सूरए माइदा – दसवाँ रूकू

सूरए माइदा – दसवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ रसूल पहुंचादो जो कुछ उतरा तुम्हें तुम्हारे रब की तरफ़ से (1)
और ऐसा न हो तो तुम ने उसका पयाम (संदेश) न पहुंचाया और अल्लाह तुम्हारी निगहबानी करेगा लोगों से (2)
बेशक अल्लाह काफ़िरों को राह नहीं देता (67) तुम फ़रमादो ऐ किताब वालों तुम कुछ भी नहीं हो (3)
जब तक न क़ायम करो तौरात और इंजिल और जो कुछ तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा (4)
और बेशक ऐ मेहबूब वह जो तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा उस से उनमें बहुतों को शरारत और कुफ़्र की ओर तरक़्की होगी (5)
तो तुम काफ़िरों को कुछ ग़म न खाओ (68) बेशक वो जो अपने आपको मुसलमान कहते हैं (6)
और इस तरह यहूदी और सितारों को पूजने वाले और ईसाई, इनमें जो कोई सच्चे दिल से अल्लाह और क़यामत पर ईमान लाए और अच्छे काम करे तो उनपर न कुछ डर है और न कुछ ग़म (69) बेशक हमने बनी इस्राईल से एहद लिया(7)
और उनकी तरफ़ रसूल भेजे जब कभी उनके पास कोई रसूल वह बात लेकर आया जो उनके नफ़्स की ख़्वाहिश न थी (8)
एक दल को झुटलाया और एक दल को शहीद करते हैं (9)(70)
और इस ग़ुमान में हैं कि कोई सज़ा न होगी (10)
तो अंधे और बेहरे हो गए (11)
फिर अल्लाह ने उनकी तौबह क़ुबूल की (12)
फिर उनमें बहुतेरे अंधे और बेहरे हो गए और अल्लाह उनके काम देख रहा है(71) बेशक काफ़िर हैं वो जो कहते हैं कि अल्लाह वही मसीह मरयम का बेटा है (13)
और मसीह ने तो यह कहा था कि ऐ बनी इस्राईल अल्लाह की बन्दगी करो जो मेरा रब (14)
है और तुम्हारा रब बेशक जो अल्लाह का शरीक ठहराए तो अल्लाह ने उसपर जन्नत हराम करदी और उसका ठिकाना दोज़ख़ है.और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं  (72) बेशक काफ़िर हैं वो जो कहते हैं अल्लाह तीन ख़ुदाओ में का तीसरा हैं (15)
और ख़ुदा तो नहीं मगर एक ख़ुदा (16)
और अगर अपनी बात से बाज़ न आए  (17)
तो जो उनमें काफ़िर मरेंगे उनको ज़रूर दर्दनाक अज़ाब पहुंचेगा  (73) तो क्यों नहीं रूजू करते अल्लाह की तरफ़ और उससे बख़्शिश मांगते और अल्लाह बख़्श्ने वाला मेहरबान (74) मसीह मरयम का बेटा नहीं मगर एक रसूल  (18)
उससे पहले बहुत रसूल हो गुज़रे  (19)
और उसकी माँ सिद्दीक़ा (सच्ची) है (20)
दोनो खाना खाते थे (21)
देखो तो हम कैसी साफ़ निशानियां इनके लिये बयान करते हैं फिर देखो वो कैसे औंध जाते हैं  (75)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह के सिवा ऐसे को पूजते हो जो तुम्हारे नुक़सान का मालिक न नफ़ा का (22)
और अल्लाह ही सुनता जानता है  (76) तुम फ़रमाओ ऐ किताब वालो अपने दीन में नाहक़ ज़ियादती न करो  (23)
और ऐसे लोगों की ख़्वाहिश पर न चलो (24)
जो पहले गुमराह हो चुके और बहुतो को गुमराह किया और सीधी राह से बहक गए (77)

तफसीर
सूरए माइदा –  चौथा रूकू

(1) और कुछ अन्देशा न करो.

(2) यानी काफ़िरों से जो आपके क़त्ल का इरादा रखते हैं. सफ़रों में रात को हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का पहरा दिया जाता था, जब यह आयत उतरी, पहरा हटा दिया गया और हुज़ूर ने पहरेदारों से फ़रमाया कि तुम लोग चले जाओ. अल्लाह तआला ने मेरी हिफ़ाज़त फ़रमाई.

(3) किसी दीन व मिल्लत में नहीं.

(4) यानी क़ुरआने पाक इन किताबों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात और आप पर ईमान लाने का हुक्म है, जब तक हुज़ूर पर ईमान न लाएं. तौरात व इन्जील के अनुकरण का दावा सही नहीं हो सकता.

(5) क्योंकि जितना क़ुरआने पाक उतरता जाएगा, ये मक्कार दुश्मनी से इसके इन्कार में और सख़्ती करते जाएंगे.

(6) और दिल में ईमान नहीं रखते, मुनाफ़िक़ है.

(7) तौरात में, कि अल्लाह तआला और उसके रसूलों पर ईमान लाएं और अल्लाह के हुक्म के मुताबिक अमल करें.

(8) और उन्होंने नबियों के आदेशों को अपनी इच्छाओं के ख़िलाफ़ पाया तो उनमें से.

(9) नबियों को झुटलाने में तो यहूदी और ईसाई सब शरीक हैं मगर क़त्ल करना, यह ख़ास यहूदियों का काम है. उन्होंने बहुत से नबियों को शहीद किया जिनमें से हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया अलैहुमस्सलाम भी है.

(10) और ऐसे सख़्त जुर्मों पर भी अज़ाब न किया जाएगा.

(11) सच्चाई को देखने और सुनने से, यह उनकी असीम अज्ञानता और अत्यन्त कुफ़्र और सत्य क़ुबूल करने से बिल्कुल ही मुँह फेर लेने का बयान है.

(12) जब उन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद तौबह की उसके बाद दोबारा.

(13) ईसाइयों के कई सम्प्रदाय हैं उनमें से याक़ूबिया और मल्कानिया का यह कहना था कि मरयम ने मअबूद जना और यह भी कहते थे कि मअबूद ने ईसा की ज़ात में प्रवेश किया और वह उनके साथ एक हो गया तो ईसा मअबूद हो गए.
(14) और मैं उसका बन्दा हूँ, मअबूद नहीं.

(15) यह क़ौल ईसाइयों के सम्प्रदाय मरक़सिया व नस्तूरिया का है. अकसर मुफ़िस्सरों का क़ौल है कि इससे उनकी मुराद यह थी कि अल्लाह और मरयम और ईसा तीनों इलाह हैं और इलाह होना इन सब में मुश्तरक है. मुतकल्लिमीन फ़रमाते हैं कि ईसाई कहते हैं कि बाप, बेटा, रूहुलक़ुदुस, ये तीनों एक इलाह हैं.

(16) न उसका कोई सानी न सालिस. वह वहदानियत के साथ मौसूफ़ है, उसका कोई शरीक नहीं. बाप, बेटे, बीबी, सबसे पाक.

(17) और त्रिमूर्ति के मानने वाले रहे, तौहीद इख़्तियार न की.

(18) उनको मअबूद मानना ग़लत, बातिल और कुफ़्र है.

(19) वो भी चमत्कार रखते थे. ये चमत्कार उनके सच्चे नबी होने की दलील थे. इसी तरह हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम भी रसूल हैं, उनके चमत्कार भी उनकी नबुव्वत के प्रमाण हैं, उन्हें रसूल ही मानना चाहिये, जैसे  और नबियों को चमत्कार पर ख़ुदा नहीं मानते, उनको भी ख़ुदा न मानो.

(20) जो अपने रब के कलिमात और उसकी किताबों की तस्दीक़ करने वाली हैं.

(21) इसमें ईसाइयों का रद है कि इलाह यानी मअबूद ग़िज़ा का मोहताज़ नहीं हो सकता, तो जो ग़िज़ा खाए, जिस्म रखे, उस जिस्म में तबदील हो, ग़िज़ा उसका बदल बने, वह कैसे मअबूद हो सकता है.

(22) यह शिर्क के बातिल होने की एक और दलील है इसका ख़ुलासा यह है कि मअबूद (जिसकी पूजा की जा सके) वही हो सकता है जो नफ़ा नुक़सान वग़ैरह हर चीज़ पर ज़ाती क़ुदरत और इख़्तियार रखता हो. जो ऐसा न हो, वह इलाह यानी पूजनीय नहीं हो सकता और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम नफ़ा नुक़सान के अपनी ज़ात से मालिक न थे, अल्लाह तआला के मालिक करने से मालिक हुए, तो उनकी निस्बत अल्लाह होने का अक़ीदा बातिल है. (तफ़सीरे अबूसउद)

(23) यहूदियों की ज़ियादती तो यह है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत ही नहीं मानते और ईसाइयों की ज़ियादती यह कि उन्हें मअबूद ठहराते हैं.

(24) यानी अपने अधर्मी बाप दादा वग़ैरह की.

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