सूरए निसा _ पंद्रहवाँ रूकू

सूरए निसा _ पंद्रहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और जब तुम ज़मीन में सफ़र करो तो तुमपर गुनाह नहीं कि कुछ नमाज़ें क़स्र (लघुता) से पढ़ो (1)
(यानी चार रकत वाली फ़र्ज़ नमाज़ दो रकत) अगर तुम्हें डर हो कि काफ़िर तुम्हें ईज़ा (कष्ट) देंगे(2)
बेशक काफ़िर तुम्हारे खुले दुश्मन हैं  (101)  और ऐ मेहबूब जब तुम उनमें तशरीफ़ फ़रमा हो (3)
फिर नमाज़ में उनकी इमामत करो  (4)
तो चाहिये कि उनमें एक जमाअत तुम्हारे साथ हो (5)
और वो अपने हथियार लिये रहें (6)
फिर जब वो सिजदा कर लें (7)
तो हटकर तुमसे पीछे हो जाएं (8)
और अब दूसरी जमाअत आए जो उस वक़्त तक नमाज़ में शरीक न थी  (9)
अब वो तुम्हारे मुक़्तदी  (अनुयायी) हों और चाहिये कि अपनी पनाह और अपने हथियार लिये रहें (10)
काफ़िरों की तमन्ना है कि कहीं तुम अपने हथियारों और अपने माल असबाब से ग़ाफ़िल हो जाओ तो एक दफ़ा तुम पर झुक पड़ें  (11)
और तुम पर मुज़ायक़ा (हर्ज) नहीं अगर तुम्हें मेंह के कारण तकलीफ़ हो या बीमार हो कि अपने हथियार खोल रखो और अपनी पनाह लिये रहो (12)
बेशक अल्लाह ने काफ़िरों के लिये ख़्वारी का अज़ाब तैयार कर रखा है (102) फिर जब तुम नमाज़ पढ चुको तो अल्लाह की याद करो खड़े और बैठे और करवटों पर लेटे (13)
फिर जब मुतमईन (संतुष्ट) हो जाओ तो दस्तूर के अनुसार नमाज़ क़ायम करो बेशक नमाज़ मुसलमानों पर वक़्त बांधा हुआ फर्ज़ है (14)(103)
और काफ़िरों की तलाश में सुस्ती न करो अगर तुम्हें दुख पहुंचता है तो उन्हें भी दुख पहुंचता है जैसा तुम्हें पहुंचता है और तुम अल्लाह से वह उम्मीद रखते हो जो वो नहीं रखते और अल्लाह जानने वाला हिकमत वाला है   (15)(104)

तफसीर
सूरए निसा-पंद्रहवाँ रूकू

(1) यानी चार रकअत वाली दो रकअत.

(2) काफ़िरों का डर क़स्र नमाज़ के लिये शर्त नहीं. यअली बिन उमैया ने हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से कहा कि हम तो अम्न में हैं फिर हम क्यों क़स्र करते हैं? फ़रमाया इसका मुझे भी तअज्जुब हुआ था तो मैंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दरियाफ़्त किया. हुज़ूर ने फ़रमाया कि तुम्हारे लिये यह अल्लाह की तरफ़ से सदक़ा है. तुम उसका सदक़ा क़ुबूल करो. इस से यह मसअला मालूम होता है कि सफ़र में चार रकअत वाली नमाज़ को पूरा पढ़ना जायज़ नहीं है. आयत उतरने के वक़्त सफ़र ख़तरे से खाली नहीं होते थे इसलिये इस आयत में इसका ज़िक्र  बयाने हाल है, कस्र की शर्त नहीं. हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर की क़िरअत भी इसकी दलील है जिसमे “ऐय्यफ़तिनाकुम” (तुम्हें तकलीफ़ पहुंचाएंगे) बगैर इन – ख़िफ़तुम (अगर तुम्हें डर हो)के है, सहाबा का भी यही अमल था कि अम्न के सफ़र में भी क़स्र फ़रमाते थे, जैसा कि ऊपर की हदीस से साबित होता है. और हदीसों से भी यह साबित है. और पूरी चार पढ़ने में अल्लाह तआला के सदक़े का रद करना लाज़िम आता है, लिहाज़ा क़स्र ज़रूरी है.
सफ़र की मुद्दत :- जिस सफ़र मे क़स्र किया जाता है उसकी कम से कम मुद्दत तीन रात दिन की दूरी है जो ऊंट या पैदल की दरमियानी रफ़्तार से तय की जाती हो और उसकी मिक़दारे ख़ुश्की और दरिया और पहाड़ों में मुख़्तलिफ़ हो जाती हैं. जो मसाफ़त या दूरी औसत रफ़्तार से चलने वाले तीन दिन में तय करते हों, उनके सफ़र में क़स्र होगा. मुसाफ़िर की जल्दी या देर का ऐतिबार नहीं, चाहे वह तीन दिन की दूरी तीन घंटों में तय करे, जब भी क़स्र होगा और अगर एक रोज़ की मसाफ़त तीन दिन से ज़्यादा में तय करे तो क़स्र न होगा. ग़रज़ ऐतिबार  दूरी का है.

(3) यानी अपने असहाब में.

(4) इसमें ख़ौफ़ की नमाज़ जमाअत का बयान है. जिहाद में जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मुश्रिकों ने देखा कि आपने तमाम सहाबा के साथ ज़ोहर की नमाज़ जमाअत से अदा फ़रमाई तो उन्हें अफ़सोस हुआ कि उन्होंने उस वक़्त क्यों न हमला किया और आपस में एक दूसरे से कहने लगे कि क्या ही अच्छा मौक़ा था. उनमें से कुछ ने कहा, इसके बाद एक और नमाज़ है जो मुसलमानों को अपने माँ बाप से ज़्यादा प्यारी है यानी अस्र की नमाज़, जब मुसलमान इस नमाज़ के लिये खड़े हो तो पूरी क़ुव्वत से हमला करके उनहे क़त्ल कर दो, उस वक़्त हज़रत जिब्रील हाज़िर हुए और उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया या रसूलल्लाह यह नमाज़े ख़ौफ़ है और अल्लाह तआला फ़रमाता है “वइज़ा कुन्ता फ़ीहिम.” (और ऐ मेहबूब जब तुम उनमें तशरीफ़ फ़रमा हो).

(5) यानी हाज़िरीन को दो जमाअतों में तक़सीम कर दिया जाए. एक उनमें से आपके साथ रहे, आप उन्हें नमाज़ पढ़ाएं और एक जमाअत दुश्मन के मुक़ाबले में क़ायम रहे.

(6) यानी जो लोग दुश्मन के मुक़ाबिल हों, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि अगर जमाअत के नमाज़ी मुराद हों तो वो लोग ऐसे हथियार लगाए रहें जिनसे नमाज़ में कोई ख़लल न हो जैसे तलवार, खंजर वग़ैरह, कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि हथियार साथ रखने का हुक्म दोनो पक्षों के लिये है और यह एहतियात के क़रीब है.

(7) यानी दोनों सिजदे करके रकअत पूरी कर लें.

(8) ताकि दुश्मन के मुक़ाबले मे खड़े हो सकें.

(9) और अब तक दुश्मन के मुक़ाबिल थी.

(10) पनाह से ज़िरह वग़ैरह ऐसी चीज़ें मुराद हैं जिससे दुश्मन के हमले से बचा जा सके. उनका साथ रखना बहरहाल वाजिब है जैसा कि क़रीब ही इरशाद होगा. “वख़ुज़ू हिज़रकुम” (और चाहिये कि अपनी पनाह लिये रहें) और हथियार साथ रखना मुस्तहब है. नमाज़े ख़ौफ़ का मुख़्तसर तरीक़ा यह है कि पहली जमाअत इमाम के साथ एक रकअत पूरी करके दुश्मन के मुक़ाबिल जाए और दूसरी जमाअत जो दुश्मन के मुक़ाबिल खड़ी थी वह आकर इमाम के साथ दूसरी रकअत पढ़े. फिर फ़क़त इमाम सलाम फेरे और पहली जमाअत आकर दूसरी रकअत बग़ैर क़िरअत के पूरी करके सलाम फेरे क्योंकि ये लोग मस्बूक़ हैं और पहली लाहिक. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का इसी तरह नमाज़े ख़ौफ़ अदा फ़रमाना रिवायत किया है.
हुज़ूर के बाद सहाबा नमाज़े ख़ौफ़ पढ़ते रहे हैं. ख़ौफ़ की हालत में दुश्मन के सामने इस तरीक़े से नमाज़ अदा करने से मालूम होता है कि जमाअत किस क़द्र ज़रूरी है. सफ़र की हालत में अगर ख़ौफ़ की सूरत पेश आए तो उसका यह बयान हुआ. लेकिन अगर मुकीम को ऐसी हालत पेश आए तो वह चार रकअत वाली नमाज़ों में हर हर जमाअत को दो दो रकअत पढ़ाए और तीन रकअत वाली नमाज़ में पहली जमाअत को दो रकअत और दूसरी को एक.

(11) नबीये क़रीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़ज़वए ज़ातुर्रफ़ाअ से जब फ़ारिग़ हुए और दुश्मन के बहुत आदमियों को गिरफ़्तार किया और लूट का माल हाथ आया और कोई दुश्मन मुक़ाबिल बाक़ी न रहा तो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम क़ज़ाए हाज़त के लिये जंगल तन्हा तशरीफ़ ले गए तो दुश्मन की जमाअत में से हुवैरिस बिन हारिस महारबी यह ख़बर पाकर तलवार लिये हुए छुपा छुपा पहाड़ से उतरा और अचानक हुज़ूर के पास पहुंचा और तलवार खींचकर कहने लगा या मुहम्मद, अब तुम्हें मुझसे कौन बचाएगा. हुज़ूर ने फ़रमाया अल्लाह तआला, और दुआ फ़रमाई. जब उसने हुज़ूर पर तलवार चलाने का इरादा किया, औंधे मुंह गिर पड़ा और तलवार हाथ से छूट गई. हुज़ूर ने वह तलवार लेकर फ़रमाया कि अब तुझे मुझसे कौन बचाएगा, कहने लगा मेरा बचाने वाला कोई नहीं है. फ़रमाया “अशहदो अन ला इलाहा इल्लल्लाहो व अशहदो अन्ना मुहम्मदुर रसूलल्लाह” पढ़ तो तेरी तलवार तुझे दूंगा. उसने इससे इन्कार किया और कहा मैं इसकी शहादत देता   हूँ कि मैं कभी आपसे न लडूंगा और ज़िन्दगी भर आपके किसी दुश्मन की मदद न करूंगा. आपने उसको उसकी तलवार दे दी. कहने लगा, या मुहम्मद, आप मुझसे बेहतर हैं. फ़रमाया हाँ हमारे लिये यहीं ठीक हैं. इसपर यह आयत उतरी और हथियार और बचाव साथ रखने का हुक्म दिया गया. (तफ़सीरे अहमदी)

(12) कि उसका साथ रखना हमेशा ज़रूरी है. इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अब्दुर रहमान बिन औंफ़ ज़ख़्मी थे और उस वक़्त हथियार रखना उनके लिये बहुत तकलीफ़दह और बोझ था. उनके बारे में यह आयत उतरी और मजबूरी की हालत में हथियार खोल रखने की इजाज़त दी गई.

(13) यानी अल्लाह का ज़िक्र हर हाल में करते रहो और किसी हाल में अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल न रहो. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, अल्लाह तआला ने हर फ़र्ज़ की एक हद निश्चित की है, सिवाए ज़िक्र के, इसकी कोई हद न रखी. फ़रमाया, ज़िक्र करो खड़े, बैठे, कर्वटों पर लेटे, रात में हो या दिन में, ख़ुश्की में हो या तरी में, सफ़र में हो या घर में, छुपावाँ और ज़ाहिर में. इससे नमाज़ों के बाद सलाम फेरते ही कलिमए तौहीद पढ़ने का प्रमाण मिलता है, जैसा कि मशायख़ की आदत है, और सही हदीसों से साबित है. ज़िक्र में तस्बीह, तहमीद, तहलील, तकबीर, सना, दुआ सब दाख़िल हैं.

(14) तो लाज़िम है कि उसके औक़ात की रिआयत की जाय.

(15) उहद की लड़ाई से जब अबू सुफ़ियान और उनके साथी लौटे तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने, जो सहाबा उहद में हाज़िर हुए थे. उन्हें मुश्रिकों के पीछे जाने का हुक्म दिया. सहाबा ज़ख्मी थे. उन्हों ने अपने ज़ख़्मों की शिकायत की, इस पर यह आयत उतरी.

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सूरए निसा – सोलहवाँ रूकू

सूरए निसा – सोलहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ मेहबूब बेशक हमने तुम्हारी तरफ़ सच्ची किताब उतारी कि तुम लोगों में फैसला करो (1)
जिस तरह तुम्हें अल्लाह दिखाए (2)
और दग़ा वालों की तरफ़ से न झगड़ो (105)  और अल्लाह से माफ़ी चाहो बेशक अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान है(106)  और उनकी तरफ़ से न झगड़ो जो अपनी जानो को ख़यानत(बेईमानी) में डालते हैं (3)
अल्लाह नहीं चाहता किसी बड़े दग़ाबाज़ गुनाहगार को (107) आदमियों से छुपाते हैं और अल्लाह से नहीं छुपते (4)
और अल्लाह उनके पास है  (5)
जब दिल में वह बात तजवीज़ (प्रस्तावित) करते हैं जो अल्लाह को नापसन्द है (6)
और अल्लाह उनके कामों को घेरे हुए है (108) सुनते हो यह जो तुम हो (7)
दुनिया की ज़िन्दगी में तो उनकी तरफ़ से झगड़े तो उनकी तरफ़ से कौन झगड़ेगा अल्लाह से क़यामत के दिन या कौन उनका वकील होगा  (109) और जो कोई बुराई या अपनी जान पर ज़ुल्म करे फिर अल्लाह से बख़्शिश चाहे तो अल्लाह को बख़्शने वाला मेहरबान पाएगा (110) और जो गुनाह कमाए तो उसकी कमाई उसी की जान पर पड़े और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है (8) (111)
और जो कोई ख़ता या गुनाह कमाए (9)
फिर उसे किसी बे गुनाह पर थोप दे उसने ज़रूर बोहतान और खुला गुनाह उठाया (112)

तफसीर
सूरए निसा – पंद्रहवाँ रूकू

(1) अनुसार के क़बीले बनी ज़फर के एक शख़्स तोअमा बिन उबैरक ने अपने पड़ोसी क़तादा बिन नोअमान की ज़िरह चुराकर आटे की बोरी में ज़ैद बिन सीमीन यहूदी के यहाँ छुपाई. जब ज़िरह की तलाश हुई और तोअमा पर शुबह किया गया तो वह इन्कार कर गया और क़सम खा गया. बोरी फटी हुई थी और उसमें से आटा गिरता जाता था. उसके निशान से लोग यहुदी के मकान तक पहुंचे और बोरी वहाँ पाई गई. यहूदी ने कहा कि तोअमा उस के पास रख गया है. यहूदियों की एक जमाअत ने इसकी गवाही दी. और तोअमा की क़ौम बनी ज़फर ने यह निश्चय कर लिया कि यहूदी को चोर बताएंगे और उसपर क़सम खालेंगे ताकि क़ौम रूस्वा न हो और उनकी ख़्वाहिश थी कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तोअमा को बरी कर दें और यहूदी को सज़ा दें. इसीलिए उन्होंने हुज़ूर के सामने यहूदी के ख़िलाफ़ झूठी गवाही दी और तोअमा की हिमायत में बोले. और इस गवाही पर कोई तर्क वितर्क न हुआ. (इस घटना के मुतअल्लिक़ कई रिवायतें आई हैं और उनमें आपसी मतभेद भी है).

(2) और इल्म अता फ़रमाए. इल्मे यक़ीनी को ज़ुहूर की क़ुव्वत की वजह से रूयत से ताबीर फ़रमाया. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि हरगिज़ कोई न कहे, जो अल्लाह ने मुझे दिखाया उसपर मैं ने फ़ैसला किया, क्योकि अल्लाह तआला ने ये मन्सब ख़ास अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अता फ़रमाया. आपकी राय हमेशा सही होती है, क्योंकि अल्लाह तआला ने हक़ीक़तों और होने वाली बातों को आपके सामने कर दिया है और दूसरे लोगों की राय अन्दाज़े का दर्जा रखती है.

(3) गुनाह करके.

(4) शर्म नहीं करते.

(5) उनका हाल जानता है. उसपर उनका कोई राज़ छुप नहीं सकता.

(6) जैसे तोअमा की तरफ़दारी में झूठी क़सम और झूठी गवाही.

(7) ऐ तोअमा की क़ौम.

(8) किसी को दूसरे के गुनाह पर अज़ाब नहीं फ़रमाता.

(9) छोटे या बड़े.

सूरए निसा -सत्तरहवाँ रूकू

सूरए निसा -सत्तरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और ऐ मेहबूब अगर अल्लाह का फ़ज़्ल व रहमत तुमपर न होता (1)
तो उनमें के कुछ लोग यह चाहते कि तुम्हें धोखा दे दे और वो अपने ही आपको बहका रहे हैं (2)
और तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेंगे (3)
और अल्लाह ने तुम पर किताब (4)
और हिकमत (बोध) उतारी  और तुम्हें सिखा दिया जो कुछ तुम न जानते थे (5)
और  अल्लाह का तुमपर बड़ा फ़ज़्ल है  (6) (113)
उनके अकसर मशवरों में कुछ भलाई नहीं (7)
मगर जो हुक्म दे ख़ैरात या अच्छी बात या लोगों में सुलह करने का और जो अल्लाह की रज़ा चाहने को ऐसा करे उसे जल्द ही हम बड़ा सवाब देंगे (114) और जो रसूल का विरोध करे बाद इसके कि हक़ (सच्चा) रास्ता उसपर खुल चुका और मुसलमानों की राह से अलग राह चले हम उसे उसके हाल पर छोड़ देंगे और उसे दोज़ख़ में दाख़िल करेंगे और क्या ही बुरी जगह पलटने की (8) (115)

तफसीर
सूरए निसा- सत्तरहवाँ रूकू

(1) तुम्हें नबी और मासूम करके और राज़ों पर मुत्तला फ़रमा के.

(2) क्योंकि इसका वबाल उन्हीं पर है.

(3) क्योंकि अल्लाह तआला ने आपको हमेशा के लिये मासूम यानी गुनाहों से पाक किया है.

(4) यानी क़ुरआने करीम.

(5) दीन की बातों और शरीअत के आदेश और ग़ैब के इल्म. इस आयत से साबित हुआ कि अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तमाम कायनात के उलूम अता फ़रमाए और किताब व हिकमत के रहस्यों और हक़ीक़तों पर सूचित किया. यह मसअला क़ुरआने करीम की बहुत सी आयतों और कई हदिसों से साबित है.

(6) कि तुम्हें इन नेअमतों के साथ मुमताज़ किया.

(7) यह सब लोगों के हक़ में आम है.

(8) यह आयत दलील है इसकी कि सर्वसम्मति आख़िरी चीज़ है इसकी मुख़ालिफ़त जायज़ नहीं जैसे कि किताब व सुन्नत का विराध जायज़ नहीं (मदारिक). और इस से साबित हुआ कि मुसलमानों का तरीक़ा ही सीधी सच्ची राह है. हदीस शरीफ़ में आया है कि जमाअत पर अल्लाह का हाथ है. एक और हदीस में है कि बड़ी जमाअत का अनुकरण करो. जो मुसलमानों की जमाअत से अलग हुआ वह दोज़ख़ी है. इससे साफ़ है कि मज़हबे एहले सुन्नत वल जमाअत ही सच्चा मज़हब है.

सूरए निसा _ अठ्ठारहवाँ रूकू

सूरए निसा _ अठ्ठारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

अल्लाह उसे नहीं बख़्शता कि उसका कोई शरीक ठहराया जाए और उससे नीचे जो कुछ है जिसे चाहे माफ़ फ़रमा देता है (1)
और जो अल्लाह का शरीक ठहराए वह दूर की गुमराही में पड़ा (116) ये शिर्क वाले अल्लाह के सिवा नहीं पूजते मगर कुछ औरतों को (2)
और नहीं पूजते मगर सरकश (बाग़ी) शैतान को (3)(117)
जिसपर अल्लाह ने लाअनत की और बोला(4)
क़सम है मैं ज़रूर तेरे बन्दों में से कुछ ठहराया हुआ हिस्सा लूंगा (5) (118)
क़सम है मैं ज़रूर बहकाऊंगा और ज़रूर उन्हें आरज़ुएं दिलाउंगा  (6)
और ज़रूर उन्हें कहुंगा कि वो चौपायों के कान चीरेंगे  (7)
और ज़रूर उन्हें कहुंगा कि वो अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ें बदल देंगे (8)
और जो अल्लाह को छोड़कर शैतान को दोस्त बनाये वह खुल्लम खुल्ला टोटे में पड़ा (119) शैतान उन्हें वादे देता है और आरज़ूएं दिलाता है (9)
और शैतान उन्हें वादे नहीं देता मगर धोखे के (10) (120)
उनका ठिकाना दोज़ख़ है उससे बचने की जगह न पाएंगे (121)
और जो ईमान लाए और अच्छे काम किये कुछ देर जाती है कि हम उन्हें बाग़ों में ले जाएंगे जिनके नीचे नहरे बहें हमेशा हमेशा उन में रहें  अल्लाह का सच्चा वादा और अल्लाह से ज़्यादा किसकी बात सच्ची (122) काम न कुछ तुम्हारे ख़्यालों पर हैं (11)
और न किताब वालों की हवस पर  (12)
जो बुराई करेगा (13)
उसका बदला पाएगा और अल्लाह के सिवा न कोई अपना हिमायती पायेगा न मददगार(14)(123)
और जो  कुछ भले काम करेगा मर्द हो या औरत और हो मुसलमान  (15)
तो वो जन्नत में दाख़िल किये जाएंगे और उन्हें तिल भर नुक़सान न दिया जाएगा (124) और उससे बेहतर किसका दीन जिसने अपना मुंह अल्लाह के लिये झुका दिया (16)
और वह नेकी वाला है और इब्राहीम के दीन पर (17)
जो हर बातिल  (असत्य) से अलग था और अल्लाह ने इब्राहीम को अपना गहरा दोस्त बनाया (18) (125)
और अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में और हर चीज़ पर अल्लाह का क़ाबू है (19)(126)

तफसीर
सूरए निसा _ अठ्ठारहवाँ रूकू

(1) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा का क़ौल है कि यह आयत एक बुढ़े अअराबी के बारे मे नाज़िल हुई जिसने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के नबी, मैं बूढ़ा हूँ, गुनाहों में डुबा हुआ हूँ, सिवाए इसके कि जबसे मैंने अल्लाह को पहचाना और उसपर ईमान लाया, उस वक़्त से कभी मैंने उसके साथ शिर्क न किया और उसके सिवा किसी और को वली न बनाया और जुरअत के साथ गुनाहों में मुब्तला न हुआ और एक पल भी मैं ने यह गुनाह न किया मैं अल्लाह से भाग सकता हूँ, शर्मिन्दा हुं, ताइब हूं, मग़फ़िरत चाहता हूँ, अल्लाह के यहां मेरा क्या हाल होगा. इस पर यह आयत उतरी. यह आयत इस बार पर क़ुरआन की दलील है कि शिर्क बख़्शा न जाएगा, अगर मुश्रिक अपने शिर्क से तौबह करे और ईमान लाए तो उसकी तौबह व ईमान क़ुबूल है.

(2) मादा बुतों को जैसे लात, उज़्ज़ा मनात, वग़ैरह. ये सब देवियां हैं. और अरब के हर क़बीले का एक बुत था, जिसकी वो इबादत करते थे और उसको उस क़बीले की उनसा (औरत) कहते थे. हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा की क़िरअत और हज़रत इब्ने अब्बास की क़िरअत से भी साबित होता है कि “इनास” (कुछ औरतों) से मुराद बुत हैं. एक क़ौल यह भी है कि अरब के मुश्रिक अपने बातिल माअबूदों  को ख़ुदा की बेटियां कहते थे और  एक क़ौल यह है कि मुश्रिक बुतों को ज़ेवर पहनाकर औरतों की तरह सजाते थे.

(3) क्योंकि उसी के बहकावे से बुतों को पूजते थे.

(4) शैतान.

(5) उन्हें अपना मुतीअ बनाऊंगा.

(6) तरह तरह की, कभी लम्बी उम्र की, कभी दुनिया के मज़ों की, कभी बातिल ख़्वाहिशात की, कभी और कभी और.

(7) चुनान्चें उन्होंने ऐसा किया कि ऊंटनी जब पाँच बार ब्याह लेती तो वह उसकी छोड़ देते और उसको नफ़ा उठाना अपने ऊपर हराम कर लेते और उसका दूध बूतों के लिये कर लेते और उसको बहीरा कहते थे. शैतान ने उसके दिल में यह डाल दिया था कि ऐसा करना इबादत है.

(8) मर्दों का औरतों की शक्ल में ज़नाना लिबास पहनना, औरतों की तरह बातचीत और हरक़तें करना, जिस्म को गोदकर सुरमा या सिन्दुर वग़ैरह ख़ाल में पैवस्त करके बेल बूटे बनाना भी इसमें दाख़िल है.

(9) और दिल में तरह तरह की उम्मीदें और  वसवसे डालता हैं ताकि इन्सान गुमराही में पड़े.

(10) कि जिस चीज़ के नफ़े और फ़ायदे की आशा दिलाता है, वास्तव में उसमें सख़्त घाटा और नुक़सान होता हैं.

(11) जो तुमने सोच रखा हैं कि बुत तुम्हें नफ़ा पहुचाएंगे.

(12) जो कहते कि हम अल्लाह के बेटे और प्यारे हैं हम आग कुछ दिन से ज़्यादा न जलाएंगे, यहूदियों और ईसाइयों का यह ख़्याल भी मुश्रिकों की तरह बातिल हैं.

(13) चाहे मुश्रिकों में से हो या यहूदियों और ईसाइयों में से.

(14) यह फ़टकार काफ़िरों के लिये है.

(15) इसमें इशारा है कि अअमाल यानी कर्म ईमान में दाख़िल नहीं.

(16) यानी फ़रमाँबरदारी और इख़्लास किया.

(17) जो मिल्लते इस्लामिया के मुवाफ़िक़ है. हज़रत इब्राहीम की शरीअत और मिल्लत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मिल्लत में दाख़िल है और दीने मुहम्मदी की विशेषताएं इसके अलावा है. दीने मुहम्मदी पर चलने से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की शरीअत और मिल्लत का अनुकरण हो जाता है. चूंकि अरब और यहूदी और ईसाई सब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की नस्ल से होने में गर्व रखते थे और आपकी शरीअत उन सबको प्यारी थी और शरीअते मुहम्मदी उसपर हावी है, तो उन सबको दीने मुहम्मदी में दाख़िल होना और उसको क़ुबूल करना लाज़िम है.

(18) “खिल्लत” सच्ची यगानगत और ग़ैर से नाता तोड़ने को कहते है. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम यह गुण रखते थे इसलिये आपको “ख़लील” कहा गया. एक क़ौल यह भी है कि ख़लील उस मुहिब को कहते है जिसकी महब्बत सम्पूर्ण हो और उसमें किसी क़िस्म की रूकावट और नुक़सान न हो. यह मानी भी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम में पाए जाते हैं. सारे नबियों के जो कमालात हैं सब नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हासिल हैं. हुज़ूर अल्लाह के ख़लील भी है जैसा कि बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है और हबीब भी, जैसा कि तिरमिज़ी शरीफ़ की हदीस में है कि मैं अल्लाह का हबीब हूँ और यह गर्व से नहीं कहता.

(19) और वह उसके इल्म और क़ुदरत के इहाते में है. इहाता-बिल-इल्म यह है कि किसी चीज़ के लिये जितने कारण हो सकते है उसमें कोई कारण इल्म से बाहर न हो.

सूरए निसा _ उन्नीसवाँ रूकू

सूरए निसा _ उन्नीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और तुमसे  औरतों के बारे में फ़तवा पूछते हैं (1)
तुम फ़रमा दो कि अल्लाह तुम्हें उनका फ़तवा देता है और वह जो तुमपर क़ुरआन में पढ़ा जाता है उन यतीम लड़कियों के बारे में कि तुम उन्हें नहीं देते जो उनका मुक़र्रर है (2)
और उन्हें निकाह में भी लाने से मुंह फेरते हो  और कमज़ोर (3)
बच्चों के बारे में और यह  कि यतीमों के हक़ में इन्साफ़ पर क़ायम रहो (4)
और तुम जो भलाई करो तो अल्लाह को उसकी ख़बर है (127) और अगर कोई औरत अपने शौहर की ज़ियादती या बेरग़बती  (अरूचि) का डर करे   (5)
तो उन पर गुनाह नहीं कि आपस में सुल्ह करलें (6)
और सुल्ह ख़ूब है (7)
और दिल लालच के फंदे में हैं (8)
और अगर तुम नेकी और परहेज़गारी करो (9)
तो अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है (10)(128)
और तुमसे कभी न हो सकेगा कि औरतों को बराबर रखो और चाहे कितनी ही हिर्स (लालच) करो (11)
तो यह तो न हो कि एक तरफ़ पूरा झुक जाओ कि दूसरी को अधर में लटकती छोड़ दो  (12)
और अगर तुम नेकी और परहेज़गारी करो तो बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है  (129) और अगर वो दोनों (13)
अलग हो जाएं तो अल्लाह अपनी कुशायश (बरकत) से तुम में हर एक को दूसरे से बेनियाज़ (बेपरवाह) कर देगा(14)
और अल्लाह कुशायश (वृद्धि) वाला हिकमत वाला है (130) और अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में और बेशक ताकीद फ़रमा दी है हमने उनसे जो तुमसे पहले किताब दिये गए और तुमको कि अल्लाह से डरते रहो (15)
और अगर कुफ्र करो तो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है  और जो कुछ ज़मीन में (16)
और अल्लाह बेनियाज़ है (17)
सब ख़ूबियों सराहा (131) अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में और अल्लाह काफी है कारसाज़ (132)  ऐ लोगो वह चाहे तो तुम्हें ले जाए (18)
और औरों को ले आए और अल्लाह को इसकी क़ुदरत (क्षमता) है  (133) जो दुनिया का इनाम चाहे तो अल्लाह ही के पास दुनिया और आख़िरत दोनों का इनाम है(19) और अल्लाह ही सुनता देखता है(134)

तफसीर
सूरए निसा _ उन्नीसवाँ रूकू

(1) ज़ाहिलियत के ज़माने में अरब के लोग औरत और छोटे बच्चों को मैयत के माल का वारिस नहीं मानते थे. जब मीरास की आयत उतरी तो उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म, क्या औरत और छोटे बच्चे वारिस होंगे, आपने उनको इस आयत से जवाब दिया, हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया कि यतीमों के सरपरस्तों का तरीक़ा यह था कि अगर यतीम लड़की माल और सौंदर्य वाली होती तो उससे थोड़े से मेहर पर निकाह कर लेते और अगर हुस्न और माल न रखती तो उसे छोड़ देते और अगर ख़ूबसूरत न होती और मालदार होती तो उससे निकाह न करते और इस डर से दूसरे के निकाह में न देते कि वह माल में हिस्सेदार हो जाएगा. अल्लाह ताअला ने ये आयतें उतार कर उन्हें इन आदतों से मना फ़रमाया.

(2) मीरास से.

(3) यतीम या अनाथ.

(4) उनके पूरे अधिकार उनको दो.

(5) ज़्यादती तो इस तरह कि उससे अलग रहे, खाने पहनने को न दे या कमी करे या मारे या बदज़बानी करे, और बेरग़बती यह कि महब्बत न रखे, बोल चाल छोड़ दे या कम कर दे.

(6) और इस सुल्ह के लिये अपने अधिकारों का बोझ कम करने पर राज़ी हो गएं.

(7) और ज़ियादती और जुदाई दोनो से बेहतर है.

(8) हर एक अपनी राहत और आसाइश चाहता और अपने ऊपर कुछ मशक्क़त गवारा करके दूसरे के आसाइश को प्राथमिकता नहीं देता.

(9) और नापसन्द होने के बावज़ूद अपने मोज़ूदा औरतों पर सब्र करो और उनके साथ अच्छा बर्ताव करो और उन्हें तक़लीफ़ दुख देने से और झगड़ा पैदा करने वाली बातों से बचते रहो और सोहबत और सहवास में नेक सुलूक करो और यह जानते रहो के वह तुम्हारे पास अमानतें है.

(10) वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का इनाम देगा.

(11) यानी अगर कई बीवियाँ हो तो यह तुम्हारी क्षमता में नहीं कि हर काम में तुम उन्हें बराबर रखो, किसी को किसी पर तर्ज़ीह न होने दो, न मेल महब्बत में, न ख़्वाहिश और रग़बत में, न इशरत और इख़्तिलात में, न नज़र और तवज्जुह में, तुम कोशिश करके यह तो कर नहीं सकते लेकिन अगर इतना तुम्हारी क्षमता या बस में नहीं है और इस वज़ह से इन तमाम पाबन्दियों का बोझ तुम पर नहीं रखा गया है और दिली मोहब्बत और सच्चा प्यार जो तुम्हारा इख़्तियार नहीं है उसमें बराबरी करने का तुम्हें हुक्म नहीं दिया गया.

(12) बल्कि यह ज़रूर है कि जहाँ तक तुम्हें क़ुदरत और इख़्तियार है वहां तक एक सा बर्ताव करो, महब्बत इख़्तियारी चीज़ नहीं. तो बातचीत, सदव्यवहार, खाने पहनने, साथ रखने ऐसी बातों में बराबरी करना तुम्हारे बस में है. इन बातों में दोनो के साथ एक सा सुलूक करना लाज़िम और  ज़रूरी है.

(13) मियाँ बीवी में आपस में सुलह न करें और वो जुदाई बेहतर समझे और ख़ुलअ के साथ अलाहदगी हो जाए या मर्द औरत को तलाक़ देकर उसका मेहर और इद्दत का ख़र्चा पानी अदा करदे और इस तरह वह…….

(14) और  एक को बेहतर बदल या पर्याय अता फ़रमाएगा.

(15) उसकी फ़रमाँबरदारी करो और उसके हुक्म के ख़िलाफ़ न करो, तौहीद और शरीअत पर क़ायम रहो, इस आयत से मालूम हुआ कि तक़वा और  परहेज़गारी का हुक्म पहले से है. तमाम उम्मतों को इसकी ताक़ीद होती रही है.

(16) तमाम जगत उसके फरमाँबरदारों से भरा है. तुम्हारे कुफ़्र से उसका क्या नुक़सान.

(17) तमाम सृष्टि से और उनकी इबादत से.

(18) मादूम यानी ख़त्म कर दे.

(19) मतलब यह है कि जिसको अपने अमल से दुनिया की तलब हो और उसकी मुराद उतनी ही जो अल्लाह उसको दे देता है और आख़िरत के सवाब के लिये किया तो अल्लाह दुनिया और आख़िरत दोनो में सवाब देने वाला है. जो शख़्स अल्लाह से फ़क़त दुनिया का तालिब हो, वह नादान, ख़सीस और  कम हिम्मत है.

सूरए निसा – बीसवाँ रूकू

सूरए निसा- बीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो इन्साफ़ पर ख़ूब क़ायम हो जाओ  अल्लाह के लिये गवाही देते चाहे इसमें तुम्हारा अपना नुक़सान हो या मां बाप का या रिश्तेदारों का, जिसपर गवाही दो वह ग़नी (मालदार) हो या फ़क़ीर हो (1)
हर हाल में अल्लाह को उसका सबसे ज़्यादा इख़्तियार है तो ख़्वाहिश के पीछे न जाओ कि हक़ से अलग पड़ो और अगर तुम हेर फेर करो (2)
या मुंह फेरो (3)
तो अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है  (4) (135)
ऐ ईमान वालो ईमान रखो अल्लाह और अल्लाह के रसूल पर (5)
और इस किताब पर जो अपने इन रसूल पर उतरी और उस किताब पर जो पहले उतरी (6)
और जो न माने अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और किताबों और रसूलों और क़यामत को (7)
तो वह ज़रूर दूर की गुमराही में पड़ा (136) बेशक वो लोग जो ईमान लाए फिर काफ़िर हुए फिर ईमान लाए फिर काफ़िर हुए फिर और कुफ़्र में बढ़े (8)
अल्लाह कभी न उन्हें बख़्शे(9)
न उन्हें राह दिखाए(137) ख़ुशख़बरी दो मुनाफिक़ों को कि उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है  (138) वो जो मुसलमानों को छोड़कर काफ़िरों को दोस्त बनाते हैं (10)
क्या उनके पास इज़्ज़त ढूंढते हैं तो इज़्ज़त तो सारी अल्लाह ही के लिये है (11)(139)
और बेशक अल्लाह तुमपर किताब  (12)
में उतार चुका कि जब तुम अल्लाह की आयतों को सुनो कि उनका इन्कार किया जाता और उनकी हंसी बनाई जाती तो उन लोगों के साथ न बैठों जब तक वो और बात में मशग़ूल न हों(13)
वरना तुम भी उन्हीं जैसे हो (14)
बेशक अल्लाह मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों सब को जहन्नम में इकट्ठा करेगा (140) वो जो तुम्हारी हालत तका करते हैं तो अगर अल्लाह की तरफ़ से तुमको फ़तह मिले कहें क्या हम तुम्हारे साथ न थे  (15)
और अगर काफ़िरों का हिस्सा हो तो उनसे कहें क्या हमें तुमपर क़ाबू न था (16)
और हमने तुम्हें मुसलमानों से बचाया (17)
तो अल्लाह तुम सबमें (18)
क़यामत के दिन फैसला कर देगा (19)
और अल्लाह काफ़िरों को मुसलमानों पर कोई राह न देगा (20)
(141)

तफसीर
सूरए निसा _ बीसवाँ रूकू

(1) किसी की रिआयत और तरफ़दारी में इन्साफ़ से न हटो और कोई सम्बन्ध और रिश्ता सत्य कहने में आड़े न आने पाए.

(2) सत्य कहने में और जैसा चाहिये न कहो.

(3) गवाही देने से.

(4) जैसे कर्म होंगे वैसा बदला देगा.

(5) यानी ईमान पर डटे रहो. यह अर्थ उस सूरत में है कि “या अय्युहल्लज़ीना आमनू” का सम्बोधन मुसलमानों से हो और अगर ख़िताब यहूदियों और ईसाईयों से हो तो मानी ये होंगे कि ऐ कुछ किताबों और कुछ रसूलों पर ईमान लाने वालो, तुम्हें यह हुक्म है. और अगर सम्बोधन मुनाफ़िक़ीन से हो तो मानी ये हैं कि ऐ ईमान का ज़ाहिरी दावा करने वालो, सच्चे दिल से ईमान लाओ. यहाँ रसूल से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और किताब से क़ुरआने पाक मुराद है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, यह आयत अब्दुल्लाह बिन सलाम और असद व उसैद और सअलबा बिन क़ैस और सलाम व सलमा व यामीन के बारे में उतरी. ये लोग किताब वालों के मूमिनीन में से थे. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया, हम आप पर और आपकी किताब पर और हज़रत मूसा पर, तौरात पर और उज़ैर पर ईमान लाते हैं और इसके सिवा बाक़ी किताबों और रसूलों पर ईमान न लाएंगे. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनसे फ़रमाया कि तुम अल्लाह पर और उसके रसूल मुहम्मदे मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) पर और क़ुरआन पर और इससे पहली हर किताब पर ईमान लाओ. इस पर यह आयत उतरी.

(6) यानी क़रआने पाक पर और उन तमाम किताबों पर ईमान लाओ जो अल्लाह ने क़ुरआन से पहले अपने नबियों पर नाज़िल फ़रमाई.

(7) यानी उनमें से किसी एक का भी इन्कार करे कि एक रसूल और एक किताब का इन्कार भी सब का इन्कार है.

(8) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि यह आयत यहूदियों के बारे में उतरी जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए फिर बछड़ा पूज कर काफ़िर हुए फिर उसके बाद ईमान लाए. फिर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और इंजिल का इन्कार करके काफ़िर हो गए फिर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और क़ुरआन का इन्कार करके और कुफ़्र में बढ़े. एक क़ौल यह है कि यह आयत मुनाफ़िकों के बारे में उतरी कि वो ईमान लाऐ  फिर काफ़िर हो गए. ईमान के बाद फिर ईमान लाए. यानि उन्होंने अपने ईमान का इज़हार किया ताकि उनपर ईमान वालों के एहकाम जारी हों. फिर कुफ़्र में बढ़े यानी कुफ़्र पर उनकी मौत हुई.

(9)  जब तक कुफ़्र पर रहे और कुफ़्र पर मरे क्योंकि कुफ़्र बख़्शा नहीं जाता मगर जबकि काफ़िर तौबह करे और ईमान लाए, जैसा कि फ़रमाया “क़ुल लिल्लज़ीना क़फ़रू ईंय्य यन्तहू युग़फ़र लहुम मा क़द सलफ़” (तुम काफ़िरों से फ़रमाओ अगर वो बाज़ रहे तो जो हो गुज़रा वह उन्हें माफ़ फ़रमा दिया जाएगा) (सूरए अन्फ़ाल, आयत38).

(10) यह मुनाफ़िक़ों का हाल है जिनका ख़्याल था कि इस्लाम ग़ालिब न होगा और इसलिये वो काफ़िरों को क़ुव्वत और शानो शौक़त वाला समझकर उनसे दोस्ती करते थे और उनसे मिलने में बड़ाई जानते थे जबकि काफ़िरों के साथ दोस्ती वर्ज़ित और उनके मिलने से इज़्ज़त की तलब बातिल.

(11) और उसके लिये जिसे वह इज़्ज़त दे, जैसे कि नबी और ईमान वाले.

(12) यानी क़ुरआन.

(13) काफ़िरों के साथ दोस्ती और उनकी बैठकों में शरीक होना ऐसे ही और अधर्मियों और गुमराहों की मजलिसों में शिरकत और उनके साथ याराना और उठना बैठना मना फ़रमाया गया.

(14) इससे साबित हुआ कि कुफ़्र के साथ राज़ी होने वाला भी काफ़िर है.

(15) इससे उनकी मुराद लूट के माल में शिरकत करना और हिस्सा चाहना है.

(16) कि तुम्हें क़त्ल करते, गिरफ़्तार करते, मगर हमने यह कुछ नहीं किया.

(17) और उन्हें तरह तरह के बहानों से रोका और उनके राज़ों पर तुम्हें बाख़बर किया. तो अब हमारे इस सुलूक की क़द्र करो और हिस्सा दो. (यह मुनाफ़िक़ों का हाल है )

(18) ऐ ईमानदारों और मुनाफ़िक़ों.

(19) कि ईमान वालों को जन्नत अता करेगा और मुनाफ़िक़ों  को जहन्नम में दाख़िल करेगा.

(20) यानी काफ़िर न मुसलमानों को मिटा सकेंगे, न तर्क में परास्त कर सकेंगे. उलमा ने इस आयत से चन्द मसअले निकाले हैं. (1) काफ़िर मुसलमान का वारिस नहीं. (2) काफ़िर मुसलमान के माल पर इस्तीला पाकर मालिक नहीं हो सकता. (3) काफ़िर को मुसलमान ग़ुलाम ख़रीदने का हक़ नहीं.
(4) ज़िम्मी के बदले मुसलमान क़त्ल न किया जाएगा (जुमल).

सूरए निसा – इक्कीसवाँ रूकू

सूरए निसा – इक्कीसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक मुनाफ़िक़ लोग अपने गुमान में अल्लाह को धोखा दिया चाहते हैं (1)
और वही उन्हें ग़ाफ़िल करके मारेगा और जब नमाज़ को खड़े हों (2)
तो हारे जी से (3)
लोगों को दिखावा करते हैं और अल्लाह को याद नहीं करते मगर थोड़ा  (4)(142)
बीच में डगमगा रहे हैं (5)
न इधर के और न उधर के (6)
और  जिसे अल्लाह गुमराह करे तो उसके लिये कोई राह न पाएगा (143)  ऐ ईमान वालो काफ़िरों को दोस्त न बनाओ मुसलमानों के सिवा (7)
क्या यह चाहते हो कि अपने ऊपर अल्लाह के लिये खुली हुज्जत कर लो (8)
(144) बेशक मुनाफ़िक़ दोज़ख़ के सबसे नीचे दर्जे में हैं  (9)
और तू कभी उनका मददगार न पाएगा (145) मगर वो जिन्होंने तौबह की   (10)
और संवरे और अल्लाह की रस्सी मज़बूत थामी और अपना दीन ख़ालिस अल्लाह के लिये कर लिया तो ये मुसलमानों के साथ है (11)
और जल्द ही अल्लाह मुसलमानों को बड़ा सवाब देगा   (146) और अल्लाह तुम्हें अज़ाब देकर क्या करेगा अगर तुम हक़ मानो और ईमान लाओ और अल्लाह है सिला( इनाम) देने वाला जानने वाला (147)

छटा पारा . ला. युहिब्बुल्लाह
(सूरए निसा . जारी)

अल्लाह पसन्द नहीं करता बुरी बात का ऐलान करना (12)
मगर मज़्लूम से (13)
और अल्लाह सुनता जानता है (148) अगर तुम कोई भलाई खुले आम करो या छुपाकर या किसी की बुराई से दरगुज़र (क्षमा) करो तो बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला क़ुदरत वाला है  (14)(149)
वो जो अल्लाह और उसके रसूलों को नहीं मानते और चाहते हैं कि अल्लाह से उसके रसूलों को अलग कर दें(15)
और कहते हैं हम किसी पर ईमान लाए और किसी के इन्कारी हुए (16)
और चाहते हैं कि ईमान और कुफ़्र के बीच में कोई राह निकाल लें (150) यही हैं ठीक ठीक काफ़िर (17)
और हमने काफ़िरों के लिये ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है(151) और वो जो अल्लाह और उसके सब रसूलों पर ईमान लाए और उनमें से किसी पर ईमान में फर्क न किया उन्हें जल्द ही अल्लाह उनके सवाब देगा  (18)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (19) (152)

तफसीर
सूरए निसा _ इक्कीसवाँ रूकू
(1) क्योंकि हक़ीक़त में तो अल्लाह को धोख़ा देना सम्भव नहीं.

(2) ईमान वालों के साथ.

(3) क्योंकि ईमान तो है नहीं जिससे फ़रमाँबरदारी की लज़्ज़त और इबादत का लुत्फ़ हासिल हो. केवल दिखावा है. इसलिये मुनाफ़िक़ को नमाज़ बोझ मालूम होती है.

(4) इस तरह कि मुसलमानों के पास हुए तो नमाज़ पढ़ ली और अलग हुए तो ग़ायब.

(5) कुफ़्र और ईमान के.

(6) न ख़ालिस मूमिन, न खुले काफ़िर.

(7) इस आयत में मुसलमानों को बताया गया कि काफ़िरों को दोस्त बनाना मुनाफ़िक़ों की आदत है, तुम इससे बचो.

(8) अपने दोग़लेपन की, और जहन्नम के हक़दार हो जाओ

(9) मुनाफ़िक़ का अज़ाब काफ़िर से भी सख़्त है क्योंकि वह दुनिया में इस्लाम ज़ाहिर करके मुजाहिदों के हाथों से बचता रहा है और कुफ़्र के बावुजूद मुसलमानों को धोख़े में रखना और इस्लाम के साथ ठट्ठा करना उसकी आदत रही है.

(10) दोग़ली प्रवृत्ति से.

(11) दोनो दुनियाओ में.

पारा पाँच समाप्त

(12) यानी किसी के छुपे हाल का ज़ाहिर करना, इसमें पीठ पीछे बुराई भी आ गई, चुग़लख़ोरी भी, समझदार वह है जो अपने दोषो को देखे. एक क़ौल यह भी है कि बुरी बात से गाली मुराद है.

(13) कि उसको जायज़ है कि ज़ालिम के ज़ुल्म का बयान करे. वह चोर या ग़ासिब के बारे में कह सकता है कि उसने मेरा माल चुराया या ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा किया. एक शख़्स एक क़ौम का मेहमान हुआ था. उन्होंने अच्छी तरह उसकी मेज़बानी न की. जब वह वहाँ से निकला तो उनकी शिकायत करता निकला. इस घटना के बारे में यह आयत उतरी. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि यह आयत हज़रत अबुबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो के बारे में उतरी. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने आपकी शान में एक शख़्स ज़बान दराज़ी करता रहा. आपने कई बार ख़ामोशी की, मगर वह न रूका तो एक बार आपने उसको जवाब दिया. इस पर हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उठ खड़े हुए. हज़रत सिद्दीके अकबर ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, यह शख़्स मुझको बुरा भला कहता रहा तो हुज़ूर ने कुछ न फ़रमाया, मैं ने एक बार जवाब दिया तो हुज़ूर उठ गए. फ़रमाया, एक फ़रिश्ता तुम्हारी तरफ़ से जवाब दे रहा था, जब तुमने जवाब दिया तो फ़रिश्ता चला गया और शैतान आ गया. इसके बारे में यह आयत उतरी.

(14) तुम उसके बन्दों को माफ़ करो, वह तुम्हें माफ़ फ़रमाएगा. हदीस में है, तुम ज़मीन वालों पर रहम करो, आसमान वाला तुम पर रहम करेगा.

(15) इस तरह कि अल्लाह पर ईमान लाए और उसके रसूलों पर न लाएं.

(16) यह आयत यहूदियों और ईसाइयों के बारे में नाज़िल हुई कि यहूदी मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ कुफ़्र किया.

(17) कुछ रसूलों पर ईमान लाना उन्हें कुफ़्र से नहीं बचाता क्योंकि एक नबी का इन्कार भी सारे नबियों के इन्कार के बराबर है.

(18) बड़े गुनाह करने वाले भी इसमें दाख़िल है. क्योंकि वह अल्लाह और उसके सब रसूलों पर ईमान रखता है. मुअतज़िला सिर्फ़ कबीरा गुनाह करने वालो के लिये अज़ाब दिये जाने का अक़ीदा रखते हैं. इस आयत से उनके इस अक़ीदे का रद किया गया.

(19) यह आयत सिफ़ाते फ़ेअलिया (जैसे कि मग़फ़िरत व रहमत) के क़दीम होने को प्रमाणित करती है क्योंकि हुदूस के मानने वाले को कहना पड़ता है कि अल्लाह तआला (मआज़ल्लाह) अज़ल में ग़फूर व रहीम नहीं था, फिर हो गया. उसके इस क़ौल को यह आयत बातिल करती है.