सूरए निसा – तैरहवाँ रूकू

सूरए निसा – तैरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और मुसलमानों को नहीं पहुंचता कि मुसलमान का ख़ून करे मगर हाथ बहक कर (1)
और जो किसी मुसलमान को भूले से क़त्ल करे तो उसपर एक ममलूक (ग़ुलाम) मुसलमान का आज़ाद करना है और ख़ूं बहा (जुर्माना) कि मक़तूल (मृतक) के लोगों को सुपुर्द की जाए (2)
मगर यह कि वो माफ़ कर दें फिर अगर वह (3)
उस क़ौम से हो जो तुम्हारी दुश्मन है (4)
और ख़ुद मुसलमान है तो सिर्फ़ एक ममलूक (ग़ुलाम) मुसलमान का आज़ाद करना  (5)
और अगर वह उस क़ौम में हो कि तुम में उनमें मुआहिदा (समझौता) है तो उसके लोगों को ख़ूं बहा (जुर्माना) सुपुर्द की जाए और एक मुसलमान ममलूक(ग़ुलाम) आज़ाद करना  (6)
तो जिसका हाथ न पहुंचे(7)
वह लगातार दो महीने के रोज़े रखे (8)
यह अल्लाह के यहां उसकी तौबह है और अल्लाह जानने वाला हिकमत वाला है (92)
और जो कोई मुसलमान को जानबूझकर क़त्ल करे तो उसका बदला जहन्नम है कि मुद्दतों उसमें रहे(9)
और अल्लाह ने उसपर ग़जब (प्रकोप) किया और उसपर लानत की और उसके लिये तैयार रखा बड़ा अज़ाब (93) ऐ ईमान वालों जब तुम जिहाद को चलो तो तहक़ीक़ (जांचपड़ताल) करलो और जो तुम्हें सलाम करे उससे यह न कहो कि तू मुसलमान नहीं (10)
तुम जीती दुनिया का असबाब (सामान) चाहते हो तो अल्लाह के पास बहुतेरी गनीमतें (परिहार)  हैं पहले तुम भी ऐसे ही थे (11)
फिर अल्लाह ने तुम पर एहसान किया (12)
कि तुम पर तहक़ीक़  (जांच) करना लाज़िम है(13)
बेशक अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है (94) बराबर नहीं वो मुसलमान कि बे उज्र (बिना मजबूरी) जिहाद से बैठ रहें और वो कि ख़ुदा कि राह में अपने मालों  और जानों के साथ जिहाद करते हैं (14)
अल्लाह ने अपनी जानों के साथ जिहाद करने वालों का दर्जा बैठने वालो से बड़ा किया(15)
और अल्लाह ने सबसे भलाई का वादा फ़रमाया (16)
और अल्लाह ने जिहाद वालों को  (17)
बैठने वालों पर बड़े सवाब से फ़ज़ीलत (प्रधानता) दी है(95)    उसकी तरफ़ से दर्जें और बख़्शिश और रहमत (18)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (96)
तफसीर
सूरए निसा – तैरहवाँ रूकू
(1) यानी मूमिन काफ़िर की तरह मार डालने के क़ाबिल नहीं है, जिसका हुक्म ऊपर की आयत में आया. तो मुसलमान का क़त्ल करना बिना हक़ के रवा नहीं और मुसलमान की शान नहीं कि उससे किसी मुसलमान का क़त्ल हो, सिवाय इसके कि भूल से हो, इस तरह कि मारता था शिकार को, या हर्बी काफ़िर को, और हाथ बहक कर लग गया मुसलमान को, या यह कि किसी शख़्स को हर्बी काफ़िर समझ कर मारा और था वह मुसलमान.

(2) यानी उसके वारिसों को दी जाए, वो उसे मीरास की तरह तक़सीम कर लें. दिय्यत क़त्ल होने वाले के तर्के के हुक्म में है. इससे मक़तूल का क़र्ज़ भी अदा किया जाएगा, वसिय्यत भी जारी की जाएगी.

(3) जो भूल से क़त्ल किया गया.

(4) यानी काफ़िर.

(5) लाज़िम है, और दिय्यत नहीं.

(6) यानी अगर मक़तूल ज़िम्मी हो तो उसका वही हुक्म है जो मुसलमान का.

(7) यानी वह किसी ग़ुलाम का मालिक न हो.

(8) लगातार रोज़ा रखना यह है कि इन रोज़ों के बीच रमज़ान और 10 से 13 ज़िलहज यानी तशरीक़ के दिन न हों और बीच में रोज़ों का सिलसिला किसी मजबूरी या बिना मजबूरी, किसी तरह तोड़ा न जाए. यह आयत अयाश बिन रबीआ मख़ज़ूमी के हक़ में उतरी. वह हिजरत से पहले मक्कए मुकर्रमा में इस्लाम लाए और घर वालों के ख़ौफ़ से मदीनए तैय्यिबह जाकर पनाह ली. उनकी माँ को इससे बहुत बेक़रारी हुई और उसने हारिस और अबूजहल, अपने दोनों बेटों से जो अयाश के सौतेले भाई थे, यह कहा कि ख़ुदा की क़सम न मैं साए में बैठूं, न खाना चखूं, न पानी पियूं, जब तक तुम अयाश को मेरे पास न ले आओ. वो दोनों हारिस बिन ज़ैद बिन अबी उनीसा को साथ लेकर तलाश के लिये निकले और मदीनए तैय्यिबह पहुंचकर अयाश को पालिया और उनको माँ की बेक़रारी बैचेनी और खाना पीना छोड़ने की ख़बर सुनाई और अल्लाह को बीच में देकर यह एहद किया कि हम दीन के बारे मे तुम से कुछ न कहेंगे, इस तरह वो अयाश को मदीने से निकाल लाए और मदीने से बाहर आकर उनको बाँधा और हर एक ने सौ सौ कोड़े मारे, फिर माँ के पास लाए, तो माँ ने कहा मैं तेरे बन्धन न खोलूंगी तू अपना दीन न छोड़ दे. फिर अयाश को धूप में बंधा हुआ डाल दिया और इन मुसीबतों में पड़कर अयाश ने उनका कहा मान लिया और अपना दीन छोड़ दिया तो हारिस बिन ज़ैद ने उनको बुरा भला कहा और कहा तू इसी दीन पर था, अगर यह सच्चा था तो तू ने सच्चाई को छोड़ दिया और अगर तू बातिल था तो तू बातिल दीन पर रहा. यह बात अयाश को बड़ी बुरी लगी और अयाश ने कहा कि मैं तुझको अकेला पाउंगा तो ख़ुदा की क़सम ज़रूर क़त्ल कर दूंगा. इसके बाद अयाश इस्लाम लाए और उन्होंने मदीनए तैय्यिबह हिजरत की और उनके बाद हारिस भी इस्लाम लाए और हिजरत करके रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में पहुंचे. लेकिन उस रोज़ अयाश मौजूद न थे, न उन्हें हारिस के इस्लाम की सूचना मिली. क़ुबा के क़रीब अयाश ने हारिस को पालिया और क़त्ल कर दिया तो लोगों ने कहा, अयाश तुमने बहुत बुरा किया, हारिस मुसलमान हो चुके थे. इस पर अयाश को बहुत अफ़सोस हुआ और उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमते अक़दस में जाकर वाक़िआ अर्ज़ किया और कहा कि मुझे क़त्ल के वक़्त तक उनके इस्लाम लाने की ख़बर ही न हुई, इस पर यह आयत उतरी.

(9) मुसलमान को जान बूझकर क़त्ल करना सख़्त गुनाह और बड़ा बुरा काम है. हदीस शरीफ़ में है कि दुनिया का हलाक करना अल्लाह के नज़दीक एक मुसलमान के हलाक करने से हलका है. फिर यह क़त्ल अगर ईमान की दुश्मनी से हो या क़ातिल इस क़त्ल को हलाल जानता हो तो यह भी कुफ़्र है. “ख़ूलूद” लम्बे समय के अर्थ में भी इस्तेमाल होता है. और क़ातिल अगर सिर्फ़ दुनियावी दुश्मनी से मुसलमान को क़त्ल करें और उसके क़त्ल को अच्छा ना जाने जब भी उसका बदला लम्बे समय के लिये जहन्न्म है. “ख़ुलूद” का लफ़्ज लम्बी मुद्दत के लिये इस्तेमाल होता तो क़ुरआने करीम में लफ़्ज अबद मज़कूर नहीं होता और काफ़िर के बारे में ख़ूलूद हमेशा के अर्थ में आया है तो इसके साथ अबद भी ज़िक्र फ़रमाया गया है. यह आयत मुक़ैय्यस बिन ख़ुबाबा के बारे में उतरी. उसके भाई बनी नज्जार क़बीले में मक़तूल पाए गए थे और क़ातिल मालूम न था. बनी नज्जार ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म के हुक्म से दिय्यत अदा कर दी उसके बाद मुक़ैय्यस ने शैतान के बहकावे में एक मुसलमान को बेख़बरी में क़त्ल कर दिया और दिय्यत के ऊंट लेकर मक्के  को चलता हो गया और मुर्तद हो गया. यह इस्लाम में पहला शख़्स है जो मुर्तद हुआ, यानी इस्लाम लाकर उससे फिर गया.

(10) या जिससे इस्लाम की अलामत व निशानी पाओ उससे हाथ रोको और जब तक उसका कुफ़्र साबित न हो जाए, उस पर हाथ न डालो. अबू दाऊद व तिरमिज़ी की हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जब कोई लश्कर रवाना फ़रमाते तो हुक्म देते अगर तुम मस्जिद देखो या अज़ान सुनो तो क़त्ल न करना. अक्सर फ़ुक़हाए किराम ने फ़रमाया कि अगर यहूदी या ईसाई यह कहे कि मैं मूमिन हूँ तो उसको मूमिन न माना जाए, क्योंकि वह अपने अक़ीदे को ही ईमान कहता है. और अगर “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” कहे जब भी उसके मुसलमान होने का हुक्म न किया जाएगा जब तक कि वह अपने दीन से बेज़ारी का इज़हार और उसके बातिल होने का ऐतिराफ़ न करे. इससे मालूम हुआ कि जो शख़्स किसी कुफ़्र में मुब्तला हो उसके लिये उस कुफ़्र से बेज़ारी और उसको कुफ़्र जानना ज़रूरी है.

(11) यानी जब तुम इस्लाम में दाख़िल हुए थे तो तुम्हारी ज़बान से कलिमए शहादत सुनकर तुम्हारे जान माल मेहफ़ूज़ कर दिये गए थे और तुम्हारा इज़हार बेएतिबार क़रार न दिया गया था, ऐसा ही इस्लाम में दाख़िल होने वालों के साथ तुम्हें भी सुलूक करना चाहिये. यह आयत मर्वास बिन नहीक के बारे में उतरी जो एहले फ़िदक में से थे और उनके सिवा उनकी क़ौम का कोई शख़्स इस्लाम न लाया था. इस क़ौम को ख़बर मिली कि इस्लामी लश्कर उनकी तरफ़ आ रहा है तो क़ौम के सब लोग भाग गए, मगर मर्वास ठहरे रहे. जब उन्होंने दूर से लश्कर को देखा तो इस ख़याल से कि कहीं कोई ग़ैर मुस्लिम जमाअत हो, यह पहाड़ की चोटी पर अपनी बकरियाँ लेकर चढ़ गए. जब लश्कर आया और इन्होंने अल्लाहो अकबर की आवाज़ें सुनीं तो ख़ुद भी तकबीर पढ़ते हुए उतर आए और कहने लगे “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह , अस्सलामो अलैकुम. मुसलमानों ने ख़्याल किया कि फ़िदक वाले तो सब काफ़िर है, यह शख़्स मुग़ालता देने के लिये ईमान का इज़हार कर रहा है, इस ख़याल से उसामा बिन ज़ैद ने उनको क़त्ल कर दिया और बकरियाँ ले आए. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में हाज़िर हुए तो तमाम माजरा अर्ज़ किया. हुज़ूर को बहुत दुख हुआ और फ़रमाया, तुमने उसके सामान के कारण उसको क़त्ल कर दिया. इस पर यह आयत उतरी और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसामा को हुक्म दिया कि मक़तूल की बकरियाँ उसके घर वालों को वापस कर दो.

(12) कि तुम को इस्लाम पर ठहराव बख़्शा और तुम्हारा मूमिन होना मशहूर किया.

(13) ताकि तुम्हारे हाथ से कोई ईमान वाला क़त्ल न हो.

(14) इस आयत में जिहाद की तरग़ीब है कि बैठ रहने वाले और जिहाद करने वाले बराबर नहीं हैं. जिहाद करने वालों के ऊंचे दर्जे और सवाब हैं. और यह मसअला भी साबित होता है कि जो लोग बीमारी या बुढ़ापे या कमज़ोरी या अन्धेपन या हाथ पाँव के नाकारा होने और मजबूरी के कारण जिहाद में हाज़िर न हों, वो फ़ज़ीलत और इनाम से मेहरूम न किये जाएंगे, अगर सच्ची नियत रखते हों. बुखारी शरीफ़ की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ग़ज़वए तबूक से वापसी के वक़्त फ़रमाया, कुछ लोग मदीने में रह गए हैं. हम किसी घाटी या आबादी में नहीं चलते मगर वो हमारे साथ होते हैं. उन्हें मजबूरी ने रोक लिया है.

(15) जो मजबूरी के कारण जिहाद में हाज़िर न हो सके, अगरचे वो नियत का सवाब पाएंगे लेकिन जिहाद करने वालों को अमल की फ़ज़ीलत उससे ज़्यादा हासिल है.

(16) जिहाद करने वाले हों या मजबूरी से रह जाने वाले.

(17) बग़ैर मजबूरी के.

(18) हदीस शरीफ़ में है, अल्लाह तआला ने मुजाहिदों के लिये जन्नत में सौ दर्जे रखे हैं, हर दो दर्जों में इतना फ़ासला है जैसे आसमान और ज़मीन में.

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