सूरए माइदा – पन्द्रहवाँ रूकू

सूरए माइदा – पन्द्रहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

जिस दिन अल्लाह जमा फ़रमाएगा रसूलों को (1)
फिर फ़रमाएगा तुम्हें क्या जवाब मिला (2)
अर्ज़ करेंगे हमें कुछ इल्म नहीं बेशक तू ही है सब ग़ैबों (अज्ञात) का जानने वाला (3) (109)
जब अल्लाह फ़रमाएगा ऐ मरयब के बेटे ईसा याद करो मेरा एहसान अपने ऊपर और अपनी माँ पर (4)
जब मैंने पाक रूह से तेरी मदद की (5)
तू लोगों से बातें करता पालने में (6)
और पक्की उम्र होकर (7)
और  जब मैं ने तुझे सिखाई किताब और हिकमत (बोध) (8)
और तौरात और इंजील और जब तू मिट्टी से परिन्द की सी मूरत मेरे हुक्म से बनाता फिर उसमें फूंक मारता तो वह मेरे हुक्म से उड़ने लगती (9)
और तू मादरज़ाद (जन्मजात) अन्धे और सफ़ेद दाग़ वाले को मेरे हुक्म से शिफ़ा देता और जब तू मुर्दों को मेरे हुक्म से ज़िन्दा निकालता (10)
और जब मैं ने बनी इस्राईल को तुझ से रोका (11)
जब तू उन के पास रौशन निशानियां लेकर आया तो उनमें के काफ़िर बोले कि यह (12)
तो नहीं मगर खुला जादू (110) और जब मैं न हवारियों (अनुयाइयों) (13)
के दिल में डाला कि मुझ पर और मेरे रसूल पर (14)
ईमान लाओ बोले हम ईमान लाए और गवाह रह कि हम मुसलमान हैं (15)  (111)
जब हवारियों ने कहा ऐ ईसा मरयम के बेटे क्या आपका रब ऐसा करेगा कि हम पर आसमान से एक ख़्वान उतारे (16)
कहा अल्लाह से डरो अगर ईमान रखते हो  (17) (112)
बोले हम चाहते हैं (18)
कि उसमें से खाएं और हमारे दिल ठहरें (19)
और हम आँखों देख लें कि आपने हम से सच फ़रमाया (20)
और हम उसपर गवाह हो जाएं  (21)  (113)
ईसा मरयम के बेटे ने अर्ज़ की ऐ अल्लाह ऐ रब हमारे हम पर आसमान से एक ख़्वान उतार कि वह हमारे लिये ईद हो (22)
हमारे अगले पिछलों की  (23)
और तेरी तरफ़ से निशानी  (24)
और हमें रिज़्क दे और तू सब से बेहतर रोज़ी देने वाला है (114) अल्लाह ने फ़रमाया कि मैं इसे तुम पर उतारता हूँ फिर अब जो तुम में कुफ़्र करेगा (25)
तो बेशक मैं उसे वह अज़ाब दूंगा कि सारे जहान में किसी पर न करूंगा  (26) (115)

तफसीर
सूरए माइदा –  पन्द्रहवाँ रूकू

(1) यानी क़यामत के दिन.

(2) यानी जब तुमने अपनी उम्मतों को ईमान की दावत दी तो उन्होंने क्या जवाब दिया. इस सवाल में इन्कार करने वालों की तरफ़ इशारा है.

(3) नबियों का यह जवाब उनके हद दर्जा अदब की शान ज़ाहिर करता है कि वो अल्लाह के इल्म के सामने अपने इल्म को बिल्कुल नज़र में न लाएंगे और क़ाबिले ज़िक्र क़रार न देंगे और मामला अल्लाह तआला के इल्म और इन्साफ़ पर छोड़ देंगे.

(4) कि मैंने उनको पाक किया और जगत की औरतों पर उनको फ़ज़ीलत दी.

(5) यानी हज़रत जिब्रील से कि वह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथ रहते और ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद करते.

(6) कम उम्र में, और यह चमत्कार है.

(7) इस आयत से साबित होता है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम क़यामत से पहले तशरीफ़ लाएंगे क्योंकि पक्की उम्र का वक़्त आने से पहले आप उठा लिये गए. दोबारा तशरीफ़ लाने के वक़त आप तैंतीस साल के जवान की सूरत में होंगे और इस आयत के अनुसार कलाम फ़रमाएंगे और जो पालने में फ़रमाया “इन्नी अब्दुल्लाह” (मैं अल्लाह का बन्दा हूँ) वही फ़रमाएंगे. (जुमल)

(8) यानी इल्मों के राज़.

(9) यह भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का चमत्कार था.

(10) अंधे और सफ़ेद दाग़ वाले को आँख वाला और स्वस्थ करना और मुर्दों को कब्रों से ज़िन्दा करके निकालना, यह सब अल्लाह के हुक्म से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के महान चमत्कार हैं.

(11) यह एक और नेअमत का बयान है कि अल्लाह तआला ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को यहूदियों की शरारतों से मेहफ़ूज़ रखा जिन्होंने हज़रत के खुले चमत्कार देखकर आपके क़त्ल का इरादा किया. अल्लाह तआला ने आप को आसमान पर उठा लिया और यहूदी नामुराद रह गए.

(12) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार.

(13) हवारी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथी और आपके ख़ास लोग हैं.

(14) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर.

(15) ज़ाहिर और बातिन में महब्बत रखने वाले और फ़रमाँबरदार.

(16)  मानी ये है कि क्या अल्लाह तआला इस बारे में आपकी दुआ क़ूबूल फ़रमाएगा.

(17) और अल्लाह से डरो ताकि यह मुराद हासिल हो. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा, मानी ये हैं कि तमाम उम्मतों से निराला सवाल करने में अल्लाह से डरो, या ये मानी हैं कि उसकी क़ुदरत पर ईमान रखते हो तो इसमें आगे पीछे न हो. हवारी ईमान वाले, अल्लाह को पहचानने वाले और उसकी क़ुदरत पर यक़ीन करने वाले थे. उन्होंने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया.

(18)   बरक़त हासिल करने के लिये.

(19) और पक्का यक़ीन हो और जैसा कि हमने अल्लाह की क़ुदरत को दलील से जाना है, आँखों से देखकर उसको और पक्का कर ले.

(20) बेशक आप अल्लाह के रसूल हैं.

(21) अपने बाद वालों के लिये, हवारियों के यह अर्ज़ करने पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उन्हें तीस रोज़े रखने का हुक्म फ़रमाया और कहा जब तुम इन रोज़ों से फ़ारिग़ हो जाओगे तो अल्लाह तआला से जो दुआ करोगे, क़ुबूल होगी. उन्होंने रोज़े रखकर आसमान से खाना उतरने की दुआ की. उस वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने गुस्ल फ़रमाया और मोटा लिबास पहना और दो रकअत नमाज़ अदा की और सर झुकाया और रोकर यह दुआ की जिसका अगली आयत में बयान है.

(22)  यानी हम इसके उतरने के दिन को ईद बनाएं, इसका आदर करें, खुशियाँ मनाएं, तेरी इबादत करें, शुक्र अदा करें. इस से मालूम हुआ कि जिस रोज़ अल्लाह तआला की खास रहमत उतरे उस दिन को ईद बनाना और खुशियाँ मनाना, ईबादते करना, अल्लाह का शुक्र अदा करना नेक लोगो का तरीक़ा है और कुछ शक नहीं कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का तशरीफ़ लाना अल्लाह तआला की सबसे बड़ी नेअमत और रहम है, इसीलिये हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की पैदायश के दिन ईद मनाना और मीलाद शरीफ़ पढ़कर अल्लाह का शुक्र अदा करना और खुशी ज़ाहिर करना अच्छी बात है और अल्लाह के प्यारे बन्दो का तरीक़ा है.

(23)  जो दीनदार हमारे ज़माने में हैं उनकी और जो हमारे बाद आएं उनकी.

(24) तेरी क़ुदरत की और मेरी नबुव्वत की.

(25) यानी आसमान से खाना उतरने के बाद.

(26) चुनांचे आसमान से खाना उतरा, इसके बाद जिन्होंने उनमें से कुफ़्र किया उनकी शक्लें बिगाड़ दी गई और वो सुअर बना दिये गये और तीन दीन के अन्दर सब मर गए.

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