सूरए माइदा – ग्यारहवाँ रूकू

सूरए माइदा – ग्यारहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
लअनत किये गए वो जिन्होंने कुफ़्र किया बनी इस्राईल में दाऊद और ईसा मरयम के बेटे की ज़बान पर  (1)
ये (2)
बदला उनकी नाफ़रमानी और सरकशी का (78) जो बुरी बात करते आपस में एक दूसरे को न रोकते ज़रूर बहुत ही बुरे काम करते थे (3)(79)
उनमें तुम बहुतों को देखोगे कि काफ़िरों से दोस्ती करते हैं क्या ही बुरी चीज़ अपने लिये ख़ुद आगे भेजी यह कि अल्लाह का उनपर ग़ज़ब (प्रकोप) हुआ और वो अज़ाब में हमेशा रहेंगे (4) (80)
और अगर वो ईमान लाते  (5)
अल्लाह और नबी पर और उसपर जो उनकी तरफ़ उतरा तो काफ़िरों से दोस्ती न करते  (6)
मगर उनमें तो बहुतेरे फ़ासिक़ (दुराचारी) हैं (81)
ज़रूर तुम मुसलमानों का सबसे बढ़कर दुश्मन यहूदियों और मुश्रिकों को पाओगे और ज़रूर तुम मुसलमानों की दोस्ती में सबसे ज़्यादा क़रीब उनको पाओगे  जो कहते थे हम नसारा (ईसाई) हैं (7)
यह इसलिये कि उनमें आलिम और दर्वेश (महात्मा) हैं और ये घमण्ड नहीं करते (8) (82)

सातवाँ पारा – व इज़ासमिऊ
(सुरए माइदा जारी )

और जब सुनते हैं वह जो रसूल की तरफ़ उतरा (9)
उनकी आँखें देखो कि आँसुओं से उबल रही हैं (10)
इसलिये कि वो हक़ को पहचान गए कहते हैं ऐ हमारे रब हम ईमान लाए (11)
तो हमें हक़ के गवाहों मे लिख ले (12) (83)
और हमें क्या हुआ कि हम ईमान न लाएं अल्लाह पर और उस हक़ पर कि हमारे पास आया और हम तमा (लालच) करते हैं कि हमें हमारा रब नेक लोगों के साथ दाख़िल करे (13) (84)
तो अल्लाह ने उनके इस कहने के बदले उन्हें बाग़ दिये जिनके नीचे नहरें बहें हमेशा उनमें रहेंगे यह बदला है नेकों का (14) (85)
और वो जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाई वो हैं दोज़ख़ वाले (83)
 
तफसीर
सूरए माइदा – ग्यारहवाँ रूकू

(1)  ईला के रहने वालों ने जब सीमा का उल्लंघन किया और सनीचर के दिन शिकार न करने का जो हुक्म था, उसकी अवहेलना की तो हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने उनपर लअनत की और उनके हक़ में बददुआ फ़रमाई तो वो बन्दरों और सुअरों की सूरत में कर दिये गए, और मायदा वालों ने जब आसमान से उतरी नेमतें खाने के बाद कुफ़्र किया तो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उनके हक़ में बददुआ की तो वो सुअर और बन्दर हो गए और उनकी संख्या पांच हज़ार थी. (जुमल वग़ैरह) कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि यहूदी अपने पूर्वजों पर गर्व किया करते थे और कहते थे हम नबियों की औलाद हैं, इस आयत में उन्हें बताया गया कि इन नबियों ने उनपर लअनत की है, एक क़ौल यह है कि हज़रत दाऊद और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने सैयदे आलम मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी की ख़ुशख़बरी दी और हुज़ूर पर ईमान न लाने और कुफ़्र करने वालों पर लअनत की.

(2) लअनत.

(3) आयत से साबित हुआ कि बुराई से लोगो को रोकना वाजिब है,  और बुराई को मना करने से रूका रहना सख़्त गुनाह है. तिरमिज़ी की हदीस में है कि जब बनी इस्राईल गुनाहों में गिरफ्तार हुए तो उनके उलमा ने पहले तो उन्हें मना किया, जब वो न माने तो फिर वो उलमा भी उनसे मिल गए और खाने पीने उठने बैठने में उनके साथ शामिल हो गए. उनके इस गुनाह और ज़िद का यह नतीजा हुआ कि अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की ज़बान से उनपर लअनत उतारी.

(4) इस आयत से साबित हुआ कि क़ाफ़िरों से दोस्ती और उनके साथ रिश्तेदारी हराम और अल्लाह तआला के गज़ब का कारण है.

(5) सच्चाई और महब्बत के साथ, बग़ैर दोग़ली प्रवृति के.

(6) इससे साबित हुआ कि मुश्रिकों के साथ दोस्ती और सहयोग दोग़ली प्रवृति की निशानी है.

(7) इस आयत में उनकी प्रशंसा है जो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के दीन पर रहे और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत मालूम होने पर हुज़ूर पर ईमान ले आए, इस्लाम की शुरूआत में जब क़ुरैश के काफ़िरों ने मुसलमानों को बहुत तकलीफ़ दीं तो सहाबए किराम में से ग्यारह मर्द और चार औरतों ने हुज़ूर के हुक्म से हबशा की तरफ़ हिज़रत की. इन मुहाजिरों के नाम ये है : हज़रत उस्मान और उनकी ज़ौजए ताहिरा हज़रत रूक़ैया दुख़्तरे रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हज़रत जुबैर, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद, हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़, हज़रत अबू हुज़ैफ़ा और बीवी हज़रत सहला बिन्ते सुहैल और हज़रत मुसअब बिन उमैर, हज़रत अबू सलमा और उनकी बीवी हज़रत उम्मे सलमा बिन्ते उमैया, हज़रत उस्मान बिन मतऊन, हज़रत आमिर बिन रबीआ और उनकी बीवी हज़रत लैला बिन्ते अबी ख़सीमा, हज़रत हातिब बिन अम्र,  हज़रत सुहैल बिन बैदा रदियल्लाहो अन्हुम. ये हज़रात नबुव्वत के पांचवे साल रजब मास में दरिया का सफ़र करके हबशा पहुंचे. इस हिजरत को हिजरते ऊला कहते हैं. उनके बाद हज़रत जअफ़र बिन अबी तालिब गए और फिर मुसलमान रवाना होते रहे यहाँ तक कि बच्चो और औरतों के अलावा मुहाजिरों की तादाद बयासी मर्दों तक पहुंच गई. जब क़रैश को इस हिजरत के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने एक जमाअत तोहफ़े वग़ैरह लेकर नजाशी बादशाह के पास भेजी. उन लोगों ने शाही दरबार में जाकर बादशाह से कहा कि हमारे मुल्क में एक शख़्स ने नबुव्वत का दावा किया है और लोगों को नादान बना डाला है. उनकी जमाअत जो आपके मुल्क में आई है वह यहाँ फ़साद फैलाएगी और आपकी रिआया को बाग़ी बनाएगी. हम आपको ख़बर देने के लिये आए है और हमारी क़ौम दरख़्वास्त करती है कि आप उन्हें हमारे हवाले कीजिये. नजाशी बादशाह ने कहा, हम उन लोगो से बात करलें. यह कहकर मुसलमानों को तलब किया और उनसे पूछा कि तुम हज़रत ईसा और उनकी वालिदा के हक़ में क्या अक़ीदा रखते हो. हज़रत जअफ़र बिन अबी तालिब ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा अल्लाह के बंदे और उसके रसूल और कलिमतुल्लाह और रूहुल्लाह है और हज़रत मरयम कुंवारी पाक हैं. यह सुनकर नजाशी ने ज़मीन से एक लकड़ी का टुकड़ा उठाकर कहा, खुदा की क़सम तुम्हारे आक़ा ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के कलाम में इतना भी नहीं बढ़ाया जितनी यह लकड़ी, यानी हुज़ूर का इरशाद हज़रत ईसा के कलाम के बिलकुल अनुकूल है. यह देखकर मक्के के मुश्रिकों के चेहरे उतर गए. फिर नजाशी ने क़ुरआन शरीफ़ सुनने की ख़्वाहिश की, हज़रत जअफ़र ने सूरए मरयम तिलावत की. उस वक़्त दरबार में ईसाई आलिम और दर्वेश मौजूद थे. कुरआन करीम सुनकर बे इख़्तियार रोने लगे नजाशी ने मुसलमानों से कहा तुम्हारे लिये मेरी सल्तनत में कोई ख़तरा नहीं. मक्के के मुश्रिक नाकाम फिरे और मुसलमान नजाशी के पास बहुत इज़्ज़त और आसायश के साथ रहे और अल्लाह के फ़ज़्ल से नजाशी को ईमान की दौलत हासिल हुई. इस घटना के बारे में यह आयत उतरी.

(8) इससे साबित हुआ कि इल्म हासिल करना और अहंकार और घमण्ड छोड़ देना बहुत काम आने वाली चीज़ें हैं और इनकी बदौलत हिदायत नसीब होती है.

(9) यानी क़ुरआन शरीफ़.

(10) यह उनके दिल की रिक़्क़त का बयान है कि क़ुरआने करीम के दिल पर असर करने वाली बातें सुनकर रो पड़ते हैं. चुनांचे नजाशी बादशाह की दरख़्वास्त पर हज़रत जअफ़र ने उसके दरबार में सूरए मरयम और सूरए तॉहा की आयतें पढ़ कर सुनाई तो नजाशी बादशाह और उसके दरबारी जिनमें उसकी क़ौम के उलमा मौजूद थे सब फूटफूट कर रोने लगे. इसी तरह नजाशी की क़ौम के सत्तर आदमी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए थे, हुज़ूर से सूरए यासीन सुन कर बहुत रोए.

(11) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर और हमने उनके सच्चे होने की गवाही दी.

(12) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत में दाख़िल कर जो क़यामत के दिन सारी उम्मतों के गवाह होंगे. (ये उन्हें इंजील से मालूम हो चुका था)

(13) जब हबशा का प्रतिनिधि मण्डल इस्लाम अपनाकर वापस हुआ तो यहूदियों ने उसपर मलामत की, उसके जवाब में उन्होंने यह कहा कि सच्चाई साफ़ हो गई तो हम क्यों ईमान न लाते यानी ऐसी हालत में ईमान न लाना मलामत की बात है, न कि ईमान लाना क्योंकि यह दोनो जगत में भलाई का कारण है.

(14) जो सच्चाई और दिल की गहराई के साथ ईमान लाएं और सच्चाई का इक़रार करें.

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