सूरए माइदा – चौदहवाँ रूकू

सूरए माइदा – चौदहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो ऐसी बातें न पूछो जो तुमपर ज़ाहिर की जाएं तो तुम्हें बुरी लगें (1)
और अगर उन्हें उस वक़्त पूछोगे कि क़ुरआन उतर रहा है तो तुमपर ज़ाहिर करदी जाएंगी अल्लाह उन्हें माफ़ कर चुका है (2)
और अल्लाह बख़्शने वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है  (101) तुमसे अगली एक क़ौम ने उन्हें पूछा (3)
फिर उनसे इन्कारी हो बैठे (102) अल्लाह ने मुक़र्रर नहीं किया है काम चरा हुआ और न बिजार और न वसीला और न हामी (4)
हाँ, काफ़िर लोग अल्लाह पर झूठ इफ़तिरा (मिथ्यारोप) बांधते हैं (5)
और उनमें अकसर निरे बेअक़्ल हैं (6) (103)
और जब उनसे कहा जाए आओ उस तरफ़ जो अल्लाह ने उतारा और रसूल की तरफ़ (7)
कहें हमें वह बहुत है जिसपर हमने अपने बाप दादा को पाया, क्या अगरचे उनके बाप दादा न कुछ जानें न राह पर हों (8)(104)
ऐ ईमान वालो तुम अपनी फिक़्र रखो तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेगा जो गुमराह हुआ जब कि तुम राह पर हो (9)
तुम सबकी रूजू (पलटना) अल्लाह ही की तरफ़ है फिर वह तुम्हें बता देगा जो तुम करते थे (105) ऐ ईमान वालो (10)
तुम्हारी आपस की गवाही जब तुममे किसी को मौत आए (11)
वसीयत करते वक़्त तुम में के दो विश्वसनीय शख़्स हैं या ग़ैरों में के दो जब तुम मुल्क में सफ़र को जाओ फिर तुम्हें मौत का हादसा पहुंचे उन दोनों को नमाज़ के बाद रोको (12)
वो अल्लाह की क़सम खाएं अगर तुम्हें कुछ शक पड़े (13)
हम हलफ़ के बदले कुछ माल न खरीदेंगे (14)
अगरचे क़रीब का रिश्तेदार हो और अल्लाह की गवाही ने छुपाएंगे ऐसा करें तो हम ज़रूर गुनाहगारों में हैं (106) फिर अगर पता चले कि वो किसी गुनाह के सज़ावार (हक़दार) हुए (15)
तो उनकी जगह दो और खड़े हों उनमें से कि उस गुनाह यानी झूठी गवाही ने उनका हक़ लेकर उनको नुक़सान पहुंचाया (16)
जो मैयत से ज़्यादा क़रीब हों अल्लाह की क़सम खाए कि हमारी गवाही ज्यादा ठीक है उन दो की गवाही से और हम हद से न बढ़े (17)
ऐसा हो तो हम ज़ालिमों में हों (107) यह क़रीबतर है उससे कि गवाही जैसी चाहिये अदा करें या डरें कि कुछ क़समें रद करदी जाएं उनकी क़समों के बाद (18)
और अल्लाह से डरो और हुक्म सुनो और अल्लाह बेहुक्मों को राह नहीं देता (108)

तफसीर
सूरए माइदा –  चौदहवाँ रूकू

(1) कुछ लोग सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बहुत से बेफ़ायदा सवाल किया करते थे. यह सरकार के मिज़ाज पर बोझ होता था. एक दिन फ़रमाया कि जो जो पूछना हो पूछ लो. मैं हर बात का जवाब दूंगा. एक शख़्स ने पूछा कि मेरा अंजाम क्या है. फ़रमाया जहन्नम. दूसरे ने पूछा कि मेरा बाप कौन है, आपने उसके असली बाप का नाम बता दिया जिसके नुत्फ़े से वह था जबकि उसकी माँ का शौहर और था जिसका यह शख़्स बेटा कहलाता था. इसपर यह आयत उतरी. और फ़रमाया गया कि ऐसी बाते न पूछो जो ज़ाहिर की जाएं तो तुम्हें नागवार गुज़रें. (तफ़सीरे अहमदी) बुखारी व मुस्लिम की हदीस शरीफ़ में है कि एक रोज़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने खुत्बा देते हुए फ़रमाया कि जिसको जो पूछना हो पूछ ले. अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफ़ा सहमी ने खड़े होकर पूछा कि मेरा बाप कौन है. फ़रमाया हुज़ाफ़ा. फिर फ़रमाया और पूछो हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने उठकर ईमान और रिसालत के इक़रार के साथ माज़िरत पेश की. इब्ने शहाब की रिवायत है कि अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफ़ा की माँ ने उनसे शिकायत की और कहा कि तू बहुत नालायक बेटा है, तुझे क्या मालूम कि ज़िहालत के ज़माने की औरतों का क्या हाल था. अल्लाह न करे तेरी माँ से कोई क़ुसूर हुआ होता तो आज वह कैसी रूस्वा होती, इसपर अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफ़ा ने कहा कि अगर हुज़ूर किसी हबशी ग़ुलाम को मेरा बाप बता देते तो मैं यक़ीन के साथ मान लेता. बुखारी शरीफ़ की हदीस में है कि लोग ठट्ठा बनाने के अन्दाज़ में इस क़िस्म के सवाल किया करते थे, कोई कहता मेरा बाप कौन है, कोई पूछता मेरी ऊंटनी गुम हो गई है वह कहाँ है. इस पर यह आयत उतरी. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़ुत्बे में हज फ़र्ज़ होने का बयान फ़रमाया. इसपर एक शख़्स ने कहा क्या हर साल हज फ़र्ज़ है. हुज़ूर ने ख़ामोशी रखी. सवाल करने वाले ने सवाल दोहराया तो इरशाद फ़रमाया कि जो मैं बयान न करूं उसपर मत अड़ो. अगर मैं हाँ कह देता तो हर साल हज फर्ज़ हो जाता और तुम न कर सकते. इससे मालूम हुआ कि अहकाम हुज़ूर के इरशाद के तहत है, जो फ़र्ज़ फ़रमा दे वह फ़र्ज़ हो जाए, न फ़रमाएं, न हो.

(2)  इस आयत से साबित हुआ कि जिस काम की शरीअत में मना न आए वह किया जा सकता है. हज़रत सलमान रदियल्लाहो अन्हो की हदीस में है कि हलाल वह है जो अल्लाह ने अपनी किताब में हलाल फ़रमाया, हराम वह है जिसको उसने अपनी किताब में हराम फ़रमाया और जिसके बारे में कुछ न फ़रमाया वह माफ़ है तो तकलीफ़ में न पड़ो. (ख़ाजिन)

(3)  अपने नबियों से और बे ज़रूरत सवाल किये. नबियों ने अहकाम बयान फ़रमाए तो उनपर अमल न कर सके.

(4) जिहालत के ज़माने में काफ़िरों का यह तरीक़ा था कि जो ऊंटनी पाँच बार बच्चे जनती और आख़िरी बार उसके नर होता उसका कान चीर देते, फिर न उसपर सवारी करते न उसको ज़िबह करते.न पानी और चारे से हंकाते. और जब सफ़र पेश होता या कोई बीमार होता तो यह मन्नत मानते कि अगर मैं सफ़र से सकुशल वापस आऊं या स्वस्थ हो जाऊं तो मेरी ऊंटनी  साइबा (बिजार) है और उससे भी नफ़ा उठाना हराम जानते और उसको आज़ाद छोड़ देते और बकरी जब सात बार बच्चा जन चुकती तो अगर सातवाँ बच्चा नर होता तो उसको मर्द खाते और अगर मादा होती तो बकरियों में छोड़ देते और ऐसे ही अगर नर व मादा दोनो होते और कहते कि यह अपने भाई से मिल गई है उसको वसीला कहते और जब नर ऊंट से दस गर्भ हासिल होजाते तो उसको छोड़ देते न उसपर सवारी करते न उससे काम लेते न उसको चारे पानी पर से रोकते, उसको हामी कहते.  (मदारिक) बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है कि बहीरा वह है जिसका दूध बूतों के लिये रोकते थे, कोई उस जानवर का दूध न दोहता और साइबा वह जिसको अपने बुतों के लिये छोड़ देते थे कोई उससे काम न लेता. ये रस्में जिहालत के ज़माने से इस्लाम के दौर तक चली आ रही थीं. इस आयत में उनको ग़लत क़रार दिया गया.

(5) क्योंकि अल्लाह तआला ने इन जानवरों को हराम नहीं किया. उसकी तरफ़ इसकी निस्बत ग़लत है.

(6) जो अपने सरदारों के कहने से इन चीज़ों को हराम समझते है, इतनी समझ नहीं रखते कि जो चीज़ अल्लाह और उसके रसूल ने हराम न की उसको कोई हराम नहीं कर सकता.

(7) यानी अल्लाह और रसूल के हुक्म का अनुकरण करो और समझलो कि ये चीज़ें हराम नहीं.

(8) यानी बाप दादा का अनुकरण जब दुरूस्त होता कि वो जानकारी रखते और सीधी राह पर होते.

(9) मुसलमान काफ़िरों की मेहरूमी पर अफ़सोस करते थे और उन्हें दुख होता था कि काफ़िर दुश्मनी में पड़कर इस्लाम की दौलत से मेहरूम रहे. अल्लाह तआला ने उनकी तसल्ली फ़रमादी कि इसमें तुम्हारा कुछ नुक़सान नहीं. अल्लाह की हाँ को हाँ और ना को ना मानने का फ़र्ज़ अदा करके तुम अपना कर्तव्य पूरा कर चुके. तुम अपनी नेकी का सवाब पाओगे. अब्दुल्लाह बिन मुबारक ने फ़रमाया इस आयत में “अम्र बिल मअरूफ़ व नहीये अनिल मुन्कर” यानी अल्लाह ने जिस काम का हुक्म दिया उसे करना और जिससे मना किया उससे रूके रहना, इसकी अनिवार्यता की बहुत ताकीद की है. क्योंकि अपनी फ़िक्र रखने के मानी ये है कि एक दूसरे की ख़बरगीरी करें, नेकियों की रूचि दिलाए, और बुराइयों से रोके. (ख़ाज़िन)

(10) मुहाजिरों में से बदील, जो हज़रत अम्र इब्ने आस के मवाली में से थे, तिजारत के इरादे से शाम की तरफ़ दो ईसाइयों के साथ रवाना हुए. उनमें से एक का नाम तमीम बिन औस दारी था और दूसरे का अदी बिन बुदए शाम पहुंचते ही बदील बीमार हो गए और उन्होंने अपने सारे सामान की एक सूची लिखकर सामान में डाल दी और साथियों को इसकी सूचना न दी. जब बीमारी बढ़ी तो बदील ने तमीम व अदी दोनो को वसीयत की कि उनकी सारी पूंजी मदीना शरीफ़ पहुंच कर उनके घरवालों को दें. बदील की वफ़ात हो गई. इन दोनों ने उनकी मौत के बाद उनका सामान देखा. उसमें एक चांदी का प्याला था. जिसपर सोने का काम बना हुआ था. उसमें तीन सौ मिरक़ाल चांदी था. बदील यह प्याला बादशाह को भेंट करने के इरादे से लाए थे. उनकी मृत्यु के बाद उनके दोनों साथियों ने इस प्याले को ग़ायब कर दिया और अपने काम से निपटने के बाद जब ये लोग मदीनए तैय्यिबह पहुंचे तो उन्होंने बदील का सामान उनके घर वालों के सुपुर्द कर दिया. सामान खोलने पर सूची उसके हाथ आ गई जिसमें सारी पूंजी की तफ़सील थी. जब सामान को सूची से मिलाया तो प्याला न पाया. अब वो तमीम  और अदी के पास पहुंचे और उन्होंने पूछा कि क्या बदील ने कुछ सामान बेचा भी था. उन्होंने कहा, नहीं पूछा, क्या कोई तिजारती मामला किया था. उन्होंने कहा, नहीं. फिर पूछा बदील बहुत समय तक बीमार रहे, क्या उन्होंने अपने इलाज में कुछ ख़र्च किया. उन्होंने कहा, नहीं वो तो शहर पहुंचते ही बीमार हो गए और जल्द ही उनका इन्तिक़ाल हो गया. इस पर घरवालों ने कहा कि उनके सामान में एक सूची मिली है उसमें चांदी का एक प्याला सोने का काम किया हुआ, जिसमें तीन सौ मिस्क़ाल चांदी है, यह भी लिखा है. तमीम व अदी ने कहा हमें नहीं मालूम. हमें तो जो वसीयत की थी उसके अनुसार सामान हमने तुम्हें दे दिया. प्याले की हमें ख़बर भी नहीं. मुकदमा रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के दरबार में पेश हुआ. तमीम व अदी वहाँ भी इन्कार पर जमे रहे और क़सम खाली. इसपर यह आयत उतरी. (खाजिन) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा की रिवायत में है कि फिर वह प्याला मक्कए मुकर्रमा में पकड़ा गया. जिस व्यक्ति के पास था उसने कहा कि मैंने यह प्याला तमीम व अदी से खरीदा है. प्याले के मालिक के सरपरस्तों में से दो व्यक्तियों ने खड़े होकर क़सम खाई कि हमारी गवाही इनकी गवाही से ज़्यादा सच्ची है. यह प्याला हमारे बुज़ुर्ग का है. इस बारे में यह आयत उतरी. (तिरमिज़ी)

(11) यानी मौत का वक़्त करीब आए, ज़िन्दगी की उम्मीद न रहे, मौत की निशानियाँ ज़ाहिर हो.

(12) इस नमाज़ से अस्र की नमाज़ मुराद है, क्योंकि वह लोगों के जमा होने का वक़्त होता है. हसन रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि नमाज़े ज़ोहर या अस्र, क्योंकि हिजाज़ के लोग मुकदमें उसी वक़्त करते थे. हदीस शरीफ़ में है कि जब यह आयत उतरी तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अस्र की नमाज़ पढ़कर अदी और तमीम को बुलाया. उन दोनो ने क़समें खाई. इसके बाद मक्कए मुकर्रमा में यह प्याला पकड़ा गया तो जिस व्यक्ति के पास था उसने कहा कि मैंने अदी  और तमीम से खरीदा है.  (मदारिक)

(13) उनकी अमानत और दयानत में और वो यह कहें कि……..

(14) यानी झूठी क़सम न खाएंगे और किसी की ख़ातिर ऐसा न करेंगे.

(15) ख़ियानत के या झूठ वग़ैरह के.

(16) और वो मरने वाले के घर वाले और रिश्तेदार है.

(17) चुनांचे बदील की घटना में जब उनके दोनो साथियों की ख़ियानत ज़ाहिर हुई तो बदील के वारिसों में से दो व्यक्ति खड़े हुए और उन्होंने क़सम खाई कि यह प्याला हमारे बुजुर्ग का है, और हमारी गवाही इन दोनो की गवाही से ज़्यादा ठीक है.

(18) मानी का हासिल यह है कि इस मामले में जो हुक्म दिया गया कि अदी व तमीम की क़समों के बाद माल बरामद होने पर मरने वाले के वारिसों की क़समें ली गई, यह इसलिये कि लोग इस घटना से सबक़ लें और इससे डरते रहे कि झूठी गवाही का अंजाम शर्मिन्दगी और रूस्वाई है. मुदई पर क़सम नहीं, लेकिन यहाँ जब माल पाया गया तो मुदआ अलैहिमा ने दावा किया कि उन्होंने मरने वाले से ख़रीद लिया था. अब उनकी हेसियत मुदई की हो गई और उनके पास इसका कोई सुबूत न था लिहाज़ा उनके ख़िलाफ़ मरने वाले के वारिसों से क़सम ली गई.

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