सूरए निसा _ चौदहवाँ रूकू

सूरए निसा _ चौदहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

वो लोग जिनकी जान फ़रिश्ते निकालते हैं इस हाल में कि वो अपने ऊपर ज़ुल्म करते थे उनसे फ़रिश्तें कहते हैं तुम काहे में थे कहते है कि हम ज़मीन में कमज़ोर थे  (1)
कहते है क्या अल्लाह कि ज़मीन कुशादा (विस्तृत) न थी कि तुम उसमें हिजरत करते तो ऐसों का ठिकाना जहन्नम है और बहुत बुरी जगह पलटने की (2) (97)
मगर वो जो दबा लिये गये मर्द और औरतें और बच्चे जिन्हें न कोई तदबीर बन पड़े (3)
न रास्ता जानें (98) तो क़रीब है अल्लाह  ऐसो को माफ़ फ़रमाए (4)
और अल्लाह माफ़ फ़रमाने वाला बख़्शने वाला है (99)  और जो अल्लाह की राह में घरबार छोड़ कर निकलेगा वह ज़मीन में बहुत जगह और गुंजायश पाएगा और जो अपने घर से निकला (5)
अल्लाह व रसूल की तरफ़ हिजरत करता फिर उसे मौत ने आलिया तो उसका सवाब अल्लाह के ज़िम्मे पर हो गया (6)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (100)

तफसीर
सूरए निसा- चौदहवाँ रूकू

(1) यह आयत उन लोगो के बारे में नाज़िल हुई जिन्होंने इस्लाम का कलिमा तो ज़बान से अदा किया मगर जिस ज़माने में हिजरत फ़र्ज़ थी उस वक़्त हिजरत न की और जब मुश्रिक  बद्र की लड़ाई में मुसलमानों के मुक़ाबले के लिये गए तो ये लोग उनके साथ हुए और काफ़िरों के साथ ही मारे भी गए. उनके हक़ में यह आयत उतरी और बताया गया कि काफ़िरों के साथ होना और हिजरत का फ़र्ज़ तर्क करना अपनी जान पर ज़ुल्म करना है.

(2) यह आयत साबित करती है जो शख़्स किसी शहर मे अपने दीन पर क़ायम न रह सकता हो और यह जाने कि दूसरी जगह जाने से अपने दीनी कर्तव्य अदा कर सकेगा, उसपर हिजरत वाजिब हो जाती है. हदीस में है जो शख़्स अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिये एक जगह से दूसरी जगह चला जाए, अगरचे एक बालिश्त ही क्यों न हो, उसके लिये जन्नत वाजिब हो जाती है. और उसको हज़रत इब्राहीम और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का साथ मिलेगा.

(3) कुफ़्र की ज़मीन से निकलने और हिजरत करने की.

(4) कि वह मेहरबानी और करम वाला है और मेहरबान जो उम्मीद दिलाता है, पूरी करता है और यक़ीनन माफ़ फरमाएगा.

(5) इससे पहली आयत जब उतरी तो जुन्दअ बिन ज़मरतुल लैसी ने उसे सुना. ये बहुत बूढ़े शख़्स थे. कहने लगे कि मैं छूट दिए गए लोगों में से तो हूँ  नहीं, क्योंकि मेरे पास इतना माल है कि जिससे मैं मदीनए तैय्यिबह हिजरत करके पहुंच सकता हूँ  ख़ुदा की क़सम मक्कए मुकर्रमा में अब एक रात न ठहरूंगा. मुझे ले चलो. चुनांचे उनको चारपाई पर लेकर चले. तनईम आकर उनका इन्तिक़ाल हो गया. आख़िर वक़्त उन्होंने अपना दायाँ हाथ बाएं हाथ पर रखा और कहा, या रब यह मेरा और यह तेरे रसूल का. मैं उसपर बैअत करता हूँ  जिसपर तेरे रसूल ने बैअत की. यह ख़बर पाकर सहाबए किराम ने फ़रमाया, काश वो मदीना पहुंचते तो उनका अज्र कितना बड़ा होता. और मुश्रिक हंसे और कहने लगे कि जिस मतलब के लिये निकले थे वह न मिला. इस पर यह आयत उतरी.

(6) उसके वादे और उसकी मेहरबानी और कृपा से, क्योंकि हक़ और अधिकार के तरीक़े से कोई चीज़ उसपर वाजिब नहीं उसकी शान इससे ऊपर है. जो कोई नेकी का इरादा करें और उसको पूरा करने से मजबूर हो जाए, वह उस फ़रमाँबरदारी का सवाब पाएगा.  इल्म की तलब, जिहाद, हज, ज़ियारत, फ़रमाँरदारी, पाक और सब्र वाली ज़िन्दगी और हलाल रोज़ी की तलाश के लिये वतन छोड़ना अल्लाह व रसूल की तरफ़ हिजरत करने जैसा है. इस राह में मरने वाला इनाम पाएगा.

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