सूरए निसा _ दूसरा रूकू

सूरए निसा _ दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है (1)
तुम्हारी औलाद के बारे में  (2)
बेटे का हिस्सा दो बेटियों के बराबर है (3)
फिर अगर निरी लड़कियां हो अगरचे दो से ऊपर (4)
तो उनको तर्के की दो तिहाई और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा (5)
और मैयत के माँ बाप को हर एक को उसके तर्के से छटा, अगर मैयत के औलाद हो (6)
फिर अगर उसकी औलाद न हो और माँ बाप छोड़े (7)
तो माँ का तिहाई फिर अगर उसके कई बहन भाई हों(8)
तो माँ का छटा (9)
बाद उस वसियत के जो कर गया और दैन के (10)
तुम्हारे बाप और तुम्हारे बेटे तुम क्या जानो कि उनमें कौन तुम्हारे ज़्यादा काम आएगा (11)
यह हिस्सा बांधा हुआ है अल्लाह की तरफ़ से बेशक अल्लाह इल्म वाला हिकमत (बोध) वाला है  (11)
और तुम्हारी बीवियाँ जो छोड़ जाएं उसमें तुम्हें आधा है अगर उनके औलाद हो तो उनके तर्के में से तुम्हें चौथाई है (12)
जो वसिय्यत वो कर गई और दैन (ऋण) निकाल कर और तुम्हारे तर्के में औरतों का चौथाई है अगर तुम्हारे औलाद न हो. फिर अगर तुम्हारे औलाद हो तो उनका तुम्हारे तर्के में से आठवाँ (13)
जो वसिय्यत तुम कर जाओ  दैन (ऋण) निकाल कर और अगर किसी ऐसे मर्द या औरत का तर्का बटता हो जिसने माँ बाप औलाद कुछ न छोड़े और माँ की तरफ़ से उसका भाई या बहन है तो उनमें से हर एक को छटा फिर अगर  वो बहन भाई एक से ज़्यादा हों तो सब तिहाई में शरीक हैं (14)
मैयत की वसिय्यत और दैन निकाल कर जिसमें उसने नुक़सान न पहुंचाया हो  (15)
यह अल्लाह का इरशाद  (आदेश) है और  अल्लाह इल्म वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है (12) ये अल्लाह की हदें हैं, और जो हुक्म माने अल्लाह और अल्लाह के रसूल का, अल्लाह उसे बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नेहरें बहें हमेशा उनमें रहेंगे और यही है बड़ी कामयाबी (13)
और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे और उसकी कुल हदों से बढ़ जाए अल्लाह उसे आग में दाख़िल करेगा जिसमें हमेशा रहेगा और उसके लिये ख़्वारी (ज़िल्लत) का अज़ाब है (16) (14)

तफ़सीर :

सूरए निसा – दूसरा रूकू

(1) विरासत के बारे में.

(2) अगर मरने वाले ने बेटे बेटियाँ दोनों छोड़ी हों तो.

(3) यानी बेटी का हिस्सा बेटे से आधा है और अगर मरने वाले ने सिर्फ़ लड़के छोड़े हों तो कुल माल उन का.

(4) या दो.

(5) इससे मालूम हुआ कि अगर लड़का अकेला वारिस रहा हो तो कुल माल उसका होगा क्योंकि ऊपर बेटे का हिस्सा बेटियों से दूना बताया गया है तो जब अकेली लड़की का आधा हुआ तो अकेले लड़के का उससे दूना हुआ और वह कुल है.

(6) चाहे लड़का हो या लड़की कि उनमें से हर एक को औलाद कहा जाता है.

(7) यानी सिर्फ़ माँ बाप छोड़े और अगर माँ बाप के साथ शौहर या बीवी में से किसी को छोड़ा, तो माँ का हिस्सा बीवी का हिस्सा निकालने के बाद जो बाक़ी बचे उसका तिहाई होगा न कि कुल का तिहाई.

(8) सगे चाहे सौतेले.

(9) और एक ही भाई हो तो वह माँ का हिस्सा नहीं घटा सकता.

(10) क्योंकि वसिय्यत और क़र्ज़ विरासत की तक़सीम से पहले है. और क़र्ज़ वसिय्यत से भी पहले है. हदीस शरीफ़ में है “इन्नद दैना क़बलल वसिय्यते” जिसका अर्थ यह होता है कि वसिय्यत पर अमल करने से पहले मरने वाले का क़र्ज़ अदा करना ज़रूरी है.

(11) इसलिये हिस्सो का मुक़र्रर करना तुम्हारी राय पर न छोड़ा.

(12  चाहे एक बीबी हो या कई. एक होगी तो वह अकेली चौथाई पाएगी. कई होंगी तो सब उस चौथाई में बराबर शरीक होंगी चाहे बीबी एक हो या कई, हिस्सा यही रहेगा.

(13) चाहे बीबी एक हो या ज़्यादा.

(14) क्योंकि वो माँ के रिश्ते की बदौलत हक़दार हुए और माँ तिहाई से ज़्यादा नहीं पाती और इसीलिये उनमें मर्द का हिस्सा औरत से ज़्यादा नहीं है.

(15) अपने वारिसों को तिहाई से ज़्यादा वसिय्यत करके या किसी वारिस के हक़ में वसिय्यत करके. वारिस के क़र्ज़ कई क़िस्म हैं. असहाबे फ़राइज़ वो लोग हैं जिनके लिये हिस्सा मुक़र्रर है जैसे बेटी एक हो तो आधे माल की मालिक, ज़्यादा हों तो सब के लिये दो तिहाई. पोती और पड़पोती और उससे नीचे की हर पोती, अगर मरने वाले के औलाद न हो तो बेटी के हुक्म में है. और अगर मैयत ने एक बेटी छोड़ी है तो यह उसके साथ छटा पाएगी और अगर मैयत ने बेटा छोड़ा तो विरासत से वंचित हो जाएगी, कुछ न पाएगी और अगर मरने वाले ने दो बेटियाँ छोड़ीं तो भी पोती वंचित यानी साक़ित हो गई. लेकिन अगर उसके साथ या उसके नीचे दर्जे में कोई लड़का होगा तो वह उसको इसबा बना देगा. सगी बहन मैयत के बेटा या पोता न छोड़ने की सूरत में बेटियों के हुक्म में है. अल्लाती बहनें, जो बाप में शरीक हों और उनकी माएं अलग अलग हों, वो सगी बहनों के न होने की सूरत में उनकी मिस्ल है और दोनों क़िस्म की बहनें, यानी सगी और अल्लाती, मैयत की बेटी या पोती के साथ इसबा हो जाती हैं और बेटे और पोते और उसके मातहत पोते और बाप के साथ साक़ित या वंचित और इमाम साहब के नज़दीक दादा के साथ भी मेहरूम हैं. सौतेले भाई बहन जो फ़क़त माँ में शरीक हों, उनमें से एक हो तो छटा और ज़्यादा हों तो तिहाई और उनमें मर्द और औरत बराबर हिस्सा पाएंगे. और बेटे पोते और उसके मातहत के पोते और बाप दादा के होते मेहरूम हो जाएंगे. बाप छटा हिस्सा पाएगा अगर मैयत ने बेटा या पोता या उससे नीचे की कोई पोती छोड़ी हो तो बाप छटा और वह बाक़ी भी पाएगा जो असाबे फ़र्ज़ को देकर बचे. दादा यानी बाप का बाप, बाप के न होने की सूरत में बाप की मिस्ल है सिवाय इसके कि माँ को मेहरूम न कर सकेगा. माँ का छटा हिस्सा है. अगर मैयत ने अपनी औलाद या अपने बेटे या पोते या पड़पोते की औलाद या बहन भाई में से दो छोड़े हों चाहे वो सगे भाई हों या सौतेले और अगर उनमें से कोई छोड़ा न हो तो तो माँ कुल माल का तिहाई पाएगी और अगर मैयत ने शौहर या बीबी और माँ बाप छोड़े हों तो माँ को शौहर या बीबी का हिस्सा देने के बाद जो बाक़ी रहे उसका तिहाई मिलेगा और जद्दा का छटा हिस्सा है चाहे वह माँ की तरफ़ से हो यानी नानी या बाप की तरफ़ से हो यानी दादी. एक हो, ज़्यादा हों, और क़रीब वाली दूर वाली के लिये आड़ हो जाती है. और माँ हर एक जद्दा यानी नानी और दादी को मेहरूम कर देती है. और बाप की तरफ़ की जद्दात यानी दादियाँ बाप के होने की सूरत में मेहजूब यानी मेहरूम हो जाती हैं. इस सूरत में कुछ न मिलेगा. ज़ौज को चौथा हिस्सा मिलेगा. अगर मैयत ने अपनी या अपने बेटे पोते परपोते वग़ैरह की औलाद छोड़ी हो और अगर इस क़िस्म की औलाद न छोड़ी हो तो शौहर आधा पाएगा. बीवी मैयत की और उसके बेटे पोते वग़ैरह की औलाद होने की सूरत में आठवाँ हिस्सा पाएगी और न होने की सूरत में चौथाई. इसबात वो वारिस है जिनके लिये कोई हिस्सा निश्चित नहीं है. फ़र्ज़ वारिसों से जो बाक़ी बचता है वो पाते हैं. इन में सबसे ऊपर बेटा है फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर दादा फिर बाप के सिलसिले में जहाँ तक कोई पाया जाए. फिर सगा भाई फिर सौतेला यानी बाप शरीक भाई फिर सगे भाई का बेटा फिर बाप शरीक भाई का बेटा, फिर आज़ाद करने वाला और जिन औरतों का हिस्सा आधा या दो तिहाई है वो अपने भाईयों के साथ इसबा हो जाती हैं और जो ऐसी न हों वो नहीं. ख़ून के रिश्तों, फ़र्ज़ वारिस और इसबात के सिवा जो रिश्तेदार हैं वो ज़विल अरहाम में दाख़िल हैं और उनकी तरतीब इस्बात की मिस्ल है.

(16) क्योंकि कुल हदों के फलांगने वाला काफ़िर है. इसलिये कि मूमिन कैसा भी गुनाहगार हो, ईमान की हद से तो न गुज़रेगा.

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