सूरए माइदा – नवाँ रूकू

सूरए माइदा –  नवाँ  रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ ईमान वालो जिन्होंने तुम्हारे दीन को हंसी खेल बना लिया है (1)
वो जो तुमसे पहले किताब दिये गए और काफ़िर (2)
उनमें किसी को अपना दोस्त न बनाओ और अल्लाह से डरते रहो अगर ईमान रखते हो (3)
(57) और जब तुम नमाज़ के लिये अज़ान दो तो उसे हंसी खेल बनाते हैं (4)
यह इसलिये कि वो निरे बे अक़्ल लोग हैं (5)(58)
तुम फ़रमाओ ऐ किताबियों तुम्हें हमारा क्या बुरा लगा यही न कि हम ईमान लाए अल्लाह पर और उसपर जो हमारी तरफ़ उतरा और उसपर जो पहले उतरा  (6)
और यह कि तुम में अक्सर बेहुक्म हैं  (59) तुम फ़रमाओ क्या मैं बतादूं जो अल्लाह के यहाँ इससे बदतर दर्जे में हैं (7)
वो जिनपर अल्लाह ने लअनत की और उन पर ग़ज़ब फ़रमाया और उनमें से कर दिया बन्दर और सुअर (8)
और शैतान के पुजारी उनका ठिकाना ज़्यादा बुरा है (9)
और ये सीधी राह से ज़्यादा बहके (60) और जब तुम्हारे पास आए (10)
तो कहते हैं कि हम मुसलमान हैं और वो आते वक़्त भी काफ़िर थे और जाते वक़्त भी काफ़िर और अल्लाह ख़ूब जानता है जो छुपा रहे हैं (61) और उन (11)
में तुम बहुतों को देखोगे कि गुनाह और ज़ियादती और हरामख़ोरी पर दौड़ते हैं (12)
बेशक बहुत ही बुरे काम करते हैं (62)  इन्हें क्यों नहीं मना करते उनके पादरी, और दर्वेश गुनाह की बात कहने और हराम खाने से बेशक बहुत ही बुरे काम कर रहे हैं (13)(63)
और यहूदी बोले अल्लाह का हाथ बंधा हुआ है  (14)
उनके हाथ बांधे जाएं (15)
और उनपर इस कहने से लअनत है बल्कि उसके हाथ कुशादा हैं (16)
अता फ़रमाता है जैसे चाहे (17)
और ऐ मेहबूब ये (18)
जो तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा उससे उनमें बहुतों को शरारत और कुछ कुफ्र में तरक़्क़ी होगी (19)
और बैर डाल दिया (20)
जब कभी लड़ाई की आग भड़काते हैं अल्लाह उसे बुझा देता है (21)
और ज़मीन में फ़साद के लिये दौड़ते फिरते हैं और अल्लाह फ़सादियों को नहीं चाहता  (64) और अगर किताब वाले ईमान लाते और परहेज़गारी करते तो ज़रूर हम उनके गुनाह उतार देते और ज़रूर उन्हें चैन के बाग़ों में ले जाते  (65) और अगर वो क़ायम रखते तौरात और इंजील  (22)
और जो कुछ उनकी तरफ़ उनके रब की तरफ़ से उतरा  (23)
तो उन्हें रिज़्क मिलता है ऊपर से और उनके पांव के नीचे से (24)
उनमें कोई गिरोह  (दल) अगर एतिदाल (संतुलन) पर है (25) और उनमें अक्सर बहुत ही बुरे काम कर रहे हैं (26)(66)

तफसीर
सूरए माइदा –  नवाँ  रूकू

(1) रफ़ाआ बिन ज़ैद और सवीद बिन हारिस दोनों इस्लाम ज़ाहिर करने के बाद मुनाफ़िक़ हो गए. कुछ मुसलमान उनसे महब्बत रखते थे. अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और बताया कि ज़बान से इस्लाम ज़ाहिर करना और दिल में कुफ़्र छुपाए रखना, दीन को हंसी खेल बनाना है.

(2) यानी मूर्तिपूजक मुश्रिक जो किताब वालों से भी बुरे हैं. (ख़ाज़िन)

(3) क्योंकि ख़ुदा के दुश्मनों के साथ दोस्ती करना ईमान वाले का काम नहीं.

(4) कलबी का क़ौल है कि जब रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का मुअज़्ज़िन नमाज़ के लिये अज़ान कहता और मुसलमान उठते तो यहूदी हंसते और ठठ्ठा करते. इस पर यह आयत उतरी. सदी का कहना है कि मदीनए तैय्यिबह में जब मुअज़्ज़िन अज़ान में “अशहदो अन ला इलाहा इल्लल्लाह” और “अशहदो अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह” कहता तो एक यहूदी यह कहा करता कि जल जाए झुटा. एक रात उसका ख़ादिम आग लाया, वह और उसके घर के लोग सो रहे थे. आग से एक चिंगारी उड़ी और वह यहूदी और उसके घर के लोग और सारा घर जल गया.

(5) जो ऐसी बुरी और जिहालत की बातें करते हैं. इस आयत से मालूम हुआ कि अज़ान क़ुरआनी आयत से भी साबित हैं.

(6) यहूदियों की एक जमाअत ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दरियाफ़्त किया कि आप नबियों में से किस को मानते हैं, इस सवाल से उनका मतलब यह था कि आप हज़रत ईसा को न मानें तो वो आप पर ईमान ले आएं. लेकिन हुज़ूर ने इसके जवाब में फ़रमाया कि मैं अल्लाह पर ईमान रखता हूँ और जो उसने हम पर उतारा और जो हज़रत इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़ व याक़ूब और उनकी औलाद पर उतारा और जो हज़रत मूसा व ईसा को दिया गया यानी तौरात और इंजील और जो और नबियों को उनके रब की तरफ़ से दिया गया, सब को मानता हूँ. हम नबियों में फ़र्क़ नहीं करते कि किसी को मानें और किसी को न मानें. जब उन्हें मालूम हुआ कि आप हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत को भी मानते हैं तो वो आपकी नबुव्वत का इन्कार कर बैठे और कहने लगे जो ईसा को माने, हम उस पर ईमान न लाएंगे. इस पर यह आयत उतरी.

(7) कि इस सच्चे दीन वालों को तो तुम सिर्फ़ अपनी दुश्मनी ही से बुरा कहते हो और तुमपर अल्लाह तआला ने लअनत की है और ग़ज़ब फ़रमाया और आयत में जो बयान है, वह तुम्हारा हाल हुआ तो बदतर दर्जे में तो तुम ख़ुद हो, कुछ दिल में सोचो.

(8) सूरतें बिगाड़ के.

(9) और वह जहन्नम है.

(10) यह आयत यहूदियों की एक जमाअत के बारे में उतरी जिन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपने ईमान और महब्बत का इज़हार किया और कुफ़्र और गुमराही छुपाई. अल्लाह तआला ने यह आयत उतार कर अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उनके हाल की ख़बर दी.

(11) यानी यहूदी.

(12) गुनाह हर बुराई और नाफ़रमानी को शामिल है. कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि गुनाह से तौरात के मज़मून का छुपाना और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की जो विशेषताएं और गुण हैं उनको छुपाना और ज़ियादती से तौरात के अन्दर अपनी तरफ़ से कुछ बढ़ा देना और हरामख़ोरी से रिशवतें वग़ैरह मुराद हैं.  (ख़ाज़िन)
(13) कि लोगों को गुनाहों और बुरे कामों से नहीं रोकते. इससे मालूम हुआ कि उलमा पर नसीहत और बुराई से रोकना वाजिब है, और जो शख़्स बुरी बात से मना करने को छोड़े, और बुराई के इन्कार से रूका रहे, वह गुनाह करने वाले जैसा है.

(14) यानी मआज़ल्लाह वह बख़ील यानी कंजूस है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि यहूदी बहुत ख़ुशहाल और काफ़ी मालदार थे. जब उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाया और विरोध किया तो उनकी रोज़ी कम हो गई. उस वक़्त एक यहूदी ने कहा कि अल्लाह का हाथ बंधा है, यानी मआज़ल्लाह वह रिज़्क़ देने और ख़र्ज करने में कंजूसी करता है. उनके इस कहने पर किसी यहूदी ने मना न किया बल्कि राज़ी रहे, इसीलिये यह सबका कहा हुआ क़रार दिया गया और यह आयत उनके बारे में उतरी.

(15) तंगी और दादो-दहिश से. इस इरशाद का यह असर हुआ कि यहूदी दुनिया में सबसे ज़्यादा कंजूस हो गए या ये मानी हैं कि उनके हाथ जहन्नम में बांधे जाएं और इस तरह उन्हें दोज़ख़ की आग में डाला जाए, उनकी इस बेहूदा बात और गुस्ताख़ी की सज़ा में.

(16) वह सख़ावत वाला और करम वाला है.
(17) अपनी हिकमत के अनुसार, इसमें किसी को ऐतिराज़ की मजाल नहीं.

(18) क़ुरआन शरीफ़.

(19) यानी जितना क़ुरआने पाक उतरता जाएगा उतना हसद और दुश्मनी बढ़ती जाएगी और वो उसके साथ कुफ़्र और सरकशी में बढ़ते रहेंगे.

(20) वो हमेशा आपस में अलग अलग रहेंगे और उनके दिल कभी न मिलेंगे.

(21) और उनकी मदद नहीं फ़रमाता, वह ज़लील होता है.

(22) इस तरह कि नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाते और आपकी फ़रमाँबरदारी करते कि तौरात व इंजील में इसका हुक्म दिया गया है.

(23) यानी तमाम किताबें जो अल्लाह तआला ने अपने रसूलों पर उतारीं, सबमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का ज़िक्र और आप पर ईमान लाने का हुक्म है.

(24) यानी रिज़्क़ की बहुतात होती और हर तरफ़ से पहुंचता. इस आयत से मालूम हुआ कि दीन की पाबन्दी और अल्लाह तआला की फ़रमाँबरदारी से रिज़्क़ में विस्तार होता है.

(25) हद से आगे नहीं जाता, ये यहूदियों में से वो लोग हैं जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाए.

(26) जो कुफ़्र पर जमे हुए है.

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One Response

  1. its good

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