सूरए माइदा – सोलहवाँ रूकू

सूरए माइदा – सोलहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और जब अल्लाह फ़रमाएगा (1)
ऐ मरयम के बेटे ईसा क्या तूने लोगों से कह दिया था कि मुझे और मेरी माँ को दो ख़ुदा बना लो अल्लाह के सिवा (2)
अर्ज़ करेगा पाकी है तुझे (3)
मुझे रवा नहीं कि वह बात कहूँ जो मुझे नहीं पहुंचती (4)
अगर मैं ने ऐसा कहा हो तो ज़रूर तुझे मालूम होगा तू जानता है जो मेरे जी में है और मैं नहीं जानता जो तेरे इल्म में है बेशक तू ही है सब ग़ैबों (अज्ञात) का जानने वाला (5)(116)
मैंने तो उनसे न कहा मगर वही जो तूने मुझे हुक्म दिया था कि अल्लाह को पूजो जो मेरा भी रब और तुम्हारा भी रब और मैं उनपर मुत्तला (बाख़बर) था जब तक मैं उनमें रहा फिर जब तूने मुझे उठा लिया (6)
तू ही उनपर निगाह रखता था और हर चीज़ तेरे सामने हाज़िर है (7) (117)
अगर तू उन्हें अज़ाब करे तो वो तेरे बन्दे हैं और अगर तू उन्हें बख़्श दे तो बेशक तू ही है ग़ालिब हिकमत वाला  (8) (118)
अल्लाह ने फ़रमाया कि यह (9)
है वह दिन जिसमें सच्चों को (10)
उनका सच काम आएगा उनके लिये बाग़ हैं जिनके नीचे नेहरें बहें हमेशा हमेशा उनमें रहेंगे अल्लाह उनसे राज़ी और वो अल्लाह से राज़ी यह है बड़ी कामयाबी (119) अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनमें है सब की सल्तनत और वह हर चीज़ पर क़ादिर है (11)(120)

तफसीर
सूरए माइदा –  सोलहवाँ रूकू

(1) क़यामत के दिन ईसाइयों की तौबीख़ के लिये.

(2) इस सम्बोधन को सुनकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम काँप जाएंगे और..

(3) सारे दोषों और बुराईयों से और इससे कि तेरा कोई शरीक हो सके.

(4) यानी जब कोई तेरा शरीक नहीं हो सकता तो मैं यह लोगों से कैसे कह सकता था.

(5) इल्म को अल्लाह की तरफ़ निस्बत करना और मामला उसको सौंप देना और अल्लाह की बड़ाई के सामने अपनी मिस्कीनी ज़ाहिर करना, यह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के अदब की शान है..

(6) “तवफ़्फ़ैतनी” (तूने मुझे उठा लिया) के शब्द से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की मौत साबित करना सही नहीं क्योंकि अव्वल तो शब्द “तवफ़्फ़ा” यानी उठा लेना मौत के लिये ख़ास नहीं. किसी चीज़ के पूरे तौर पर लेने को कहते हैं चाहे वह बिना मौत के हो जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में इरशाद हुआ “अल्लाहो यतवफ्फ़ल अनफ़ुसा मौतिहा वल्लती लम तमुत फ़ी मनामिहा”  (अल्लाह जानों को वफ़ात देता है उनकी मौत के वक़्त और जो न मरे उन्हें उनके सोते में)   (सूरए जुमर, आयत 42). दूसरे, जब यह सवाल जवाब क़यामत के दिन का है तो अगर शब्द “तवफ़्फा़” मौत के मानी में भी मान लिया जाये जब भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की मौत दोबारा उतरने से पहले इससे साबित न हो सकेगी.

(7) और मेरा इनका किसी का हाल तुझसे छुपा नहीं.

(8) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को मालूम है कि क़ौम में कुछ लोग कुफ़्र पर अड़े रहे, कुछ ईमान की दौलत से मालामाल हुए, इसलिये आप अल्लाह की बारग़ाह में अर्ज़ करते हैं कि इनमें से जो कुफ़्र पर क़ायम रहे, उनपर तू अज़ाब फ़रमाए तो बिल्कुल सही और मुनासिब और इन्साफ़ है क्योंकि इन्होंने तर्क पूरा होने के बाद कुफ़्र अपनाया. और जो ईमान लाए उन्हें तू बख़्शे तो तेरी मेहरबानी है और तेरा हर काम हिकमत है.

(9) क़यामत का दिन.

(10) जो दुनिया में सच्चाई पर रहे, जैसे कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम.

(11) सच्चे को सवाब देने पर भी और झूठे को अज़ाब फ़रमाने पर भी. आयत के मानी ये है कि अल्लाह तआला हर चीज़ पर, जो हो सकती है, क़ुदरत रखता है. (जुमल) झूठ वग़ैरह ऐब और बुराईयाँ अल्लाह तआला के लिये सोची भी नहीं जा सकती. उनको अल्लाह की क़ुदरत के अन्तर्गत और इस आयत से साबित करना ग़लत और बातिल है.

Advertisements