सूरए आले इमरान – आठवाँ रूकू

सूरए आले इमरान – आठवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

और किताबियों का एक दल बोला (1)
वह जो ईमान वालों पर उतरा (2)
सुब्ह को उसपर ईमान लाओ और शाम को इन्कारी हो जाओ शायद वो फिर जाएं (3) (72)
और यक़ीन न लाओ मगर उसका जो तुम्हारे दीन का मानने वाला हो तुम फ़रमादो कि अल्लाह ही की हिदायत हिदायत है   (4)
(यकी़न काहे का न लाओ) उसका कि किसी को मिले(5)
जैसा तुम्हें मिला या कोई तुम पर हुज्जत (तर्क) ला सके तुम्हारे रब के पास (6)
तुम फ़रमादो कि फ़ज़्ल (कृपा)  तो अल्लाह ही के हाथ है जिसे चाहे दे और अल्लाह वुसअत  (विस्तार) वाला इल्म वाला है (73) अपनी रहमत से (7)
ख़ास करता है जिसे चाहे (8)
और अल्लाह बड़े फ़ज़्ल वाला है (74)  और किताबियों में कोई वह है कि अगर तू उसके पास एक ढेर अमानत रखे तो वह तुझे अदा कर देगा(9)
और इनमें कोई वह है कि अगर एक अशरफ़ी उसके पास अमानत रखे तो वह तुझे फेर कर न देगा मगर जब तक तू उसके सर पर खड़ा हो (10)
यह इसलिये कि वो कहते हैं कि अनपढ़ों (11)
के मामले में हम पर कोई मुवाख़िज़ा (पकड़) नहीं और अल्लाह पर जानबूझ कर झूठ बांधते हैं(12) (75)
हाँ क्यों नहीं जिसने अपना अहद पूरा किया और परहेज़गारी की और बेशक परहेज़गार अल्लाह को ख़ुश आते हैं (76) वो जो अल्लाह के अहद और अपनी क़समों के बदले ज़लील(तुच्छ)  दाम लेते हैं (13)
आख़िरत में उनका कुछ हिस्सा नहीं और अल्लाह न उनसे बात करें न उनकी तरफ़ नज़र फ़रमाए क़यामत के दिन और न उन्हें पाक करे और उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है(14)(77)
और इनमें कुछ वो है जो ज़बान फेरकर किताब में मेल करते हैं कि तुम समझो यह भी किताब में है  और वह किताब में नहीं और वो कहते हैं यह अल्लाह के पास से है और वह अल्लाह के पास से नहीं और अल्लाह पर जान बूझकर झूठ बांधते हैं (15)(78)
किसी आदमी का यह हक़ नहीं कि अल्लाह उसे किताब  और हुक्म व पैग़म्बरी दे(16)
फिर वह उन लोगों से कहे कि अल्लाह को छोड़कर मेरे बन्दे हो जाओ (17)
हाँ यह कहेगा कि अल्लाह वाले (18)
हो जाओ इस वजह से कि तुम किताब सिखाते हो और इससे कि तुम दर्स (पठन) करते हो (19)(79)
और न तुम्हें यह हुक्म होगा (20)
कि फ़रिश्तों और पैग़म्बरों को ख़ुदा ठहरा लो, क्या तुम्हें कुफ्र का हुक्म देगा बाद इसके कि तुम मुसलमान हो लिये (21)(80)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – आठवाँ रूकू

(1) और उन्होंने आपसी सलाह करके यह कपट सोचा.

(2) यानी क़ुरआन शरीफ़

(3) यहूदी इस्लाम के विरोध में रात दिन नए-नए छल कपट किया करते थे. ख़ैबर के यहूदियों के विद्वानों में से बारह ने आपस में सलाह करके एक यह कपट सोचा कि उनकी एक जमाअत सुब्ह को इस्लाम लाए और शाम को इस्लाम से फिर जाए और लोगों से कहे कि हमने अपनी किताबों में जो देखा तो साबित हुआ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) वो वादा किये गए नबी नहीं हैं जिनकी हमारी किताबों में ख़बर है, ताकि इस हरकत से मुसलमानों को दीन में संदेह पैदा हो. लेकिन अल्लाह तआला ने यह आयत उतारकर उनका यह राज़ खोल दिया और उनकी यह चाल न चल सकी और मुसलमान पहले से ख़बरदार हो गए.

(4) और जो इसके सिवा है वह बातिल और गुमराह है.

(5) दीन व हिदायत और किताब व हिकमत और बुज़ुर्गी.

(6) क़यामत का दिन.

(7) यानी नबुव्वत और रिसालत से.

(8) इससे यह साबित होता है कि नबुव्वत जिस किसी को मिलती है, अल्लाह के फ़ज़्ल से मिलती है. इसमें हक़ या अधिकार की बात नहीं होती. (ख़ाज़िन),

(9) यह आयत किताब वालों के बारे में उतरी और इसमें ज़ाहिर फ़रमाया गया कि उनमें दो क़िस्म के लोग हैं, अमानत वाले और ख़यानत वाले. कुछ तो ऐसे हैं कि बहुत सा माल उनके पास अमानत या सुरक्षित रखा जाए तो ज़रा सी कमी के बिना वक़्त पर अदा कर दें, जैसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम जिनके पास एक क़ुरैशी ने बारह सौ औक़िया (एक औक़िया = एक आऊन्स ) सोना अमानत रखा था. आपने उसको वैसा ही अदा किया. और कुछ किताब वाले इतने बेईमान हैं कि थोड़े पर भी उनकी नियत बिगड़ जाती है, जैसे कि फ़ख़ास बिन आज़ूरा जिसके पास किसी ने एक अशरफ़ी अमानत रखी थी, माँगते वक़्त उससे इनकारी हो गया.

(10) और जैसे ही देने वाला उसके पास से हटे, वह अमानत का माल डकार जाता है.

(11) यानी जो किताब वाले नहीं है, उनका.

(12) कि उसने अपनी किताबों में दूसरे दीन वालों के माल हज़्म कर जाने का हुक्म दिया है, इसके बावुजूद कि वो ख़ूब जानते हैं कि उनकी किताबों में ऐसा कोई हुक्म नहीं है.

(13) यह आयत यहूदियों के पादरी और उनके रईस अबू राफ़े व कनाना बिन अबिल हुक़ैक़ और कअब बिन अशरफ़ और हैय्यी बिन अख़तब के बारे में उतरी जिन्हों ने अल्लाह तआला का वह एहद छुपाया था जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने के बारे में उनसे तौरात में लिया गया. उन्होंने उसको बदल दिया और उसकी जगह अपने हाथों से कुछ का कुछ लिख दिया और झूटी क़सम खाई कि यह अल्लाह की तरफ़ से है और ये सब कुछ उन्होंने अपनी जमाअत के जाहिलों से रिश्वतें और पैसा हासिल करने के लिये किया.

(14) मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, तीन लोग ऐसे हैं कि क़यामत के दिन अल्लाह न उनसे कलाम फ़रमाए और न उनकी तरफ़ रहमत की नज़र करे, न उन्हें गुनाहों से पाक करे, और उन्हें दर्दनाक अज़ाब है फिर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इस आयत को तीन बार पढ़ा. हज़रत अबूज़र रावी ने कहा कि वो लोग टोटे और नुक़सान में रहे. या रसूलल्लाह, वह कौन लोग हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया इज़ार को टख़नों से नीचे लटकाने वाला और एहसान जताने वाला और अपने तिजारती माल को झूटी क़सम से रिवाज देने वाला. हज़रत अबू उमामा की हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, जो किसी मुस्लमान का हक़ मारने के लिये क़सम खाए, अल्लाह उस पर जन्नत हराम करता है और दोज़ख़ लाज़िम करता है. सहाबा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, अगरचे थोड़ी ही चीज़ हो. फ़रमाया अगरचे बबूल की शाख़ ही क्यों न हो.

(15) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि यह आयत यहूदियों  और ईसाइयों दोनों के बारे में उतरी कि उन्होंने तौरात  और इंजिल में फेर बदल किया  और अल्लाह की किताब में अपनी तरफ़ से जो चाहा मिलाया.

(16) और अमल में कमाल अता फ़रमाए और गुनाहों से मासूम करें.

(17) यह नबियों से असंभव है और उनकी तरफ़ इसकी निस्बत बोहतान है. नजरान के ईसाइयों ने कहा कि हमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने हुक्म दिया है कि हम उन्हें रब मानें. इस आयत में अल्लाह तआला ने उनके इस क़ौल को झुटलाया और बताया कि नबियों की शान से ऐसा कहना संभव ही नहीं है. इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में दूसरा क़ौल यह है कि अबू राफ़े यहूदी और सैयद नसरानी ने सरवरे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा “या मुहम्मद, आप चाहते हैं कि हम आपकी इबादत करें और आपको रब मानें”. हुज़ूर ने फ़रमाया, अल्लाह की पनाह, कि में ग़ैरूल्लाह की इबादत का हुक्म करूं, न मुझे अल्लाह ने इस का हुक्म दिया, न मुझे इसलिये भेजा.

(18) रब्बानी के मानी आलिम, फ़क़ीह और बाअमल आलिम और निहायत दीनदार के हैं.

(19) इससे साबित हुआ कि इल्म और तालीम का फल ये होना चाहिये कि आदमी अल्लाह वाला हो जाए. जिसे इल्म से यह फ़ायदा न हो, उसका इल्म व्यर्थ और बेकार है.

(20) अल्लाह तआला या उसका कोई नबी.

(21) ऐसा किसी तरह नहीं हो सकता.

Advertisements

सूरए आले इमरान – नवाँ रूकू

सूरए आले इमरान –  नवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

और याद करो जब अल्लाह ने पैग़म्बरों से उनका एहद लिया  (1)
जो मैं तुमको किताब और हिकमत दूं फिर तशरीफ़ लाए तुम्हारे पास वो रसूल  (2)
कि तुम्हारी किताबों की तस्दीक़ (पुष्टि) फ़रमाए  (3)
तो तुम ज़रूर उसपर ईमान लाना और ज़रूर ज़रूर उसकी मदद करना फ़रमाया क्यों तुमने इक़रार किया और उस पर मेरा भारी ज़िम्मा लिया सबने अर्ज़ की हमने इक़रार किया फ़रमाया तो एक दूसरे पर गवाह हो जाओ और मैं आप तुम्हारे साथ गवाहों में हूं (81) तो जो कोई इस (4)
के बाद फिरे (5)
तो वही लोग फ़ासिक़  (दुराचारी) हैं (6) (82)
तो क्या अल्लाह के दीन के सिवा और दीन चाहते हें (7)
और उसी के हुज़ूर गर्दन रखे हैं जो कोई आसमानों और  ज़मीन में हैं (8)
ख़ुशी से  (9)
और मजबूरी से (10)
और उसी की तरफ़ फिरेंगे (83) यूं कहो कि हम ईमान लाए अल्लाह पर और उस पर जो हमारी तरफ़ उतरा और जो उतरा इब्राहीम और इस्माईल और इस्हाक़ और याक़ूब और उनके बेटों पर और जो कुछ मिला मूसा और ईसा और नबियों को उनके रब से, हम उनमें किसी पर ईमान में फ़र्क़ नहीं करते (11)
और  हम उसी के हुज़ूर गर्दन झूकाए हैं (84) और जो इस्लाम के सिवा कोई दीन चाहेगा वह कभी उससे क़ुबूल न किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों से है(85) किस तरह अल्लाह  ऐसी क़ौम की हिदायत चाहे जो ईमान लाकर काफ़िर हो गए (12)
और गवाही दे चुके थे कि रसूल  (13)
सच्चा है और उन्हें खुली निशानियां आ चुकी थीं (14)
और अल्लाह ज़ालिमों को हिदायत नहीं करता (86) उनका बदला यह है कि उनपर लानत है अल्लाह और फ़रिश्तों और आदमियों की सब की(87) हमेशा उसमें रहें न उनपर से अज़ाब हल्का हो और न उन्हें मोहलत दी जाए (88) मगर जिन्होंने उसके बाद तौबह की (15)
और आपा संभाला तो ज़रूर अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (89) बेशक वह जो ईमान लाकर काफ़िर हुए फिर और क़ुफ्र में बढ़े (16)
उनकी तौबह कभी क़ुबूल न होगी (17)
और वही हैं बहके हुए  (90) जो काफिर हुए और काफिर ही मरे उन में किसी से ज़मीन भर सोना हरगिज़ क़ुबूल न किया जाएगा अगरचे (यद्यपि) अपनी ख़लासी (छुटकारा) को दे उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है और उनका कोई यार (सहायक) नहीं  (91)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान –    नवाँ रूकू

(1) हज़रत अली मुर्तज़ा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने हज़रत आदम और उनके बाद जिस किसी को नबुव्वत अता फ़रमाई उनसे सैयदुल अंबिया मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत एहद लिया और उन नबियों ने अपनी क़ौमो से एहद लिया कि अगर उनकी ज़िन्दगी मे सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ लाएं तो आप पर ईमान लाएं और आपकी मदद करें. इससे साबित हुआ कि हुज़ूर सारे नबियों में सबसे अफ़ज़ल हैं.

(2) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(3) इस तरह कि उनकी विशेषताएं और हाल इसके अनुसार हों जो नबियों की किताबों मे बयान फ़रमाए गए हैं.

(4) एहद.

(5) और आने वाले नबी मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने से पीछे हटे.

(6) ईमान से बाहर.

(7) एहद लिये जाने के बाद और दलीलें साफ़ हो जाने के बावुजूद.

(8) फ़रिश्ते और इन्सान और जिन्न.

(9) दलीलों और प्रमाणों में नज़र करके और इन्साफ़ इख़्तियार करके. और ये फ़रमाँबरदारी उनको फ़ायदा देती और नफ़ा पहुंचाती है.

(10) किसी डर से या अज़ाब के देख लेने से, जैसा कि काफ़िर मौत के क़रीब मजबूर और मायूस होकर ईमान लाता है. यह ईमान उसको क़यामत में नफ़ा न देगा.

(11) जैसा कि यहूदियों और ईसाइयों ने किया कि कुछ पर ईमान लाए और कुछ का इनकार किया.

(12) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि यह आयत यहूदियों और ईसाइयों के बारे में उतरी कि यहूदी हुज़ूर के तशरीफ़ लाने से पहले आपके वसीले से दुआएं करते थे. आपकी नबुव्वत के इक़रारी थे और आपके तशरीफ़ लाने की प्रतीक्षा करते थे. जब हुज़ूर तशरीफ़ लाए तो हसद से आप का इन्कार करने लगे और काफ़िर हो गए. मानी यह है कि अल्लाह तआला ऐसी क़ौम को कैसे ईमान की तौफ़ीक़ दे जो जान पहचान कर और मान कर इन्कारी हो गई.

(13) यानी नबियों के सरदार मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(14) और वो रौशन चमत्कार देख चुके थे.

(15) और कुफ़्र से रूक गए. हारिस बिन सवीद अन्सारी को काफ़िरों के साथ जा मिलने के बाद शर्मिन्दगी हुई तो उन्हों ने अपनी क़ौम के पास संदेश भेजा कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पूछें कि क्या मेरी तौबह क़ुबूल हो सकती है ? उनके बारे में यह आयत उतरी. तब वह मदीनए मुनव्वरा में तौबह करके हाज़िर हुए और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनकी तौबह क़ुबूल फ़रमाई.

(16) यह आयत यहूदियों के बारे में उतरी, जिन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाने के बाद हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और इंजील के साथ कुफ़्र किया. फिर कुफ़्र में और बढ़े. सैयदे अंबिया मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और क़ुरआन के साथ कुफ़्र किया और एक क़ौल यह है कि यह आयत यहूदियों और ईसाइयो के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तशरीफ़ लाने से पहले तो अपनी किताबों में आपकी नात और विशेषताएं देखकर आप पर ईमान रखते थे और आपके तशरीफ़ लाने के बाद काफ़िर हो गए और फिर कुफ़्र में और सख़्त हो गए.

(17) इस हाल में यह मरते वक़्त या अगर वह कुफ़्र पर मरे.

सूरए आले इमरान – दसवाँ रूकू

सूरए आले इमरान –  दसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

तुम कभी भलाई को न पहुंचोगे जब तक खुदा की राह में अपनी प्यारी चीज़ ख़र्च न करो (1)
और तुम जो कुछ ख़र्च करो अल्लाह को मालूम है (92) सब खाने बनी इस्राईल को हलाल थे मगर वह जो यअक़ूब ने अपने ऊपर हराम कर लिया था तौरात उतरने से पहले तुम फ़रमाओ तौरात लाकर पढ़ो अगर सच्चे हो (2) (93)
तो उसके बाद जो अल्लाह पर झूठ बांधे  (3)
तो वह ज़ालिम हैं (94) तुम फ़रमाओ अल्लाह सच्चा है तो इब्राहीम के दीन पर चलो (4)
जो हर बातिल (असत्य) से अलग थे और शिर्क वालों में न थे(95) बेशक सबमें पहला घर जो लोगों की इबादत को मुक़र्रर हुआ वह जो मक्का में है बरकत वाला और सारे संसार का राहनुमा  (5)  (96)
उसमें खुली हुई निशानियां हैं  (6)
इब्राहीम के खड़े होने की जगह (7)
और जो उसमें आए, अम्न में हो (8)
और अल्लाह के लिये लोगों पर उस घर का हज करना है जो उस तक चल सके(9)
और जो इन्कारी हो तो अल्लाह सारे संसार से बे परवाह है  (10)(97)
तुम फ़रमाओ ऐ किताबियों, अल्लाह की आयतें क्यों नहीं मानते (11)
और तुम्हारे काम अल्लाह के सामने हैं (98) तुम फ़रमाओ ऐ किताबियों क्यों अल्लाह की राह से रोकते हो (12)
उसे जो ईमान लाए उसे टेढ़ा किया चाहते हो और तुम ख़ुद उस पर गवाह हो (13)
और अल्लाह तुम्हारे कौतुकों से बेख़बर नहीं (99) ऐ  ईमान वालों अगर तुम कुछ किताबियों के कहे पर चले तो वो तुम्हारे ईमान के बाद तुम्हें काफ़िरों पर छोड़ेंगे (14) (100)
और तुम किस तरह कुफ़्र करोगे तुम पर अल्लाह की आयतें पढ़ी जाती हैं और तुम में उसका रसूल तशरीफ लाया और जिसने अल्लाह का सहारा लिया तो ज़रूर वह सीधी राह दिखाया गया (101)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान –    दसवाँ रूकू

(1) “बिर” भलाई से अल्लाह तआला का डर और फ़रमाँबरदारी मुराद है. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि यहाँ ख़र्च करना आम है सारे सदक़ों का, यानी वाजिब हों या नफ़्ल, सब इसमें दाख़िल हैं. हसन का क़ौल है कि जो माल मुसलमानों को मेहबूब हो उसे अल्लाह की रज़ा के लिये ख़र्च करे, वह इस आयत में दाख़िल है, चाहे एक खजूर ही हो. (ख़ाज़िन) उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ शकर की बोरियाँ ख़रीद कर सदक़ा करते थे, उनसे कहा गया इसकी क़ीमत ही क्यों नहीं देते. फ़रमाया, शकर मुझे पसन्द है. यह चाहता हूँ कि ख़ुदा की राह में प्यारी चीज़ ख़र्च करूं. (मदारिक). बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस है कि हज़रत अबू तलहा अन्सारी मदीने में बड़े मालदार थे. उन्हें अपनी जायदाद में बैरहा नाम का बाग़ बहुत प्यारा था. जब यह आयत उतरी तो उन्होंने रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में खड़े होकर अर्ज़ किया कि मुझे अपने माल में यह बाग़ सबसे प्यारा है. मैं इसको ख़ुदा की राह में सदक़ा करता हूँ हुज़ूर ने इस पर ख़ुशी ज़ाहिर की, और हज़रत अबू तलहा ने हुज़ूर की इजाज़त से अपने रिश्तेदारों में उसको तक़सीम कर दिया. हज़रत उमर फ़ारूक रदियल्लाहो अन्हो ने अबू मूसा अशअरी को लिखा कि मेरे लिये एक दासी ख़रीद कर भेजो. जब वह आई तो आपको बहुत पसन्द आई, आपने यह आयत पढ़कर अल्लाह के लिये उसे आज़ाद कर दिया.

(2) यहूदियों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा कि हुज़ूर अपने आपको हज़रत इब्राहीम की मिल्लत पर ख़याल करते हैं, इसके बावुजूद कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ऊंट का दूध और गोश्त नहीं खाते हैं, तो आप हज़रत इब्राहीम की मिल्लत पर कैसे हुए ? हुज़ूर ने फ़रमाया कि ये चीज़े हज़रत इब्राहीम पर हलाल थीं. यहूदी कहने लगे कि ये हज़रत नूह पर भी हराम थीं. और हम तक हराम ही चली आई. इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और बताया गया कि यहूदियों का यह दावा ग़लत है, बल्कि ये चीज़ें हज़रत इब्राहीम व इस्माईल व इस्हाक़, वह याक़ूब पर हलाल थीं. हज़रत याक़ूब ने किसी वजह से इनको अपने ऊपर हराम फ़रमाया और यह पाबन्दी उनकी औलाद में बाक़ी रही. यहूदियों ने इसका इन्कार किया तो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि तौरात इस मज़ूमून पर गवाह है, अगर तुम्हें इन्कार है तो तौरात लाओ. इस पर यहूदियों को अपनी बेइज़्ज़ती और रूस्वाई का डर हुआ और वो तौरात न ला सके. उनका झूट ज़ाहिर हो गया और उन्हें शर्मिन्दगी उठानी पड़ी इससे साबित हुआ कि पिछली शरीअतों में अहकाम स्थगित होते थे. इसमें यहूदियों का रद है जो स्थगन के क़ायल न थे. हुज़ूर सैयदे आलम उम्मी थे, यानी ज़ाहिर में पढ़े लिखे न थे. इसके बावुजूद यहूदियों को तौरात से इल्ज़ाम देना और तौरात में लिखी बातों के आधार पर अपनी बात प्रमाणित करना आपका चमत्कार और आपकी नबी होने की दलील है. और इससे आपके ख़ुदादाद ग़ैबी इल्म का पता चलता है.

(3) और कहे कि इब्राहीम की मिल्लत में ऊंट के गोश्त और दूध को अल्लाह तआला ने हराम किया था.

(4) कि वह इस्लाम और दीने मुहम्मदी है.

(5) यहूदियों ने मुसलमानों से कहा था कि बैतुल मक़दिस हमारा क़िबला है, काबे से अफ़ज़ल और इससे पहला है, नबियों की हिजरत की जगह और इबादत का क़िबला है. मुसलमानों ने कहा कि काबा अफ़ज़ल है. इस पर यह आयत उतरी और इसमें बताया गया कि सबसे पहला मकान जिसको अल्लाह तआला ने ताअत और इबादत के लिये मुक़र्रर किया, नमाज़ का क़िबला और हज और तवाफ़ का केन्द्र बनाया, जिसमें नेकियों के सवाब ज़्यादा होते हैं, वह काबए मुअज़्ज़मा है, जो मक्का शहर में स्थित है. हदीस शरीफ़ में है कि काबए मुअज़्ज़मा बैतुल मक़दिस से चालीस साल पहले बनाया गया.

(6) जो इसकी पाकी और फ़ज़ीलत के प्रमाण हैं. इन निशानियों में से कुछ ये हैं कि चिड़ियाँ काबा शरीफ़ के ऊपर नहीं बैठतीं और इसके ऊपर से होकर नहीं उड़ती बल्कि उड़ती हुई आती हैं तो इधर उधर हट जाती हैं, और जो चिड़ियाँ बीमार हो जाती हैं वो अपना इलाज यही करती हैं कि काबे की हवा में होकर गुज़र जाएं, इसी से उनको अच्छाई हो जाती है. और वहशी जानवर एक दूसरे को हरम में तकलीफ़ नहीं पहुँचाते, यहाँ तक कि कुत्ते इस ज़मीन में हिरन पर नहीं दौड़ते और वहाँ शिकार नहीं करते. और लोगों के दिल काबे की तरफ़ खिंचते हैं और उसकी तरफ़ नजर करने से आँसू जारी होते है और हर जुमे की रात वलियों की रूहें इसके चारों तरफ़ हाज़िर होती है और जो कोई इसके निरादर और अपमान का इरादा करता है, बर्बाद हो जाता है. इन्हीं आयतों में से मक़ामे इब्राहीम वग़ैरह वो चीज़ें हैं जिनका आयत में बयान किया गया है. (मदारिक, ख़ाज़िन व तफ़सीरे अहमदी)

(7) मक़ामे इब्राहीम वह पत्थर है जिस पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम काबा शरीफ़ के निर्माण के वक़्त खड़े होते थे और इसमें आपके क़दमों के निशान थे जो इतनी सदियाँ गुज़र जाने के बाद आज भी बाक़ी हैं.

(8) यहाँ तक कि अगर कोई व्यक्ति क़त्ल करके हरम में दाख़िल हो तो वहाँ न उसको क़त्ल किया जाए, न उस पर हद क़ायम की जाए. हज़रत उमर फ़ारूक़ रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि अगर मैं अपने वालिद ख़त्ताब के क़ातिल को भी हरम शरीफ़ में पाऊं तो उसको हाथ न लगाऊं यहाँ तक कि वह वहां से बाहर आए.

(9) इस आयत में हज फ़र्ज़ होने का बयान है और इसका कि हज करने की क्षमता या ताक़त शर्त है. हदीस शरीफ़ में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने इसकी तफ़सीर ज़ाद और राहिला से फ़रमाई. ज़ाद यानी तोशा, खाने पीने का इन्तिज़ाम इस क़द्र होना चाहिये कि जाकर वापिस आने तक के लिये काफ़ी हो और यह वापसी के वक़्त तक बाल बच्चों के नफ़्क़े यानी आजीविका के अलावा हाना चाहिये. रास्ते का सुरक्षित होना भी ज़रूरी है क्योंकि उसके बग़ैर क्षमता साबित नहीं होती.

(10) इससे अल्लाह तआला का क्रोध ज़ाहिर होता है और यह मसअला भी साबित होता है कि फ़र्जे़ क़तई का इन्कार करने वाला काफ़िर है.

(11) जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सच्चे नबी होने को प्रमाणित करती है.

(12) नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटला कर और आपकी तारीफ़ और विशेषताएं छुपाकर, जो तौरात में बयान की गई हैं.

(13) कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ तौरात में लिखी हुई है और अल्लाह को जो दीन प्रिय है वह इस्लाम ही है.

(14) औस और ख़ज़रज के क़बीलो में पहले बड़ी दुश्मनी थी और मुद्दतों उनमें जंग जारी रही. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सदक़े में इन क़बीलों के लोग इस्लाम लाकर आपस में दोस्त बने. एक दिन वो एक बैठक में प्यार महब्बत की बातें कर रहे थे. शास बिन क़ैस यहूदी जो इस्लाम का बड़ा दुश्मन थाख् उस तरफ़ से गुज़रा और उनके आपसी मेल मिलाप को देखकर जल गया, और कहने लगा कि जब ये लोग आपस में मिल गए तो हमारा क्या ठिकाना है. एक जवान को मुक़र्रर किया कि उनकी बैठक में बैठकर उनकी पिछली लड़ाइयों का ज़िक्र छेड़े और उस ज़माने में हर एक क़बीला जो अपनी तारीफ़ और दूसरों की आलोचना में शेर लिखता था, पढ़े. चुनांचे उस यहूदी ने ऐसा ही किया और उसकी शरारत और भड़काने से दोनो क़बीलों के लोग ग़ुस्से में आ गए और हथियार उठा लिये. क़रीब था कि क़त्ल खून शुरू हो जाए, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे यह ख़बर पाकर मुहाजिरीन के साथ तशरीफ़ लाए और फ़रमाया कि ऐ इस्लामी जमाअत, यह क्या जिहालत की हरकते हैं. मैं तुम्हारे बीच हूँ अल्लाह ने तुम को इस्लाम की इज़्ज़त दी, जिहालत की बला से निजात दी, तुम्हारे बीच उल्फ़त और महब्बत डाली, तुम फिर कुफ़्र के ज़माने की तरफ़ लौटते हो. हुज़ूर के इरशाद ने उनके दिलों पर असर किया और उन्होंने समझा कि यह शैतान का धोखा और दुश्मन का कपट था. उन्होंने हाथों से हथियार फ़ैंक दिये और रोते हुए एक दूसरे से लिपट गए और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ फ़रमाँबरदारी के साथ चले आए, उनके बारे में यह आयत उतरी.

सूरए आले इमरान- ग्यारहवाँ रूकू

सूरए आले इमरान-  ग्यारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

ऐ ईमान वालो, अल्लाह से डरो जैसा उससे डरने का हक़ है और कभी न मरना मगर मुसलमान  (102) और अल्लाह की रस्सी मज़बूत थाम लो(1)
सब मिलकर और आपस में फट न जाना (2)
और अल्लाह का एहसान अपने ऊपर याद करो जब तुम में बैर था उसने तुम्हारे दिलों में मिलाप कर दिया तो उसके फ़ज़्ल से तुम आपस में भाई हो गए  (3)
और  तुम एक दोज़ख़ के ग़ार के किनारे पर थे(4)
तो उसने तुम्हें उससे बचा दिया (5)
अल्लाह तुमसे यूं ही अपनी आयतें बयान फ़रमाता है कि कहीं तुम हिदायत पाओ (103) और तुम में एक दल ऐसा होना चाहिये कि भलाई की तरफ़ बुलाएं और अच्छी बात का हुक्म दें और बुराई से मना करें (6)
और यही मुराद को पहुंचे (7) (104)
और उन जैसे न होना जो आपस में फट गए और उनमें फुट पड़ गई (8)
बाद इसके कि रौशन निशानियां उन्हें आचुकी थीं (9)
और उनके लिये बड़ा अज़ाब है (105) जिस दिन कुछ मुंह उजाले होंगे और कुछ मुंह काले तो वो जिनके मुंह काले हुए (10)
क्या तुम ईमान लाकर काफ़िर हुए (11)
तो अब अज़ाब चखो अपने कुफ़्र का बदला  (106)  और वो जिनके मुंह उजाले हुए  (12)
वो अल्लाह की रहमत में हैं वो हमेशा उसमें रहेंगे (107) ये अल्लाह की आयतें हैं कि हम ठीक ठीक तुम पर पढ़ते हैं और  अल्लाह संसार वालों पर ज़ुल्म नहीं चाहता (13)(108)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान-  ग्यारहवाँ रूकू

(1) “हब्लिल्लाह” यानी अल्लाह की रस्सी की व्याख्या में मुफ़स्सिरों के कुछ क़ौल हैं. कुछ कहते हैं इससे क़ुरआन मुराद है. मुस्लिम की हदीस शरीफ़ में आया कि क़ुरआन पाक अल्लाह की रस्सी है, जिसने इसका अनुकरण किया वह हिदायत पर है, जिसने इसे छोड़ा वह गुमराही पर है. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि “हब्लिल्लाह” से जमाअत मुराद है और फ़रमाया कि तुम जमाअत को लाज़िम करो कि वह हब्लिल्लाह है, जिसको मज़बूती से थामने का हुक्म दिया गया है.

(2) जैसे कि यहूदी और ईसाई अलग अलग हो गए. इस आयत में उन कामों और हरकतों को मना किया गया है जो मुसलमानों के बीच फूट का कारण बनें. मुसलमानों का तरीक़ा अहले सुन्नत का मज़हब है, इसके सिवा कोई राह इख़्तियार करना दीन में फूट डालना है जिससे मना किया गया है.

(3) और इस्लाम की बदौलत दुश्मनी से दूर होकर आपस में दीनी महब्बत पैदा हुई यहाँ तक कि औस और ख़ज़रज की वह मशहूर लड़ाई जो एकसौ बीस साल से जारी थी और उसके कारण रात दिन क़त्ल का बाज़ार गर्म रहता था, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़रिये अल्लाह तआला ने मिटा दी और जंग की आग ठंडी कर दी गई और युद्ध-ग्रस्त क़बीलो के बीच प्यार, दोस्ती और महब्बत की भावना पैदा कर दी.

(4) यानी कुफ़्र की हालत में, कि अगर उसी हाल में मर जाते तो दोज़ख़ में पहुंचते.

(5) ईमान की दौलत अता करके.

(6) इस आयत से जायज़ काम किये जाने और नाजायज़ कामों से अलग रहने की अनिवार्यता और बहुमत तथा सहमति को मानने की दलील दी गई.

(7) हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि नेकियों का हुक्म देना और बुराइयों से रोकना बेहतरीन जिहाद है.

(8) जैसा कि यहूदी और ईसाई आपस में विरोधी हुए और उनमें एक दूसरे के साथ दुश्मनी पक्की हो गई या जैसा कि ख़ुद तुम इस्लाम से पहले जिहालत के दौर से अलग अलग थे. तुम्हारे बीच शत्रुता थी. इस आयत में मुसलमानों को आपस में एक रहने का हुक्म दिया गया और मतभेद और उसके कारण पैदा करने से मना किया गया. हदीसों में भी इसकी बहुत ताकीदें आई हैं. और मुसलमानों की जमाअत से अलग होने की सख़्ती से मनाही फ़रमाई गई है. जो फ़िर्क़ा पैदा होता है, इस हुक्म का विरोध करके ही पैदा होता है और मुसलमानों की जमाअत में फूट डालने का जुर्म करता है और हदीस के इरशाद के अनुसार वह शैतान का शिकार है. अल्लाह तआला हमें इससे मेहफ़ूज रखे.

(9) और सच्चाई सामने आ चुकी.

(10) यानी काफ़िर, तो उनसे ज़रूर कहा जाएगा.

(11) इसके मुख़ातब या तो तमाम काफ़िर हैं, उस सूरत में ईमान से मीसाक़ के दिन का ईमान मुराद है. जब अल्लाह तआला ने उनसे फ़रमाया था कि क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ. सबने “बला” यानी “बेशक” कहा था और ईमान लाए थे. अब जो दुनिया में काफ़िर हुए तो उनसे फ़रमाया जाता है कि मीसाक़ के दिन ईमान लाने के बाद तुम काफ़िर हो गए. हसन का क़ौल है कि इससे मुनाफ़िक़ लोग मुराद हैं जिन्हों ने ज़बान से ईमान ज़ाहिर किया था और उनके दिल इन्कारी थे. इकरमा ने कहा कि वो किताब वाले हैं जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तशरीफ़ लाने से पहले तो हुज़ूर पर ईमान लाए और हुज़ूर के तशरीफ़ लाने के बाद आपका इनकार करके काफ़िर हो गए. एक क़ौल यह है कि इसके मुख़ातब मुर्तद लोग हैं जो इस्लाम लाकर फिर गए और काफ़िर हो गए.

(12) यानी ईमान वाले कि उस रोज़ अल्लाह के करम से वो खुश होंगे, उनके चेहरे चमकते दमकते होंगे, दाएं बाएं और सामने नूर होगा.

(13) और किसी को बेजुर्म अज़ाब नहीं देता और किसी नेकी का सवाब कम नहीं करता.

सूरए आले इमरान -बारहवाँ रूकू

सूरए आले इमरान -बारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

तुम बेहतर हो (1)
उन सब उम्मतों में जो लोगों में ज़ाहिर हुई भलाई का हुक्म देते हो और बुराई से मना करते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो और अगर किताबी ईमान लाते (2)
तो उनका भला था उनमें कुछ मुसलमान हैं  (3)
और ज़्यादा काफ़िर (110) वो तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेंगे मगर यही सताना (4)
और अगर तुमसे लड़ें तो तुम्हारे सामने से पीठ फेर जाएंगे (5)
फिर उनकी मदद न होगी(111) उनपर जमा दी गई ख़्वारी (ज़िल्लत) जहां हो अमान न पाएं (6)
मगर अल्लाह की डोर(7)
और आदमियों की डोर से (8)
और अल्लाह के ग़ज़ब (प्रकोप) के सज़ावार (हक़दार) हुए और उनपर जमा दी गई मोहताजी (9)
यह इसलिये कि वो अल्लाह की आयतों से कुफ्र करते और पैग़म्बरों को नाहक़ शहीद करते यह इसलिये कि नाफ़रमाबरदार और सरकश (बाग़ी) थे (112)
एक से नहीं, किताबियों में कुछ वो हैं कि हक़ पर क़ायम हैं (10)
अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं रात की घड़ियों में और सज़्दा करते हैं(11) (113)
अल्लाह और पिछले दिन पर ईमान लाते हैं और भलाई का हुक्म देते और बुराई से मना करते हैं (12)
और नेक कामों पर दौड़ते है और ये लोग लायक़ है (114) और वो जो भलाई करें उनका हक़ न मारा जाएगा और अल्लाह को मालूम हैं डर वाले (13)(115)
वो जो काफ़िर हुए उनके माल और औलाद (14)
उनको अल्लाह से कुछ न बचा लेंगे और वह जहन्नमी हैं उनको हमेशा उसी में रहना (15) (116)
कहावत उसकी जो इस दुनिया की ज़िन्दगी में (16)
ख़र्च करते हैं उस हवा की सी है जिसमें पाला हो वह एक ऐसी क़ौम की खेती पर पड़ी जो अपना ही बुरा करते थे तो उसे बिल्कुल मार गई (17)
और अल्लाह ने उनपर ज़ुल्म न किया हाँ वो ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं (117) ऐ ईमान वालों, गै़रों को अपना राज़दार न बनाओ (18)
वो तुम्हारी बुराई में कमी नहीं करते उनकी आरज़ू है जितनी ईज़ा (कष्ट) तुम्हें पहुंचे बैर उनकी बातों से झलक उठा और वो (19)
जो सीने में छुपाए है और बड़ा है हमने निशानियां तुम्हें खोल कर सुना दी अगर तुम्हें अक़्ल हो (20) (118)
सुनते हो यह जो तुम हो तुम तो उन्हें चाहते हो (21)
और वो तुम्हें नहीं चाहते(22)
और हाल यह कि तुम सब किताबों पर ईमान लाते हो (23)
और वो जब तुमसे मिलते हें कहते हैं ईमान लाए (24)
और अकेले हों तो तुमपर उंगलियां चबाएं गुस्से से तुम फ़रमादो कि मर जाओ अपनी घुटन में(25)
अल्लाह ख़ूब जानता है दिलों की बात (119) तुम्हे कोई भलाई पहुंचे तो उन्हें बुरा लगे (26)
और तुम को बुराई पहुंचे तो उसपर ख़ुश हों और अगर तुम सब्र और परहेज़गारी किये रहो (27)
तो उनका दाँव तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेगा बेशक उनके सब काम ख़ुदा के घेरे में हैं (120)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – बारहवाँ रूकू

(1) ऐ मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत ! यहूदियों में से मालिक बिन सैफ़ और वहब बिन यहूदा ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद वग़ैरह असहाबे रसूल से कहा, हम तुमसे बढ़कर हैं और हमारा दीन तुम्हारे दीन से बेहतर है, जिसकी तुम हमें दावत देते हो. इस पर यह आयत उतरी. तिरमिज़ी की हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, अल्लाह तआला मेरी उम्मत को गुमराही पर जमा नहीं करेगा और अल्लाह तआला का दस्ते रहमत जमाअत पर है, जो जमाअत से अलग हुआ वह दोज़ख़ में गया.

(2) नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर.

(3) जैसे कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और यहूदियों में से उनके साथी और नजाशी और ईसाइयों में से उनके साथी.

(4) ज़बानी बुरा भला कहने और धमकी वग़ैरह से. यहूदियों में से जो लोग इस्लाम लाए थे जैसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथी, यहूदियों के सरदार उनके दुश्मन हो गए और उन्हें यातनाएं देने की फ़िक़्र में रहने लगे. इस पर यह आयत उतरी और अल्लाह तआला ने ईमान लाने वालों को संतुष्ट कर दिया कि ज़बानी बुरा भला कहने के अलावा वो मुसलमानों को कोई कष्ट न पहुंचा सकेंगे. ग़लबा मुसलमानों को ही रहेगा और यहूदियों का अन्त ज़िल्लत और रूस्वाई है.

(5) और तुम्हारे मुक़ाबले की हिम्मत न कर सकेंगे. ये ग़ैबी ख़बरें ऐसी ही सच साबित हुई.

(6) हमेशा ज़लील ही रहेंगे, इज़्ज़त कभी न पाएंगे. उसका असर है कि आजतक यहूदियों को कहीं की सल्तनत मयस्सर न आई. जहाँ रहे, रिआया और ग़ुलाम ही बन कर रहे.

(7) थाम कर यानी ईमान लाकर.

(8) यानी मुसलमानों की पनाह लेकर और उन्हें जिज़िया देकर.

(9) चुनांचे यहूदी को मालदार होकर भी दिल की दौलत नसीब नहीं होती.

(10) जब हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथी ईमान लाए तो यहूदी पादरियों ने जलकर कहा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) पर हममें से जो ईमान लाए हैं वो बुरे लोग हैं. अगर बुरे न होते तो अपने बाप दादा का दीन न छोड़ते. इस पर यह आयत उतरी. अता का क़ौल है कि “मिन अहलिल किताबे उम्मतुम क़ाइमतुन” (यानी किताब वालों में कुछ वो है कि सत्य पर क़ायम हैं) से चालीस मर्द नजरान वालों के, बत्तीश हबशा के, आठ रोम के मुराद हैं. जो हज़रत ईसा के दिन पर थे. फिर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाए.

(11) यानी नमाज़ पढ़ते हैं, इससे या तो इशा की नमाज़ मुराद है जो किताब वाले नहीं पढ़ते या तहज्जुद की नमाज़.

(12) और दीन में ख़राबी नही लाते.

(13) यहूदियों ने अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथियों से कहा था कि तुम इस्लाम क़ुबूल कर के टोटे में पड़े तो अल्लाह तआला ने उन्हें ख़बर दी कि वो ऊंचे दर्जों के हक़दार हुए और अपनी नेकियों का इनाम पाएंगे. यहूदियों की बकवास बेहूदा है.

(14) जिनपर उन्हें बहुत नाज़ और गर्व है.

(15) यह आयत बनी क़ुरैज़ा और नुज़ैर के बारे में उतरी. यहूदियों के सरदारों ने रियासत और माल हासिल करने की ग़रज़ से रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ दुश्मनी की थी. अल्लाह तआला ने इस आयत में इरशाद फ़रमाया कि उनके माल और औलाद कुछ काम न आएंगे. वो रसूल की दुश्मनी में नाहक़ अपनी आक़िबत ख़राब कर रहे हैं. एक क़ौल यह भी है कि यह आयत क़ुरैश के मुश्रिकों के बारे में उतरी क्योंकि अबू जहल को अपनी दौलत और माल पर बड़ा घमण्ड था, और अबू सूफ़ियान ने बद्र और उहद में मुश्रिकों पर बहुत माल ख़र्च किया था. एक क़ौल यह है कि यह आयत सारे काफ़िरों के बारें में आई हैं, उन सब को बताया गया कि माल और औलाद में से कोई भी काम आने वाला और अल्लाह के अज़ाब से बचने वाला नहीं.

(16) मुफ़स्सिरों का कहना है कि इससे यहूदियों का वह ख़र्च मुराद है जो अपने आलिमों और सरदारों पर करते थे. एक क़ौल यह है कि काफ़िरों के सारे नफ़क़ात और सदक़ात मुराद हैं. एक क़ौल यह है कि रियाकार का ख़र्च करना मुराद है. क्योंकि इन सब लोगों का ख़र्च करना या दुनियावी नफ़े के लिये होगा या आख़िरत के फ़ायदे के लिये. अगर केवल दुनियावी नफ़े के लिये हो, तो आख़िरत और अल्लाह की ख़ुशी मक़सूद ही नहीं होती, उसका अमल दिखावे और ज़ाहिर के लिये होता है. ऐसे अमल का आख़िरत में क्या नफ़ा. और क़ाफ़िर के सारे कर्म अकारत हैं. वह अगर आख़िरत की नियत से भी ख़र्च करे तो नफ़ा नही पा सकता. उन लोगो के लिये वह मिसाल बिल्कुल पूरी उतरती है जो आयत में बयान की जाती है.

(17) यानी जिस तरह कि बरफ़ानी हवा खेती को बर्बाद कर देती है उसी तरह कुफ़्र इन्फ़ाक़ यानी दीन को बातिल कर देता है.

(18) उनसे दोस्ती न करो. महब्बत के तअल्लुक़ात न रखो, वो भरोसे के क़ाबिल नहीं हैं. कुछ मुसलमान यहूदियों से रिश्तेदारी और दोस्ती और पड़ोस वग़ैरह के सम्बन्धों की बुनियाद पर मेल जोल रखते थे, उनके हक़ में यह आयत उतरी. काफ़िरों से दोस्ती और महब्बत करना और उन्हें अपना बनाना नाजायज़ और मना है.

(19) ग़ुस्सा और दुश्मनी.

(20) तो उनसे दोस्ती न करो.

(21) रिश्तेदारी और दोस्ती वग़ैरह सम्बन्धों के आधार पर.

(22) और दीनी मतभेद की बुनियाद पर तुम से दुश्मनी रखते हैं.

(23) और वो तुम्हारी किताब पर ईमान नहीं रखते.

(24) यह मुनाफ़िक़ो यानी दोग़ली प्रवृत्ति वालों का हाल है.

(25) ऐ हसद करने वाले, मर जा ताकि तेरा रंज दूर हो सके, क्योंकि हसद की तकलीफ़ सिवाय मौत के और कोई दूर नहीं कर सकता.

(26) और इस पर वो दुखी हों.

(27) और उनसे दोस्ती और महब्बत न करो. इस आयत से मालूम हुआ कि दुश्मन के मुक़ाबले में सब्र और तक़वा काम आता हैं.

सूरए आले इमरान -तैरहवाँ रूकू

सूरए आले इमरान -तैरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

और याद करो ऐ मेहबूब, जब तुम सुबह  (1)
अपने दौलतख़ाने (मकान) से बाहर आए, मुसलमानों को लड़ाई के मोर्चें पर क़ायम करते (2)
और अल्लाह सुनता जानता है (121) जब तुममें के दो दलों का इरादा हुआ कि नामर्दी कर जाएं (3)
और अल्लाह उनका संभालने वाला है और मुसलमानों का अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये(122) और बेशक अल्लाह ने बद्र में तुम्हारी मदद की जब तुम बिल्कुल बेसरोसामान थे (4)
तो अल्लाह से डरो कहीं तुम शुक्रगुज़ार हो   (123) जब ऐ मेहबूब, तुम मुसलमानों से फ़रमाते थे क्या तुम्हें यह क़ाफ़ी नहीं कि तुम्हारा रब तुम्हारी मदद करे तीन हज़ार फ़रिश्तें उतार कर (124) हाँ क्यों नहीं अगर तुम सब्र और तक़वा करो और उसी दम तुम पर आ पड़ें तो तुम्हारी मदद को पांच हज़ार फ़रिश्तें निशान वाले भेजेगा (5)(125)
और यह फ़त्ह अल्लाह ने न की मगर तुम्हारी ख़ुशी के लिये और इसीलिये कि इससे तुम्हारे दिलों को चैन मिले (6)
और मदद नहीं मगर अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाले के पास से  (7) (126)
इसलिये कि काफ़िरों का एक हिस्सा काट दे (8)
या उन्हें ज़लील करे कि नामुराद फिर जाएं  (127) यह बात तुम्हारे हाथ नहीं या उन्हें तौबा की तौफ़ीक़  (शक्ति) दे या उन पर अज़ाब करे कि वो ज़ालिम हैं (128) और अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है जिसे चाहे बख़्श दे और जिसे चाहे अज़ाब करे और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान (129)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – तैरहवाँ रूकू

(1) मदीनए तैय्यिबह में उहद के इरादे से.

(2) सभी मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि बद्र की जंग में हारने के बाद काफ़िरों को बड़ा दुख था इसलिये उन्होंने बदला लेने के लिये एक बड़ा लश्कर इकठ्ठा करके चढ़ाई की. जब रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ख़बर मिली कि काफ़िरों की फ़ौज उहद में उतरी है तो आपने सहाबा से सलाह की. इस बैठक में अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल को भी बुलाया गया जो इससे पहले कभी किसी सलाह के लिये बुलाया न गया था. अक्सर अन्सार की और इस अब्दुल्लाह की यह राय हुई कि हुज़ूर मदीनए तैय्यिबह में ही क़ायम रहें और जब काफ़िर यहाँ आएं तब उनसे मुक़ाबला किया जाए. यही सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मर्ज़ी थी, लेकिन कुछ सहाबा की राय यह हुई कि मदीनए तैय्यिबह से बाहर निकल कर लड़ना चाहिये और इसी पर उन्होंने ज़ोर दिया. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपने मकान में तशरीफ़ ले गये और हथियार लगाकर बाहर तशरीफ़ लाए. अब हुज़ूर को देखकर सहाबा को शर्मिन्दगी हुई और उन्होंने अर्ज़ किया कि हुज़ूर को राय देना और उसपर ज़ोर देना हमारी ग़लती थी, इसे माफ़ फ़रमाया जाए और जो सरकार की मर्ज़ी हो वही किया जाए. हुज़ूर ने फ़रमाया कि नबी के लिये अच्छा नहीं कि हथियार पहन कर जंग से पहले उतार दे. मुश्रिक फ़ौज उहद में बुध/जुमेरात को पहुंची थी और रसूले करीम सल्लल्लाहा अलैहे वसल्लम जुमे के दिन नमाज़े जुमा के बाद एक अन्सारी के जनाज़े की नमाज़ पढ़कर रवाना हुए और पन्द्रह शव्वाल सन तीन हिजरी इतवार के दिन उहद में पहुंचे. यहाँ आप और आपके साथी उतरे और पहाड़ का एक दर्रा जो इस्लामी लश्कर के पीछे था, उस तरफ़ से डर था कि किसी वक़्त दुश्मन पीछे से आकर हमला करे, इसलिये हुज़ूर ने अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर को पचास तीर अन्दाज़ों के साथ वहाँ लगाया और फ़रमाया कि अगर दुश्मन इस तरफ़ से हमला करे तो तीरों की बारिश करके उसको भगा दिया जाए और हुक्म दिया कि कुछ भी हो जाए, यहाँ से न हटना और इस जगह को न छोड़ना, चाहे जीत हो या हार. अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल मुनाफ़िक़, जिसने मदीनए तैय्यिबह में रहकर जंग करने की राय दी थी, अपनी राय के ख़िलाफ़ किये जाने की वजह से कु़द्ध हुआ और कहने लगा कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने नई उम्र के लड़को का कहना माना और मेरी बात की परवाह नहीं की. इस अब्दुल्लाह बिन उबई के साथ तीन सौ मुनाफ़िक़ थे उनसे उसने कहा, जब दुश्मन इस्लामी लश्कर के सामने आ जाए उस वक़्त भाग पड़ना ताकि इस्लामी लश्कर तितर बितर हो जाए और तुम्हें देखकर और लोग भी भाग निकलें. मुसलमानों के लश्कर की कुल संख्या इन मुनाफ़िक़ो समेत एक हज़ार थी और मुश्रिकों की तादाद तीन हज़ार. मुकाबला शुरू होते ही अब्दुल्लाह बिन उबई अपने तीन सौ मुनाफ़िक़ साथियों को लेकर भाग निकला और हुज़ूर के सात सौ सहाबा हुज़ूर के साथ रह गए. अल्लाह तआला ने उनको साबित क़दम रखा, यहाँ तक कि मुश्रिकों को पराजय हुई. अब सहाबा भागते हुए मुश्रिकों के पीछे पड़ गए और हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जहां कायम रहने के लिये फ़रमाया, वहाँ क़ायम न रहे तो अल्लाह तआला ने उन्हें यह दिखाया कि बद्र में अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी की बरकत से जीत हुई थी, यहाँ हुज़ूर के हुक्म का विरोध करने का नतीजा यह हुआ कि अल्लाह तआला ने मुश्रिकों के दिल से डर और दहशत दूर फ़रमादी और वो पलट पड़े और मुसलमानों को परास्त होना पड़ा. रसूले करीम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ एक जमाअत रही, जिसमें अबूबक्र व अली व अब्बास व तलहा व सअद थे. इसी जंग में हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुबारक दांत शहीद हुए और चेहरे पर ज़ख़म आया. इसी के सम्बन्ध में यह आयत उतरी.

(3) ये दोनो समुदाय अन्सार में से थे, एक बनी सलाम ख़ज़रज में से और एक बनी हारिस औस में से. ये दोनो लश्कर के बाज़ू थे, जब अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल मुनाफ़िक़ भागा तो इन्हों ने भी जाने का इरादा किया. अल्लाह तआला ने करम किया और इन्हें इससे मेहफ़ूज रखा और वो हुज़ूर के साथ डटे रहे यहाँ उस नेअमत और एहसान का ज़िक्र फ़रमाया है.

(4) तुम्हारी तादाद भी कम थी, तुम्हारे पास हथियारों और सवारों की भी कमी थी.

(5) चुनांचे ईमान वालों ने बद्र के दिन सब्र और तक़वा से काम लिया. अल्लाह तआला ने वादे के मुताबिक पांच हज़ार फ़रिश्तों की मदद भेजी और मुसलमानों की विजय और काफ़िरों की पराजय हुई.

(6) और दुश्मन की बहुतात और अपनी अल्पसंख्या से परेशानी और बेचैनी न हो.

(7) तो चाहिये की बन्दा उस ज़ात पर नज़र रखे जो हाजतमन्द को उसकी हाजत की पूर्ति के साधन उपलब्ध कराता है. यानी अल्लाह तआला और उसी पर भरोसा रखे.

(8) इस तरह कि उनके बड़े बड़े सरदार क़त्ल हों और गिरफ़तार किये जाएं जैसा कि बद्र में पेश आया.

सूरए आले इमरान – चौदहवाँ रूकू

सूरए आले इमरान – चौदहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

ऐ ईमान वालों, सूद दूना दून न खाओ(1)
और अल्लाह से डरो इस उम्मीद पर कि भलाई मिले (130) और उस आग से बचों जो काफ़िरों के लिये तैयार रखी है (2) (131)
और अल्लाह व रसूल के फ़रमाँबरदार रहो   (3)
इस उम्मीद पर कि तुम रहम किये जाओ  (132) और दौड़ो (4)
अपने रब की बख़्शिश और ऐसी जन्नत की तरफ़ जिसकी चौड़ान में सब आसमान व ज़मीन आ जाएं(5)
परहेज़गारों के लिये तैयार रखी है  (6) (133)
वो जो अल्लाह की राह में खर्च करते है ख़ुशी में और रंज में (7)
और गुस्सा पीने वाले और लोगों से दरगुज़र (क्षमा) करने वाले और नेक लोग अल्लाह के मेहबूब हैं (134) और वो कि जब कोई बेहयाई या अपनी जानों पर ज़ुल्म करे (8)
अल्लाह को याद करके अपने गुनाहों की माफ़ी चाहें(9)
और गुनाह कौन बख़्शे सिवा अल्लाह के और अपने किये पर जान बूझकर अड़ न जाएं  (135) ऐसों को बदला उनके रब की बख़्शिश और जन्नतें हैं (10)
जिनके नीचे नहरे जारी हमेशा उनमें रहें और अमल करने वालों का क्या अच्छा नेग है  (11)(136)
तुमसे पहले कुछ तरीक़े बर्ताव में आचुके हैं (12)
तो ज़मीन में चलकर देखों कैसा अन्जाम हुआ झुटलाने वालों का (13)(137)
यह लोगों को बताना और राह दिखाना और परहेज़गारों को नसीहत है (138) और न सुस्ती करो और न ग़म खाओ (14)
तुम्ही ग़ालिब आओगे अगर ईमान रखते हो  (139) अगर तुम्हें (15)
कोई तकलीफ़ पहुंची तो वो लोग भी वैसी ही तकलीफ़ पा चुके हैं (16)
और ये दिन है जिनमें हमने लोगों के लिये बारियां रखी हैं (17)
और इसलिये कि अल्लाह पहचान करादे ईमान वालों की (18)
और तुम में से कुछ लोगों को शहादत का मरतबा दे और अल्लाह दोस्त नहीं रखता ज़ालिमों को (140)  और इसलिये कि अल्लाह मुसलमानों का निखार करदे  (19)
और काफ़िरों को मिटा दे  (20)(141)
क्या इस गुमान में हो कि जन्नत में चले जाओगे और अभी अल्लाह ने तुम्हारे ग़ाज़ियों (धर्मयोद्धाओं) का इम्तिहान न लिया और न सब्र वालों की आज़माइश की (21)
(142) और तुम तो मौत की तमन्ना किया करते थे उसके मिलने से पहले (22)
तो अब वह तुम्हें नज़र आई आँखों के सामने (143)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – चौदहवाँ रूकू

(1) इस आयत मे सूद की मनाही फ़रमाई गई और उस ज़ियादती पर फटकारा गया जो उस ज़माने में प्रचलित थी कि जब मीआद आ जाती थी और क़र्ज़दार के पास अदा की कोई शक्ल न होती तो क़र्ज़ देने वाला माल ज़्यादा करके मुद्दत बढ़ा देता और ऐसा बार बार करते, जैसा कि इस मुल्क के सूद ख़ोर करते हैं और उसको सूद दर सूद कहते हैं. इससे साबित हुआ कि बड़े गुनाह से आदमी ईमान से बाहर नहीं हो जाता.

(2) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, इसमें ईमान वालों को हिदायत है कि सूद वग़ैरह जो चीज़ें अल्लाह तआला ने हराम फ़रमाई उनको हलाल न जाने क्योंकि स्पष्ट (क़तई) हराम को हलाल जानना कुफ़्र है.

(3) कि रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का अनुकरण अल्लाह की फ़रमाँबरदारी है और रसूल की नाफ़रमानी करने वाला अल्लाह का फ़रमाँबरदार नहीं हो सकता.

(4) तौबह और फ़र्ज़ो की अदायगी और फ़रमाँबरदारी और कर्म निष्ठा अपना कर.

(5) यह जन्नत के फैलाव का बयान है, इस तरह कि लोग समझ सकें क्योंकि उन्होंने सबसे वसीअ लम्बी चौड़ी जो चीज़ देखी है वह आसमान व ज़मीन ही है. इससे वो अन्दाज़ा कर सकते हैं कि अगर आसमान और ज़मीन के दर्जे दर्जे और परत परत बनाकर जोड़ दिये जाएं और सबका एक परत कर दिया जाए, इससे जन्नत के अरज़ का अन्दाज़ा होता है कि जन्नत कितनी विस्तृत है. हिरक़िल बादशाह ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में लिखा कि जब जन्नत की ये वुसअत अर्थात फैलाव है कि आसमान और ज़मीन उसमें आ जाएं तो फिर दोज़ख कहाँ है. हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जवाब में फ़रमाया, सुब्हानल्लाह, जब दिन आता है तो रात कहाँ होती है. इस बात का अर्थ अत्यन्त गहरा है. ज़ाहिरी पहलू यह है कि आसमान की चाल से एक दिशा में दिन हासिल होता है तो उसकी विपरीत दिशा में रात होती है. इसी तरह जन्नत ऊपर की दिशा में है और दोज़ख़ नीचे की तरफ़ है. यहूदियों ने यही सवाल हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से किया था, तो आपने भी यही जवाब दिया था. इस पर उन्होंने कहा कि तौरात में भी इसी तरह समझाया गया है. मानी ये हैं कि अल्लाह की क़ुदरत और इख़्तियार से कुछ दूर नहीं, जिस चीज़ को जहाँ चाहे रखे. यह इन्सान की तंगनज़री है कि किसी चीज़ का विस्तार और फैसला देखकर हैरान होता है और पूछने लगता है कि ऐसी बड़ी चीज़ कहाँ समाएगी. हज़रत अनस बिन मालिक रदियल्लाहो अन्हो से पूछा गया कि जन्नत आसमान में है या ज़मीन में. फ़रमाया, कौन सी ज़मीन और कौन सा आसमान है जिसमें जन्नत समा सके. अर्ज किया गया फिर कहां है, फ़रमाया आसमानों के ऊपर, अर्श के नीचे.

(6) इस आयत और इससे ऊपर की आयत “वत्तकुन्नारल्लती उईद्दत लिलकाफ़िरीन” से साबित हुआ कि जन्नत दोज़ख़ पैदा हो चुकीं, मौजूद हैं.

(7) यानी हर हाल में ख़र्च करते हैं. बुख़ारी और मुस्लिम में हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया ख़र्च करो, तुम पर ख़र्च किया जाएगा, यानी ख़ुदा की राह में दो, तुम्हें अल्लाह की रहमत से मिलेगा.

(8) यानी उनसे कोई बड़ा या छोटा गुनाह सरज़द हो.

(9) और तौबह करें और गुनाह से बाज़ आएं और आइन्दा के लिए इस से दूर रहने का पक्का निश्चय करें कि यह क़ुबूल की जाने वाली तौबह की शर्तों में से हैं.

(10) खजूर बेचने वाले तैहान के पास एक सुंदर औरत खजूर ख़रीदने आई. उसने कहा ये खजूरें तो अच्छी नहीं हैं, ऊमदा खूजूरें मकान के अन्दर हैं. इस बहाने से उसको मकान में ले गया और पकड़ कर लिपटा लिया और मुंह चूम लिया. औरत ने कहा ख़ुदा से डर. यह सुनते ही उसको छोड़ दिया और शर्मिन्दा हुआ. और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हो कर हाल अर्ज़ किया. इस पर यह आयत “वल्लज़ीना इज़ा फ़अलू” (और वो कि जब करें) उतरी. एक क़ौल यह है कि एक अन्सारी और एक सक़फ़ी दोनों में महब्बत थी और हर एक ने एक दूसरे को भाई बनाया था. सक़फ़ी जिहाद में गया और अपने मकान की देखरेख अपने भाई अन्सारी के सुपुर्द कर गया. एक रोज़ अन्सारी गोश्त लाया. जब सक़फ़ी की औरत ने गोश्त लेने के लिये हाथ बढ़ाया तो अन्सारी ने उसका हाथ चूम लिया और चूमते ही उसको सख़्त पछतावा और शर्मीन्दगी हुई और वह जंगल मे निकल गया, अपने सर पर ख़ाक डाली और मुंह पर तमांचे मारे. जब सक़फ़ी जिहाद से वापस आया तो उसने अपनी बीवी से अन्सारी का हाल पूछा. उसने कहा ख़ुदा ऐसे भाई न बढ़ाए और फिर सारी घटना बताई. अन्सारी पहाड़ो में रोता तौबह करता था. सक़फ़ी उसको तलाश करके सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में लाया, उसके बारे में यह आयत उतरी.

(11) यानी फ़रमाँबरदारों के लिये बेहतर बदला है.

(12) पिछली उम्मतों के साथ जिन्होंने दुनिया के लालच और इसकी लज़्ज़तों की तलब में नबियों रसूलों का विरोध किया. अल्लाह तआला ने उन्हें मोहलतें दीं, फिर भी वो सीधी राह पर न आए, तो उन्हें हलाक व बर्बाद कर दिया.

(13) ताकि तुम सबक़ हासिल करो.

(14) उसका जो उहद की जंग में पेश आया.

(15) उहद की जंग में.

(16) बद्र की लड़ाई में, इसके बावुजूद उन्होंने दुस्साहस या कम-हिम्मती नहीं की और उनसे मुक़ाबला करने में सुस्ती से काम न लिया तो तुम्हें भी सुस्ती और कम-हिम्मती न चाहिये.

(17) कभी किसी की बारी है, कभी किसी की.

(18) सब्र और महब्बत के साथ, कि उनको परिश्रम और नाकामी जगह से नहीं हटा सकती और उनके पाँव डगमगा नहीं सकते.

(19) और उन्हें गुनाहों से पाक कर दे.

(20) यानी काफ़िरों से जो मुसलमानों को तकलीफ़े पहुंचती हैं वो तो मुसलमानों के लिये शहादत और पाकीज़गी है, और मुसलमान जो काफ़िरों को क़त्ल करें तो यह काफ़िरों की बर्बादी और उनका उन्मूलन यानी जड़ से उखाड़ फैंकना है.

(21) कि अल्लाह की रज़ा के लिये कैसे ज़ख़्म खाते और तकलीफ़ उठाते हैं, इससे उनपर कोप है जो उहद के दिन काफ़िरों के मुक़ाबले से भागे.

(22) जब बद्र के शहीदों के दर्जे और मरतबे और उनपर अल्लाह तआला के इनाम और अहसान बयान फ़रमा दिये गए, तो जो मुसलमान वहाँ हाज़िर न थे उन्हें हसरत हुई और उन्हों ने आरज़ू की काश किसी जिहाद में उन्हें हाज़िरी नसीब हो जाए और शहादत के दर्जे मिलें. उन्हीं लोगो ने हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से उहद पर जाने के लिये आग्रह किया था. उनके बारे में यह आयत उतरी.