सूरए निसा – सातवाँ रूकू

सूरए निसा – सातवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो, नशे की हालत में नमाज़ के पास न जाओ (1)
जब तक इतना होश न हो कि जो कहो उसे समझो और न नापाकी की हालत में बे नहाए मगर मुसाफ़िरी में (2)
और अगर तुम बीमार हो (3)
या सफ़र में या तुम में से कोई क़ज़ाए हाजत (पेशाब पख़ाना) से आया  (4)
या तुमने औरतों को छुआ(5)
और पानी न पाया(6)
तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करो (7)
तो अपने मुंह और हाथों का मसह (हाथ फेरना)  करो(8)
बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला बख़्शने वाला है (43)
क्या तुमने उन्हें न देखा जिनको किताब से एक हिस्सा मिला (9)
गुमराही मोल लेते है(10)
और चाहते है (11)
तुम भी राह से बहक जाओ (44) और अल्लाह ख़ूब जानता है तुम्हारे दुश्मनों को  (12)
और अल्लाह काफ़ी है वाली (मालिक) (13)
और अल्लाह काफ़ी है मददगार (45) कुछ यहूदी कलामों की उनकी जगह से फेरते हैं (14)
और (15)
कहते है हमने सुना और न माना और (16)
सुनिये आप सुनाए न जाएं (17)
और राना कहते हैं (18)
ज़बाने फेर कर (19)
और दीन में तअने (लांछन) के लिये (20)
और अगर वो  (21)
कहते है कि हमने सुना और माना और हुज़ूर हमारी बात सुनें और हुज़ूर हमपर नज़र फ़रमाएं तो उनके लिये भलाई और रास्ती में
ज़्यादा होता लेकिन उनपर तो अल्लाह ने लानत की उनके कुफ्र की वजह से तो यक़ीन नहीं रखते मगर थोड़ा (22) (46)
ऐ किताब वालो ईमान लाओ उसपर जो हमने उतारा तुम्हारे साथ वाली किताब (23)
की पुष्टि फ़रमाता इससे पहले कि हम बिगाड़ें कुछ मुंहों को (24)
तो उन्हें फेर दे उनकी पीठ की तरफ़ या उन्हें लानत करें जैसी लानत की हफ़्ते वालों पर (25)
और ख़ुदा का हुक्म होकर रहे  (47) बेशक अल्लाह इसे नहीं बख़्शता कि उसके साथ कुफ्र किया जाए  और कुफ्र से नीचे जो कुछ है जिसे चाहे माफ़ फ़रमा देता है (26)
और जिसने ख़ुदा का शरीक ठहराया उसने बड़ा गुनाह का तूफ़ान बांधा (48) क्या तुमने उन्हें न देखा जो ख़ुद अपनी सुथराई बयान करते हैं (27)
कि अल्लाह जिसे चाहे सुथरा करे और उनपर ज़ुल्म न होगा ख़ुर्में के दाने के डोरे बराबर (28)(49)
देखो कैसा अल्लाह पर झूठ बांध रहे हैं (29) और यह काफ़ी है खुल्लम खुल्ला गुनाह (50)

तफसीर
सूरए निसा – सातवाँ रूकू

(1) हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़ ने सहाबा की एक जमाअत की दावत की. उसमें खाने के बाद शराब पेश की गई. कुछ ने पी, क्योंकि उस वक़्त तक शराब हराम न हुई थी. फिर मग़रिब की नमाज़ पढ़ी. इमाम नशे में “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना अअबुदो मा तअबुदूना व अन्तुम आबिदूना मा अअबुद” पढ़ गए और दोनों जगह “ला” (नहीं) छोड़ गए और नशे में ख़बर न हुई. और आयत का मतलब ग़लत हो गया. इस पर यह आयत उतरी और नशे की हालत में नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमा दिया गया. तो मुसलमानों ने नमाज़ के वक़्तों में शराब छोड़ दी. इसके बाद शराब बिल्कुल हराम कर दी गई. इस से साबित हुआ कि आदमी नशे की हालत में कुफ़्र का कलिमा ज़बान पर लाने से काफ़िर नहीं होता. इसलिये कि “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना” में दोनों जगह “ला” का छोड़ देना कुफ़्र है, लेकिन उस हालत में हुज़ूर ने उस पर कुफ़्र का हुक्म न फ़रमाया बल्कि क़ुरआने पाक में उनको “या अय्युहल लज़ीना आमनू” (ऐ ईमान वालों) से ख़िताब फ़रमाया गया.

(2) जबकि पानी न पाओ, तयम्मुम कर लो.

(3) और पानी का इस्तेमाल ज़रूर करता हो.

(4) यह किनाया है बे वुज़ू होने से.

(5) यानी हमबिस्तरी की.

(6) इसके इस्तेमाल पर क़ादिर न होने, चाहे पानी मौजूद न होने के कारण या दूर होने की वजह से या उसके हासिल करने का साधन न होने के कारण या साँप, ख़तरनाक जंगली जानवर, दुश्मन वग़ैरह कोई रूकावट होने के कारण.

(7) यह हुक्म मरीज़ों, मुसाफ़िरों, जनाबत और हदस वालों को शामिल है, जो पानी न पाएं या उसके इस्तेमाल से मजबूर हों (मदारिक). माहवारी, हैज़ व निफ़ास से पाकी के लिये भी पानी से मजबूर होने की सूरत में तयम्मुम जायज़ है, जैसा कि हदीस शरीफ़ में आया है.

(8) तयम्मुम का तरीक़ा :- तयम्मुम करने वाला दिल से पाकी हासिल करने की नियत करे. तयम्मुम में नियत शर्त है क्योंकि अल्लाह का हुक्म आया है. जो चीज़ मिट्टी की जिन्स से हो जैसे धूल, रेत, पत्थर, उन सब पर तयम्मुम जायज़ है. चाहे पत्थर पर धूल भी न हो लेकिन पाक होना इन चीज़ों में शर्त है. तयम्मुम में दो ज़र्बें हैं, एक बार हाथ मार कर चेहरे पर फेर लें, दूसरी बार हाथों पर. पानी के साथ पाक अस्ल है और तयम्मुम पानी से मजबूर होने की हालत में उसकी जगह लेता
है. जिस तरह हदस पानी से ज़ायल होता है, उसी तरह तयम्मुम से. यहाँ तक कि एक तयम्मुम से बहुत से फ़र्ज़ और नफ़्ल पढ़े जा सकते हैं. तयम्मुम करने वाले के पीछे ग़ुस्ल और वुज़ू वाले की नमाज़ सही है. ग़ज़वए बनी मुस्तलक़ में जब इस्लामी लश्कर रात को एक वीराने में उतरा जहाँ पानी न था और सुबह वहाँ से कूच करने का इरादा था, वहाँ उम्मुल मूमिनीन हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा का हार खो गया. उसकी तलाश के लिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने वहाँ क़याम फ़रमाया. सुबह हुई तो पानी न था. अल्लाह तआला ने तयम्मुम की आयत उतारी. उसैद बिन हदीर रदियल्लाहो अन्हो ने कहा कि ऐ आले अबूबक्र, यह तुम्हारी पहली ही बरकत नहीं है, यानी तुम्हारी बरकत से मुसलमानों को बहुत आसानियाँ हुई और बहुत से फ़ायदे पहुंचे. फिर ऊंट उठाया गया तो उसके नीचे हार मिला. हार खो जाने और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के
न बताने में बहुत हिकमत हैं. हज़रत सिद्दीक़ा के हार की वजह से क़याम उनकी बुज़ुर्गी और महानता ज़ाहिर करता है. सहाबा का तलाश में लग जाना, इसमें हिदायत है कि हुज़ूर की बीबियों की ख़िदमत ईमान वालों की ख़ुशनसीबी है, और फिर तयम्मुम का हुक्म होना, मालूम होता है कि हुज़ूर की पाक बीबियों की ख़िदमत का ऐसा इनआम है, जिससे क़यामत तक मुसलमान फ़ायदा उठाते रहेंगे. सुब्हानल्लाह !

(9) वह यह कि तौरात से उन्होंने सिर्फ़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत को पहचाना और उसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का जो बयान था उस हिस्से से मेहरूम रहे और आपके नबी होने का इन्कार कर बैठै. यह आयत रिफ़ाआ बिन ज़ैद और मालिक बिन दख़्श्म यहूदियों के बारे में उतरी. ये दोनों जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बात करते तो ज़बान टेढ़ी करके बोलते.

(10) हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करके.

(11) ऐ मुसलमानों !

(12) और उसने तुम्हें भी उनकी दुश्मनी पर ख़बरदार कर दिया तो चाहिये कि उनसे बचते रहो.

(13) और जिसके काम बनाने वाला अल्लाह हो उसे क्या डर.

(14) जो तौरात शरीफ़ में अल्लाह तआला ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात में फ़रमाए.

(15) जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उन्हें कुछ हुक्म फ़रमाते हैं तो.

(16) कहते हैं.

(17) यह कलिमा दो पहलू रखता है. एक पहलू तो यह कि कोई नागवार बात आपको सुनने में न आए और दूसरा पहलू यह कि आपको सुनना नसीब न हो.
(18) इसके बावुजूद कि इस कलिमे के साथ सम्बोधन करने को मना किया गया है क्योंकि उनकी ज़बान में ख़राब मानी रखता है.

(19) हक़ यानी सच्चाई से बातिल यानी बुराई की तरफ़

(20) कि वो अपने दोस्तों से कहते थे कि हम हुज़ूर की बुराई करते हैं. अगर आप नबी होते तो आप इसको जान लेते. अल्लाह तआला ने उनके दिल में छुपी कटुता और ख़बासत को ज़ाहिर फ़रमा दिया.

(21) इन कलिमात की जगह अदब और आदर करने वालों के तरीक़े पर.

(22) इतना कि अल्लाह ने उन्हें पैदा किया और रोज़ी दी और इतना काफ़ी नहीं जब तक कि ईमान वाली बातों को न मानें और सब की तस्दीक़ न करें.

(23) तौरात.

(24) आँख नाक कान पलकें वग़ैरह नक़्शा मिटा कर.

(25) इन दोनों बातों में से एक ज़रूर लाज़िम है. और लानत तो उन पर ऐसी पड़ी कि दुनिया उन्हें बुरा कहती है. यहाँ मुफ़स्सिरों के कुछ अलग अलग क़ौल हैं. कुछ इस फटकार का पड़ना दुनिया में बताते हैं, कुछ आख़िरत में. कुछ कहते है कि लानत हो चुकी और फटकार पड़ गई. कुछ कहते हैं कि अभी इन्तिज़ार है. कुछ का क़ौल है कि यह फटकार उस सूरत में थी जबकि यहूदियों में से कोई ईमान न लाता और चूंकि बहुत से यहूदी ईमान ले आए, इसलिये शर्त नहीं पाई गई और फटकार उठ गई. हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम जो यहूदी आलिमों के बड़ों में से हैं, उन्होंने मुल्के शाम से वापस आते हुए रास्ते में यह आयत सुनी और अपने घर पहुंचने से पहले इसलाम लाकर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह मैं नहीं ख़याल करता था कि मैं अपना मुंह पीठ की तरफ़ फिर जाने से पहले और चेहरे का नक़्शा मिट जाने से पहले आपकी ख़िदमत में हाज़िर हो सकूंगा, यानी इस डर से उन्होंने ईमान लाने में जल्दी की क्योंकि तौरात शरीफ़ से उन्हें आपके सच्चे रसूल होने का यक़ीनी इल्म था, इसी डर से कअब अहबार जो यहूदियों में बड़ी बुज़ुर्गी रखते थे, हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से यह आयत सुनकर मुसलमान हो गए.

(26) मानी यह हैं कि जो कुफ़्र पर मरे उसकी बख़्शिश नहीं. उसके लिये हमेशगी का अज़ाब है और जिसने कुफ़्र न किया हो, वह चाहे कितना ही बड़ा गुनाह करने वाला हो, और तौबह के बग़ैर मर जाए, तो उसका बदला अल्लाह की मर्ज़ी पर है, चाहे माफ़ फ़रमाए या उसके गुनाहों पर अज़ाब करे फिर अपनी रहमत से जन्नत में दाख़िल फ़रमाए. इस आयत में यहूदियों को ईमान की तरग़ीब है और इस पर भी प्रमाण है कि यहूदियों पर शरीअत के शब्दों में मुश्रिक शब्द लागू होना सही है.

(27) यह आयत यहूदियों और ईसाईयों के बारे में नाज़िल हुई जो अपने आपको अल्लाह का बेटा और उसका प्यारा बताते थे और कहते थे कि यहूदियों और ईसाईयों के सिवा कोई जन्नत में दाख़िल न होगा. इस आयत में बताया गया कि इन्सान का, दीनदारी, नेक काम, तक़वा और अल्लाह की बारगाह में क़ुर्ब और मक़बूलियत का दावेदार होना और मुंह से अपनी तारीफ़ करना काम नहीं आता.

(28) यानी बिल्कुल ज़ुल्म न होगा. वही सज़ा दी जाएगी जो उनका हक़ है.

(29) अपने आपको गुनाह और अल्लाह का प्यारा बताकर.

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