सूरए माइदा _ तैरहवाँ रूकू

सूरए माइदा _  तैरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो ज़रूर अल्लाह तुम्हें आज़माएगा ऐसे कुछ शिकार से जिस तक तुम्हारा हाथ और नेज़े (भाले) पहुंचें (1)
कि अल्लाह पहचान करा दे उनकी जो उससे बिन देखे डरते हैं फिर इसके बाद जो हद से वढ़े (2)
उसके लिये दर्दनाक अज़ाब है (94) ऐ ईमान वालो शिकार न मारो जब तुम एहराम में हो (3)
और तुम में से जो उसे जान बूझकर क़त्ल करे (4)
तो उसका बदला यह है कि वैसा ही जानवर मवेशी से दे (5)
तुम में के दो सिक़ह (विश्वस्त) आदमी उसका हुक्म करें (6)
यह क़ुरबानी हो काबा को पहुंचती (7)
या कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) दे कुछ मिस्कीनों का खाना (8)
या उसके बराबर रोज़े कि अपने काम का बवाल चखो अल्लाह ने माफ़ किया जो हो गुज़रा (9)
और जो अब करेगा अल्लाह उससे बदला लेगा और अल्लाह ग़ालिब है बदला लेने वाला (95) हलाल है तुम्हारे लिये दरिया का शिकार और उसका खाना तुम्हारे और मुसाफ़िरों के फ़ायदे को और तुम पर हराम है ख़ुश्की का शिकार (10)
जब तक तुम एहराम में हो और अल्लाह से डरो जिसकी तरफ़ तुम्हें उठना है (96) अल्लाह ने अदब वाले घर काबे को लोगों के क़याम का वाइस (कारण) किया (11)
और हुरमत (इज़्ज़त) वाले महीने (12)
और हरम की क़ुरबानी और गले में अलामत (निशानी) लटकी जानवरों को (13)
यह इसलिये कि तुम यक़ीन करो कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में और यह कि अल्लाह सब कुछ जानता है (97) जान रखो कि अल्लाह का अज़ाब सख़्त है (14)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान (98) रसूल पर नहीं मगर हुक्म पहुंचाना (15)
और अल्लाह जानता है जो तुम ज़ाहिर करते और जो तुम छुपाते हो (16)(99)
तुम फ़रमादो कि गन्दा और सुथरा बराबर नहीं (17)
अगरचे तुम गन्दे की कसरत (बहुतात) भाए तो अल्लाह से डरते रहो ऐ अक़्ल वालो कि तुम फ़लाह (भलाई) पाओ (100)

तफसीर
सूरए माइदा –  तैरहवाँ रूकू

(1) सन छ हिजरी जिसमें हुदैबिया का वाक़िया पेश आया, उस साल मुसलमान एहराम पहने हुए थे. इस हालम में वो इस आज़माइश में डाले गए कि जंगली जानवर और चिड़ियाँ बहुतात से आई और उनकी सवारियों पर छा गई. हाथ से पकड़ना, हथियार से शिकार कर लेना बिल्कुल इख़्तियार में था. अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और इस आज़माइश में वो अल्लाह के फ़ज़्ल से फ़रमाँबरदार साबित हुए और अल्लाह के हुक्म के अनुकरण में डटे रहे.(ख़ाज़िन वग़ैरह)

(2) और मुसीबत के बाद नाफ़रमानी करे.

(3) एहराम पहने हुए आदमी पर शिकार यानी ख़ुश्की के किसी बहशी जानवर को मारना हराम है. जानवर की तरफ़ शिकार करने के लिये इशारा करना या किसी तरह बताना भी शिकार में दाख़िल और मना है. एहराम की हालत में हर वहशी जानवर का शिकार मना है चाहे वह हलाल हो या न हो. काटने वाला कुत्ता और कौआ और बिच्छू  और चील और चूहा और भेड़िया और साँप इन जानवरों को हदीसों में बुरे या मूज़ी जानवर कहा गया और इनके क़त्ल की इजाज़त दी गई, मच्छर, पिस्सू, चींटी,मक्खी और कीड़े और मकोड़े और आक्रमक दरिन्दों को मारना माफ़ है. (तफ़सीरे अहमदी वग़ैरह)

(4) एहराम की हालत में जिन जानवरों का मारना मना है वो हर हाल में मना है चाहे जान बूझकर हो या भूले से. जान बूझकर मारने का हुक्म तो इस आयत से मालूम हुआ और भूले से मारने का हदीस शरीफ़ से साबित है. (मदारिक)

 (5) वैसा ही जानवर देने से मुराद यह है कि क़ीमत में मारे हुए जानवर के बराबर हो. हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा और इमाम अबू यूसुफ़ रहमतुल्लाह अलैहिमा का यही क़ौल है और इमाम मुहम्मद व इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाहे अलैहिमा के नज़दीक बनावट और सूरत में मारे हुए जानवर की तरह होना मुराद है. (मदारिक व तफ़सीरे अहमदी)

(6) यानी क़ीमत का अन्दाज़ा करें और क़ीमत वहाँ की मानी जाएगी जहाँ शिकार मारा गया हो या उसके क़रीब के मक़ाम की.

(7) यानी कफ़्फ़ारे के जानवर का हरम शरीफ़ के बाहर ज़िब्ह करना दुरूस्त नहीं है. मक्कए मुकर्रमा में होना चाहिये और ख़ास काबे में भी ज़िब्ह जायज़ नहीं, इसीलिये काबे को पहुंचती फ़रमाया, काबे के अन्दर न फ़रमाया और कफ़्फ़ारा खाने या रोज़े से अदा किया जाए तो उसके लिये मक्कए मुकर्रमा में होने की क़ैद नहीं, बाहर भी जायज़ है. (तफ़सीरे अहमदी वग़ैरह)

(8) यह भी जायज़ है कि शिकार की क़ीमत का ग़ल्ला ख़रीद कर फ़क़ीरों को इस तरह दे कि हर मिस्कीन को सदक़ए फ़ित्र के बराबर पहुंचे और यह भी जायज़ है कि इस क़ीमत में जितने मिस्कीनों के ऐसे हिस्से होते थे उतरे रोज़े रखे.

(9) यानी इस हुक्म से पहले जो शिकार मारे.

(10) इस आयत में यह मसअला बयान फ़रमाया गया कि एहराम पहने आदमी के लिये दरिया का शिकार हलाल है और ख़ुश्की का हराम. दरिया का शिकार वह है जिसकी पैदाइश दरिया में हो और ख़ुश्की का वह जिसकी पैदाइश ख़ुश्की में हो.

(11) कि वहाँ दीनी और दुनियावी कामों का क़याम होता है. डरा हुआ वहाँ पनाह लेता है. बूढ़ों को वहाँ अम्न मिलता है, व्यापारी वहाँ नफ़ा पाते हैं, हज उमरा करने वाले वहाँ हाज़िर होकर मनासिक (संस्कार) अदा करते हैं.

(12) यानी ज़िल्हज को जिसमें हज किया जाता है.

(13) कि उनमें सवाब ज़्यादा है. उन सब को तुम्हारी भलाइयों के क़याम का कारण बनाया.

(14) तो हरम और एहराम की पाकी का ख़याल रखो. अल्लाह तआला ने अपनी रहमतों का ज़िक्र फ़रमाने के बाद अपनी सिफ़त “शदीदुल इक़ाब” (सख़्त अज़ाब देने वाला) ज़िक्र फ़रमाई ताकि ख़ौफ़ और  रिजा से ईमान की पूर्ति हो. इसके बाद अपनी वुसअत व रहमत का इज़हार फ़रमाया.

(15) तो जब रसूल हुक्म पहुंचाकर फ़ारिग़ हो गए तो तुम पर फ़रमाँबरदारी लाज़िम और हुज्जत क़ायम हो गई और बहाने की गुंजाइश बाक़ी न रही.

 (16) उसको तुम्हारे ज़ाहिर और बातिन, दोग़लेपन और फ़रमाँबरदारी सब की जानकारी है.

(17) यानी हलाल व हराम, अच्छे और बुरे, मुस्लिम और काफ़िर और खरा व खोटा एक दर्जे में नहीं हो सकता.

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