (अनुकम्पा) से उसपर रूजू फ़रमाएगा (5)
बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (39) क्या तुझे मालूम नहीं कि अल्लाह के लिये है आसमानों और ज़मीन की बादशाही, सज़ा देता है जिसे चाहे और बख़्श्ता है जिसे चाहे और अल्लाह सब कुछ कर सकता है (6) (40)
ऐ रसूल तुम्हें ग़मगीन (दुखी) न करें वो जो कुफ्र पर दोड़ते हैं (7)
जो कुछ वो अपने मुंह से कहते हैं हम ईमान लाए और उनके दिल मुसलमान नहीं (8)
और कुछ यहूदी झूठ ख़ूब सुनते हैं (9)
और लोगों की ख़ूब सुनते हैं (10)
जो तुम्हारे पास हाज़िर न हुए अल्लाह की बातों को उनके ठिकानो के बाद बदल देते हैं कहते हैं यह हुक्म तुम्हें मिले तो मानो और यह न मिले तो बचो (11)
और जिसे अल्लाह गुमराह करना चाहे तो हरगिज़ तू अल्लाह से उसका कुछ बना न सकेगा वो हैं कि अल्लाह ने उनका दिल पाक करना न चाहा उन्हें दुनिया में रूस्वाई है और आख़िरत में बड़ा अज़ाब (41) बड़े झूठ सुनने वाले, बड़े हरामख़ोर (12)
तो अगर तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों (13)
तो उनमें फैसला फ़रमाओ या उनसे मुंह फेर लो (14)
और अगर तुम उनसे मुंह फेर लोगे तो वो तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेंगे  (15)
और अगर उनमें फैसला फ़रमाओ तो इन्साफ़ से फ़ैसला करो बेशक इन्साफ़ वाले अल्लाह को पसन्द हैं  (42) और वो तुमसे किस तरह फै़सला चाहेंगे हालांकि उनके पास तौरात है जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है (16)  फिर भी उसी से मुंह फेरते हैं (17)और वो ईमान लाने वाले नहीं (43)

तफसीर
सूरए माइदा –  छटा रूकू

(1) जिसकी बदौलत तुम्हें उसका क़ुर्ब हासिल हो.

(2) यानी काफ़िरों के लिये अज़ाब लाज़िम है और इससे रिहाई पाने का कोई रास्ता नहीं है.

(3) और उसकी चोरी दो बार के इक़रार या दो मर्दों की शहादत (गवाही) से हाकिम के सामने साबित हो और जो माल चुराया है, दस दरहम से कम का न हो. (इब्ने मसऊद की हदीस)

(4) यानी दायाँ, इसलिये कि हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो की क़िरअत में “ऐमानुहुमा” आया है. पहली बार की चोरी में दायाँ हाथ काटा जाएगा, फिर दोबारा अगर करे तो बायाँ पाँव. उसके बाद भी अगर चोरी करे, तो क़ैद किया जाए, यहाँ तक कि तौबह करे. चोर का हाथ काटना तो वाजिब है और चोरी गया माल मौजूद हो तो उसका वापस करना भी वाजिब और अगर वह ज़ाया हो गया हो तो ज़मान (मुआवज़ा) वाजिब नहीं (तफ़सीरे अहमदी)

(5) और आख़िरत के अज़ाब से उसको निजात देगा.

(6) इससे मालूम हुआ कि अज़ाब करना और रहमत फ़रमाना अल्लाह तआला की मर्ज़ी पर है. वह मालिक है, जो चाहे करे, किसी को ऐतिराज़ की हिम्मत नहीं. इससे क़दरिया और मोअतज़िला सम्प्रदायों की काट हो गई जो फ़रमाँबरदार पर रहमत और गुनहगार पर अज़ाब करना अल्लाह तआला पर वाजिब कहते हैं.

(7) अल्लाह तआला सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को “या अय्युहर रसूल” के इज़्ज़त वाले सम्बोधन के साथ मुख़ातब फ़रमाकर आपकी तस्कीन फ़रमाता है कि ऐ हबीब, मैं आपका मददगार और सहायक हूँ मुनाफ़िक़ों के कुफ़्र में जल्दी करने यानी उनके कुफ़्र ज़ाहिर करने और काफ़िरों के साथ दोस्ती और सहयोग कर लेने से आप दुखी न हों.

(8) यह उनकी दोग़ली प्रवृत्ति का बयान है.

(9) अपने सरदारों से और उनकी झूटी बातों को क़ुबूल करते है.

(10) माशाअल्लाह, आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने बहुत सही अनुवाद फ़रमाया. इस जगह आम मुफ़स्सिरों और अनुवादकों से ग़लती हुई कि उन्होंने आयत के ये मानी बयान किये कि मुनाफ़िक़ और यहूदी अपने सरदारों की झूटी बातें सुनते हैं. आपकी बातें दूसरी क़ौम की ख़ातिर कान धर कर सुनते हैं जिसके वो जासूस हैं. मगर ये मानी सही नहीं हैं और क़ुरआन का अन्दाज़ इससे बिल्कुल मेल नहीं खाता. यहाँ मुराद यह है कि ये लोग अपने सरदारों की झूटी बातें ख़ूब सुनते हैं और लोगों यानी ख़ैबर के यहूदियों की बातों को ख़ूब मानते हैं जिनके अहवाल का आयत में बयान आ रहा है.  (तफ़सीरे अबूसऊद, जुमल)

(11) ख़ैबर के यहूदियों के शरीफ़ों में से एक विवाहित मर्द और विवाहित औरत ने ज़िना किया. इसकी सज़ा तौरात में संगसार करना थी. यह उन्हें गवारा न था, इसलिये उन्होंने चाहा कि इस मुक़दमे का फैसला हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कराएं. चुनांचे इन दोनों मुजरिमों को एक जमाअत के साथ मदीनए तैय्यिबह भेजा और कह दिया कि अगर हुज़ूर हद का हुक्म दें तो मान लेना और संगसार करने का हुक्म दें तो मत मानना. वो लोग बनी क़ुरैज़ा और बनी नुज़ैर के यहूदियों के पास आए और ख़याल किया कि ये हुज़ूर के हम-वतन हैं और उनके साथ आपकी सुलह भी है, उनकी सिफ़ारिश से काम बन जाएगा. चुनांचे यहूदियों के सरदारों में से कअब बिन अशरफ़ व कअब बिन असद व सईद बिन अम्र व मालिक बिन सैफ़ व किनाना बिन अबिलहक़ीक वग़ैरह, उन्हें लेकर हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर हुए और मसअला दरियाफ़्त किया. हुज़ूर ने फ़रमाया क्या मेरा फ़ैसला मानोगे ? उन्होंने इक़रार किया. और तब आयते रज्म उतरी और संगसार करने का हुक्म दिया गया. यहूदियों ने इस हुक्म को मानने से इन्कार किया. हुज़ूर ने फ़रमाया कि तुम में एक जवान गोरा काना फ़िदक का रहने वाला इब्ने सूरिया नाम का है, तुम उसको जानते हो. कहने लगे हाँ फ़रमाया वह कैसा आदमी है. कहने लगे कि आज धरती पर यहूदियों में उसकी टक्कर का आलिम नहीं. तौरात का अकेला आलिम है. फ़रमाया उसको बुलाओ. चुनांचे बुलाया गया. जब वह हाज़िर हुआ तो हुज़ूर ने फ़रमाया, यहूदियों में सबसे बड़ा आलिम तू ही है ? अर्ज़ किया लोग तो ऐसा ही कहते हैं. हुज़ूर ने यहूद से फ़रमाया, इस मामले में इसकी बात मानोगे ? सब ने इक़रार किया. तब हुज़ूर ने इब्ने सूरिया से फ़रमाया, मैं तुझे अल्लाह की क़सम देता हूँ जिसके सिवा कोई मअबूद नहीं, जिसने हज़रत मूसा पर तौरात उतारी और तुम लोगों को मिस्त्र से निकाला, तुम्हारे लिये दरिया में रास्ते बनाए, तुम्हें निजात दी, फिरऔनियों को डूबोया, तुम्हारे लिये बादल को सायबान बनाया, मन्न व सलवा उतारा, अपनी किताब नाज़िल फ़रमाई जिसमें हलाल हराम का बयान है, क्या तुम्हारी किताब में ब्याहे मर्द व औरत के लिये संगसार करने का हुक्म है. इब्ने सूरिया ने अर्ज़ किया, बेशक है, उसी की क़सम जिसका आपने मुझसे ज़िक्र किया. अज़ाब नाज़िल होने का डर न होता तो मैं इक़रार न करता और झूट बोल देता मगर यह फ़रमाइये कि आपकी किताब में इसका क्या हुक्म है, फ़रमाया जब चार सच्चे और भरोसे वाले गवाहों की गवाही से खुले तौर पर ज़िना साबित हो जाए तो संगसार करना वाजिब हो जाता है. इब्ने सूरिया ने अर्ज़ किया अल्लाह की क़सम ऐसा ही तौरात में है, फिर हुज़ूर ने इब्ने सूरिया से दरियाफ़्त कि अल्लाह के हुक्म में तबदीली किस तरह वाक़े  हुई. उसने अर्ज़ किया कि हमारा दस्तूर यह था कि हम किसी शरीफ़ को पकड़ते तो  छोड़ देते और ग़रीब आदमी पर हद क़ायम करते. इस तरह शरीफ़ों में ज़िना बहुत बढ़ गया, यहाँ तक कि एक बार बादशाह के चचाज़ाद भाई ने ज़िना किया तो हमने उसको संगसार न किया, फिर एक दूसरे शख़्स ने अपनी क़ौम की औरत के साथ ज़िना किया तो बादशाह ने उसको संगसार करना चाहा. उसकी क़ौम उठ खड़ी हुई और उन्होंने कहा कि जब तक बादशाह के भाई को संगसार न किया जाए उस वक़्त तक इसको हरगिज़ संगसार न किया जाएगा. तब हमने जमा होकर ग़रीब शरीफ़ सबके लिये संगसार करने के बजाय यह सज़ा सज़ा निकाली कि चालीस कोड़े मारे जाएं और मुंह काला करके गधे पर उलटा बिठाकर घुमाया जाए. यह सुनकर यहूदी बहुत बिगड़े और इब्ने सूरिया से कहने लगे, तूने हज़रत को बड़ी जल्दी ख़बर दे दी और हमने जितनी तेरी तारीफ़ की थी, तू उसका हक़दार नहीं. इब्ने सूरिया ने कहा कि हुज़ूर ने मुझे तौरात की क़सम दिलाई, अगर मुझे अज़ाब के नाज़िल होने का डर न होता तो मैं आपको ख़बर न देता. इसके बाद हुज़ूर के हुक्म से उन दोनों ज़िना करने वालों को संगसार किया गया. और यह आयत उतरी (खाज़िन).

(12) यह यहूदियों के हाकिमों के बारे में है जो रिशवतें लेकर हराम को हलाल करते और शरीअत के हुक्म बदल देते थे. रिशवत का लेना देना दोनों हराम हैं. हदीस शरीफ़ में रिशवत लेने देने वाले दोनों पर लअनत आई है.
(13) यानी किताब वाले.

(14) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को इख़्तियार दिया गया कि किताब वाले आपके पास कोई मुकदमा लाएं तो आपको इख़्तियार है, फ़ैसला फ़रमाएं या न फ़रमाएं.

(15) क्योंकि अल्लाह तआला आपका निगहबान है.

(16) कि विवाहित मर्द और शौहरदार औरत के ज़िना की सज़ा रज्म यानी संगसार करना है.

(17) इसके बावुज़ूद कि तौरात पर ईमान लाने के दावेदार भी हैं और उन्हें यह भी मालूम है कि तौरात में संगसार का हुक्म है, उसको न मानना और आपकी नबुव्वत के इन्कारी होते हुए भी आपसे फ़ैसला चाहना अत्यन्त आश्चर्य की बात है.

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