सूरए निसा – नवाँ रूकू

सूरए निसा – नवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

क्या तुमने उन्हें न देखा जिनका दावा है कि वो ईमान लाए उसपर जो तुम्हारी तरफ़ उतरा और उसपर जो तुमसे पहले उतरा फिर चाहते हैं कि शैतान को अपना पंच बनाएं और उनको हुक्म यह था कि उसे बिल्कुल न मानें और इबलीस यह चाहता है कि उन्हें दूर बहका दे(1) (60)
और जब उनसे कहा जाए कि अल्लाह की उतारी हुई किताब और रसूल की तरफ़ आओ तो तुम देखोगे कि मुनाफ़िक़ (दोग़ले लोग) तुमसे मुंह मोड़ कर फिर जाते हैं  (61) कैसी होगी जब उनपर कोई उफ़ताद  (मुसीबत) पड़े(2)
बदला उसका जो उनके हाथों ने आगे भेजा (3)
फिर ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों अल्लाह की क़सम खाते कि हमारा इरादा तो भलाई और  मेल ही था (4) (62)
उनके दिलों की तो बात अल्लाह जानता है तो तुम उनसे चश्मपोशी करो (नज़र फेरलो) और उन्हें समझा दो और उनके मामले में उनसे रसा बात कहो(5) (63)
और हमने कोई रसूल न भेजा मगर इसलिये कि अल्लाह के हुक्म से उसकी इताअत (आज्ञा पालन) की जाए (6)
और अगर जब वह अपनी जानों पर ज़ुल्म करें(7)
तो ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों और फिर अल्लाह से माफ़ी चाहें और रसूल उनकी शफ़ाअत फ़रमाए तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पाएं (8)(64)
तो ऐ मेहबूब तुम्हारे रब की क़सम वो मुसलमान न होंगे जबतक अपने आपस के झगड़े में तुम्हें हाकिम न बनाएं फिर जो कुछ तुम हुक्म फ़रमा दो अपने दिलों में उस से रूकावट न पाएं और जिसे मान लें (9)(65)
और अगर हम उनपर फ़र्ज़ करते कि अपने आपको क़त्ल कर दो या अपने घरबार छोड़ कर निकल  जाओ (10)
तो उनमें थोड़े ही  ऐसा करते और अगर वो करते जिस बात की उन्हें नसीहत दी जाती है (11)
तो इसमें उनका भला था और ईमान पर ख़ूब जमना (66) और ऐसा होता तो ज़रूर हम उन्हेंअपने पास से बड़ा सवाब देते (67) और ज़रूर उनको सीधी राह की हिदायत करते (68) और जो अल्लाह  और उसके रसूल का हुक्म माने तो उसे उनका साथ मिलेगा जिनपर अल्लाह ने फ़ज़्ल किया यानी नबी (12)
और सिद्दिक़ीन (सच्चाई वाले) (13)
और शहीद(14)
और नेक लोग(15)
ये क्या ही अच्छे साथी हैं  (69) यह अल्लाह का फ़ज़्ल है और अल्लाह काफ़ी है जानने वाला (70)

तफसीर
सूरए निसा – नवाँ रूकू

(1) बिशर नामी एक मुनाफ़िक़ का एक यहूदी से झगड़ा था. यहूदी ने कहा चलो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से तय करा लें. मुनाफ़िक़ ने ख़याल किया कि हुज़ूर तो रिआयत किये बिना केवल सच्चा ही फ़ैसला देंगे, उसका मतलब हासिल न होगा. इसलिये उसने ईमान का दावा रखने के बावुजूद यह कहा कि कअब बिन अशरफ़ यहूदी को पंच बनाओ (क़ुरआने मजीद में ताग़ूत से इस कअब बिन अशरफ़ के पास फ़ैसला ले जाना मुराद है) यहूदी जानता था कि कअब रिशवत खाता है, इसलिये उसने सहधर्मी होने के बावुजूद उसको पंच तसलीम नहीं किया. नाचार मुनाफ़िक़ को फ़ैसले के लिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में आना पड़ा. हुज़ूर ने जो फ़ैसला दिया, वह यहूदी के हक़ में हुआ. यहाँ से फ़ैसला सुनने के बाद फिर मुनाफ़िक़ यहूदी से ज़िद करने लगा और उसे मजबूर करके हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो के पास लाया. यहूदी ने आपसे अर्ज़ किया कि मेरा इसका मामला सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तय फ़रमा चुके, लेकिन यह हुज़ूर के फ़ैसले से राज़ी नहीं. आप से फ़ैसला चाहता है. फ़रमाया कि हाँ मैं अभी आकर फ़ैसला करता हूँ यह फ़रमाकर मकान में तशरीफ़ ले गए और तलवार लाकर उस मुनाफ़िक़ को क़त्ल कर दिया और फ़रमाया जो अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले से राज़ी न हो उसका मेरे पास यह फ़ैसला है.

(2) जिससे भागने बचने की कोई राह न हो जैसी कि बिशर मुनाफ़िक़ पर पड़ी कि उसको हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने क़त्ल कर दिया.

(3) कुफ़्र और दोहरी प्रवृत्ति और गुनाह, जैसा कि बिशर मुनाफ़िक़ ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के फ़ैसले से मुंह फेर कर किया.

(4) और वह माफ़ी और शर्मिन्दगी कुछ काम न दे, जैसा कि बिशर मुनाफ़िक़ के मारे जाने के बाद उसके सरपरस्त उसके ख़ून का बदला तलब करने आए और बेजा माज़िरतें करने और बातें बनाने लगे. अल्लाह तआला ने उसके ख़ून का कोई बदला न दिया क्योंकि वह मारे ही जाने के क़ाबिल था.

(5) जो उनके दिल में असर कर जाएं.

(6) जबकि रसूल का भेजना ही इसलिये है कि वो फ़रमाँबरदारी के मालिक बनाए जाएं और उनकी आज्ञा का पालन फ़र्ज़ हो. तो जो उनके हुक्म से राज़ी न हो उसने रिसालत को तसलीम न किया, वह काफ़िर क़त्ल किये जाने के क़ाबिल है.

(7) गुनाह और नाफ़रमानी करके.

(8) इससे मालूम हुआ कि अल्लाह की बारगाह में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को वसीला और आपकी शफ़ाअत काम बन जाने का ज़रिया है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ाते शरीफ़ के बाद एक अरब देहाती आपके मुबारक रौज़े पर हाज़िर हुआ और रोज़ए शरीफ़ की पाक मिट्टी अपने सर पर डाली और अर्ज़ करने लगा, या रसूलल्लाह, जो आपने फ़रमाया हमने सुना और जो आप पर उतरा उसमें यह आयत भी है “वलौ अन्नहुम इज़ ज़लमू”. मैंने बेशक अपनी जान पर ज़ुल्म किया और मैं आपके हुज़ूर में अल्लाह से अपने गुनाह की बख़्शिश चाहने हाज़िर हुआ तो मेरे रब से मेरे गुनाह की बख़्शिश कराईये. इस पर क़ब्र शरीफ़ से आवाज़ आई कि तेरी बख़्शिश की गई. इससे कुछ मसअले मालूम हुए. अल्लाह तआला की बारगाह में हाजत अर्ज़ करने के लिये उसके प्यारों को वसीला बनाना कामयाबी का ज़रिया है. क़ब्र पर हाजत के लिये जाना भी ” जाऊका” में दाख़िल है. और पिछले नेक लोगों का तरीक़ा रहा है. वफ़ात के बाद अल्लाह के प्यारों को “या” के साथ पुकारना ज़ायज़ है. अल्लाह के मक़बूल बन्दे मदद फ़रमाते हैं और उनकी दुआ से हाजत पूरी होती है.

(9) मानी ये हैं कि जब तक आपके फ़ैसले और हुक्म को दिल की सच्चाई से न माने लें, मुसलमान नहीं हो सकते. सुब्हानल्लाह, इससे रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान ज़ाहिर होती है. पहाड़ से आने वाला पानी जिससे बाग़ों में सिंचाई करते हैं, उसमें एक अन्सारी का हज़रत ज़ुबैर रदियल्लाहो अन्हो से झगड़ा हुआ. मामला सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर पेश किया गया. हुज़ूर ने फ़रमाया, ऐ ज़ुबैर तुम अपने बाग़ को पानी देकर अपने पड़ौसी की तरफ़ पानी छोड़ दो. यह अन्सारी को बुरा लगा और उसको ज़बान से यह कलिमा निकला कि ज़ुबैर आपके फुफीज़ाद भाई हैं. इसके बावुजूद कि फ़ैसले में हज़रत ज़ुबैर को अन्सारी के साथ ऐहसान की हिदायत फ़रमाई गई थी लेकिन अन्सारी ने इसकी क़द्र न की तो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत ज़ुबैर को हुक्म दिया कि अपने बाग़ को भरपूर पानी देकर पानी रोक लो. इस पर आयत उतरी.

(10) जैसा कि बनी इस्त्राईल को मिस्त्र से निकल जाने और तौबह के लिये अपने आपको क़त्ल का हुक्म दिया था. साबित बिन क़ैस बिन शम्मास से एक यहूदी ने कहा कि अल्लाह ने हम पर अपना क़त्ल और घर बार छोड़ना फ़र्ज़ किया था, हमने उसको पूरा किया. साबित न फ़रमाया कि अगर अल्लाह हम पर फ़र्ज़ करता तो हम भी ज़रूर हुक्म पूरा करते. इस पर यह आयत उतरी.

(11) यानी रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फ़रमाँबरदारी और आपकी आज्ञा के पालन की.

(12) तो नबियों के मुख़लिस फ़रमाँबरदार, जन्नत में उनकी सोहबत और दर्शन से मेहरूम न होंगे.

(13) ” सिद्दीक ” नबियों के सच्चे अनुयाइयों को कहते हैं, जो सच्चे दिल से उनकी राह पर क़ायम रहें. मगर इस आयत में नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बड़ी बुज़ुर्गी वाले सहाबा मुराद है जैसे कि हज़रत अबूबक्र सिद्दीक रदियल्लाहो तआला अन्हो.

(14) जिन्होंने ख़ुदा की राह में जानें दीं.

(15) वह दीनदार जो बन्दों के हक़ और अल्लाह के हक़ दोनों अदा करें और उनके ज़ाहिर और छुपवाँ हाल अच्छे और पाक हों. हज़रत सोअबान सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ बहुत महब्बत रखते थे. जुदाई की ताक़त न थी. एक रोज़ इस क़द्र ग़मगीन और रंजीदा हाज़िर हुए कि रंग बदल गया था. हुज़ूर ने फ़रमाया आज रंग क्यों बदला हुआ है. अर्ज़ किया न मुझे कोई बीमारी है न दर्द, सिवाय इसके कि जब हुज़ूर सामने नहीं होते तो बहुत ज़्यादा वहशत और परेशानी होती है. जब आख़िरत को याद करता हूँ तो यह अन्देशा होता है कि वहाँ में किस तरह दीदार पा सकूंगा. आप सबसे ऊंचे दर्जे में होंगे, मुझे अल्लाह तआला ने अपनी मेहरबानी से जन्नत दी भी तो उस ऊंचे मक़ाम तक पहुंच कहाँ इस पर यह आयत उतरी और उन्हें तसल्ली दी गई कि दर्ज़ों के फ़र्क़ के बावुजूद फ़रमाँबरदारों को मुलाक़ात और साथ रहने की नेअमत से नवाज़ा जाएगा.

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