सूरए निसा _ आठवाँ रूकू

सूरए निसा _ आठवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
क्या तुमने वो न देखे जिन्हें किताब का एक हिस्सा मिला ईमान लाते हैं बुत और शैतान पर और काफ़िरों को कहते हैं कि ये
मुसलमानों से ज़्यादा राह पर हैं (51) ये हैं जिनपर अल्लाह ने लानत की  और  जिसे ख़ुदा लानत करें तो कभी उसका कोई
यार न पाएगा (1) (52)
क्या मुल्क में उनका कुछ हिस्सा है (2)
ऐसा हो तो लोगों को तिल भर न दें (53) या लोगों से हसद (ईषर्या) करते हैं (3)
उस पर जो अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से दिया(4)
तो हमने तो इब्राहीम की औलाद को किताब  और हिकमत (बोध) अता फ़रमाई और उन्हें बड़ा मुल्क दिया (5)(54)
तो उनमें कोई उसपर ईमान लाया (6)
और किसी ने उससे मुंह फेरा (7)
और दोज़ख़ काफ़ी है भड़कती आग (8)(55)
जिन्होंने हमारी आयतों का इन्कार किया जल्द ही हम उनको आग में दाख़िल करेंगे जब कभी उनकी खालें पक जाएंगी हम उनके
सिवा और खालें उन्हें बदल देंगे कि अज़ाब का मज़ा लें बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है (56) और जो लोग ईमान लाए
और अच्छे काम किये जल्द ही हम उन्हें बाग़ों में ले जाएंगे जिनके नीचे नहरे बहें उन में हमशा रहेंगे, उनके लिये वहां सुथरी बीबीयां हैं (9)
और हम उन्हें वहां दाख़िल करेंगे जहां साया ही साया होगा (10)  (57)
बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें जिन की हैं उन्हें सुपुर्द करो (11)
और यह कि जब तुम लोगों में फैसला करो तो इन्साफ़ के साथ फैसला करो (12)
बेशक अल्लाह तुम्हें क्या ही ख़ूब नसीहत फ़रमाता है बेशक अल्लाह सुनता देखता है (58)
ऐ ईमान वालों हुक्म मानों अल्लाह का और हुक्म मानो रसूल का (13)
और उनका जो तुममें हुकूमत वाले हैं (14)
फिर अगर तुममें किसी बात का झगड़ा उठे तो उसे अल्लाह और रसूल के हुज़ूर रूजू (पेश) करो और अल्लाह और क़यामत पर ईमान रखते हो (15)
यह बेहतर है और इसका अन्जाम सबसे अच्छा (59)

तफसीर
सूरए निसा – आठवाँ रूकू

(1) यह आयत कअब बिन अशरफ़ वग़ैरह यहूदी आलिमों के बारे में उतरी जो सत्तर सवारों की जमाअत लेकर क़ुरैश से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ जंग करने पर हलफ़ लेने पहुंचे, क़ुरैश ने उनसे कहा कि चूंकि तुम किताब वाले हो इसलिये तुम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के साथ ज़्यादा क़ुर्ब रखते हो, हम कैसे इत्मीनान करें कि तुम हमसे धोखे के साथ नहीं मिल रहे हो. अगर इत्मीनान दिलाना हो तो हमारें बुतों को सज्दा करो. तो उन्होंने शैतान की फ़रमाँबरदारी करके बुतों को सज्दा किया, फिर अबू सुफ़ियान ने कहा कि हम ठीक राह पर हैं या मुहम्मद ? कअब बिन अशरफ़ ने कहा, तुम्ही ठीक राह पर हो. इस पर यह आयत उतरी और अल्लाह तआला ने उन पर लानत फ़रमाई कि उन्होंने हुज़ूर की दुश्मनी में मुश्रिकों के बुतों तक को पूज लिया.

(2) यहूदी कहते थे कि हम सल्तनत और नबुव्वत के ज़्यादा हक़दार हैं तो हम कैसे अरबों का अनुकरण और फ़रमाँबरदारी करें. अल्लाह तआला ने उनके दावे को झुटला दिया कि उनका सल्तनत में हिस्सा ही क्या है. और मान लिया जाय कुछ होता भी, तो उनका बुख़्ल और कंजूसी इस दर्जें की है कि…..

(3) नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और ऐहले ईमान से.

(4) नबुव्वत और विजय और ग़लबा और सम्मान वग़ैरह नेअमतें.

(5) जैसा कि हज़रत यूसुफ़ और हज़रत दाऊद और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को, तो अगर अपने हबीब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर करम और मेहरबानी की तो उससे क्यों जलते और हसद करते हो.
(6) जैसा कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथ वाले सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाए.

(7) और ईमान से मेहरूम रहा.

(8) उसके लिये जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान ना लाए.

(9) जो हर निजासत, गन्दगी और नफ़रत के क़ाबिल चीज़ों से पाक हैं.

(10) यानी जन्नत का साया, जिसकी राहत, आसायश को न समझा जा सकता है, न ही बयान किया जा सकता है.

(11) अमानतें रखने वालों और हाकिमों को अमानतें ईमानदारी के साथ हक़दार को अदा करने और फ़ैसलों में इन्साफ़ करने का हुक्म दिया. मुफ़स्सिरों का कहना है कि फ़राइज़ भी अल्लाह तआला की अमानतें हैं, उनकी अदायगी का हुक्म भी इसमें दाख़िल है.

(12) पक्षों में से बिल्कुल किसी की रिआयत न हो. उलमा ने फ़रमाया कि हाकिम को चाहिये कि पांच बातों में पक्षों के साथ बराबर का सुलूक करे. (1) अपने पास आने में जैसे एक को मौक़ा दे दूसरे को भी दे. (2) बैठने की जगह दोनों को एक सी दे. (3) दोनों की तरफ़ बराबर ध्यान दें. (4) बात सुनने में हर एक के साथ एक ही तरीक़ा रखे. (5) फ़ैसला देने में हक़ की रिआयत करे, जिसका दूसरे पर अधिकार हो पूरा दिलाए. हदीस शरीफ़ में है, इन्साफ़ करने वालों को अल्लाह के क़ुर्ब में नूरी मिम्बर अता होंगे. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में इस घटना का ज़िक्र किया है कि मक्का की वज़य के वक़्त सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसमान बिन तलहा. काबे के ख़ादिम से काबे की चाबी ले ली. फिर जब यह आयत उतरी तो आपने वह चाबी उन्हें वापस दी और फ़रमाया कि अब यह चाबी हमेशा तुम्हारी नस्ल में रहेगी. इस पर उसमान बिन तलहा हजबी इस्लाम लाए. अगरचे यह घटना थोड़ी थोड़ी तबदीलियों के साथ बहुत से मुहद्दिसों ने बयान की है मगर हदीसों पर नज़र करने से यह सही मालूम नहीं होती. क्योंकि इब्ने अब्दुल्लाह और इब्ने मुन्दा और इब्ने असीर
की रिवायतों से मालूम होता है कि उसमान बिन तलहा आठ हिजरी मे मदीनए तैय्यिबह हाज़िर होकर इस्लाम ला चुके थे और उन्होंने फ़त्हे मक्का के रोज़ चाबी अपनी ख़ुशी से पेश की थी. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीसों से यही निष्कर्ष निकलता है.

(13) कि रसूल की फ़रमाँबरदारी अल्लाह ही की फ़रमाँबरदारी है. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, जिसने मेरी फ़रमाँबरदारी की उसने अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की और जिसने मेरी नाफ़रमानी की, उसने अल्लाह की नाफ़रमानी की.

(14) इसी हदीस में हुज़ूर फ़रमाते हैं, जिसने सरदार की फ़रमाँबरदारी की उसने मेरी फ़रमाँबरदारी की. जिसने सरदार की नाफ़रमानी की उसने मेरी नाफ़रमानी की. इस आयत से साबित हुआ कि मुसलमान सरदारों और हाकिमों की आज्ञा का पालन वाजिब है जब तक वो हक़ के अनुसार रहें और अगर हक़ के ख़िलाफ़ हुक्म करें, तो उनकी फ़रमाँबरदारी नहीं.
(15) इस आयत से मालूम हुआ कि अहकाम तीन क़िस्म के हैं, एक वो जो ज़ाहिरे किताब यानी क़ुरआन से साबित हो, एक वो जो ज़ाहिरे हदीस से, एक वो जो क़ुरआन और हदीस की तरफ़ क़यास के तौर पर रूजू करने से. “उलिल अम्र” (जो हुकूमत करते हैं) में इमाम, अमीर, बादशाह, हाकिम, क़ाज़ी सब दाख़िल हैं. ख़िलाफ़ते कामिला तो ज़मानए रिसालत के बाद तीस साल रही, मगर ख़िलाफ़ते नाक़िसा अब्बासी ख़लीफ़ाओं में भी थी और अब तो इमामत भी नहीं पाई जाती. क्योंकि
इमाम के लिये क़ुरैश से होना शर्त है और यह बात अक्सर जगहों में ग़ायब है. लेकिन सुल्तान और इमारत बाक़ी है और चूंकि सुल्तान और अमीर भी उलुल अम्र में दाख़िल हैं इसलिये हमपर उनकी इताअत भी लाज़िम है.

सूरए निसा – नवाँ रूकू

सूरए निसा – नवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

क्या तुमने उन्हें न देखा जिनका दावा है कि वो ईमान लाए उसपर जो तुम्हारी तरफ़ उतरा और उसपर जो तुमसे पहले उतरा फिर चाहते हैं कि शैतान को अपना पंच बनाएं और उनको हुक्म यह था कि उसे बिल्कुल न मानें और इबलीस यह चाहता है कि उन्हें दूर बहका दे(1) (60)
और जब उनसे कहा जाए कि अल्लाह की उतारी हुई किताब और रसूल की तरफ़ आओ तो तुम देखोगे कि मुनाफ़िक़ (दोग़ले लोग) तुमसे मुंह मोड़ कर फिर जाते हैं  (61) कैसी होगी जब उनपर कोई उफ़ताद  (मुसीबत) पड़े(2)
बदला उसका जो उनके हाथों ने आगे भेजा (3)
फिर ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों अल्लाह की क़सम खाते कि हमारा इरादा तो भलाई और  मेल ही था (4) (62)
उनके दिलों की तो बात अल्लाह जानता है तो तुम उनसे चश्मपोशी करो (नज़र फेरलो) और उन्हें समझा दो और उनके मामले में उनसे रसा बात कहो(5) (63)
और हमने कोई रसूल न भेजा मगर इसलिये कि अल्लाह के हुक्म से उसकी इताअत (आज्ञा पालन) की जाए (6)
और अगर जब वह अपनी जानों पर ज़ुल्म करें(7)
तो ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों और फिर अल्लाह से माफ़ी चाहें और रसूल उनकी शफ़ाअत फ़रमाए तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पाएं (8)(64)
तो ऐ मेहबूब तुम्हारे रब की क़सम वो मुसलमान न होंगे जबतक अपने आपस के झगड़े में तुम्हें हाकिम न बनाएं फिर जो कुछ तुम हुक्म फ़रमा दो अपने दिलों में उस से रूकावट न पाएं और जिसे मान लें (9)(65)
और अगर हम उनपर फ़र्ज़ करते कि अपने आपको क़त्ल कर दो या अपने घरबार छोड़ कर निकल  जाओ (10)
तो उनमें थोड़े ही  ऐसा करते और अगर वो करते जिस बात की उन्हें नसीहत दी जाती है (11)
तो इसमें उनका भला था और ईमान पर ख़ूब जमना (66) और ऐसा होता तो ज़रूर हम उन्हेंअपने पास से बड़ा सवाब देते (67) और ज़रूर उनको सीधी राह की हिदायत करते (68) और जो अल्लाह  और उसके रसूल का हुक्म माने तो उसे उनका साथ मिलेगा जिनपर अल्लाह ने फ़ज़्ल किया यानी नबी (12)
और सिद्दिक़ीन (सच्चाई वाले) (13)
और शहीद(14)
और नेक लोग(15)
ये क्या ही अच्छे साथी हैं  (69) यह अल्लाह का फ़ज़्ल है और अल्लाह काफ़ी है जानने वाला (70)

तफसीर
सूरए निसा – नवाँ रूकू

(1) बिशर नामी एक मुनाफ़िक़ का एक यहूदी से झगड़ा था. यहूदी ने कहा चलो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से तय करा लें. मुनाफ़िक़ ने ख़याल किया कि हुज़ूर तो रिआयत किये बिना केवल सच्चा ही फ़ैसला देंगे, उसका मतलब हासिल न होगा. इसलिये उसने ईमान का दावा रखने के बावुजूद यह कहा कि कअब बिन अशरफ़ यहूदी को पंच बनाओ (क़ुरआने मजीद में ताग़ूत से इस कअब बिन अशरफ़ के पास फ़ैसला ले जाना मुराद है) यहूदी जानता था कि कअब रिशवत खाता है, इसलिये उसने सहधर्मी होने के बावुजूद उसको पंच तसलीम नहीं किया. नाचार मुनाफ़िक़ को फ़ैसले के लिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में आना पड़ा. हुज़ूर ने जो फ़ैसला दिया, वह यहूदी के हक़ में हुआ. यहाँ से फ़ैसला सुनने के बाद फिर मुनाफ़िक़ यहूदी से ज़िद करने लगा और उसे मजबूर करके हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो के पास लाया. यहूदी ने आपसे अर्ज़ किया कि मेरा इसका मामला सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तय फ़रमा चुके, लेकिन यह हुज़ूर के फ़ैसले से राज़ी नहीं. आप से फ़ैसला चाहता है. फ़रमाया कि हाँ मैं अभी आकर फ़ैसला करता हूँ यह फ़रमाकर मकान में तशरीफ़ ले गए और तलवार लाकर उस मुनाफ़िक़ को क़त्ल कर दिया और फ़रमाया जो अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले से राज़ी न हो उसका मेरे पास यह फ़ैसला है.

(2) जिससे भागने बचने की कोई राह न हो जैसी कि बिशर मुनाफ़िक़ पर पड़ी कि उसको हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने क़त्ल कर दिया.

(3) कुफ़्र और दोहरी प्रवृत्ति और गुनाह, जैसा कि बिशर मुनाफ़िक़ ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के फ़ैसले से मुंह फेर कर किया.

(4) और वह माफ़ी और शर्मिन्दगी कुछ काम न दे, जैसा कि बिशर मुनाफ़िक़ के मारे जाने के बाद उसके सरपरस्त उसके ख़ून का बदला तलब करने आए और बेजा माज़िरतें करने और बातें बनाने लगे. अल्लाह तआला ने उसके ख़ून का कोई बदला न दिया क्योंकि वह मारे ही जाने के क़ाबिल था.

(5) जो उनके दिल में असर कर जाएं.

(6) जबकि रसूल का भेजना ही इसलिये है कि वो फ़रमाँबरदारी के मालिक बनाए जाएं और उनकी आज्ञा का पालन फ़र्ज़ हो. तो जो उनके हुक्म से राज़ी न हो उसने रिसालत को तसलीम न किया, वह काफ़िर क़त्ल किये जाने के क़ाबिल है.

(7) गुनाह और नाफ़रमानी करके.

(8) इससे मालूम हुआ कि अल्लाह की बारगाह में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को वसीला और आपकी शफ़ाअत काम बन जाने का ज़रिया है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ाते शरीफ़ के बाद एक अरब देहाती आपके मुबारक रौज़े पर हाज़िर हुआ और रोज़ए शरीफ़ की पाक मिट्टी अपने सर पर डाली और अर्ज़ करने लगा, या रसूलल्लाह, जो आपने फ़रमाया हमने सुना और जो आप पर उतरा उसमें यह आयत भी है “वलौ अन्नहुम इज़ ज़लमू”. मैंने बेशक अपनी जान पर ज़ुल्म किया और मैं आपके हुज़ूर में अल्लाह से अपने गुनाह की बख़्शिश चाहने हाज़िर हुआ तो मेरे रब से मेरे गुनाह की बख़्शिश कराईये. इस पर क़ब्र शरीफ़ से आवाज़ आई कि तेरी बख़्शिश की गई. इससे कुछ मसअले मालूम हुए. अल्लाह तआला की बारगाह में हाजत अर्ज़ करने के लिये उसके प्यारों को वसीला बनाना कामयाबी का ज़रिया है. क़ब्र पर हाजत के लिये जाना भी ” जाऊका” में दाख़िल है. और पिछले नेक लोगों का तरीक़ा रहा है. वफ़ात के बाद अल्लाह के प्यारों को “या” के साथ पुकारना ज़ायज़ है. अल्लाह के मक़बूल बन्दे मदद फ़रमाते हैं और उनकी दुआ से हाजत पूरी होती है.

(9) मानी ये हैं कि जब तक आपके फ़ैसले और हुक्म को दिल की सच्चाई से न माने लें, मुसलमान नहीं हो सकते. सुब्हानल्लाह, इससे रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान ज़ाहिर होती है. पहाड़ से आने वाला पानी जिससे बाग़ों में सिंचाई करते हैं, उसमें एक अन्सारी का हज़रत ज़ुबैर रदियल्लाहो अन्हो से झगड़ा हुआ. मामला सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर पेश किया गया. हुज़ूर ने फ़रमाया, ऐ ज़ुबैर तुम अपने बाग़ को पानी देकर अपने पड़ौसी की तरफ़ पानी छोड़ दो. यह अन्सारी को बुरा लगा और उसको ज़बान से यह कलिमा निकला कि ज़ुबैर आपके फुफीज़ाद भाई हैं. इसके बावुजूद कि फ़ैसले में हज़रत ज़ुबैर को अन्सारी के साथ ऐहसान की हिदायत फ़रमाई गई थी लेकिन अन्सारी ने इसकी क़द्र न की तो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत ज़ुबैर को हुक्म दिया कि अपने बाग़ को भरपूर पानी देकर पानी रोक लो. इस पर आयत उतरी.

(10) जैसा कि बनी इस्त्राईल को मिस्त्र से निकल जाने और तौबह के लिये अपने आपको क़त्ल का हुक्म दिया था. साबित बिन क़ैस बिन शम्मास से एक यहूदी ने कहा कि अल्लाह ने हम पर अपना क़त्ल और घर बार छोड़ना फ़र्ज़ किया था, हमने उसको पूरा किया. साबित न फ़रमाया कि अगर अल्लाह हम पर फ़र्ज़ करता तो हम भी ज़रूर हुक्म पूरा करते. इस पर यह आयत उतरी.

(11) यानी रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फ़रमाँबरदारी और आपकी आज्ञा के पालन की.

(12) तो नबियों के मुख़लिस फ़रमाँबरदार, जन्नत में उनकी सोहबत और दर्शन से मेहरूम न होंगे.

(13) ” सिद्दीक ” नबियों के सच्चे अनुयाइयों को कहते हैं, जो सच्चे दिल से उनकी राह पर क़ायम रहें. मगर इस आयत में नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बड़ी बुज़ुर्गी वाले सहाबा मुराद है जैसे कि हज़रत अबूबक्र सिद्दीक रदियल्लाहो तआला अन्हो.

(14) जिन्होंने ख़ुदा की राह में जानें दीं.

(15) वह दीनदार जो बन्दों के हक़ और अल्लाह के हक़ दोनों अदा करें और उनके ज़ाहिर और छुपवाँ हाल अच्छे और पाक हों. हज़रत सोअबान सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ बहुत महब्बत रखते थे. जुदाई की ताक़त न थी. एक रोज़ इस क़द्र ग़मगीन और रंजीदा हाज़िर हुए कि रंग बदल गया था. हुज़ूर ने फ़रमाया आज रंग क्यों बदला हुआ है. अर्ज़ किया न मुझे कोई बीमारी है न दर्द, सिवाय इसके कि जब हुज़ूर सामने नहीं होते तो बहुत ज़्यादा वहशत और परेशानी होती है. जब आख़िरत को याद करता हूँ तो यह अन्देशा होता है कि वहाँ में किस तरह दीदार पा सकूंगा. आप सबसे ऊंचे दर्जे में होंगे, मुझे अल्लाह तआला ने अपनी मेहरबानी से जन्नत दी भी तो उस ऊंचे मक़ाम तक पहुंच कहाँ इस पर यह आयत उतरी और उन्हें तसल्ली दी गई कि दर्ज़ों के फ़र्क़ के बावुजूद फ़रमाँबरदारों को मुलाक़ात और साथ रहने की नेअमत से नवाज़ा जाएगा.

सूरए निसा – दसवाँ रूकू

सूरए निसा – दसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालों होशियारी से काम लो (1)
दुश्मन की तरफ़ थोड़े थोड़े होकर निकलो या इकट्ठे चलो (71) और तुम में कोई वह है फिर ज़रूर देर लगाएगा (2)
फिर तुमपर कोई मुसीबत पड़े तो कहे खुदा का मुझपर एहसान था कि मैं उनके साथ हाज़िर न था (72)और अगर तुम्हें अल्लाह का फ़ज़्ल मिले (3)
तो ज़रूर कहे (4)
गोया तुममें उसमें कोई दोस्ती न थी  ऐ काश मैं उनके साथ होता तो बड़ी मुराद पाता  (73) तो उन्हें अल्लाह की राह में लड़ना चाहिये जो दुनिया की ज़िन्दग़ी बेचकर आख़िरत लेते हैं और जो अल्लाह की राह में  (5)
लड़े फिर मारा जाए या ग़ालिब (विजयी) आए तो जल्द ही हम उसे बड़ा सवाब देंगे  (74) और तुम्हें क्या हुआ कि न लड़ो अल्लाह की राह में  और कमज़ोर मर्दों  और औरतों  और बच्चों के वास्तें यह दुआ कर रह हैं कि  ऐ हमारे रब हमें इस बस्ती से निकाल जिसके लोग ज़ालिम हैं और हमें अपने पास से कोई मददगार दे दे (75) ईमान वाले अल्लाह की राह में लड़ते हैं (6)
और काफ़िर शैतान की राह में लड़ते हैं तो शैतान के दोस्तों से (7)
लड़ो बेशक शैतान का दाव कमज़ोर है  (8) (76)

तफसीर
सूरए निसा – दसवाँ रूकू

(1) दुश्मन की घात से बचो और उसे अपने ऊपर मौक़ा न दो. एक क़ौल यह भी है कि हथियार साथ रखो. इससे मालूम हुआ कि दुश्मन के मुक़ाबले में अपनी हिफ़ाज़त की तदबीरें जायज़ हैं.

(2) यानी दोग़ली प्रवृत्ति वाले मुनाफ़िक़.

(3) तुम्हारी जीत हो और दुश्मन का माल यानी ग़नीमत हाथ आए.

(4) वही जिसके कथन से यह साबित होता है कि…………

(5) यानी जिहाद फ़र्ज़ है और इसे छोड़ देने का तुम्हारे पास कोई बहाना नहीं है.

(6) इस आयत में मुसलमानों को जिहाद की रूचि दिलाई गई ताकि वो उन कमज़ोर मुसलमानों को काफ़िरों के अत्याचारी पंजे से छुड़ाएं जिन्हे मक्कए मुकर्रमा में मुश्रिकों ने क़ैद कर लिया था और तरह तरह की यातनाएं और तकलीफ़ दे रहे थे और उनकी औरतों और बच्चों तक पर बेरहमी से अत्याचार कर रहे थे और वो लोग उनके हाथों में मजबूर थे. इस हालत में वो अल्लाह तआला से रिहाई और मदद की दुआएं करते थे. ये दुआएं क़ुबूल हुई और अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उनका सरपरस्त और मददगार बनाया और उन्हें मुश्रिकों के हाथों से छुड़ाया और मक्कए मुकर्रमा फ़त्ह करके उनकी ज़बरदस्त मदद फ़रमाई.

(7) दीन के प्रचार और अल्लाह की ख़ुशी के लिये.

(8) यानी काफ़िरों का और वह अल्लाह की मदद के मुक़ाबले में क्या चीज़ है.

सूरए निसा – ग्यारहवाँ रूकू

सूरए निसा – ग्यारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

क्या तुमने उन्हें न देखा जिनसे कहा गया अपने हाथ रोक लो  (1)
और नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो फिर जब उनपर जिहाद फ़र्ज़ किया गया (2)
तो उनमें से कुछ लोगों से ऐसा डरने लगे जैसे अल्लाह से डरे या इससे भी ज़्यादा (3)
और बोले ऐ रब हमारे तूने हमपर जिहाद क्यों फ़र्ज़ कर दिया (4)
थोड़ी मुद्दत तक हमें और जीने दिया होता तुम फ़रमादो कि दुनिया का बरतना थोड़ा है (5)
और डर वालों के लिये आख़िरत अच्छी और तुमपर तागे बराबर ज़ुल्म न होगा (6)
(77)
तुम जहां कहीं हो मौत तुम्हें आ लेगी (7)
अगरचे मज़बूत क़िलों में हो और उन्हें कोई भलाई पहुंचे (8)
तो कहें यह अल्लाह की तरफ़ से है और उन्हें कोई बुराई पहुंचे (9)
तो कहे यह हुज़ूर की तरफ़ से आई(10)
तुम फ़रमा दो सब अल्लाह की तरफ़ से है(11)
तो उन लोगों को क्या हुआ कोई बात समझते मालूम ही नहीं होते  (78) ऐ सुनने वाले तुझे जो भलाई पहुंचे वह अल्लाह की तरफ़ से है (12)
और जो बुराई पहुंचे वह तेरी अपनी तरफ़ से है (13)
और ऐ मेहबूब हमने तुम्हें सब लोगों के लिये रसूल भेजा (14)
और अल्लाह काफ़ी है गवाह(15) (79)
जिसने रसूल का हुक्म माना बेशक उसने अल्लाह का हुक्म माना  (16)
और जिसने मुंह फेरा  (17)
तो हमने तुम्हें उनके बचाने को न भेजा(80) और कहते हैं हमने हुक्म माना (18)
फिर जब तुम्हारे पास से निकल कर जाते हैं तो उनमें एक दल जो कह गया था उसके ख़िलाफ़ रात को मन्सूबे (योजनाएं) गांठता है और अल्लाह लिख रखता है उसके रात के मन्सूबे (19)
तो ऐ मेहबूब तुम उनसे चश्मपोशी करो और अल्लाह पर भरोसा रखो  और अल्लाह काफ़ी है काम बनाने को (81) तो क्या ग़ौर नहीं करते क़ुरआन में (20)
और अगर वह ग़ैरख़ुदा के पास से होता तो ज़रूर उसमें बहुत इख़्तिलाफ़ (भिन्नता) पाते  (21)
(82) और जब उनके पास कोई बात इत्मिनान (22)
या डर (23)
की आती है उसका चर्चा कर बैठते हैं  (24)
और अगर उसमें रसूल और अपने हुक्म वाले लोगों (25)
की तरफ़ रूज़ू लाते (26)
तो ज़रूर उनसे इसकी हक़ीक़त जान लेते, ये जो बाद में काविश  (प्रयत्न) करते हैं (27)
और अगर तुमपर अल्लाह का फ़ज़्ल (28)
और उसकी रहमत (29) न होती तो ज़रूर तुम शैतान के पीछे लग जाते  (30)
मगर थोड़े(31) (83)
तो ऐ मेहबूब अल्लाह की राह में लड़ो (32)
तुम तक़लीफ़ न दिये जाओगे मगर अपने दम की  (33)
और  मुसलमानों को तैयार करो क़रीब है (34)
कि अल्लाह काफ़िरों की सख़्ती रोक दे (35)
और अल्लाह की आंच सबसे सख़्ततर है और उसका अज़ाब सबसे कर्रा (ज़बरदस्त) (84) जो अच्छी सिफ़रिश करे (36)
उसके लिये उसमें से हिस्सा है (37)
और जो बुरी सिफ़रिश करे उसके लिये उसमें से हिस्सा है (38)
और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है (85) और जब तुम्हें कोई किसी लफ़्ज़ से सलाम करे तो तुम उससे बेहतर लफ़्ज़ जवाब में कहो या वही कह दो बेशक अल्लाह हर चीज़ पर हिसाब लेने वाला है(39) (86)
अल्लाह है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं और वह ज़रूर तुम्हें इकट्ठा करेगा क़यामत के दिन जिसमें कुछ शक नहीं और अल्लाह से ज़्यादा किस की बात सच्ची (40)(87)
तफसीर
सूरए निसा – ग्यारहवाँ रूकू

(1) जंग से. मक्के के मुश्रिक मुसलमानों को बहुत तकलीफ़े देते थे. हिजरत से पहले रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा की एक जमाअत ने हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया कि आप हमें काफ़िरों से लड़ने की इजाज़त दीजिये, उन्होंने हमें बहुत सताया है और बहुत तकलीफ़े पहुंचाते हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया कि उनके साथ जंग करने से हाथ रोको, नमाज़, और ज़कात, जो तुम पर फ़र्ज़ है, वह अदा करते रहो. इससे साबित हुआ कि नमाज़ और ज़कात जिहाद से पहले फ़र्ज़ हुए.

(2) मदीनए तैय्यिबह में और बद्र की हाज़िरी का हुक्म दिया गया.

(3) यह डर क़ुदरती था कि इन्सान की आदत है कि मौत और हलाकत से घबराता और डरता है.

(4) इसकी हिकमत क्या है, यह सवाल हिकमत की वजह दरियाफ़त करने के लिये था न कि एतिराज़ के तौर पर. इसीलिये उनको इस सवाल पर फटकारा न गया, बल्कि तसल्ली वाला जवाब अता फ़रमा दिया गया.

(5) ख़त्म हो जाने वाला और नश्वर है.

(6) और तुम्हारे इनाम कम न किये जाएंगे तो जिहाद में डर और हिचकिचाहट से काम न लो.

(7) और इससे रिहाई पाने की कोई सूरत नहीं और जब मौत अटल है तो बिस्तर पर मर जाने से ख़ुदा की राह में जान देना बेहतर है कि यह आख़िरत की सआदत या ख़ुशनसीबी का कारण है.

(8) पैदावार वग़ैरह के सस्ता और ज़्यादा होने की.

(9) मेंहगाई और अकाल वग़ैरह.

(10) यह हाल मुनाफ़िक़ों का है कि जब उन्हें कोई सख़्ती पेश आती है तो उसको सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तरफ़ जोड़ देते और कहते जब से यह आए हैं ऐसी ही सख़्तियाँ पेश आया करती हैं.

(11) मेंहगाई हो या सस्तापन, अकाल हो या ख़ुशहाली, रंज हो या राहत, आराम हो या तकलीफ़, विजय हो या पराजय, हक़ीक़त में सब अल्लाह की तरफ़ से है.

(12) उसकी मेहरबानी और रहमत है.

(13) कि तूने ऐसे गुनाह किये कि तू इसका हक़दार हुआ. यहाँ बुराई की निस्बत बन्दे की तरफ़ मजाज़ है और ऊपर जो बयान हुआ वह हक़ीक़त थी. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि बुराई की निस्बत बन्दे की तरफ़ अदब के तौर पर है. खुलासा यह है कि बन्दा जब अल्लाह की तरफ़ नज़र करे तो हर चीज़ को उसीकी तरफ़ से जाने और जब कारणों पर नज़र करे तो बुराइयों को अपने नफ़्स की बुराई के कारण से समझे.

(14) अरब हों या अजम, आप तमाम सृष्टि के लिये रसूल बनाए गए और सारा जगत उम्मत बनाया गया. यह सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ऊंचे दर्जे और इज़्ज़त का बयान है.

(15) आपकी आम रिसालत पर, तो सबपर आपकी आज्ञा का पालन और आपका अनुकरण फ़र्ज़ है.

(16) रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, जिसने मेरी फ़रमाँबरदारी की उसने अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की और जिसने मुझसे महब्बत की उसने अल्लाह से महब्बत की. इस पर आजकल के गुस्ताख़ बददीनों की तरह उस ज़माने के कुछ मुनाफ़िक़ों ने कहा कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम यह चाहते हैं कि हम उन्हें रब मान लें, जैसा ईसाईयों ने हज़रत ईसा बिन मरयम को रब माना, इस पर अल्लाह तआला ने उसके रद में यह आयत उतार कर अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कलाम की तस्दीक़ फ़रमादी कि बेशक रसूल की फ़रमाँबरदारी अल्लाह की फ़रमाँबरदारी है.

(17) और आपकी फ़रमाँबरदारी से मुंह फेरा.

(18) यह आयत मुनाफ़िक़ों के हक में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में ईमान और फ़रमाँबरदारी ज़ाहिर करते थे और कहते थे कि हम हुज़ूर पर ईमान लाए हैं, हमने हुज़ूर की तस्दीक़ की है. हुज़ूर हमें जो हुक्म फ़रमाएं उसकी इताअत हम पर लाज़िम हैं.

(19) उनके आमालनामों में और उसका उन्हें बदला देगा.

(20) और उसके इल्म और हिकमत को नहीं देखते कि उसने अपनी फ़साहत से सारी सृष्टि को आजिज़ कर दिया है और ग़ैबी ख़बरों से मुनाफ़िक़ों के अहवाल और उनके छलकपट का राज़ खोल दिया और अगले पिछलों की ख़बरें दी हैं.

(21) और आने वाले ज़माने के बारे में ग़ैबी ख़बरें मुताबिक़ नहीं होती और जब ऐसा न हुआ और क़ुरआने पाक की ख़बरों से आयन्दा पेश आने वाली घटनाएं मेल खाती चली गई तो साबित हुआ कि यक़ीनन वह अल्लाह की किताब है और उसके मज़ामीन में भी आपस में इख़्तिलाफ़ नहीं. इसी तरह फ़साहत और बलाग़त में भी, क्योंकि सारी सृष्टि का कलाम फ़सीह भी हो तो सब एक सा नहीं होता, कुछ बलीग़ होता है और कुछ निम्न स्तर का होता है जैसा कि शायरों और भाषाशास्त्रियों के कलाम में देखा जाता है कि कोई बहुत मज़ेदार है और कोई बहुत फीका. यह अल्लाह तआला ही के कलाम की शान है कि उसका तमाम कलाम फ़साहत और बलाग़त के सर्वोत्तम दर्जे पर है.

(22) यानी इस्लाम की जीत.

(23) यानी मुसलमानों की हार की ख़बर.

(24) जो बुराई का कारण होता है कि मुसलमानों की विजय की शोहरत और प्रसि़द्धि से तो काफ़िरों में जोश पैदा होता है और हार की ख़बर से मुसलमानों का साहस टूटता है.

(25) बुज़ुर्ग सहाबा जो राय वाले और नज़र वाले है.

(26) और ख़ुद कुछ दख़्ल न देते.

(27) मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया, इस आयत में क़यास के जायज़ होने की दलील है. और यह भी मालूम होता है कि एक इल्म वह है जो क़ुरआन की आयतों और हदीस से हासिल हो और एक इल्म वह है जो क़ुरआन और हदीस के मज़मून पर ग़ौर करके अपना नतीजा निकालने के ज़रिये हासिल होता है. यह भी मालूम हुआ कि दीन की बातों में हर शख़्स को दख़्ल देना जायज़ नहीं. जो योग्यता रखता हो उसी को इनमें पड़ना चाहिये.

(28) रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का नबी बनकर तशरीफ़ लाना.

(29) क़ुरआन का उतरना.

(30) और कुफ़्र और गुमराही में गिरफ़्तार रहते.

(31) वो लोग जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तशरीफ़ लाने और क़ुरआने पाक के उतरने से पहले आप पर ईमान लाए, जैसा ज़ैद बिन अम्र बिन नुफ़ैल और वरक़ह बिन नौफ़ल और क़ैस बिन साइदा.

(32) चाहे कोई तुम्हारा साथ दे या न दे और तुम अकेले रह जाओ.

(33) बद्रे सुग़रा की जंग जो अबू सूफ़ियान से ठहर चुकी थी, जब उसका वक़्त आ पहुंचा तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने वहाँ जाने के लिये लोगो को दावत दी. कुछ पर यह भारी गुज़रा तो अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुक्म दिया कि वो जिहाद न छोड़ें, चाहे अकेले हों. अल्लाह आपका मददगार है. अल्लाह का वादा सच्चा है. यह हुक्म पाकर रसूले करीम सललल्लाहो अलैहे वसल्लम बद्रे सुग़रा की जंग के लिये रवाना हुए. आपके साथ सिर्फ़ सत्तर सवार थे.

(34) उन्हें जिहाद की रूचि दिलाओ और बस.

(35) चुनांचे ऐसा ही हुआ कि मुसलमानों का यह छोटा सा लश्कर कामयाब आया और काफ़िरों पर ऐसा रोब छाया कि वो मुसलमानों के मुक़ाबले में मैदान में न आ सके. इस आयत से साबित हुआ कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम शुजाअत और बहादुरी में सबसे उत्तम हैं कि आपको अकेले काफ़िरों के मुक़ाबले में तशरीफ़ ले जाने का हुक्म हुआ और आप तैयार हो गए.

(36) किसी से किसी की, कि उसको नफ़ा पहुंचाए या किसी मुसीबत और बला से छुटकारा दिलाए और हो वह शरीअत के मुताबिक, तो………

(37) इनाम और बदला.

(38) अज़ाब और सज़ा.

(39) सलाम के मसाइल : सलाम करना सुन्नत है, और जवाब देना फ़र्ज़, और जवाब में बेहतर यह है कि सलाम करने वाले के सलाम पर कुछ बढ़ाए. मसलन पहला शख़्स अस्सलामो अलैकुम कहे तो दूसरा शख़्स “वअलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाह “ कहे. और अगर पहले ने ” व-रहमतुल्लाह” भी कहा तो यह व बरकातुहू और बढ़ाए. फिर इससे ज़्यादा सलाम और जवाब में और कोई बढ़ौत्री नहीं है. काफ़िर, गुमराह, फ़ासिक़ और इस्तिंजा करते मुसलमानों को सलाम न किया जाए. जो शख़्स ख़ुत्बा या तिलावते क़ुरआन या हदीस या इल्मी बहस या अज़ान या तकबीर में मशग़ूल हो, उस हाल में उसको सलाम न किया जाए और अगर कोई सलाम करे तो उस पर जवाब देना लाज़िम नहीं. और जो शख़्स शतरंज, चौसर, ताश, गंजफ़ा वग़ैरह, कोई नाजायज़ खेल खेल रहा हो या गाने बजाने में मशग़ूल हो या पाख़ाने या ग़ुस्लख़ाने में हो, या बिना मजबूरी के नंगा हो, उसको सलाम न किया जाए. आदमी जब अपने घर में दाख़िल हो तो बीबी को सलाम करे. हिन्दुस्तान में यह बड़ी ग़लत रस्म है कि शौहर और बीवी के इतने गहरे तअल्लुक़ात होते हुए भी एक दूसरे को सलाम से मेहरूम रखते हैं. जबकि सलाम जिसको किया जाता है उसके लिये सलामती की दुआ है. बेहतर सवारी वाला कमतर सवारी वाले को, और छोटा बड़े को, और थोड़े ज़्यादा को सलाम करें.

(40) यानी उससे ज़्यादा कोई सच्चा नहीं इसलिये कि उसका झूट असंभव, नामुमकिन और मुहाल है क्योंकि झूट बुराई और ऐब है, हर बुराई और ऐब अल्लाह पर मुहाल हैं. वह सारे ऐबों से पाक है.

सूरए निसा – बारहवाँ रूकू

सूरए निसा – बारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तो तुम्हें क्या हुआ कि मुनाफ़िक़ों के बारे में दो फ़रीक़ (पक्ष) हो गये  (1)
और अल्लाह ने उन्हें औंधा कर दिया  (2)
उनके कौतुकों की वजह से(3)
क्या यह चाहते हो कि उसे राह दिखाओ जिसे अल्लाह ने गुमराह किया और जिसे अल्लाह गुमराह करे तो कभी उसके लिये राह न पाएगा(88)  वो तो चाहते है कि कहीं तुम भी काफ़िर हो जाओ जैसे वो काफ़िर हुए तो तुम सब एकसे हो जाओ तो उनमें किसी को अपना दोस्त न बनाओ  (4)
जब तक अल्लाह की राह में घर बार न छोड़े  (5)
फिर अगर वो मुंह फेरें(6)
तो उन्हें पकड़ो  और जहां पाओ क़त्ल करो और उनमें किसी को दोस्त न ठहराओ न मददगार (7)
(89) मगर वो जो ऐसी क़ौम से तअल्लुक़ रखते हैं कि तुममें उनमें मुआहिदा (समझौता) है(8)
या तुम्हारे पास यूं आए कि उनके दिलों में सकत न रही कि तुमसे लड़ें  (9)
या अपनी क़ौम से लड़ें  (10)
और अल्लाह चाहता तो ज़रूर उन्हें तुम पर क़ाबू देता तो वो बेशक तुमसे लड़ते  (11)
फिर अगर वो तुमसे किनारा करें और न लड़ें और सुलह का पयाम डालें तो अल्लाह ने तुम्हें उनपर कोई राह न रखी (12)(90)
अब कुछ और तुम ऐसे पाओगे जो ये चाहते हैं कि तुम से भी आमान में रहें और अपनी क़ौम से भी आमान में रहें (13)
जब कभी उनकी क़ौम उन्हें फ़साद  (14)
की तरफ़ फेरे तो उसपर औंधे गिरते हैं फिर अगर वो तुमसे किनारा न करें और (15)
सुलह की गर्दन न डाले और अपने हाथ न रोके तो उन्हें पकड़ो और जहां पाओ क़त्ल करो और ये हैं कि जिनपर हमने तुमपर खुला इख़्तियार दिया (16) (91)

तफसीर
सूरए निसा – बारहवाँ रूकू

(1) मुनाफ़िक़ों की एक जमाअत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ जिहाद में जाने से रूक गई थी. उसके बारे में सहाबा के दो पक्ष हो गए. एक पक्ष क़त्ल पर ज़ोर देता था और एक उनके क़त्ल से इन्कार करता था. इस मामले में यह आयत उतरी.

(2) कि वो हुज़ूर के साथ जिहाद में जाने से मेहरूम रहें.

(3) उनके कुफ़्र और इर्तिदाद और मुश्रिकों के साथ मिलने के कारण, तो चाहिये कि मुसलमान भी उनके कुफ़्र में इख़्तिलाफ़ न करें.

(4) इस आयत में काफ़िरों के साथ मेल जोल को मना किया गया है. चाहे वो ईमान का इज़हार ही करते हो.

(5) और इससे उनके ईमान की तहक़ीक़ न हो ले.

(6) ईमान और हिजरत से, और अपनी हालत पर क़ायम रहें.

(7) और अगर तुम्हारी दोस्ती का दावा करें और मदद के लिये तैयार हों तो उनकी मदद क़ुबूल न करो.

(8) यह छूट क़त्ल की तरफ़ राजेअ है. क्योंकि काफ़िरों और मुनाफ़िक़ीन के साथ मेल जोल किसी हाल में जायज़ नहीं और एहद से वह एहद मुराद है कि उस क़ौम को और जो उस क़ौम से जा मिले उसको अम्न है जैसा कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मक्कए मुकर्रमा तशरीफ़ ले जाते वक़्त हिलाल बिन उमैर असलमी से मामला किया था.

(9) अपनी क़ौम के साथ होकर.

(10) तुम्हारे साथ होकर.

(11) लेकिन अल्लाह तआला ने उनके दिलों में रोब डाल दिया और मुसलमानों को उनके शर से मेहफ़ूज़ रखा.

(12) कि तुम उनसे जंग करो. कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि यह हुक्म आयत “उक्तुलुल मुश्रिकीना हैसो वजद तुमूहुम ” (यानी तो मुश्रिकों को मारो जहां पाओ) (सूरए तौबह, आयत पांच) से मन्सूख़ हो गया.

(13) मदीनए तैय्यिबह में असद और ग़तफ़ान क़बीले के लोग दिखावे के लिये इस्लाम का कलिमा पढ़ते और अपने आप को मुसलमान ज़ाहिर करते और जब उनमें से कोई अपनी क़ौम से मिलता और वो लोग उनसे कहते कि तुम किस चीज़ पर ईमान लाए तो वो लोग कहते कि बन्दरों बिच्छुओं वग़ैरह पर. इस अन्दाज़ से उनका मतलब यह था कि दोनों मुनाफ़िक़ थे. उनके बारे में यह आयत उतरी.

(14) शिर्क या मुसलमानों से जंग.

(15) जंग से बाज़ आकर.

(16) उनके खुले कुफ़्र और मुसलमानों को तकलीफ़ें पहुंचाने के कारण.

सूरए निसा – तैरहवाँ रूकू

सूरए निसा – तैरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और मुसलमानों को नहीं पहुंचता कि मुसलमान का ख़ून करे मगर हाथ बहक कर (1)
और जो किसी मुसलमान को भूले से क़त्ल करे तो उसपर एक ममलूक (ग़ुलाम) मुसलमान का आज़ाद करना है और ख़ूं बहा (जुर्माना) कि मक़तूल (मृतक) के लोगों को सुपुर्द की जाए (2)
मगर यह कि वो माफ़ कर दें फिर अगर वह (3)
उस क़ौम से हो जो तुम्हारी दुश्मन है (4)
और ख़ुद मुसलमान है तो सिर्फ़ एक ममलूक (ग़ुलाम) मुसलमान का आज़ाद करना  (5)
और अगर वह उस क़ौम में हो कि तुम में उनमें मुआहिदा (समझौता) है तो उसके लोगों को ख़ूं बहा (जुर्माना) सुपुर्द की जाए और एक मुसलमान ममलूक(ग़ुलाम) आज़ाद करना  (6)
तो जिसका हाथ न पहुंचे(7)
वह लगातार दो महीने के रोज़े रखे (8)
यह अल्लाह के यहां उसकी तौबह है और अल्लाह जानने वाला हिकमत वाला है (92)
और जो कोई मुसलमान को जानबूझकर क़त्ल करे तो उसका बदला जहन्नम है कि मुद्दतों उसमें रहे(9)
और अल्लाह ने उसपर ग़जब (प्रकोप) किया और उसपर लानत की और उसके लिये तैयार रखा बड़ा अज़ाब (93) ऐ ईमान वालों जब तुम जिहाद को चलो तो तहक़ीक़ (जांचपड़ताल) करलो और जो तुम्हें सलाम करे उससे यह न कहो कि तू मुसलमान नहीं (10)
तुम जीती दुनिया का असबाब (सामान) चाहते हो तो अल्लाह के पास बहुतेरी गनीमतें (परिहार)  हैं पहले तुम भी ऐसे ही थे (11)
फिर अल्लाह ने तुम पर एहसान किया (12)
कि तुम पर तहक़ीक़  (जांच) करना लाज़िम है(13)
बेशक अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है (94) बराबर नहीं वो मुसलमान कि बे उज्र (बिना मजबूरी) जिहाद से बैठ रहें और वो कि ख़ुदा कि राह में अपने मालों  और जानों के साथ जिहाद करते हैं (14)
अल्लाह ने अपनी जानों के साथ जिहाद करने वालों का दर्जा बैठने वालो से बड़ा किया(15)
और अल्लाह ने सबसे भलाई का वादा फ़रमाया (16)
और अल्लाह ने जिहाद वालों को  (17)
बैठने वालों पर बड़े सवाब से फ़ज़ीलत (प्रधानता) दी है(95)    उसकी तरफ़ से दर्जें और बख़्शिश और रहमत (18)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (96)
तफसीर
सूरए निसा – तैरहवाँ रूकू
(1) यानी मूमिन काफ़िर की तरह मार डालने के क़ाबिल नहीं है, जिसका हुक्म ऊपर की आयत में आया. तो मुसलमान का क़त्ल करना बिना हक़ के रवा नहीं और मुसलमान की शान नहीं कि उससे किसी मुसलमान का क़त्ल हो, सिवाय इसके कि भूल से हो, इस तरह कि मारता था शिकार को, या हर्बी काफ़िर को, और हाथ बहक कर लग गया मुसलमान को, या यह कि किसी शख़्स को हर्बी काफ़िर समझ कर मारा और था वह मुसलमान.

(2) यानी उसके वारिसों को दी जाए, वो उसे मीरास की तरह तक़सीम कर लें. दिय्यत क़त्ल होने वाले के तर्के के हुक्म में है. इससे मक़तूल का क़र्ज़ भी अदा किया जाएगा, वसिय्यत भी जारी की जाएगी.

(3) जो भूल से क़त्ल किया गया.

(4) यानी काफ़िर.

(5) लाज़िम है, और दिय्यत नहीं.

(6) यानी अगर मक़तूल ज़िम्मी हो तो उसका वही हुक्म है जो मुसलमान का.

(7) यानी वह किसी ग़ुलाम का मालिक न हो.

(8) लगातार रोज़ा रखना यह है कि इन रोज़ों के बीच रमज़ान और 10 से 13 ज़िलहज यानी तशरीक़ के दिन न हों और बीच में रोज़ों का सिलसिला किसी मजबूरी या बिना मजबूरी, किसी तरह तोड़ा न जाए. यह आयत अयाश बिन रबीआ मख़ज़ूमी के हक़ में उतरी. वह हिजरत से पहले मक्कए मुकर्रमा में इस्लाम लाए और घर वालों के ख़ौफ़ से मदीनए तैय्यिबह जाकर पनाह ली. उनकी माँ को इससे बहुत बेक़रारी हुई और उसने हारिस और अबूजहल, अपने दोनों बेटों से जो अयाश के सौतेले भाई थे, यह कहा कि ख़ुदा की क़सम न मैं साए में बैठूं, न खाना चखूं, न पानी पियूं, जब तक तुम अयाश को मेरे पास न ले आओ. वो दोनों हारिस बिन ज़ैद बिन अबी उनीसा को साथ लेकर तलाश के लिये निकले और मदीनए तैय्यिबह पहुंचकर अयाश को पालिया और उनको माँ की बेक़रारी बैचेनी और खाना पीना छोड़ने की ख़बर सुनाई और अल्लाह को बीच में देकर यह एहद किया कि हम दीन के बारे मे तुम से कुछ न कहेंगे, इस तरह वो अयाश को मदीने से निकाल लाए और मदीने से बाहर आकर उनको बाँधा और हर एक ने सौ सौ कोड़े मारे, फिर माँ के पास लाए, तो माँ ने कहा मैं तेरे बन्धन न खोलूंगी तू अपना दीन न छोड़ दे. फिर अयाश को धूप में बंधा हुआ डाल दिया और इन मुसीबतों में पड़कर अयाश ने उनका कहा मान लिया और अपना दीन छोड़ दिया तो हारिस बिन ज़ैद ने उनको बुरा भला कहा और कहा तू इसी दीन पर था, अगर यह सच्चा था तो तू ने सच्चाई को छोड़ दिया और अगर तू बातिल था तो तू बातिल दीन पर रहा. यह बात अयाश को बड़ी बुरी लगी और अयाश ने कहा कि मैं तुझको अकेला पाउंगा तो ख़ुदा की क़सम ज़रूर क़त्ल कर दूंगा. इसके बाद अयाश इस्लाम लाए और उन्होंने मदीनए तैय्यिबह हिजरत की और उनके बाद हारिस भी इस्लाम लाए और हिजरत करके रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में पहुंचे. लेकिन उस रोज़ अयाश मौजूद न थे, न उन्हें हारिस के इस्लाम की सूचना मिली. क़ुबा के क़रीब अयाश ने हारिस को पालिया और क़त्ल कर दिया तो लोगों ने कहा, अयाश तुमने बहुत बुरा किया, हारिस मुसलमान हो चुके थे. इस पर अयाश को बहुत अफ़सोस हुआ और उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमते अक़दस में जाकर वाक़िआ अर्ज़ किया और कहा कि मुझे क़त्ल के वक़्त तक उनके इस्लाम लाने की ख़बर ही न हुई, इस पर यह आयत उतरी.

(9) मुसलमान को जान बूझकर क़त्ल करना सख़्त गुनाह और बड़ा बुरा काम है. हदीस शरीफ़ में है कि दुनिया का हलाक करना अल्लाह के नज़दीक एक मुसलमान के हलाक करने से हलका है. फिर यह क़त्ल अगर ईमान की दुश्मनी से हो या क़ातिल इस क़त्ल को हलाल जानता हो तो यह भी कुफ़्र है. “ख़ूलूद” लम्बे समय के अर्थ में भी इस्तेमाल होता है. और क़ातिल अगर सिर्फ़ दुनियावी दुश्मनी से मुसलमान को क़त्ल करें और उसके क़त्ल को अच्छा ना जाने जब भी उसका बदला लम्बे समय के लिये जहन्न्म है. “ख़ुलूद” का लफ़्ज लम्बी मुद्दत के लिये इस्तेमाल होता तो क़ुरआने करीम में लफ़्ज अबद मज़कूर नहीं होता और काफ़िर के बारे में ख़ूलूद हमेशा के अर्थ में आया है तो इसके साथ अबद भी ज़िक्र फ़रमाया गया है. यह आयत मुक़ैय्यस बिन ख़ुबाबा के बारे में उतरी. उसके भाई बनी नज्जार क़बीले में मक़तूल पाए गए थे और क़ातिल मालूम न था. बनी नज्जार ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म के हुक्म से दिय्यत अदा कर दी उसके बाद मुक़ैय्यस ने शैतान के बहकावे में एक मुसलमान को बेख़बरी में क़त्ल कर दिया और दिय्यत के ऊंट लेकर मक्के  को चलता हो गया और मुर्तद हो गया. यह इस्लाम में पहला शख़्स है जो मुर्तद हुआ, यानी इस्लाम लाकर उससे फिर गया.

(10) या जिससे इस्लाम की अलामत व निशानी पाओ उससे हाथ रोको और जब तक उसका कुफ़्र साबित न हो जाए, उस पर हाथ न डालो. अबू दाऊद व तिरमिज़ी की हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जब कोई लश्कर रवाना फ़रमाते तो हुक्म देते अगर तुम मस्जिद देखो या अज़ान सुनो तो क़त्ल न करना. अक्सर फ़ुक़हाए किराम ने फ़रमाया कि अगर यहूदी या ईसाई यह कहे कि मैं मूमिन हूँ तो उसको मूमिन न माना जाए, क्योंकि वह अपने अक़ीदे को ही ईमान कहता है. और अगर “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” कहे जब भी उसके मुसलमान होने का हुक्म न किया जाएगा जब तक कि वह अपने दीन से बेज़ारी का इज़हार और उसके बातिल होने का ऐतिराफ़ न करे. इससे मालूम हुआ कि जो शख़्स किसी कुफ़्र में मुब्तला हो उसके लिये उस कुफ़्र से बेज़ारी और उसको कुफ़्र जानना ज़रूरी है.

(11) यानी जब तुम इस्लाम में दाख़िल हुए थे तो तुम्हारी ज़बान से कलिमए शहादत सुनकर तुम्हारे जान माल मेहफ़ूज़ कर दिये गए थे और तुम्हारा इज़हार बेएतिबार क़रार न दिया गया था, ऐसा ही इस्लाम में दाख़िल होने वालों के साथ तुम्हें भी सुलूक करना चाहिये. यह आयत मर्वास बिन नहीक के बारे में उतरी जो एहले फ़िदक में से थे और उनके सिवा उनकी क़ौम का कोई शख़्स इस्लाम न लाया था. इस क़ौम को ख़बर मिली कि इस्लामी लश्कर उनकी तरफ़ आ रहा है तो क़ौम के सब लोग भाग गए, मगर मर्वास ठहरे रहे. जब उन्होंने दूर से लश्कर को देखा तो इस ख़याल से कि कहीं कोई ग़ैर मुस्लिम जमाअत हो, यह पहाड़ की चोटी पर अपनी बकरियाँ लेकर चढ़ गए. जब लश्कर आया और इन्होंने अल्लाहो अकबर की आवाज़ें सुनीं तो ख़ुद भी तकबीर पढ़ते हुए उतर आए और कहने लगे “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह , अस्सलामो अलैकुम. मुसलमानों ने ख़्याल किया कि फ़िदक वाले तो सब काफ़िर है, यह शख़्स मुग़ालता देने के लिये ईमान का इज़हार कर रहा है, इस ख़याल से उसामा बिन ज़ैद ने उनको क़त्ल कर दिया और बकरियाँ ले आए. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में हाज़िर हुए तो तमाम माजरा अर्ज़ किया. हुज़ूर को बहुत दुख हुआ और फ़रमाया, तुमने उसके सामान के कारण उसको क़त्ल कर दिया. इस पर यह आयत उतरी और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसामा को हुक्म दिया कि मक़तूल की बकरियाँ उसके घर वालों को वापस कर दो.

(12) कि तुम को इस्लाम पर ठहराव बख़्शा और तुम्हारा मूमिन होना मशहूर किया.

(13) ताकि तुम्हारे हाथ से कोई ईमान वाला क़त्ल न हो.

(14) इस आयत में जिहाद की तरग़ीब है कि बैठ रहने वाले और जिहाद करने वाले बराबर नहीं हैं. जिहाद करने वालों के ऊंचे दर्जे और सवाब हैं. और यह मसअला भी साबित होता है कि जो लोग बीमारी या बुढ़ापे या कमज़ोरी या अन्धेपन या हाथ पाँव के नाकारा होने और मजबूरी के कारण जिहाद में हाज़िर न हों, वो फ़ज़ीलत और इनाम से मेहरूम न किये जाएंगे, अगर सच्ची नियत रखते हों. बुखारी शरीफ़ की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ग़ज़वए तबूक से वापसी के वक़्त फ़रमाया, कुछ लोग मदीने में रह गए हैं. हम किसी घाटी या आबादी में नहीं चलते मगर वो हमारे साथ होते हैं. उन्हें मजबूरी ने रोक लिया है.

(15) जो मजबूरी के कारण जिहाद में हाज़िर न हो सके, अगरचे वो नियत का सवाब पाएंगे लेकिन जिहाद करने वालों को अमल की फ़ज़ीलत उससे ज़्यादा हासिल है.

(16) जिहाद करने वाले हों या मजबूरी से रह जाने वाले.

(17) बग़ैर मजबूरी के.

(18) हदीस शरीफ़ में है, अल्लाह तआला ने मुजाहिदों के लिये जन्नत में सौ दर्जे रखे हैं, हर दो दर्जों में इतना फ़ासला है जैसे आसमान और ज़मीन में.

सूरए निसा _ चौदहवाँ रूकू

सूरए निसा _ चौदहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

वो लोग जिनकी जान फ़रिश्ते निकालते हैं इस हाल में कि वो अपने ऊपर ज़ुल्म करते थे उनसे फ़रिश्तें कहते हैं तुम काहे में थे कहते है कि हम ज़मीन में कमज़ोर थे  (1)
कहते है क्या अल्लाह कि ज़मीन कुशादा (विस्तृत) न थी कि तुम उसमें हिजरत करते तो ऐसों का ठिकाना जहन्नम है और बहुत बुरी जगह पलटने की (2) (97)
मगर वो जो दबा लिये गये मर्द और औरतें और बच्चे जिन्हें न कोई तदबीर बन पड़े (3)
न रास्ता जानें (98) तो क़रीब है अल्लाह  ऐसो को माफ़ फ़रमाए (4)
और अल्लाह माफ़ फ़रमाने वाला बख़्शने वाला है (99)  और जो अल्लाह की राह में घरबार छोड़ कर निकलेगा वह ज़मीन में बहुत जगह और गुंजायश पाएगा और जो अपने घर से निकला (5)
अल्लाह व रसूल की तरफ़ हिजरत करता फिर उसे मौत ने आलिया तो उसका सवाब अल्लाह के ज़िम्मे पर हो गया (6)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (100)

तफसीर
सूरए निसा- चौदहवाँ रूकू

(1) यह आयत उन लोगो के बारे में नाज़िल हुई जिन्होंने इस्लाम का कलिमा तो ज़बान से अदा किया मगर जिस ज़माने में हिजरत फ़र्ज़ थी उस वक़्त हिजरत न की और जब मुश्रिक  बद्र की लड़ाई में मुसलमानों के मुक़ाबले के लिये गए तो ये लोग उनके साथ हुए और काफ़िरों के साथ ही मारे भी गए. उनके हक़ में यह आयत उतरी और बताया गया कि काफ़िरों के साथ होना और हिजरत का फ़र्ज़ तर्क करना अपनी जान पर ज़ुल्म करना है.

(2) यह आयत साबित करती है जो शख़्स किसी शहर मे अपने दीन पर क़ायम न रह सकता हो और यह जाने कि दूसरी जगह जाने से अपने दीनी कर्तव्य अदा कर सकेगा, उसपर हिजरत वाजिब हो जाती है. हदीस में है जो शख़्स अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिये एक जगह से दूसरी जगह चला जाए, अगरचे एक बालिश्त ही क्यों न हो, उसके लिये जन्नत वाजिब हो जाती है. और उसको हज़रत इब्राहीम और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का साथ मिलेगा.

(3) कुफ़्र की ज़मीन से निकलने और हिजरत करने की.

(4) कि वह मेहरबानी और करम वाला है और मेहरबान जो उम्मीद दिलाता है, पूरी करता है और यक़ीनन माफ़ फरमाएगा.

(5) इससे पहली आयत जब उतरी तो जुन्दअ बिन ज़मरतुल लैसी ने उसे सुना. ये बहुत बूढ़े शख़्स थे. कहने लगे कि मैं छूट दिए गए लोगों में से तो हूँ  नहीं, क्योंकि मेरे पास इतना माल है कि जिससे मैं मदीनए तैय्यिबह हिजरत करके पहुंच सकता हूँ  ख़ुदा की क़सम मक्कए मुकर्रमा में अब एक रात न ठहरूंगा. मुझे ले चलो. चुनांचे उनको चारपाई पर लेकर चले. तनईम आकर उनका इन्तिक़ाल हो गया. आख़िर वक़्त उन्होंने अपना दायाँ हाथ बाएं हाथ पर रखा और कहा, या रब यह मेरा और यह तेरे रसूल का. मैं उसपर बैअत करता हूँ  जिसपर तेरे रसूल ने बैअत की. यह ख़बर पाकर सहाबए किराम ने फ़रमाया, काश वो मदीना पहुंचते तो उनका अज्र कितना बड़ा होता. और मुश्रिक हंसे और कहने लगे कि जिस मतलब के लिये निकले थे वह न मिला. इस पर यह आयत उतरी.

(6) उसके वादे और उसकी मेहरबानी और कृपा से, क्योंकि हक़ और अधिकार के तरीक़े से कोई चीज़ उसपर वाजिब नहीं उसकी शान इससे ऊपर है. जो कोई नेकी का इरादा करें और उसको पूरा करने से मजबूर हो जाए, वह उस फ़रमाँबरदारी का सवाब पाएगा.  इल्म की तलब, जिहाद, हज, ज़ियारत, फ़रमाँरदारी, पाक और सब्र वाली ज़िन्दगी और हलाल रोज़ी की तलाश के लिये वतन छोड़ना अल्लाह व रसूल की तरफ़ हिजरत करने जैसा है. इस राह में मरने वाला इनाम पाएगा.