सूरए निसा -तेईसवाँ रूकू

सूरए निसा _ तेईसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक ऐ मेहबूब, हमने तुम्हारी तरफ़ वही भेजी जैसी वही नूह और उसके बाद के पैग़म्बरों को भेजी (1)
और  हमने इब्राहीम और इस्माईल और इस्हाक़ और याक़ूब और उनके बेटों और ईसा और अय्यूब और यूनुस और  हारून और सुलैमान को वही की और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता फ़रमाई (163) और रसूलों को जिनका ज़िक्र आगे हम तुमसे  (2)
फ़रमा चुके और उन रसूलों को जिनका ज़िक्र तुमसे न फ़रमाया (3)
और अल्लाह ने मूसा से हक़ीक़त में कलाम फ़रमाया (4) (164)
रसूल ख़ुशख़बरी देते (5)
और डर सुनाते (6)
कि रसूलों के बाद अल्लाह के यहाँ लोगों को कोई मजबूरी न रहे (7)
और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है (165) लेकिन ऐ मेहबूब अल्लाह उसका गवाह है जो उसने तुम्हारी तरफ़ उतारा वह उसने अपने इल्म से उतारा है और फ़रिश्तें गवाह हैं और अल्लाह की गवाही काफ़ी (166) वो जिन्होंने कुफ़्र किया (8)
और अल्लाह की राह से रोका (9)
बेशक वो दूर की गुमराही में पड़े (167) बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया  (10)
और हद से बढ़े  (11)
अल्लाह कभी उन्हें न बख़्शेगा (12)
और न उन्हें कोई राह दिखाए  (168) मगर जहन्नम का रास्ता कि उसमें हमेशा हमेशा रहेंगे और यह अल्लाह को आसान है (169) ऐ लोगो तुम्हारे पास ये रसूल (13)
हक़ के साथ तुम्हारे रब की तरफ़ से तशरीफ़ लाए तो ईमान लाओ अपने भले को और अगर तुम कुफ़्र करो (14)
तो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है (170) ऐ किताब वालो अपने दीन में ज़ियादती न करो (15)
और अल्लाह पर न कहो मगर सच (16)
मसीह ईसा मरयम का बेटा (17)
अल्लाह का रसूल ही है और उसका एक कलिमा (18)
कि मरयम की तरफ़ भेजा और उसके यहां की एक रूह, तो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाओ (19)
और तीन न कहो (20)
बाज़ रहो अपने भले को, अल्लाह तो एक ही ख़ुदा है (21)
पाकी उसे इससे कि उसके कोई बच्चा हो. उसी का माल है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में हैं (22)
और अल्लाह काफ़ी कारसाज़ है (171)

तफसीर
सूरए निसा _ तेईसवाँ रूकू

(1) यहूदियों और ईसाईयों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से जो यह सवाल किया था कि उनके लिये आसमान से एक साथ ही किताब उतारी जाए तो वो नबुव्वत पर ईमान लाएं. इस पर यह आयत उतरी और उनपर तर्क क़ायम किया गया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के सिवा बहुत से नबी हैं. जिनमें से ग्यारह के नाम यहां आयत में बयान किये गए हैं. किताब वाले इन सबकी नबुव्वत को मानते हैं. इन सब हज़रात में से किसी पर एक साथ किताब न उतरी तो इस वजह से उनकी नबुव्वत तस्लीम करने में किताब वालों को कुछ ऐतिराज़ न हुआ तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत तस्लीम करने में क्या मजबुरी है. और रसूलों के भेजने का मक़सद लोगों की हिदायत और उनको अल्लाह तआला की तौहीद और पहचान का पाठ देना और ईमान को पुख़्ता करना और ईबादत के तरीक़े की सीख देना है. किताब के कई चरणों में उतरने से यह उद्देश्य भरपूर तरीक़े से हासिल होता है कि थोड़ा थोड़ा आसानी से दिल मे बैठता चला जाता है. इस हिकमत को न समझना और ऐतिराज़ करना हद दर्जे की मूर्खता है.

(2) क़ुरआन शरीफ़ में नाम बनाम फ़रमा चुके हैं.

(3) और अब तक उनके नामों की तफ़सील क़ुरआने पाक में ज़िक्र नहीं फ़रमाई गई.

(4) तो जिस तरह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से बेवास्ता कलाम फ़रमाना दूसरे नबियों की नबुव्वत के आड़े नहीं आता, जिनसे इस तरह कलाम नहीं फ़रमाया गया, ऐसे ही हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर किताब का एक साथ उतरना दूसरे नबियों की नबुव्वत में कुछ भी आड़े नहीं आता.

(5) सवाब की, ईमान लाने वालों को.

(6) अज़ाब का, कुफ़्र करने वालों को.

(7) और यह कहने का मौक़ा न हो कि अगर हमारे पास रसूल आते तो हम ज़रूर उनका हुक्म मानते और अल्लाह के आज्ञाकारी और फ़रमाँबरदार होते. इस आयत से यह मसअला मालूम होता है कि अल्लाह तआला रसूलों की तशरीफ़ आवरी से पहले लोगों पर अज़ाब नहीं फ़रमाता जैसा दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया “वमा कुन्ना मुअज्ज़िबीना हत्ता नबअसा रसूलन” (और हम अज़ाब करने वाले नहीं जब तक रसूल न भेज लें. सूरए बनी इस्राईल, आयत 15) और यह मसअला भी साबित होता है कि अल्लाह की पहचान शरीअत के बयान और नबियों की ज़बान से ही हासिल होती है, सिर्फ अक़्ल से इस मंज़िल तक पहुंचना मयस्सर नहीं होता.

(8) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करके.

(9) हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नअत और विशेषताएं छुपाकर और लोगो के दिलों में शुबह डाल कर. (यह हाल यहूदियो का है)

(10) अल्लाह के साथ.

(11) अल्लाह की किताब में हुज़ूर के गुण बदलकर और आपकी नबुव्वत का इन्कार करके.

(12) जब तक वो कुफ़्र पर क़ायम रहें या कुफ़्र पर मरें.

(13) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(14) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत का इन्कार करो तो इस मे उनका कुछ नुक़सान नहीं और अल्लाह तुम्हारे ईमान से बेनियाज़ है.

(15) यह आयत ईसाइयों के बारे में उतरी जिनके कई सम्प्रदाय हो गए थे और हर एक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की निस्बत अलग अलग कुफ़्री अक़ीदा रखता था. नस्तूरी आपको ख़ुदा का बेटा कहते थे. मरक़ूसी कहते कि वो तीन में के तीसरे हैं और इस कलिमे की तौजीहात में भी मतभेद था. कुछ तीन ताक़तें मानते थे और कहते थे कि बाप, बेटा और रूहुलक़ुदुस, बाप से ज़ात, बेटे से ईसा, रूहुल क़ुदुस से उनमें डाली जानेवाली ज़िन्दगी मुराद लेते थे. तो उनके नज़दीक मअबूद तीन थे और इस तीन को एक बताते थे. “तीन में एक और एक तीन में” के चक्कर में गिरफ्तार थे, कुछ कहते थे कि ईसा नासूतियत और उलूहियत के संगम है, माँ की तरफ़ से उनमें नासूतियत आई और बाप की तरफ़ से उनमें उलूहियत आई.  यह फ़िरक़ाबन्दी ईसाइयों में एक यहूदी ने पैदा की जिसका नाम पोलूस था और उसी ने उन्हें गुमराह करने के लिये इस क़िस्म के अक़ीदों की तालीम दी. इस आयत में किताब वालों को हिदायत की गई कि वो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में इफ़रात व तफ़रीत (बहुत ज़्यादा, बहुत कम) से बाज़ रहे. ख़ुदा और ख़ुदा का बेटा भी न कहें और उनकी तौहीन भी न करें.

(16) अल्लाह का शरीक और बेटा भी किसी को न बनाओ और हुलूल व इत्तिहाद के ऐब भी मत लगाओ और इस सच्चे अक़ीदे पर रहो कि….

(17) है और उस मोहतरम के लिये इसके सिवा कोई नसब नहीं.

(18) कि “हो जा” फ़रमाया और वह बग़ैर बाप और बिना नुत्फ़े के केवल अल्लाह के हुक्म से पैदा हो गए.

(19) और तस्दीक़ करो कि अल्लाह एक है, बेटे और औलाद से पाक है, उसके रसूलों की तस्दीक़ करो और इसकी कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के रसूलों में से हैं.

(20) जैसा कि ईसाइयों का अक़ीदा है कि वह कुफ़्रे महज़ है.

(21) कोई उसका शरीक नहीं.

(22) और वह सब का मालिक है, और जो मालिक हो, वह बाप नहीं हो सकता.

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