सूरए आले इमरान – सातवाँ रूकू

सूरए आले इमरान – सातवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,

तुम फ़रमाओ , ऐ किताबियों ऐसे कलिमे की तरफ़ आओ जो हम में तुम में यकसँ (समान) है(1)
यह कि इबादत न करें मगर ख़ुदा की और उसका शरीक किसी को न करें (2)
और हम में कोई एक दूसरे को रब न बना ले अल्लाह के सिवा (3)
फिर अगर वो न माने तो कह दो तुम गवाह रहो कि हम मुसलमान हैं (64) ऐ किताब वालो इब्राहीम के बारे में क्यों झगड़ते हो, तौरात और इंजील तो न उतरी मगर उनके बाद तो क्या तुम्हें अक़ल नहीं (4) (65)
सुनते हो यह जो तुम हो (5)
उसमें झगड़े जिसकी तुम्हें जानकारी थी (6)
तो उस में (7)
क्यों झगड़ते हो जिसकी तुम्हें जानकारी ही नहीं और अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते (8)
(66)
इब्राहीम यहूदी न थे और न ईसाई बल्कि हर बातिल (असत्य) से अलग मुसलमान थे और मुश्रिकों  से न थे (9) (67)
बेशक सब लोगों से इब्राहीम के ज़्यादा हक़दार वो थे जो उनके मानने वाले हुए (10)
और यह नबी (11)
और ईमान वाले (12)
और ईमान वालों का वाली (सरपरस्त) अल्लाह है (68)किताबियों का एक दल दिल से चाहता है कि किसी तरह तुम्हें गुमराह करदें और वो अपने आप को गुमराह करते हैं और उन्हें शऊर (आभास) नहीं (13)(69)
ऐ किताबियों अल्लाह की आयतों से क्यों कुफ्र करते हो हालांकि तुम ख़ुद गवाह हो(14) (70)
ऐ किताबियों हक़ में बातिल क्यों मिलाते हो (15) और हक़ क्यों छुपाते हो हालांकि तुम्हें ख़बर है (71)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – सातवाँ रूकू

(1) और क़ुरआन, तौरात और इन्जील इसमें मुख़्तलिफ़ नहीं हैं.

(2) न हज़रत ईसा को, न हज़रत उज़ैर को, न किसी और को.

(3) जैसा कि यहूदियों और ईसाइयों ने पादरियों और रब्बियों को बनाया कि उन्हें सज्दा करते और उनकी पूजा करते. (जुमल)

(4) नजरान के ईसाइयों और यहूदियों के विद्वानों में बहस हुई. यहूदियों का दावा था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम यहूदी थे और ईसाइयों का दावा था कि आप ईसाई थे. यह झगड़ा बहुत बढ़ा तो दोनों पक्षों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हकम यानी मध्यस्त बनाया और आप से फ़ैसला चाहा. इस पर यह आयत उतरी और तौरात के विद्वानों और इन्जील के जानकारों पर उनकी अज्ञानता ज़ाहिर कर दी गई कि उनमें से हर एक का दावा उनकी जिहालत की दलील है. यहूदियत व ईसाइयत तौरात और इंजील उतरने के बाद पैदा हुई और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का ज़माना, जिन पर तौरात उतरी, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से सदियों बाद का है और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम, जिन पर इंजील उतरी, उनका ज़माना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद दो हज़ार बरस के क़रीब हुआ है और तौरात व इंजील किसी में आपको यहूदी या ईसाई नहीं कहा गया है, इसके बावजुद आपकी निस्बत यह दावा जिहालत और मूर्खता की चरम सीमा है.

(5) ऐ किताब वालो, तुम.

(6) और तुम्हारी किताबों में इसकी ख़बर दी गई थी यानी आख़िरी ज़माने के नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़ाहिर होने और आपकी तारीफ़ और विशेषताओ की. जब ये सब कुछ पहचान कर भी तुम हुज़ूर पर ईमान न लाए और तुमने इसमें झगड़ा किया.

(7) यानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को यहूदी या ईसाई कहते हैं.

(8) और वास्तविकता यह है कि.

(9) तो न किसी यहूदी या ईसाई का अपने आपको दीन में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तरफ़ मन्सूब करना या जोड़ना सही हो सकता है, न किसी मुश्रिक का. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि इसमें यहूदियों और ईसाईयों पर ऐतिराज है कि वो मुश्रिक हैं.
(10) और उनकी नबुव्वत के दौर में उन पर ईमान लाए और उनकी शरीअत का पालन किया.

(11) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(12) और आपकी उम्मत के लोग.

(13) यह आयत हज़रत मआज़ बिन जबल और हुज़ैफ़ा बिन यमान और अम्मार बिन यासिर के बारे में उतरी जिनको यहूदी अपने दीन में दाख़िल करने की कोशिश करते और यहूदियत की दावत देते थे और इसमें बताया गया कि यह उनकी खाली हविस है, वो उन्हें गुमराह न कर सकेंगे.

(14) और तुम्हारी किताबों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और विशेषताएं मौजूद हैं और तुम जानते हो कि वो सच्चे नबी है और उनका दीन सच्चा दीन है.

(15) अपनी किताबों में फेर बदल करके.

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