सूरए निसा _ तीसरा रूकू

सूरए निसा _ तीसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और तुम्हारी औरतें जो बदकारी करें उन पर ख़ास अपने में (1)
के चार मर्दों की गवाही लो फिर अगर वो गवाही दे दें तो उन औरतों को घर में बंद रखो (2)
यहां तक कि उन्हें मौत उठाले या अल्लाह उनकी कुछ राह निकाले(3)(15)
और तुम में जो मर्द औरत ऐसा काम करें उनको ईज़ा (कष्ट) दो(4)
फिर अगर वो तौबह कर लें और नेक हो जाएं तो उनका पीछा छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान है (5)(16)
वह तौबह जिसका क़ुबूल करना अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल(कृपा) से लाज़िम कर लिया है वह उन्हीं की है जो नादानी से बुराई कर बैठे फिर थोड़ी देर में तौबा करलें (6)
ऐसो पर अल्लाह अपनी रहमत से रूजू (तवज्जुह)करता है और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है(17) और वह तौबा उनकी नहीं जो गुनाहों में लगे रहते हैं(7)
यहां तक कि जब उनमें किसी को मौत आए तो कहे अब मैं ने तौबा की(8)
और न उनकी जो काफ़िर मरें उनके लिये हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है (9)(18)
ऐ ईमान वालों, तुम्हें हलाल नहीं कि औरतों के वारिस बन जाओ ज़बरदस्ती (10)
और औरतों को रोको नहीं इस नियत से कि जो मेहर उनको दिया था उसमें से कुछ ले लो (11)
मगर उस सूरत में कि खुल्लमखुल्ला बेहयाई का काम करें (12)
और उनसे अच्छा बर्ताव करो (13)
फिर अगर वो तुम्हें पसन्द न आएं (14)
तो क़रीब है कि कोई चीज़ तुम्हें नापसन्द हो और अल्लाह उसमें बहुत भलाई रखे (15) (19)
और अगर तुम एक बीबी के बदले दूसरी बदलना चाहो (16)
और उसे ढेरों माल दे चुके हो (17)
तो उसमें से कुछ वापिस न लो (18)
क्या उसे वापिस लोगे झूठ बांधकर और खुले गुनाह से (19) (20)
और किस तरह वापिस लोगे हालांकि तुम में एक दूसरे के सामने बेपर्दा हो लिया और वो तुम से गाढ़ा अहद (प्रतिज्ञा) ले चुकीं  (20)(21)
और बाप दादा की मनकूहा (विवाहिता) से निकाह न करो  (21)
मगर जो हो गुज़रा वह बेशक बेहयाई (22)
और गज़ब (प्रकोप) का काम है और  बहुत बुरी राह (23) (22)

तफसीर
सूरए निसा – तीसरा रूकू

(1) यानी मुसलमानों में के.

(2) कि वो बदकारी न करने पाएं.

(3) यानी हद निश्चित करे या तौबह और निकाह की तौफ़ीक़ दे. जो मुफ़स्सिर इस आयत “अलफ़ाहिशता” (बदकारी) से ज़िना मुराद लेते हैं वो कहते हैं कि हब्स का हुक्म हूदूद यानी सज़ाएं नाज़िल होने से पहले था. सज़ाएं उतरने के बाद स्थगित किया गया. (ख़ाज़िन, जलालैन व तफ़सीरे अहमदी)

(4) झिड़कों, घुड़को, बुरा कहो, शर्म दिलाओ, जूतियाँ मारो, (जलालैन, मदारिक व ख़ाज़िन वग़ैरह)

(5) हसन का क़ौल है कि ज़िना की सज़ा पहले ईज़ा यानी यातना मुक़र्रर की गई फिर क़ैद फिर कोड़े मारना या संगसार करना. इब्ने बहर का क़ौल है कि पहली आयत “वल्लती यातीना” (और तुम्हारी औरतों में…..) उन औरतों के बारे में है जो औरतों के साथ बुरा काम करती हैं और दूसरी आयत “वल्लज़ाने” (और तुममें जो मर्द…..) लौंडे बाज़ी या इग़लाम करने वालों के बारे में उतरी. और ज़िना करने वाली औरतें और ज़िना करने वाले मर्द का हुक्म सूरए नूर में बयान फ़रमाया गया. इस तक़दीर पर ये आयतें मन्सूख़ यानी स्थगित हैं और इनमें इमाम अबू हनीफ़ा के लिये ज़ाहिर दलील है उस पर जो वो फ़रमाते हैं कि लिवातत यानी लौंडे बाज़ी में छोटी मोटी सज़ा है, बड़ा धार्मिक दण्ड नहीं.

(6) ज़ुहाक का क़ौल है कि जो तौबह मौत से पहले हो, वह क़रीब है यानी थोड़ी देर वाली है.

(7)  और तौबह में देरी कर जाते है.

(8) तौबह क़ुबूल किये जाने का वादा जो ऊपर की आयत में गुज़रा वह ऐसे लोगों के लिये नहीं है. अल्लाह मालिक है, जो चाहे करे. उनकी तौबह क़ुबूल करे या न करे. बख़्श दे या अज़ाब फ़रमाए, उस की मर्ज़ी. (तफ़सीरे अहमदी)

(9) इससे मालूम हुआ कि मरते वक़्त काफ़िर की तौबह और उसका ईमान मक़बूल नहीं.

(10) जिहालत के दौर में लोग माल की तरह अपने रिश्तेदारों की बीबियों के भी वारिस बन जाते थे फिर अगर चाहते तो मेहर के बिना उन्हें अपनी बीबी बनाकर रखते या किसी और के साथ शादी कर देते और ख़ुद मेहर ले लेते या उन्हें क़ैद कर रखते कि जो विरासत उन्हों ने पाई है वह देकर रिहाई हासिल करलें या मर जाएं तो ये उनके वारिस हो जाएं. ग़रज़ वो औरतें बिल्कुल उनके हाथ में मजबूर होती थीं और अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं कर सकती थीं. इस रस्म को मिटाने के लिये यह आयत उतारी गई.

(11) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया यह उसके सम्बन्ध में है जो अपनी बीबी से नफ़रत रखता हो और इस लिये दुर्व्यवहार करता हो कि औरत परेशान होकर मेहर वापस कर दे या छोड़ दे. इसकी अल्लाह तआला ने मनाही फ़रमाई. एक क़ौल यह है कि लोग औरत को तलाक़ देते फिर वापस ले लेते, फिर तलाक़ देते. इस तरह उसको लटका कर रखते थे. न वह उनके पास आराम पा सकती, न दूसरी जगह ठिकाना कर सकती. इसको मना फ़रमाया गया. एक क़ौल यह है कि मरने वाले के सरपरस्त को ख़िताब है कि वो उसकी बीबी को न रोकें.

(12) शौहर की नाफ़रमानी या उसकी या उसके घर वालों की यातना, बदज़बानी या हरामकारी ऐसी कोई हालत हो तो ख़ुलअ चाहने में हर्ज नहीं.

(13) खिलाने पहनाने में, बात चीत में और मियाँ बीवी के व्यवहार में.

(14) दुर्व्यवहार या सूरत नापसन्द होने की वजह से, तो सब्र करो और जुदाई मत चाहो.

(15) नेक बेटा वग़ैरह.

(16) यानी एक को तलाक़ देकर दूसरी से निकाह करना.

(17) इस आयत से भारी मेहर मुक़र्रर करने के जायज़ होने पर दलील लाई गई है. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने मिम्बर पर से फ़रमाया कि औरतों के मेहर भारी न करो. एक औरत ने यह आयत पढ़कर कहा कि ऐ  इब्ने ख़त्ताब, अल्लाह हमें देता है और तुम मना करते हो, इस पर अमीरूल मूमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया, ऐ उमर, तुझसे हर शख़्स ज़्यादा समझदार है. जो चाहो मेहर मुक़र्रर करो. सुब्हानल्लाह, ऐसी थी रसूल के ख़लीफ़ा के इन्साफ़ की शान और शरीफ़ नफ़्स की पाकी. अल्लाह तआला हमें उनका अनुकरण करने की तौफ़ीक अता फ़रमाए. आमीन.

(18) क्योंकि जुदाई तुम्हारी तरफ़ से है.

(19) यह जिहालत वालों के उस काम का रद है कि जब उन्हें कोई दूसरी औरत पसन्द आती तो वो अपनी बीबी पर तोहमत यानी लांछन लगाते ताकि वह इससे परेशान होकर जो कुछ ले चुकी है वापस कर दे. इस तरीक़े को इस आयत में मना फ़रमाया गया और झुट और गुनाह बताया गया.

(20) वह अहद अल्लाह तआला का यह इरशाद है ” फ़ इम्साकुन बि मअरूफ़िन फ़ तसरीहुम बि इहसानिन” यानी फिर भलाई के साथ रोक लेना है या नेकूई के साथ छोड़ देना है. (सूरए बक़रह, आयत 229) यह आयत इस पर दलील है कि तन्हाई में हमबिस्तरी करने से मेहर वाजिब हो जाता है.

(21) जैसा कि जिहालत के ज़माने में रिवाज था कि अपनी माँ के सिवा बाप के बाद उसकी दूसरी औरत को बेटा अपनी बीवी बना लेता था.

(22) क्योंकि बाप की बीवी माँ के बराबर है. कहा गया है कि निकाह से हम-बिस्तरी मुराद है. इससे साबित होता है कि जिससे बाप ने हमबिस्तरी की हो, चाहे निकाह करके या ज़िना करके या वह दासी हो, उसका वह मालिक होकर, उनमें से हर सूरत में बेटे का उससे निकाह हराम है.

(23) अब इसके बाद जिस क़द्र औरतें हराम हैं उनका बयान फ़रमाया जाता है. इनमें सात तोनसब से हराम है.

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