सूरए माइदा – नवाँ रूकू

सूरए माइदा –  नवाँ  रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ ईमान वालो जिन्होंने तुम्हारे दीन को हंसी खेल बना लिया है (1)
वो जो तुमसे पहले किताब दिये गए और काफ़िर (2)
उनमें किसी को अपना दोस्त न बनाओ और अल्लाह से डरते रहो अगर ईमान रखते हो (3)
(57) और जब तुम नमाज़ के लिये अज़ान दो तो उसे हंसी खेल बनाते हैं (4)
यह इसलिये कि वो निरे बे अक़्ल लोग हैं (5)(58)
तुम फ़रमाओ ऐ किताबियों तुम्हें हमारा क्या बुरा लगा यही न कि हम ईमान लाए अल्लाह पर और उसपर जो हमारी तरफ़ उतरा और उसपर जो पहले उतरा  (6)
और यह कि तुम में अक्सर बेहुक्म हैं  (59) तुम फ़रमाओ क्या मैं बतादूं जो अल्लाह के यहाँ इससे बदतर दर्जे में हैं (7)
वो जिनपर अल्लाह ने लअनत की और उन पर ग़ज़ब फ़रमाया और उनमें से कर दिया बन्दर और सुअर (8)
और शैतान के पुजारी उनका ठिकाना ज़्यादा बुरा है (9)
और ये सीधी राह से ज़्यादा बहके (60) और जब तुम्हारे पास आए (10)
तो कहते हैं कि हम मुसलमान हैं और वो आते वक़्त भी काफ़िर थे और जाते वक़्त भी काफ़िर और अल्लाह ख़ूब जानता है जो छुपा रहे हैं (61) और उन (11)
में तुम बहुतों को देखोगे कि गुनाह और ज़ियादती और हरामख़ोरी पर दौड़ते हैं (12)
बेशक बहुत ही बुरे काम करते हैं (62)  इन्हें क्यों नहीं मना करते उनके पादरी, और दर्वेश गुनाह की बात कहने और हराम खाने से बेशक बहुत ही बुरे काम कर रहे हैं (13)(63)
और यहूदी बोले अल्लाह का हाथ बंधा हुआ है  (14)
उनके हाथ बांधे जाएं (15)
और उनपर इस कहने से लअनत है बल्कि उसके हाथ कुशादा हैं (16)
अता फ़रमाता है जैसे चाहे (17)
और ऐ मेहबूब ये (18)
जो तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा उससे उनमें बहुतों को शरारत और कुछ कुफ्र में तरक़्क़ी होगी (19)
और बैर डाल दिया (20)
जब कभी लड़ाई की आग भड़काते हैं अल्लाह उसे बुझा देता है (21)
और ज़मीन में फ़साद के लिये दौड़ते फिरते हैं और अल्लाह फ़सादियों को नहीं चाहता  (64) और अगर किताब वाले ईमान लाते और परहेज़गारी करते तो ज़रूर हम उनके गुनाह उतार देते और ज़रूर उन्हें चैन के बाग़ों में ले जाते  (65) और अगर वो क़ायम रखते तौरात और इंजील  (22)
और जो कुछ उनकी तरफ़ उनके रब की तरफ़ से उतरा  (23)
तो उन्हें रिज़्क मिलता है ऊपर से और उनके पांव के नीचे से (24)
उनमें कोई गिरोह  (दल) अगर एतिदाल (संतुलन) पर है (25) और उनमें अक्सर बहुत ही बुरे काम कर रहे हैं (26)(66)

तफसीर
सूरए माइदा –  नवाँ  रूकू

(1) रफ़ाआ बिन ज़ैद और सवीद बिन हारिस दोनों इस्लाम ज़ाहिर करने के बाद मुनाफ़िक़ हो गए. कुछ मुसलमान उनसे महब्बत रखते थे. अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और बताया कि ज़बान से इस्लाम ज़ाहिर करना और दिल में कुफ़्र छुपाए रखना, दीन को हंसी खेल बनाना है.

(2) यानी मूर्तिपूजक मुश्रिक जो किताब वालों से भी बुरे हैं. (ख़ाज़िन)

(3) क्योंकि ख़ुदा के दुश्मनों के साथ दोस्ती करना ईमान वाले का काम नहीं.

(4) कलबी का क़ौल है कि जब रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का मुअज़्ज़िन नमाज़ के लिये अज़ान कहता और मुसलमान उठते तो यहूदी हंसते और ठठ्ठा करते. इस पर यह आयत उतरी. सदी का कहना है कि मदीनए तैय्यिबह में जब मुअज़्ज़िन अज़ान में “अशहदो अन ला इलाहा इल्लल्लाह” और “अशहदो अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह” कहता तो एक यहूदी यह कहा करता कि जल जाए झुटा. एक रात उसका ख़ादिम आग लाया, वह और उसके घर के लोग सो रहे थे. आग से एक चिंगारी उड़ी और वह यहूदी और उसके घर के लोग और सारा घर जल गया.

(5) जो ऐसी बुरी और जिहालत की बातें करते हैं. इस आयत से मालूम हुआ कि अज़ान क़ुरआनी आयत से भी साबित हैं.

(6) यहूदियों की एक जमाअत ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दरियाफ़्त किया कि आप नबियों में से किस को मानते हैं, इस सवाल से उनका मतलब यह था कि आप हज़रत ईसा को न मानें तो वो आप पर ईमान ले आएं. लेकिन हुज़ूर ने इसके जवाब में फ़रमाया कि मैं अल्लाह पर ईमान रखता हूँ और जो उसने हम पर उतारा और जो हज़रत इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़ व याक़ूब और उनकी औलाद पर उतारा और जो हज़रत मूसा व ईसा को दिया गया यानी तौरात और इंजील और जो और नबियों को उनके रब की तरफ़ से दिया गया, सब को मानता हूँ. हम नबियों में फ़र्क़ नहीं करते कि किसी को मानें और किसी को न मानें. जब उन्हें मालूम हुआ कि आप हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत को भी मानते हैं तो वो आपकी नबुव्वत का इन्कार कर बैठे और कहने लगे जो ईसा को माने, हम उस पर ईमान न लाएंगे. इस पर यह आयत उतरी.

(7) कि इस सच्चे दीन वालों को तो तुम सिर्फ़ अपनी दुश्मनी ही से बुरा कहते हो और तुमपर अल्लाह तआला ने लअनत की है और ग़ज़ब फ़रमाया और आयत में जो बयान है, वह तुम्हारा हाल हुआ तो बदतर दर्जे में तो तुम ख़ुद हो, कुछ दिल में सोचो.

(8) सूरतें बिगाड़ के.

(9) और वह जहन्नम है.

(10) यह आयत यहूदियों की एक जमाअत के बारे में उतरी जिन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपने ईमान और महब्बत का इज़हार किया और कुफ़्र और गुमराही छुपाई. अल्लाह तआला ने यह आयत उतार कर अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उनके हाल की ख़बर दी.

(11) यानी यहूदी.

(12) गुनाह हर बुराई और नाफ़रमानी को शामिल है. कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि गुनाह से तौरात के मज़मून का छुपाना और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की जो विशेषताएं और गुण हैं उनको छुपाना और ज़ियादती से तौरात के अन्दर अपनी तरफ़ से कुछ बढ़ा देना और हरामख़ोरी से रिशवतें वग़ैरह मुराद हैं.  (ख़ाज़िन)
(13) कि लोगों को गुनाहों और बुरे कामों से नहीं रोकते. इससे मालूम हुआ कि उलमा पर नसीहत और बुराई से रोकना वाजिब है, और जो शख़्स बुरी बात से मना करने को छोड़े, और बुराई के इन्कार से रूका रहे, वह गुनाह करने वाले जैसा है.

(14) यानी मआज़ल्लाह वह बख़ील यानी कंजूस है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि यहूदी बहुत ख़ुशहाल और काफ़ी मालदार थे. जब उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाया और विरोध किया तो उनकी रोज़ी कम हो गई. उस वक़्त एक यहूदी ने कहा कि अल्लाह का हाथ बंधा है, यानी मआज़ल्लाह वह रिज़्क़ देने और ख़र्ज करने में कंजूसी करता है. उनके इस कहने पर किसी यहूदी ने मना न किया बल्कि राज़ी रहे, इसीलिये यह सबका कहा हुआ क़रार दिया गया और यह आयत उनके बारे में उतरी.

(15) तंगी और दादो-दहिश से. इस इरशाद का यह असर हुआ कि यहूदी दुनिया में सबसे ज़्यादा कंजूस हो गए या ये मानी हैं कि उनके हाथ जहन्नम में बांधे जाएं और इस तरह उन्हें दोज़ख़ की आग में डाला जाए, उनकी इस बेहूदा बात और गुस्ताख़ी की सज़ा में.

(16) वह सख़ावत वाला और करम वाला है.
(17) अपनी हिकमत के अनुसार, इसमें किसी को ऐतिराज़ की मजाल नहीं.

(18) क़ुरआन शरीफ़.

(19) यानी जितना क़ुरआने पाक उतरता जाएगा उतना हसद और दुश्मनी बढ़ती जाएगी और वो उसके साथ कुफ़्र और सरकशी में बढ़ते रहेंगे.

(20) वो हमेशा आपस में अलग अलग रहेंगे और उनके दिल कभी न मिलेंगे.

(21) और उनकी मदद नहीं फ़रमाता, वह ज़लील होता है.

(22) इस तरह कि नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाते और आपकी फ़रमाँबरदारी करते कि तौरात व इंजील में इसका हुक्म दिया गया है.

(23) यानी तमाम किताबें जो अल्लाह तआला ने अपने रसूलों पर उतारीं, सबमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का ज़िक्र और आप पर ईमान लाने का हुक्म है.

(24) यानी रिज़्क़ की बहुतात होती और हर तरफ़ से पहुंचता. इस आयत से मालूम हुआ कि दीन की पाबन्दी और अल्लाह तआला की फ़रमाँबरदारी से रिज़्क़ में विस्तार होता है.

(25) हद से आगे नहीं जाता, ये यहूदियों में से वो लोग हैं जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाए.

(26) जो कुफ़्र पर जमे हुए है.

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सूरए माइदा – दसवाँ रूकू

सूरए माइदा – दसवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ रसूल पहुंचादो जो कुछ उतरा तुम्हें तुम्हारे रब की तरफ़ से (1)
और ऐसा न हो तो तुम ने उसका पयाम (संदेश) न पहुंचाया और अल्लाह तुम्हारी निगहबानी करेगा लोगों से (2)
बेशक अल्लाह काफ़िरों को राह नहीं देता (67) तुम फ़रमादो ऐ किताब वालों तुम कुछ भी नहीं हो (3)
जब तक न क़ायम करो तौरात और इंजिल और जो कुछ तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा (4)
और बेशक ऐ मेहबूब वह जो तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा उस से उनमें बहुतों को शरारत और कुफ़्र की ओर तरक़्की होगी (5)
तो तुम काफ़िरों को कुछ ग़म न खाओ (68) बेशक वो जो अपने आपको मुसलमान कहते हैं (6)
और इस तरह यहूदी और सितारों को पूजने वाले और ईसाई, इनमें जो कोई सच्चे दिल से अल्लाह और क़यामत पर ईमान लाए और अच्छे काम करे तो उनपर न कुछ डर है और न कुछ ग़म (69) बेशक हमने बनी इस्राईल से एहद लिया(7)
और उनकी तरफ़ रसूल भेजे जब कभी उनके पास कोई रसूल वह बात लेकर आया जो उनके नफ़्स की ख़्वाहिश न थी (8)
एक दल को झुटलाया और एक दल को शहीद करते हैं (9)(70)
और इस ग़ुमान में हैं कि कोई सज़ा न होगी (10)
तो अंधे और बेहरे हो गए (11)
फिर अल्लाह ने उनकी तौबह क़ुबूल की (12)
फिर उनमें बहुतेरे अंधे और बेहरे हो गए और अल्लाह उनके काम देख रहा है(71) बेशक काफ़िर हैं वो जो कहते हैं कि अल्लाह वही मसीह मरयम का बेटा है (13)
और मसीह ने तो यह कहा था कि ऐ बनी इस्राईल अल्लाह की बन्दगी करो जो मेरा रब (14)
है और तुम्हारा रब बेशक जो अल्लाह का शरीक ठहराए तो अल्लाह ने उसपर जन्नत हराम करदी और उसका ठिकाना दोज़ख़ है.और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं  (72) बेशक काफ़िर हैं वो जो कहते हैं अल्लाह तीन ख़ुदाओ में का तीसरा हैं (15)
और ख़ुदा तो नहीं मगर एक ख़ुदा (16)
और अगर अपनी बात से बाज़ न आए  (17)
तो जो उनमें काफ़िर मरेंगे उनको ज़रूर दर्दनाक अज़ाब पहुंचेगा  (73) तो क्यों नहीं रूजू करते अल्लाह की तरफ़ और उससे बख़्शिश मांगते और अल्लाह बख़्श्ने वाला मेहरबान (74) मसीह मरयम का बेटा नहीं मगर एक रसूल  (18)
उससे पहले बहुत रसूल हो गुज़रे  (19)
और उसकी माँ सिद्दीक़ा (सच्ची) है (20)
दोनो खाना खाते थे (21)
देखो तो हम कैसी साफ़ निशानियां इनके लिये बयान करते हैं फिर देखो वो कैसे औंध जाते हैं  (75)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह के सिवा ऐसे को पूजते हो जो तुम्हारे नुक़सान का मालिक न नफ़ा का (22)
और अल्लाह ही सुनता जानता है  (76) तुम फ़रमाओ ऐ किताब वालो अपने दीन में नाहक़ ज़ियादती न करो  (23)
और ऐसे लोगों की ख़्वाहिश पर न चलो (24)
जो पहले गुमराह हो चुके और बहुतो को गुमराह किया और सीधी राह से बहक गए (77)

तफसीर
सूरए माइदा –  चौथा रूकू

(1) और कुछ अन्देशा न करो.

(2) यानी काफ़िरों से जो आपके क़त्ल का इरादा रखते हैं. सफ़रों में रात को हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का पहरा दिया जाता था, जब यह आयत उतरी, पहरा हटा दिया गया और हुज़ूर ने पहरेदारों से फ़रमाया कि तुम लोग चले जाओ. अल्लाह तआला ने मेरी हिफ़ाज़त फ़रमाई.

(3) किसी दीन व मिल्लत में नहीं.

(4) यानी क़ुरआने पाक इन किताबों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात और आप पर ईमान लाने का हुक्म है, जब तक हुज़ूर पर ईमान न लाएं. तौरात व इन्जील के अनुकरण का दावा सही नहीं हो सकता.

(5) क्योंकि जितना क़ुरआने पाक उतरता जाएगा, ये मक्कार दुश्मनी से इसके इन्कार में और सख़्ती करते जाएंगे.

(6) और दिल में ईमान नहीं रखते, मुनाफ़िक़ है.

(7) तौरात में, कि अल्लाह तआला और उसके रसूलों पर ईमान लाएं और अल्लाह के हुक्म के मुताबिक अमल करें.

(8) और उन्होंने नबियों के आदेशों को अपनी इच्छाओं के ख़िलाफ़ पाया तो उनमें से.

(9) नबियों को झुटलाने में तो यहूदी और ईसाई सब शरीक हैं मगर क़त्ल करना, यह ख़ास यहूदियों का काम है. उन्होंने बहुत से नबियों को शहीद किया जिनमें से हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया अलैहुमस्सलाम भी है.

(10) और ऐसे सख़्त जुर्मों पर भी अज़ाब न किया जाएगा.

(11) सच्चाई को देखने और सुनने से, यह उनकी असीम अज्ञानता और अत्यन्त कुफ़्र और सत्य क़ुबूल करने से बिल्कुल ही मुँह फेर लेने का बयान है.

(12) जब उन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद तौबह की उसके बाद दोबारा.

(13) ईसाइयों के कई सम्प्रदाय हैं उनमें से याक़ूबिया और मल्कानिया का यह कहना था कि मरयम ने मअबूद जना और यह भी कहते थे कि मअबूद ने ईसा की ज़ात में प्रवेश किया और वह उनके साथ एक हो गया तो ईसा मअबूद हो गए.
(14) और मैं उसका बन्दा हूँ, मअबूद नहीं.

(15) यह क़ौल ईसाइयों के सम्प्रदाय मरक़सिया व नस्तूरिया का है. अकसर मुफ़िस्सरों का क़ौल है कि इससे उनकी मुराद यह थी कि अल्लाह और मरयम और ईसा तीनों इलाह हैं और इलाह होना इन सब में मुश्तरक है. मुतकल्लिमीन फ़रमाते हैं कि ईसाई कहते हैं कि बाप, बेटा, रूहुलक़ुदुस, ये तीनों एक इलाह हैं.

(16) न उसका कोई सानी न सालिस. वह वहदानियत के साथ मौसूफ़ है, उसका कोई शरीक नहीं. बाप, बेटे, बीबी, सबसे पाक.

(17) और त्रिमूर्ति के मानने वाले रहे, तौहीद इख़्तियार न की.

(18) उनको मअबूद मानना ग़लत, बातिल और कुफ़्र है.

(19) वो भी चमत्कार रखते थे. ये चमत्कार उनके सच्चे नबी होने की दलील थे. इसी तरह हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम भी रसूल हैं, उनके चमत्कार भी उनकी नबुव्वत के प्रमाण हैं, उन्हें रसूल ही मानना चाहिये, जैसे  और नबियों को चमत्कार पर ख़ुदा नहीं मानते, उनको भी ख़ुदा न मानो.

(20) जो अपने रब के कलिमात और उसकी किताबों की तस्दीक़ करने वाली हैं.

(21) इसमें ईसाइयों का रद है कि इलाह यानी मअबूद ग़िज़ा का मोहताज़ नहीं हो सकता, तो जो ग़िज़ा खाए, जिस्म रखे, उस जिस्म में तबदील हो, ग़िज़ा उसका बदल बने, वह कैसे मअबूद हो सकता है.

(22) यह शिर्क के बातिल होने की एक और दलील है इसका ख़ुलासा यह है कि मअबूद (जिसकी पूजा की जा सके) वही हो सकता है जो नफ़ा नुक़सान वग़ैरह हर चीज़ पर ज़ाती क़ुदरत और इख़्तियार रखता हो. जो ऐसा न हो, वह इलाह यानी पूजनीय नहीं हो सकता और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम नफ़ा नुक़सान के अपनी ज़ात से मालिक न थे, अल्लाह तआला के मालिक करने से मालिक हुए, तो उनकी निस्बत अल्लाह होने का अक़ीदा बातिल है. (तफ़सीरे अबूसउद)

(23) यहूदियों की ज़ियादती तो यह है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत ही नहीं मानते और ईसाइयों की ज़ियादती यह कि उन्हें मअबूद ठहराते हैं.

(24) यानी अपने अधर्मी बाप दादा वग़ैरह की.

सूरए माइदा – ग्यारहवाँ रूकू

सूरए माइदा – ग्यारहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
लअनत किये गए वो जिन्होंने कुफ़्र किया बनी इस्राईल में दाऊद और ईसा मरयम के बेटे की ज़बान पर  (1)
ये (2)
बदला उनकी नाफ़रमानी और सरकशी का (78) जो बुरी बात करते आपस में एक दूसरे को न रोकते ज़रूर बहुत ही बुरे काम करते थे (3)(79)
उनमें तुम बहुतों को देखोगे कि काफ़िरों से दोस्ती करते हैं क्या ही बुरी चीज़ अपने लिये ख़ुद आगे भेजी यह कि अल्लाह का उनपर ग़ज़ब (प्रकोप) हुआ और वो अज़ाब में हमेशा रहेंगे (4) (80)
और अगर वो ईमान लाते  (5)
अल्लाह और नबी पर और उसपर जो उनकी तरफ़ उतरा तो काफ़िरों से दोस्ती न करते  (6)
मगर उनमें तो बहुतेरे फ़ासिक़ (दुराचारी) हैं (81)
ज़रूर तुम मुसलमानों का सबसे बढ़कर दुश्मन यहूदियों और मुश्रिकों को पाओगे और ज़रूर तुम मुसलमानों की दोस्ती में सबसे ज़्यादा क़रीब उनको पाओगे  जो कहते थे हम नसारा (ईसाई) हैं (7)
यह इसलिये कि उनमें आलिम और दर्वेश (महात्मा) हैं और ये घमण्ड नहीं करते (8) (82)

सातवाँ पारा – व इज़ासमिऊ
(सुरए माइदा जारी )

और जब सुनते हैं वह जो रसूल की तरफ़ उतरा (9)
उनकी आँखें देखो कि आँसुओं से उबल रही हैं (10)
इसलिये कि वो हक़ को पहचान गए कहते हैं ऐ हमारे रब हम ईमान लाए (11)
तो हमें हक़ के गवाहों मे लिख ले (12) (83)
और हमें क्या हुआ कि हम ईमान न लाएं अल्लाह पर और उस हक़ पर कि हमारे पास आया और हम तमा (लालच) करते हैं कि हमें हमारा रब नेक लोगों के साथ दाख़िल करे (13) (84)
तो अल्लाह ने उनके इस कहने के बदले उन्हें बाग़ दिये जिनके नीचे नहरें बहें हमेशा उनमें रहेंगे यह बदला है नेकों का (14) (85)
और वो जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाई वो हैं दोज़ख़ वाले (83)
 
तफसीर
सूरए माइदा – ग्यारहवाँ रूकू

(1)  ईला के रहने वालों ने जब सीमा का उल्लंघन किया और सनीचर के दिन शिकार न करने का जो हुक्म था, उसकी अवहेलना की तो हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने उनपर लअनत की और उनके हक़ में बददुआ फ़रमाई तो वो बन्दरों और सुअरों की सूरत में कर दिये गए, और मायदा वालों ने जब आसमान से उतरी नेमतें खाने के बाद कुफ़्र किया तो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उनके हक़ में बददुआ की तो वो सुअर और बन्दर हो गए और उनकी संख्या पांच हज़ार थी. (जुमल वग़ैरह) कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि यहूदी अपने पूर्वजों पर गर्व किया करते थे और कहते थे हम नबियों की औलाद हैं, इस आयत में उन्हें बताया गया कि इन नबियों ने उनपर लअनत की है, एक क़ौल यह है कि हज़रत दाऊद और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने सैयदे आलम मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी की ख़ुशख़बरी दी और हुज़ूर पर ईमान न लाने और कुफ़्र करने वालों पर लअनत की.

(2) लअनत.

(3) आयत से साबित हुआ कि बुराई से लोगो को रोकना वाजिब है,  और बुराई को मना करने से रूका रहना सख़्त गुनाह है. तिरमिज़ी की हदीस में है कि जब बनी इस्राईल गुनाहों में गिरफ्तार हुए तो उनके उलमा ने पहले तो उन्हें मना किया, जब वो न माने तो फिर वो उलमा भी उनसे मिल गए और खाने पीने उठने बैठने में उनके साथ शामिल हो गए. उनके इस गुनाह और ज़िद का यह नतीजा हुआ कि अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की ज़बान से उनपर लअनत उतारी.

(4) इस आयत से साबित हुआ कि क़ाफ़िरों से दोस्ती और उनके साथ रिश्तेदारी हराम और अल्लाह तआला के गज़ब का कारण है.

(5) सच्चाई और महब्बत के साथ, बग़ैर दोग़ली प्रवृति के.

(6) इससे साबित हुआ कि मुश्रिकों के साथ दोस्ती और सहयोग दोग़ली प्रवृति की निशानी है.

(7) इस आयत में उनकी प्रशंसा है जो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के दीन पर रहे और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत मालूम होने पर हुज़ूर पर ईमान ले आए, इस्लाम की शुरूआत में जब क़ुरैश के काफ़िरों ने मुसलमानों को बहुत तकलीफ़ दीं तो सहाबए किराम में से ग्यारह मर्द और चार औरतों ने हुज़ूर के हुक्म से हबशा की तरफ़ हिज़रत की. इन मुहाजिरों के नाम ये है : हज़रत उस्मान और उनकी ज़ौजए ताहिरा हज़रत रूक़ैया दुख़्तरे रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हज़रत जुबैर, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद, हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़, हज़रत अबू हुज़ैफ़ा और बीवी हज़रत सहला बिन्ते सुहैल और हज़रत मुसअब बिन उमैर, हज़रत अबू सलमा और उनकी बीवी हज़रत उम्मे सलमा बिन्ते उमैया, हज़रत उस्मान बिन मतऊन, हज़रत आमिर बिन रबीआ और उनकी बीवी हज़रत लैला बिन्ते अबी ख़सीमा, हज़रत हातिब बिन अम्र,  हज़रत सुहैल बिन बैदा रदियल्लाहो अन्हुम. ये हज़रात नबुव्वत के पांचवे साल रजब मास में दरिया का सफ़र करके हबशा पहुंचे. इस हिजरत को हिजरते ऊला कहते हैं. उनके बाद हज़रत जअफ़र बिन अबी तालिब गए और फिर मुसलमान रवाना होते रहे यहाँ तक कि बच्चो और औरतों के अलावा मुहाजिरों की तादाद बयासी मर्दों तक पहुंच गई. जब क़रैश को इस हिजरत के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने एक जमाअत तोहफ़े वग़ैरह लेकर नजाशी बादशाह के पास भेजी. उन लोगों ने शाही दरबार में जाकर बादशाह से कहा कि हमारे मुल्क में एक शख़्स ने नबुव्वत का दावा किया है और लोगों को नादान बना डाला है. उनकी जमाअत जो आपके मुल्क में आई है वह यहाँ फ़साद फैलाएगी और आपकी रिआया को बाग़ी बनाएगी. हम आपको ख़बर देने के लिये आए है और हमारी क़ौम दरख़्वास्त करती है कि आप उन्हें हमारे हवाले कीजिये. नजाशी बादशाह ने कहा, हम उन लोगो से बात करलें. यह कहकर मुसलमानों को तलब किया और उनसे पूछा कि तुम हज़रत ईसा और उनकी वालिदा के हक़ में क्या अक़ीदा रखते हो. हज़रत जअफ़र बिन अबी तालिब ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा अल्लाह के बंदे और उसके रसूल और कलिमतुल्लाह और रूहुल्लाह है और हज़रत मरयम कुंवारी पाक हैं. यह सुनकर नजाशी ने ज़मीन से एक लकड़ी का टुकड़ा उठाकर कहा, खुदा की क़सम तुम्हारे आक़ा ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के कलाम में इतना भी नहीं बढ़ाया जितनी यह लकड़ी, यानी हुज़ूर का इरशाद हज़रत ईसा के कलाम के बिलकुल अनुकूल है. यह देखकर मक्के के मुश्रिकों के चेहरे उतर गए. फिर नजाशी ने क़ुरआन शरीफ़ सुनने की ख़्वाहिश की, हज़रत जअफ़र ने सूरए मरयम तिलावत की. उस वक़्त दरबार में ईसाई आलिम और दर्वेश मौजूद थे. कुरआन करीम सुनकर बे इख़्तियार रोने लगे नजाशी ने मुसलमानों से कहा तुम्हारे लिये मेरी सल्तनत में कोई ख़तरा नहीं. मक्के के मुश्रिक नाकाम फिरे और मुसलमान नजाशी के पास बहुत इज़्ज़त और आसायश के साथ रहे और अल्लाह के फ़ज़्ल से नजाशी को ईमान की दौलत हासिल हुई. इस घटना के बारे में यह आयत उतरी.

(8) इससे साबित हुआ कि इल्म हासिल करना और अहंकार और घमण्ड छोड़ देना बहुत काम आने वाली चीज़ें हैं और इनकी बदौलत हिदायत नसीब होती है.

(9) यानी क़ुरआन शरीफ़.

(10) यह उनके दिल की रिक़्क़त का बयान है कि क़ुरआने करीम के दिल पर असर करने वाली बातें सुनकर रो पड़ते हैं. चुनांचे नजाशी बादशाह की दरख़्वास्त पर हज़रत जअफ़र ने उसके दरबार में सूरए मरयम और सूरए तॉहा की आयतें पढ़ कर सुनाई तो नजाशी बादशाह और उसके दरबारी जिनमें उसकी क़ौम के उलमा मौजूद थे सब फूटफूट कर रोने लगे. इसी तरह नजाशी की क़ौम के सत्तर आदमी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए थे, हुज़ूर से सूरए यासीन सुन कर बहुत रोए.

(11) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर और हमने उनके सच्चे होने की गवाही दी.

(12) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत में दाख़िल कर जो क़यामत के दिन सारी उम्मतों के गवाह होंगे. (ये उन्हें इंजील से मालूम हो चुका था)

(13) जब हबशा का प्रतिनिधि मण्डल इस्लाम अपनाकर वापस हुआ तो यहूदियों ने उसपर मलामत की, उसके जवाब में उन्होंने यह कहा कि सच्चाई साफ़ हो गई तो हम क्यों ईमान न लाते यानी ऐसी हालत में ईमान न लाना मलामत की बात है, न कि ईमान लाना क्योंकि यह दोनो जगत में भलाई का कारण है.

(14) जो सच्चाई और दिल की गहराई के साथ ईमान लाएं और सच्चाई का इक़रार करें.

सूरए माइदा – बारहवाँ रूकू

सूरए माइदा – बारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ ईमान वालो (1)
हराम न ठहराओ वो सुथरी चीज़ें कि अल्लाह ने तुम्हारे लिये हलाल कीं (2)
और हद से न बढ़ो बेशक हद से बढ़ने वाले अल्लाह को नापसन्द हैं (87) और खाओ जो कुछ तुम्हें अल्लाह ने रोज़ी दी हलाल पाकीज़ा और डरो अल्लाह से जिसपर तुम्हें ईमान है (88) अल्लाह तुम्हें नहीं पकङता तुम्हारी ग़लतफ़हमी की क़समों पर (3)
हाँ उन क़समों पर पकङ फ़रमाता है जिन्हें तुमने मज़बूत किया(4)
तो ऐसी क़सम का बदला दस मिस्कीनों (ग़रीवों) को खाना देना (5)
अपने घर वालों को जो खिलाते है उसके औसत में से (6)
या उन्हें कपङे देना (7)
या एक ग़ुलाम आज़ाद करना तो  जो इन में से कुछ न पाए तो तीन दिन के रोज़े (8)
यह बदला है तुम्हारी क़समों का जब तुम क़सम खाओ (9)
और अपनी क़समों की हिफ़ाज़त करों (10)
इसी तरह अल्लाह तुम से अपनी आयतें बयान फ़रमाता है कि कहीं तुम एहसान मानो (89) ऐ ईमान वालो शराब और जुआ और बुत और पांसे नापाक ही हैं शैतानी काम तो इन से बचते रहना कि तुम भलाई पाओ (90) शैतान यही चाहता है कि तुम में बैर और दुश्मनी डलवा दे. शराब और जुए में और तुम्हें अल्लाह की याद और नमाज़ से रोके (11)
तो क्या तुम बाज़ आए (91) और हुक्म मानो अल्लाह का और हुक्म मानो रसूल का और होशियार रहो फिर अगर तुम फिर जाओ (12)
तो जान लो कि हमारे रसूल का ज़िम्मा सिर्फ़ खुले तौर पर हुक्म पहुंचा देना है (13)(92)
जो ईमान लाए और नेक काम किये उनपर कुछ गुनाह नहीं (14)
जो कुछ उन्होंने चखा जब कि डरें और ईमान रखें और नेकियां करें फिर डरें और ईमान रखें फिर डरें और अल्लाह नेकों को दोस्त रखता है (15)(93)

तफसीर
सूरए माइदा – बारहवाँ रूकू

(1) सहाब की एक जमाअत रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का वअज़ (व्याख्यान) सुनकर एक रोज़ हज़रत उस्मान बिन मतऊन के यहाँ जमा हुई और उन्होंने आपस में दुनिया छोड़ने का एहद किया और इस पर सहमति हुई कि वो टाट पहनेंगे, हमेशा दिन में रोज़ा रखेंगे, रात अल्लाह की इबादत में जाग कर गुज़ारा करेंगे, बिस्तर पर न लेटेंगे, गोश्त और चिकनाई न खाएंगे, औरतों से जुदा रहेंगे, ख़ुश्बू न लगाएंगे, इस पर यह आयत उतरी और उन्हें इस इरादे से रोक दिया गया.

(2) यानी जिस तरह हराम को छोड़ा जाता है उस तरह हलाल चीज़ों को मत छोड़ो और न किसी हलाल चीज़ को बढ़ा चढ़ाकर यह कहो कि हमने इसे अपने ऊपर हराम कर लिया.

 (3)  ग़लत फ़हमी की क़सम यह है कि आदमी किसी घटना को अपने ख़्याल से सही जान कर क़सम खाले और हक़ीक़त में वह ऐसी न हो, ऐसी क़सम पर कफ़्फ़ारा नहीं.

(4) यानी ऐसी क़सम पर जो किसी आयंदा बात पर जान बूझकर खाई जाए. ऐसी क़सम तोड़ना गुनाह भी है और उसपर कफ़्फ़ारा भी लाज़िम है.

(5) दोनो वक़्त का, चाहे उन्हें खिलाए या पौने दो सेर गेँहू या साढ़े तीन सेर जौ सदकए फ़ित्र की तरह दे दे. यह भी जायज़ है कि एक मिस्कीन को दस दिन दे दे या खिला दिया करे.

(6) यानी न बहुत आला दर्जे का न बिल्कुल कमतर बल्कि औसत.

(7)  औसत दर्जे के जिनसे अक्सर बदन ढक सके. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि एक तहबन्द या कुर्ता या एक तहबन्द और एक चादर हो. कफ़्फ़ारे में इन तीन बातों का इख़्तियार है चाहे खाना दे, चाहे कपड़े, चाहे ग़ुलाम आज़ाद करे, हर एक से कफ़्फ़ारा अदा हो जाएगा.

(8) रोज़े से कफ़्फ़ारा जब ही अदा हो सकता है जबकि खाना कपड़ा देने और ग़ुलाम आज़ाद करने की क़ुदरत न हो. यह भी ज़रूरी है कि ये रोज़े एक पर एक रखे जाएं.

(9) और क़सम खाकर तोड़ दो यानी उसको पूरा न करो. क़सम तोड़ने से पहले कफ़्फ़ारा देना दुरूस्त नहीं.

(10) यानी उन्हें पूरा करो, अगर उसमें शरीअत के लिहाज़ से कोई हर्ज न हो और यह भी हिफ़ाज़त है कि क़सम खाने की आदत तर्क की जाए.

(11) इस आयत में शराब और जुए के नतीजे और वबाल बयान फ़रमाए गए कि शराब पीने और जुआ खेलने का एक वबाल तो यह है कि इससे आपस में दुश्मनी पैदा होती है और जो इन बुराईयों में फंसा हो वह अल्लाह के ज़िक्र और नमाज़ के वक़्तो की पाबन्दी से मेहरूम हो जाता है.

(12) ख़ुदा की फ़रमाँबरदारी और रसूल के अनुकरण से.

(13) यह चेतावती है कि जब रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म ने अल्लाह का हुक्म साफ़ साफ़ पहुंचा दिया तो उनका जो फ़र्ज़ था अदा हो चुका अब जो विराध करे वह अज़ाब का हक़दार है.

(14) यह आयत उन लोगों के बारे में उतरी जो शराब हराम किये जाने से पहले वफ़ात पा चुके थे. शराब हराम होने का हुक्म उतरने के बाद सहाबा को उनकी फ़िक्र हुई कि उनसे इसका हिसाब होगा या न होगा, उनके बारे में यह आयत उतरी और बताया गया कि हराम होने का हुक्म उतरने से पहले जिन ईमानदारों न कुछ खाया पिया वो गुनहगार नहीं.

(15) आयत में शब्द “इत्तक़ू” जिसके मानी डरने और परहेज़ करने के हैं, तीन बार आया है. पहले से शिर्क से डरना और परहेज़ करना, दूसरे से शराब और जुए से बचना और तीसरे से तमाम हराम चीज़ों से परहेज़ करना मुराद है. कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि पहले से शिर्क छोड़ना, दूसरे से गुनाह और हराम काम छोड़ना और तीसरे से शुबहात का छोड़ना मुराद है. कुछ कहते है कि पहले से तमाम हराम चीज़ों से बचना, दूसरे से उसपर क़ायम रहना और तीसरे से वही उतरने के दिनों में या उसके बाद जो चीज़ें मना की जाएं उनको छोड़ देना मुराद है.  (मदारिक, ख़ाज़िन, जुमल वग़ैरह)

सूरए माइदा _ तैरहवाँ रूकू

सूरए माइदा _  तैरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो ज़रूर अल्लाह तुम्हें आज़माएगा ऐसे कुछ शिकार से जिस तक तुम्हारा हाथ और नेज़े (भाले) पहुंचें (1)
कि अल्लाह पहचान करा दे उनकी जो उससे बिन देखे डरते हैं फिर इसके बाद जो हद से वढ़े (2)
उसके लिये दर्दनाक अज़ाब है (94) ऐ ईमान वालो शिकार न मारो जब तुम एहराम में हो (3)
और तुम में से जो उसे जान बूझकर क़त्ल करे (4)
तो उसका बदला यह है कि वैसा ही जानवर मवेशी से दे (5)
तुम में के दो सिक़ह (विश्वस्त) आदमी उसका हुक्म करें (6)
यह क़ुरबानी हो काबा को पहुंचती (7)
या कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) दे कुछ मिस्कीनों का खाना (8)
या उसके बराबर रोज़े कि अपने काम का बवाल चखो अल्लाह ने माफ़ किया जो हो गुज़रा (9)
और जो अब करेगा अल्लाह उससे बदला लेगा और अल्लाह ग़ालिब है बदला लेने वाला (95) हलाल है तुम्हारे लिये दरिया का शिकार और उसका खाना तुम्हारे और मुसाफ़िरों के फ़ायदे को और तुम पर हराम है ख़ुश्की का शिकार (10)
जब तक तुम एहराम में हो और अल्लाह से डरो जिसकी तरफ़ तुम्हें उठना है (96) अल्लाह ने अदब वाले घर काबे को लोगों के क़याम का वाइस (कारण) किया (11)
और हुरमत (इज़्ज़त) वाले महीने (12)
और हरम की क़ुरबानी और गले में अलामत (निशानी) लटकी जानवरों को (13)
यह इसलिये कि तुम यक़ीन करो कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में और यह कि अल्लाह सब कुछ जानता है (97) जान रखो कि अल्लाह का अज़ाब सख़्त है (14)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान (98) रसूल पर नहीं मगर हुक्म पहुंचाना (15)
और अल्लाह जानता है जो तुम ज़ाहिर करते और जो तुम छुपाते हो (16)(99)
तुम फ़रमादो कि गन्दा और सुथरा बराबर नहीं (17)
अगरचे तुम गन्दे की कसरत (बहुतात) भाए तो अल्लाह से डरते रहो ऐ अक़्ल वालो कि तुम फ़लाह (भलाई) पाओ (100)

तफसीर
सूरए माइदा –  तैरहवाँ रूकू

(1) सन छ हिजरी जिसमें हुदैबिया का वाक़िया पेश आया, उस साल मुसलमान एहराम पहने हुए थे. इस हालम में वो इस आज़माइश में डाले गए कि जंगली जानवर और चिड़ियाँ बहुतात से आई और उनकी सवारियों पर छा गई. हाथ से पकड़ना, हथियार से शिकार कर लेना बिल्कुल इख़्तियार में था. अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और इस आज़माइश में वो अल्लाह के फ़ज़्ल से फ़रमाँबरदार साबित हुए और अल्लाह के हुक्म के अनुकरण में डटे रहे.(ख़ाज़िन वग़ैरह)

(2) और मुसीबत के बाद नाफ़रमानी करे.

(3) एहराम पहने हुए आदमी पर शिकार यानी ख़ुश्की के किसी बहशी जानवर को मारना हराम है. जानवर की तरफ़ शिकार करने के लिये इशारा करना या किसी तरह बताना भी शिकार में दाख़िल और मना है. एहराम की हालत में हर वहशी जानवर का शिकार मना है चाहे वह हलाल हो या न हो. काटने वाला कुत्ता और कौआ और बिच्छू  और चील और चूहा और भेड़िया और साँप इन जानवरों को हदीसों में बुरे या मूज़ी जानवर कहा गया और इनके क़त्ल की इजाज़त दी गई, मच्छर, पिस्सू, चींटी,मक्खी और कीड़े और मकोड़े और आक्रमक दरिन्दों को मारना माफ़ है. (तफ़सीरे अहमदी वग़ैरह)

(4) एहराम की हालत में जिन जानवरों का मारना मना है वो हर हाल में मना है चाहे जान बूझकर हो या भूले से. जान बूझकर मारने का हुक्म तो इस आयत से मालूम हुआ और भूले से मारने का हदीस शरीफ़ से साबित है. (मदारिक)

 (5) वैसा ही जानवर देने से मुराद यह है कि क़ीमत में मारे हुए जानवर के बराबर हो. हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा और इमाम अबू यूसुफ़ रहमतुल्लाह अलैहिमा का यही क़ौल है और इमाम मुहम्मद व इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाहे अलैहिमा के नज़दीक बनावट और सूरत में मारे हुए जानवर की तरह होना मुराद है. (मदारिक व तफ़सीरे अहमदी)

(6) यानी क़ीमत का अन्दाज़ा करें और क़ीमत वहाँ की मानी जाएगी जहाँ शिकार मारा गया हो या उसके क़रीब के मक़ाम की.

(7) यानी कफ़्फ़ारे के जानवर का हरम शरीफ़ के बाहर ज़िब्ह करना दुरूस्त नहीं है. मक्कए मुकर्रमा में होना चाहिये और ख़ास काबे में भी ज़िब्ह जायज़ नहीं, इसीलिये काबे को पहुंचती फ़रमाया, काबे के अन्दर न फ़रमाया और कफ़्फ़ारा खाने या रोज़े से अदा किया जाए तो उसके लिये मक्कए मुकर्रमा में होने की क़ैद नहीं, बाहर भी जायज़ है. (तफ़सीरे अहमदी वग़ैरह)

(8) यह भी जायज़ है कि शिकार की क़ीमत का ग़ल्ला ख़रीद कर फ़क़ीरों को इस तरह दे कि हर मिस्कीन को सदक़ए फ़ित्र के बराबर पहुंचे और यह भी जायज़ है कि इस क़ीमत में जितने मिस्कीनों के ऐसे हिस्से होते थे उतरे रोज़े रखे.

(9) यानी इस हुक्म से पहले जो शिकार मारे.

(10) इस आयत में यह मसअला बयान फ़रमाया गया कि एहराम पहने आदमी के लिये दरिया का शिकार हलाल है और ख़ुश्की का हराम. दरिया का शिकार वह है जिसकी पैदाइश दरिया में हो और ख़ुश्की का वह जिसकी पैदाइश ख़ुश्की में हो.

(11) कि वहाँ दीनी और दुनियावी कामों का क़याम होता है. डरा हुआ वहाँ पनाह लेता है. बूढ़ों को वहाँ अम्न मिलता है, व्यापारी वहाँ नफ़ा पाते हैं, हज उमरा करने वाले वहाँ हाज़िर होकर मनासिक (संस्कार) अदा करते हैं.

(12) यानी ज़िल्हज को जिसमें हज किया जाता है.

(13) कि उनमें सवाब ज़्यादा है. उन सब को तुम्हारी भलाइयों के क़याम का कारण बनाया.

(14) तो हरम और एहराम की पाकी का ख़याल रखो. अल्लाह तआला ने अपनी रहमतों का ज़िक्र फ़रमाने के बाद अपनी सिफ़त “शदीदुल इक़ाब” (सख़्त अज़ाब देने वाला) ज़िक्र फ़रमाई ताकि ख़ौफ़ और  रिजा से ईमान की पूर्ति हो. इसके बाद अपनी वुसअत व रहमत का इज़हार फ़रमाया.

(15) तो जब रसूल हुक्म पहुंचाकर फ़ारिग़ हो गए तो तुम पर फ़रमाँबरदारी लाज़िम और हुज्जत क़ायम हो गई और बहाने की गुंजाइश बाक़ी न रही.

 (16) उसको तुम्हारे ज़ाहिर और बातिन, दोग़लेपन और फ़रमाँबरदारी सब की जानकारी है.

(17) यानी हलाल व हराम, अच्छे और बुरे, मुस्लिम और काफ़िर और खरा व खोटा एक दर्जे में नहीं हो सकता.

सूरए माइदा – चौदहवाँ रूकू

सूरए माइदा – चौदहवाँ रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो ऐसी बातें न पूछो जो तुमपर ज़ाहिर की जाएं तो तुम्हें बुरी लगें (1)
और अगर उन्हें उस वक़्त पूछोगे कि क़ुरआन उतर रहा है तो तुमपर ज़ाहिर करदी जाएंगी अल्लाह उन्हें माफ़ कर चुका है (2)
और अल्लाह बख़्शने वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है  (101) तुमसे अगली एक क़ौम ने उन्हें पूछा (3)
फिर उनसे इन्कारी हो बैठे (102) अल्लाह ने मुक़र्रर नहीं किया है काम चरा हुआ और न बिजार और न वसीला और न हामी (4)
हाँ, काफ़िर लोग अल्लाह पर झूठ इफ़तिरा (मिथ्यारोप) बांधते हैं (5)
और उनमें अकसर निरे बेअक़्ल हैं (6) (103)
और जब उनसे कहा जाए आओ उस तरफ़ जो अल्लाह ने उतारा और रसूल की तरफ़ (7)
कहें हमें वह बहुत है जिसपर हमने अपने बाप दादा को पाया, क्या अगरचे उनके बाप दादा न कुछ जानें न राह पर हों (8)(104)
ऐ ईमान वालो तुम अपनी फिक़्र रखो तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेगा जो गुमराह हुआ जब कि तुम राह पर हो (9)
तुम सबकी रूजू (पलटना) अल्लाह ही की तरफ़ है फिर वह तुम्हें बता देगा जो तुम करते थे (105) ऐ ईमान वालो (10)
तुम्हारी आपस की गवाही जब तुममे किसी को मौत आए (11)
वसीयत करते वक़्त तुम में के दो विश्वसनीय शख़्स हैं या ग़ैरों में के दो जब तुम मुल्क में सफ़र को जाओ फिर तुम्हें मौत का हादसा पहुंचे उन दोनों को नमाज़ के बाद रोको (12)
वो अल्लाह की क़सम खाएं अगर तुम्हें कुछ शक पड़े (13)
हम हलफ़ के बदले कुछ माल न खरीदेंगे (14)
अगरचे क़रीब का रिश्तेदार हो और अल्लाह की गवाही ने छुपाएंगे ऐसा करें तो हम ज़रूर गुनाहगारों में हैं (106) फिर अगर पता चले कि वो किसी गुनाह के सज़ावार (हक़दार) हुए (15)
तो उनकी जगह दो और खड़े हों उनमें से कि उस गुनाह यानी झूठी गवाही ने उनका हक़ लेकर उनको नुक़सान पहुंचाया (16)
जो मैयत से ज़्यादा क़रीब हों अल्लाह की क़सम खाए कि हमारी गवाही ज्यादा ठीक है उन दो की गवाही से और हम हद से न बढ़े (17)
ऐसा हो तो हम ज़ालिमों में हों (107) यह क़रीबतर है उससे कि गवाही जैसी चाहिये अदा करें या डरें कि कुछ क़समें रद करदी जाएं उनकी क़समों के बाद (18)
और अल्लाह से डरो और हुक्म सुनो और अल्लाह बेहुक्मों को राह नहीं देता (108)

तफसीर
सूरए माइदा –  चौदहवाँ रूकू

(1) कुछ लोग सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बहुत से बेफ़ायदा सवाल किया करते थे. यह सरकार के मिज़ाज पर बोझ होता था. एक दिन फ़रमाया कि जो जो पूछना हो पूछ लो. मैं हर बात का जवाब दूंगा. एक शख़्स ने पूछा कि मेरा अंजाम क्या है. फ़रमाया जहन्नम. दूसरे ने पूछा कि मेरा बाप कौन है, आपने उसके असली बाप का नाम बता दिया जिसके नुत्फ़े से वह था जबकि उसकी माँ का शौहर और था जिसका यह शख़्स बेटा कहलाता था. इसपर यह आयत उतरी. और फ़रमाया गया कि ऐसी बाते न पूछो जो ज़ाहिर की जाएं तो तुम्हें नागवार गुज़रें. (तफ़सीरे अहमदी) बुखारी व मुस्लिम की हदीस शरीफ़ में है कि एक रोज़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने खुत्बा देते हुए फ़रमाया कि जिसको जो पूछना हो पूछ ले. अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफ़ा सहमी ने खड़े होकर पूछा कि मेरा बाप कौन है. फ़रमाया हुज़ाफ़ा. फिर फ़रमाया और पूछो हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने उठकर ईमान और रिसालत के इक़रार के साथ माज़िरत पेश की. इब्ने शहाब की रिवायत है कि अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफ़ा की माँ ने उनसे शिकायत की और कहा कि तू बहुत नालायक बेटा है, तुझे क्या मालूम कि ज़िहालत के ज़माने की औरतों का क्या हाल था. अल्लाह न करे तेरी माँ से कोई क़ुसूर हुआ होता तो आज वह कैसी रूस्वा होती, इसपर अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफ़ा ने कहा कि अगर हुज़ूर किसी हबशी ग़ुलाम को मेरा बाप बता देते तो मैं यक़ीन के साथ मान लेता. बुखारी शरीफ़ की हदीस में है कि लोग ठट्ठा बनाने के अन्दाज़ में इस क़िस्म के सवाल किया करते थे, कोई कहता मेरा बाप कौन है, कोई पूछता मेरी ऊंटनी गुम हो गई है वह कहाँ है. इस पर यह आयत उतरी. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़ुत्बे में हज फ़र्ज़ होने का बयान फ़रमाया. इसपर एक शख़्स ने कहा क्या हर साल हज फ़र्ज़ है. हुज़ूर ने ख़ामोशी रखी. सवाल करने वाले ने सवाल दोहराया तो इरशाद फ़रमाया कि जो मैं बयान न करूं उसपर मत अड़ो. अगर मैं हाँ कह देता तो हर साल हज फर्ज़ हो जाता और तुम न कर सकते. इससे मालूम हुआ कि अहकाम हुज़ूर के इरशाद के तहत है, जो फ़र्ज़ फ़रमा दे वह फ़र्ज़ हो जाए, न फ़रमाएं, न हो.

(2)  इस आयत से साबित हुआ कि जिस काम की शरीअत में मना न आए वह किया जा सकता है. हज़रत सलमान रदियल्लाहो अन्हो की हदीस में है कि हलाल वह है जो अल्लाह ने अपनी किताब में हलाल फ़रमाया, हराम वह है जिसको उसने अपनी किताब में हराम फ़रमाया और जिसके बारे में कुछ न फ़रमाया वह माफ़ है तो तकलीफ़ में न पड़ो. (ख़ाजिन)

(3)  अपने नबियों से और बे ज़रूरत सवाल किये. नबियों ने अहकाम बयान फ़रमाए तो उनपर अमल न कर सके.

(4) जिहालत के ज़माने में काफ़िरों का यह तरीक़ा था कि जो ऊंटनी पाँच बार बच्चे जनती और आख़िरी बार उसके नर होता उसका कान चीर देते, फिर न उसपर सवारी करते न उसको ज़िबह करते.न पानी और चारे से हंकाते. और जब सफ़र पेश होता या कोई बीमार होता तो यह मन्नत मानते कि अगर मैं सफ़र से सकुशल वापस आऊं या स्वस्थ हो जाऊं तो मेरी ऊंटनी  साइबा (बिजार) है और उससे भी नफ़ा उठाना हराम जानते और उसको आज़ाद छोड़ देते और बकरी जब सात बार बच्चा जन चुकती तो अगर सातवाँ बच्चा नर होता तो उसको मर्द खाते और अगर मादा होती तो बकरियों में छोड़ देते और ऐसे ही अगर नर व मादा दोनो होते और कहते कि यह अपने भाई से मिल गई है उसको वसीला कहते और जब नर ऊंट से दस गर्भ हासिल होजाते तो उसको छोड़ देते न उसपर सवारी करते न उससे काम लेते न उसको चारे पानी पर से रोकते, उसको हामी कहते.  (मदारिक) बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है कि बहीरा वह है जिसका दूध बूतों के लिये रोकते थे, कोई उस जानवर का दूध न दोहता और साइबा वह जिसको अपने बुतों के लिये छोड़ देते थे कोई उससे काम न लेता. ये रस्में जिहालत के ज़माने से इस्लाम के दौर तक चली आ रही थीं. इस आयत में उनको ग़लत क़रार दिया गया.

(5) क्योंकि अल्लाह तआला ने इन जानवरों को हराम नहीं किया. उसकी तरफ़ इसकी निस्बत ग़लत है.

(6) जो अपने सरदारों के कहने से इन चीज़ों को हराम समझते है, इतनी समझ नहीं रखते कि जो चीज़ अल्लाह और उसके रसूल ने हराम न की उसको कोई हराम नहीं कर सकता.

(7) यानी अल्लाह और रसूल के हुक्म का अनुकरण करो और समझलो कि ये चीज़ें हराम नहीं.

(8) यानी बाप दादा का अनुकरण जब दुरूस्त होता कि वो जानकारी रखते और सीधी राह पर होते.

(9) मुसलमान काफ़िरों की मेहरूमी पर अफ़सोस करते थे और उन्हें दुख होता था कि काफ़िर दुश्मनी में पड़कर इस्लाम की दौलत से मेहरूम रहे. अल्लाह तआला ने उनकी तसल्ली फ़रमादी कि इसमें तुम्हारा कुछ नुक़सान नहीं. अल्लाह की हाँ को हाँ और ना को ना मानने का फ़र्ज़ अदा करके तुम अपना कर्तव्य पूरा कर चुके. तुम अपनी नेकी का सवाब पाओगे. अब्दुल्लाह बिन मुबारक ने फ़रमाया इस आयत में “अम्र बिल मअरूफ़ व नहीये अनिल मुन्कर” यानी अल्लाह ने जिस काम का हुक्म दिया उसे करना और जिससे मना किया उससे रूके रहना, इसकी अनिवार्यता की बहुत ताकीद की है. क्योंकि अपनी फ़िक्र रखने के मानी ये है कि एक दूसरे की ख़बरगीरी करें, नेकियों की रूचि दिलाए, और बुराइयों से रोके. (ख़ाज़िन)

(10) मुहाजिरों में से बदील, जो हज़रत अम्र इब्ने आस के मवाली में से थे, तिजारत के इरादे से शाम की तरफ़ दो ईसाइयों के साथ रवाना हुए. उनमें से एक का नाम तमीम बिन औस दारी था और दूसरे का अदी बिन बुदए शाम पहुंचते ही बदील बीमार हो गए और उन्होंने अपने सारे सामान की एक सूची लिखकर सामान में डाल दी और साथियों को इसकी सूचना न दी. जब बीमारी बढ़ी तो बदील ने तमीम व अदी दोनो को वसीयत की कि उनकी सारी पूंजी मदीना शरीफ़ पहुंच कर उनके घरवालों को दें. बदील की वफ़ात हो गई. इन दोनों ने उनकी मौत के बाद उनका सामान देखा. उसमें एक चांदी का प्याला था. जिसपर सोने का काम बना हुआ था. उसमें तीन सौ मिरक़ाल चांदी था. बदील यह प्याला बादशाह को भेंट करने के इरादे से लाए थे. उनकी मृत्यु के बाद उनके दोनों साथियों ने इस प्याले को ग़ायब कर दिया और अपने काम से निपटने के बाद जब ये लोग मदीनए तैय्यिबह पहुंचे तो उन्होंने बदील का सामान उनके घर वालों के सुपुर्द कर दिया. सामान खोलने पर सूची उसके हाथ आ गई जिसमें सारी पूंजी की तफ़सील थी. जब सामान को सूची से मिलाया तो प्याला न पाया. अब वो तमीम  और अदी के पास पहुंचे और उन्होंने पूछा कि क्या बदील ने कुछ सामान बेचा भी था. उन्होंने कहा, नहीं पूछा, क्या कोई तिजारती मामला किया था. उन्होंने कहा, नहीं. फिर पूछा बदील बहुत समय तक बीमार रहे, क्या उन्होंने अपने इलाज में कुछ ख़र्च किया. उन्होंने कहा, नहीं वो तो शहर पहुंचते ही बीमार हो गए और जल्द ही उनका इन्तिक़ाल हो गया. इस पर घरवालों ने कहा कि उनके सामान में एक सूची मिली है उसमें चांदी का एक प्याला सोने का काम किया हुआ, जिसमें तीन सौ मिस्क़ाल चांदी है, यह भी लिखा है. तमीम व अदी ने कहा हमें नहीं मालूम. हमें तो जो वसीयत की थी उसके अनुसार सामान हमने तुम्हें दे दिया. प्याले की हमें ख़बर भी नहीं. मुकदमा रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के दरबार में पेश हुआ. तमीम व अदी वहाँ भी इन्कार पर जमे रहे और क़सम खाली. इसपर यह आयत उतरी. (खाजिन) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा की रिवायत में है कि फिर वह प्याला मक्कए मुकर्रमा में पकड़ा गया. जिस व्यक्ति के पास था उसने कहा कि मैंने यह प्याला तमीम व अदी से खरीदा है. प्याले के मालिक के सरपरस्तों में से दो व्यक्तियों ने खड़े होकर क़सम खाई कि हमारी गवाही इनकी गवाही से ज़्यादा सच्ची है. यह प्याला हमारे बुज़ुर्ग का है. इस बारे में यह आयत उतरी. (तिरमिज़ी)

(11) यानी मौत का वक़्त करीब आए, ज़िन्दगी की उम्मीद न रहे, मौत की निशानियाँ ज़ाहिर हो.

(12) इस नमाज़ से अस्र की नमाज़ मुराद है, क्योंकि वह लोगों के जमा होने का वक़्त होता है. हसन रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि नमाज़े ज़ोहर या अस्र, क्योंकि हिजाज़ के लोग मुकदमें उसी वक़्त करते थे. हदीस शरीफ़ में है कि जब यह आयत उतरी तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अस्र की नमाज़ पढ़कर अदी और तमीम को बुलाया. उन दोनो ने क़समें खाई. इसके बाद मक्कए मुकर्रमा में यह प्याला पकड़ा गया तो जिस व्यक्ति के पास था उसने कहा कि मैंने अदी  और तमीम से खरीदा है.  (मदारिक)

(13) उनकी अमानत और दयानत में और वो यह कहें कि……..

(14) यानी झूठी क़सम न खाएंगे और किसी की ख़ातिर ऐसा न करेंगे.

(15) ख़ियानत के या झूठ वग़ैरह के.

(16) और वो मरने वाले के घर वाले और रिश्तेदार है.

(17) चुनांचे बदील की घटना में जब उनके दोनो साथियों की ख़ियानत ज़ाहिर हुई तो बदील के वारिसों में से दो व्यक्ति खड़े हुए और उन्होंने क़सम खाई कि यह प्याला हमारे बुजुर्ग का है, और हमारी गवाही इन दोनो की गवाही से ज़्यादा ठीक है.

(18) मानी का हासिल यह है कि इस मामले में जो हुक्म दिया गया कि अदी व तमीम की क़समों के बाद माल बरामद होने पर मरने वाले के वारिसों की क़समें ली गई, यह इसलिये कि लोग इस घटना से सबक़ लें और इससे डरते रहे कि झूठी गवाही का अंजाम शर्मिन्दगी और रूस्वाई है. मुदई पर क़सम नहीं, लेकिन यहाँ जब माल पाया गया तो मुदआ अलैहिमा ने दावा किया कि उन्होंने मरने वाले से ख़रीद लिया था. अब उनकी हेसियत मुदई की हो गई और उनके पास इसका कोई सुबूत न था लिहाज़ा उनके ख़िलाफ़ मरने वाले के वारिसों से क़सम ली गई.

सूरए माइदा – पन्द्रहवाँ रूकू

सूरए माइदा – पन्द्रहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

जिस दिन अल्लाह जमा फ़रमाएगा रसूलों को (1)
फिर फ़रमाएगा तुम्हें क्या जवाब मिला (2)
अर्ज़ करेंगे हमें कुछ इल्म नहीं बेशक तू ही है सब ग़ैबों (अज्ञात) का जानने वाला (3) (109)
जब अल्लाह फ़रमाएगा ऐ मरयब के बेटे ईसा याद करो मेरा एहसान अपने ऊपर और अपनी माँ पर (4)
जब मैंने पाक रूह से तेरी मदद की (5)
तू लोगों से बातें करता पालने में (6)
और पक्की उम्र होकर (7)
और  जब मैं ने तुझे सिखाई किताब और हिकमत (बोध) (8)
और तौरात और इंजील और जब तू मिट्टी से परिन्द की सी मूरत मेरे हुक्म से बनाता फिर उसमें फूंक मारता तो वह मेरे हुक्म से उड़ने लगती (9)
और तू मादरज़ाद (जन्मजात) अन्धे और सफ़ेद दाग़ वाले को मेरे हुक्म से शिफ़ा देता और जब तू मुर्दों को मेरे हुक्म से ज़िन्दा निकालता (10)
और जब मैं ने बनी इस्राईल को तुझ से रोका (11)
जब तू उन के पास रौशन निशानियां लेकर आया तो उनमें के काफ़िर बोले कि यह (12)
तो नहीं मगर खुला जादू (110) और जब मैं न हवारियों (अनुयाइयों) (13)
के दिल में डाला कि मुझ पर और मेरे रसूल पर (14)
ईमान लाओ बोले हम ईमान लाए और गवाह रह कि हम मुसलमान हैं (15)  (111)
जब हवारियों ने कहा ऐ ईसा मरयम के बेटे क्या आपका रब ऐसा करेगा कि हम पर आसमान से एक ख़्वान उतारे (16)
कहा अल्लाह से डरो अगर ईमान रखते हो  (17) (112)
बोले हम चाहते हैं (18)
कि उसमें से खाएं और हमारे दिल ठहरें (19)
और हम आँखों देख लें कि आपने हम से सच फ़रमाया (20)
और हम उसपर गवाह हो जाएं  (21)  (113)
ईसा मरयम के बेटे ने अर्ज़ की ऐ अल्लाह ऐ रब हमारे हम पर आसमान से एक ख़्वान उतार कि वह हमारे लिये ईद हो (22)
हमारे अगले पिछलों की  (23)
और तेरी तरफ़ से निशानी  (24)
और हमें रिज़्क दे और तू सब से बेहतर रोज़ी देने वाला है (114) अल्लाह ने फ़रमाया कि मैं इसे तुम पर उतारता हूँ फिर अब जो तुम में कुफ़्र करेगा (25)
तो बेशक मैं उसे वह अज़ाब दूंगा कि सारे जहान में किसी पर न करूंगा  (26) (115)

तफसीर
सूरए माइदा –  पन्द्रहवाँ रूकू

(1) यानी क़यामत के दिन.

(2) यानी जब तुमने अपनी उम्मतों को ईमान की दावत दी तो उन्होंने क्या जवाब दिया. इस सवाल में इन्कार करने वालों की तरफ़ इशारा है.

(3) नबियों का यह जवाब उनके हद दर्जा अदब की शान ज़ाहिर करता है कि वो अल्लाह के इल्म के सामने अपने इल्म को बिल्कुल नज़र में न लाएंगे और क़ाबिले ज़िक्र क़रार न देंगे और मामला अल्लाह तआला के इल्म और इन्साफ़ पर छोड़ देंगे.

(4) कि मैंने उनको पाक किया और जगत की औरतों पर उनको फ़ज़ीलत दी.

(5) यानी हज़रत जिब्रील से कि वह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथ रहते और ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद करते.

(6) कम उम्र में, और यह चमत्कार है.

(7) इस आयत से साबित होता है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम क़यामत से पहले तशरीफ़ लाएंगे क्योंकि पक्की उम्र का वक़्त आने से पहले आप उठा लिये गए. दोबारा तशरीफ़ लाने के वक़त आप तैंतीस साल के जवान की सूरत में होंगे और इस आयत के अनुसार कलाम फ़रमाएंगे और जो पालने में फ़रमाया “इन्नी अब्दुल्लाह” (मैं अल्लाह का बन्दा हूँ) वही फ़रमाएंगे. (जुमल)

(8) यानी इल्मों के राज़.

(9) यह भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का चमत्कार था.

(10) अंधे और सफ़ेद दाग़ वाले को आँख वाला और स्वस्थ करना और मुर्दों को कब्रों से ज़िन्दा करके निकालना, यह सब अल्लाह के हुक्म से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के महान चमत्कार हैं.

(11) यह एक और नेअमत का बयान है कि अल्लाह तआला ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को यहूदियों की शरारतों से मेहफ़ूज़ रखा जिन्होंने हज़रत के खुले चमत्कार देखकर आपके क़त्ल का इरादा किया. अल्लाह तआला ने आप को आसमान पर उठा लिया और यहूदी नामुराद रह गए.

(12) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार.

(13) हवारी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथी और आपके ख़ास लोग हैं.

(14) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर.

(15) ज़ाहिर और बातिन में महब्बत रखने वाले और फ़रमाँबरदार.

(16)  मानी ये है कि क्या अल्लाह तआला इस बारे में आपकी दुआ क़ूबूल फ़रमाएगा.

(17) और अल्लाह से डरो ताकि यह मुराद हासिल हो. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा, मानी ये हैं कि तमाम उम्मतों से निराला सवाल करने में अल्लाह से डरो, या ये मानी हैं कि उसकी क़ुदरत पर ईमान रखते हो तो इसमें आगे पीछे न हो. हवारी ईमान वाले, अल्लाह को पहचानने वाले और उसकी क़ुदरत पर यक़ीन करने वाले थे. उन्होंने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया.

(18)   बरक़त हासिल करने के लिये.

(19) और पक्का यक़ीन हो और जैसा कि हमने अल्लाह की क़ुदरत को दलील से जाना है, आँखों से देखकर उसको और पक्का कर ले.

(20) बेशक आप अल्लाह के रसूल हैं.

(21) अपने बाद वालों के लिये, हवारियों के यह अर्ज़ करने पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उन्हें तीस रोज़े रखने का हुक्म फ़रमाया और कहा जब तुम इन रोज़ों से फ़ारिग़ हो जाओगे तो अल्लाह तआला से जो दुआ करोगे, क़ुबूल होगी. उन्होंने रोज़े रखकर आसमान से खाना उतरने की दुआ की. उस वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने गुस्ल फ़रमाया और मोटा लिबास पहना और दो रकअत नमाज़ अदा की और सर झुकाया और रोकर यह दुआ की जिसका अगली आयत में बयान है.

(22)  यानी हम इसके उतरने के दिन को ईद बनाएं, इसका आदर करें, खुशियाँ मनाएं, तेरी इबादत करें, शुक्र अदा करें. इस से मालूम हुआ कि जिस रोज़ अल्लाह तआला की खास रहमत उतरे उस दिन को ईद बनाना और खुशियाँ मनाना, ईबादते करना, अल्लाह का शुक्र अदा करना नेक लोगो का तरीक़ा है और कुछ शक नहीं कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का तशरीफ़ लाना अल्लाह तआला की सबसे बड़ी नेअमत और रहम है, इसीलिये हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की पैदायश के दिन ईद मनाना और मीलाद शरीफ़ पढ़कर अल्लाह का शुक्र अदा करना और खुशी ज़ाहिर करना अच्छी बात है और अल्लाह के प्यारे बन्दो का तरीक़ा है.

(23)  जो दीनदार हमारे ज़माने में हैं उनकी और जो हमारे बाद आएं उनकी.

(24) तेरी क़ुदरत की और मेरी नबुव्वत की.

(25) यानी आसमान से खाना उतरने के बाद.

(26) चुनांचे आसमान से खाना उतरा, इसके बाद जिन्होंने उनमें से कुफ़्र किया उनकी शक्लें बिगाड़ दी गई और वो सुअर बना दिये गये और तीन दीन के अन्दर सब मर गए.