सूरए निसा _ आठवाँ रूकू

सूरए निसा _ आठवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
क्या तुमने वो न देखे जिन्हें किताब का एक हिस्सा मिला ईमान लाते हैं बुत और शैतान पर और काफ़िरों को कहते हैं कि ये
मुसलमानों से ज़्यादा राह पर हैं (51) ये हैं जिनपर अल्लाह ने लानत की  और  जिसे ख़ुदा लानत करें तो कभी उसका कोई
यार न पाएगा (1) (52)
क्या मुल्क में उनका कुछ हिस्सा है (2)
ऐसा हो तो लोगों को तिल भर न दें (53) या लोगों से हसद (ईषर्या) करते हैं (3)
उस पर जो अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से दिया(4)
तो हमने तो इब्राहीम की औलाद को किताब  और हिकमत (बोध) अता फ़रमाई और उन्हें बड़ा मुल्क दिया (5)(54)
तो उनमें कोई उसपर ईमान लाया (6)
और किसी ने उससे मुंह फेरा (7)
और दोज़ख़ काफ़ी है भड़कती आग (8)(55)
जिन्होंने हमारी आयतों का इन्कार किया जल्द ही हम उनको आग में दाख़िल करेंगे जब कभी उनकी खालें पक जाएंगी हम उनके
सिवा और खालें उन्हें बदल देंगे कि अज़ाब का मज़ा लें बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है (56) और जो लोग ईमान लाए
और अच्छे काम किये जल्द ही हम उन्हें बाग़ों में ले जाएंगे जिनके नीचे नहरे बहें उन में हमशा रहेंगे, उनके लिये वहां सुथरी बीबीयां हैं (9)
और हम उन्हें वहां दाख़िल करेंगे जहां साया ही साया होगा (10)  (57)
बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें जिन की हैं उन्हें सुपुर्द करो (11)
और यह कि जब तुम लोगों में फैसला करो तो इन्साफ़ के साथ फैसला करो (12)
बेशक अल्लाह तुम्हें क्या ही ख़ूब नसीहत फ़रमाता है बेशक अल्लाह सुनता देखता है (58)
ऐ ईमान वालों हुक्म मानों अल्लाह का और हुक्म मानो रसूल का (13)
और उनका जो तुममें हुकूमत वाले हैं (14)
फिर अगर तुममें किसी बात का झगड़ा उठे तो उसे अल्लाह और रसूल के हुज़ूर रूजू (पेश) करो और अल्लाह और क़यामत पर ईमान रखते हो (15)
यह बेहतर है और इसका अन्जाम सबसे अच्छा (59)

तफसीर
सूरए निसा – आठवाँ रूकू

(1) यह आयत कअब बिन अशरफ़ वग़ैरह यहूदी आलिमों के बारे में उतरी जो सत्तर सवारों की जमाअत लेकर क़ुरैश से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ जंग करने पर हलफ़ लेने पहुंचे, क़ुरैश ने उनसे कहा कि चूंकि तुम किताब वाले हो इसलिये तुम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के साथ ज़्यादा क़ुर्ब रखते हो, हम कैसे इत्मीनान करें कि तुम हमसे धोखे के साथ नहीं मिल रहे हो. अगर इत्मीनान दिलाना हो तो हमारें बुतों को सज्दा करो. तो उन्होंने शैतान की फ़रमाँबरदारी करके बुतों को सज्दा किया, फिर अबू सुफ़ियान ने कहा कि हम ठीक राह पर हैं या मुहम्मद ? कअब बिन अशरफ़ ने कहा, तुम्ही ठीक राह पर हो. इस पर यह आयत उतरी और अल्लाह तआला ने उन पर लानत फ़रमाई कि उन्होंने हुज़ूर की दुश्मनी में मुश्रिकों के बुतों तक को पूज लिया.

(2) यहूदी कहते थे कि हम सल्तनत और नबुव्वत के ज़्यादा हक़दार हैं तो हम कैसे अरबों का अनुकरण और फ़रमाँबरदारी करें. अल्लाह तआला ने उनके दावे को झुटला दिया कि उनका सल्तनत में हिस्सा ही क्या है. और मान लिया जाय कुछ होता भी, तो उनका बुख़्ल और कंजूसी इस दर्जें की है कि…..

(3) नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और ऐहले ईमान से.

(4) नबुव्वत और विजय और ग़लबा और सम्मान वग़ैरह नेअमतें.

(5) जैसा कि हज़रत यूसुफ़ और हज़रत दाऊद और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को, तो अगर अपने हबीब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर करम और मेहरबानी की तो उससे क्यों जलते और हसद करते हो.
(6) जैसा कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथ वाले सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाए.

(7) और ईमान से मेहरूम रहा.

(8) उसके लिये जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान ना लाए.

(9) जो हर निजासत, गन्दगी और नफ़रत के क़ाबिल चीज़ों से पाक हैं.

(10) यानी जन्नत का साया, जिसकी राहत, आसायश को न समझा जा सकता है, न ही बयान किया जा सकता है.

(11) अमानतें रखने वालों और हाकिमों को अमानतें ईमानदारी के साथ हक़दार को अदा करने और फ़ैसलों में इन्साफ़ करने का हुक्म दिया. मुफ़स्सिरों का कहना है कि फ़राइज़ भी अल्लाह तआला की अमानतें हैं, उनकी अदायगी का हुक्म भी इसमें दाख़िल है.

(12) पक्षों में से बिल्कुल किसी की रिआयत न हो. उलमा ने फ़रमाया कि हाकिम को चाहिये कि पांच बातों में पक्षों के साथ बराबर का सुलूक करे. (1) अपने पास आने में जैसे एक को मौक़ा दे दूसरे को भी दे. (2) बैठने की जगह दोनों को एक सी दे. (3) दोनों की तरफ़ बराबर ध्यान दें. (4) बात सुनने में हर एक के साथ एक ही तरीक़ा रखे. (5) फ़ैसला देने में हक़ की रिआयत करे, जिसका दूसरे पर अधिकार हो पूरा दिलाए. हदीस शरीफ़ में है, इन्साफ़ करने वालों को अल्लाह के क़ुर्ब में नूरी मिम्बर अता होंगे. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में इस घटना का ज़िक्र किया है कि मक्का की वज़य के वक़्त सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसमान बिन तलहा. काबे के ख़ादिम से काबे की चाबी ले ली. फिर जब यह आयत उतरी तो आपने वह चाबी उन्हें वापस दी और फ़रमाया कि अब यह चाबी हमेशा तुम्हारी नस्ल में रहेगी. इस पर उसमान बिन तलहा हजबी इस्लाम लाए. अगरचे यह घटना थोड़ी थोड़ी तबदीलियों के साथ बहुत से मुहद्दिसों ने बयान की है मगर हदीसों पर नज़र करने से यह सही मालूम नहीं होती. क्योंकि इब्ने अब्दुल्लाह और इब्ने मुन्दा और इब्ने असीर
की रिवायतों से मालूम होता है कि उसमान बिन तलहा आठ हिजरी मे मदीनए तैय्यिबह हाज़िर होकर इस्लाम ला चुके थे और उन्होंने फ़त्हे मक्का के रोज़ चाबी अपनी ख़ुशी से पेश की थी. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीसों से यही निष्कर्ष निकलता है.

(13) कि रसूल की फ़रमाँबरदारी अल्लाह ही की फ़रमाँबरदारी है. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, जिसने मेरी फ़रमाँबरदारी की उसने अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की और जिसने मेरी नाफ़रमानी की, उसने अल्लाह की नाफ़रमानी की.

(14) इसी हदीस में हुज़ूर फ़रमाते हैं, जिसने सरदार की फ़रमाँबरदारी की उसने मेरी फ़रमाँबरदारी की. जिसने सरदार की नाफ़रमानी की उसने मेरी नाफ़रमानी की. इस आयत से साबित हुआ कि मुसलमान सरदारों और हाकिमों की आज्ञा का पालन वाजिब है जब तक वो हक़ के अनुसार रहें और अगर हक़ के ख़िलाफ़ हुक्म करें, तो उनकी फ़रमाँबरदारी नहीं.
(15) इस आयत से मालूम हुआ कि अहकाम तीन क़िस्म के हैं, एक वो जो ज़ाहिरे किताब यानी क़ुरआन से साबित हो, एक वो जो ज़ाहिरे हदीस से, एक वो जो क़ुरआन और हदीस की तरफ़ क़यास के तौर पर रूजू करने से. “उलिल अम्र” (जो हुकूमत करते हैं) में इमाम, अमीर, बादशाह, हाकिम, क़ाज़ी सब दाख़िल हैं. ख़िलाफ़ते कामिला तो ज़मानए रिसालत के बाद तीस साल रही, मगर ख़िलाफ़ते नाक़िसा अब्बासी ख़लीफ़ाओं में भी थी और अब तो इमामत भी नहीं पाई जाती. क्योंकि
इमाम के लिये क़ुरैश से होना शर्त है और यह बात अक्सर जगहों में ग़ायब है. लेकिन सुल्तान और इमारत बाक़ी है और चूंकि सुल्तान और अमीर भी उलुल अम्र में दाख़िल हैं इसलिये हमपर उनकी इताअत भी लाज़िम है.

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