सूरए आले इमरान – पहला रूकू

सूरए आले इमरान – पहला रूकू

तीसरा पारा  ( जारी )
मदीने में उतरी (1) आयते 200, रूकू 20
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

अलिफ़ लाम मीम (1) अल्लाह  है जिसके सिवा किसी की पूजा नहीं (2)
आप ज़िन्दा, औरों का क़ायम रखने वाला (2)
उसने तुम पर यह सच्ची किताब उतारी अगली किताबों की तस्दीक़ (पुष्टि) फ़रमाती और उसने इस से पहले तौरात और इन्ज़ील उतारी (3)
लोगों को राह दिखाती और फै़सला उतारा बेशक वो जो अल्लाह की आयतों को इन्कारी हुए (3)
उनके लिये सख़्त अज़ाब है, और अल्लाह ग़ालिब बदला लेने वाला है (4)
अल्लाह पर कुछ छुपा नहीं ज़मीन में न आसमान में (5)
वही है जो तुम्हारी तस्वीर बनाता है माओं के पेट में जैसी चाहे (4)
उसके सिवा किसी की इबादत नहीं, इज़्ज़त वाला हिक़मत वाला (5) (6)
वही है जिसने तुमपर यह किताब उतारी इसकी कुछ आयतें साफ़ मानी रखती हैं (6)
वो किताब की अस्ल हैं (7)
और दूसरी वो हैं जिनके मानी में इश्तिबाह  (शक) है (8)
वो जिनके दिलों में कजी है  (9)
वो इश्तिबाह वाली के पीछे पड़ते हैं (10)
गुमराही चाहते (11)
और उसका पहलू ढूंढने को (12)और उसका ठीक पहलू अल्लाह ही को मालूम है (13)
और पुख़्ता इल्म वालें (14) कहते हैं हम उसपर ईमान लाएं (15)
सब हमारे रब के पास से है (16)
और नसीहत नहीं मानते मगर अक़्ल वाले (17) (7)
ऐ रब हमारे दिल टेढ़े न कर बाद इसके कि तूने हमें हिदायत दी और हमें अपने पास से रहमत अता कर, बेशक तू है बड़ा देने वाला (8)  ऐ रब हमारे बेशक तू सब लोगों को जमा करने वाला है (18)
उस दिन के लिए जिसमें कोई शुबह नहीं (19)
बेशक अल्लाह का वादा नहीं बदलता (20) (9)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – पहला रूकू

(1) सूरए आले इमरान मदीनए तैय्यिबह में उतरी. इसमें बीस रूकू, दो सौ आयतें, तीन हज़ार चार सौ अस्सी शब्द और चौदह हज़ार पाँच सौ बीस अक्षर हैं.

(2) मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि यह आयत नजरान के प्रतिनिधि मण्डल के बारे में उतरी जो साठ सवारों पर आधारित था. उस में चौदह सरदार थे और तीन उस क़ौम के बुज़ुर्ग और नेता. एक आक़िब जिसका नाम अब्दुल मसीह था. यह व्यक्ति क़ौम का अमीर अर्थात मूखिया था और उसकी राय के बिना ईसाई कोई काम नहीं करते थें. दूसरा सैयद जिसका नाम एहम था. यह व्यक्ति अपनी क़ौम का मुख्य सचिव और वित्त विभाग का बड़ा अफ़सर था. खाने पीने और रसद के सारे प्रबन्ध उसी के हुक्म से होते थे. तीसरा अबू हारिस बिन अलक़मा था. यह शख़्स ईसाईयों के तमाम विद्वानों और पादरियों का सबसे बड़ा पेशवा था. रूम के बादशाह उसके इल्म और उसकी धार्मिक महानता के लिहाज़ से उसका आदर सत्कार करते थे. ये तमाम लोग ऊमदा क़ीमती पोशाकें पहनकर बड़ी शान से हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मुनाज़िरा यानी धार्मिक बहस करने के इरादे से आए और मस्जिदे अक़दस में दाख़िल हुए. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उस वक़्त अस्त्र की नमाज़ अदा फ़रमा रहे थे. उन लोगों की नमाज़ का वक़्त भी आ गया और उन्होंने भी मस्जिद शरीफ़ ही में पूर्व दिशा की ओर मुंह करके नमाज़ शुरू कर दी. पूरी करने के बाद हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बातचीत शुरू की. हुज़ूर ने फ़रमाया तुम इस्लाम लाओ. कहने लगे हम आपसे पहले इस्लाम ला चुके. फ़रमाया यह ग़लत है, यह दावा झूटा है, तुम्हें इस्लाम से तुम्हारा यह दावा रोकता है कि अल्लाह के औलाद है. और तुम्हारी सलीब परस्ती रोकती है. और तुम्हारा सुअर खाना रोकता है. उन्होंने कहा अगर ईसा ख़ुदा के बेटे न हों तो बताइये उनका बाप कौन है. और सब के सब बौलने लगे.  सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया,  क्या तुम नहीं जानते कि बेटा बाप से ज़रूर मुशाबेह होता है. उन्होंने इक़रार किया. फिर फ़रमाया क्या तुम नहीं जानते कि हमारा रब ज़िन्दा है, उसे मौत नहीं, उसके लिये मौत मुहाल है, और ईसा अलैहिस्सलाम पर मौत आने वाली है. उन्होंने इसका भी इक़रार किया. फ़िर फ़रमाया, क्या तुम नहीं जानते कि हमारा रब बन्दों के काम बनाने वाला और उनकी हक़ीक़ी हिफ़ाज़त करने वाला है और रोज़ी देने वाला है. उन्होंने कहा, हाँ. हुज़ूर ने फ़रमाया क्या हज़रत ईसा भी ऐसे ही हैं. वो बोले नहीं. फ़रमाया, क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह तआला पर आसमान और ज़मीन की कोई चीज़ छुपी हुई नहीं. उन्होंने इक़रार किया. हुज़ूर ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा अल्लाह की तालीम के बिना उसमें से कुछ जानते हैं. उन्होंने कहा, नहीं. हुज़ूर ने फ़रमाया, क्या तुम नहीं जानते कि हज़रत ईसा गर्भ में रहे, पैदा होने वालों की तरह पैदा हुए, बच्चों की तरह खिलाए पिलाए गए, आदमियों वाली ज़रूरतें रखते थे. उन्होंने इसका इक़रार किया. हुज़ूर ने फ़रमाया, फिर वह कैसे इलाह यानी मअबूद हो सकते हैं जैसा कि तुम्हारा गुमान है. इस पर वो सब ख़ामोश रह गए और उनसे कोई जवाब न बन पड़ा. इस पर सूरए आले इमरान की पहली से कुछ ऊपर अस्सी आयतें उतरीं. अल्लाह की विशेषताओं में हैय्य का मतलब है दायम बाक़ी यानी ऐसा हमेशगी रखने वाला जिसकी मौत मुमकिन ही न हो. क़ैय्यूम वह है जो अपनी ज़ात से क़ायम हो और दुनिया वाले अपनी दुनिया और आख़िरत की ज़िन्दगी में जो हाजतें रखते हैं, उसका प्रबन्ध फ़रमाए.

(3) इसमें नजरान के प्रतिनिधि मण्डल के ईसाई भी शामिल हैं.

(4) मर्द, औरत, गोरा, काला, खूबसूरत, बदसूरत, वग़ैरह. बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, तुम्हारी पैदाइश का माद्दा माँ के पेट में चालीस रोज़ जमा होता है, फिर इतने ही दिन गोश्त के टुकड़े की सूरत में रहता है, फिर अल्लाह तआला एक फ़रिश्ता भेजता है जो उसका रिज़्क़, उसकी उम्र, उसके कर्म, उसका अन्त, यानी उसका सौभाग्य और दुर्भाग्य लिखता है. फिर उसमें रूह डालता है, तो उसकी क़सम, जिसके सिवा कोई पूजे जाने के क़ाबिल नहीं है, आदमी जन्नतियों के से कर्म करता रहता है, यहाँ तक कि उसमें और जन्नत में हाथ भर का यानी बहुत कम फ़र्क़ रह जाता है. तो किताब सबक़त करती है, और वह दोज़ख़ियों के से अमल करता रहता है, यहाँ तक कि उसमें और दोज़ख़ं में एक हाथ का फ़र्क़ रह जाता है फिर किताब सबक़त करती है और उसकी ज़िन्दगी का नक़शा बदलता है और वह जन्नतियों के से अमल करने लगता है. उसी पर उसका ख़ात्मा होता है और वह जन्नत में दाख़िल होता है.

(5) इसमें भी ईसाईयों का रद है जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को ख़ुदा का बेटा कहते और उनकी पूजा करते थे.

(6) जिसमें कोई संदेह या शक नहीं.

(7) कि अहकाम में उनकी तरफ़ रूजू किया जाता है और हलाल व हराम में उन्हीं पर अमल.

(8) वो कुछ कारणों का ऐहतिमाल रखती हैं. उनमें से कौन सी वजह, कौन सा कारण मुराद है अल्लाह ही जानता है या जिसको अल्लाह तआला उसकी जानकारी दे.

(9) यानी गुमराह और अधर्मी लोग, जो अपने नफ़्स के बहकावे के पाबन्द हैं.

(10) और उसके ज़ाहिर पर हुक्म करते हैं या झूटी व्याख्या करते हैं और यह नेक नियत से नहीं बल्कि……

(11) और शक शुबह में डालने.

(12) अपनी इच्छा के अनुसार, इसके बावुजूद कि वो व्याख्या के योग्य नहीं. (जुमल और ख़ाज़िन)

(13) हक़ीक़त में. (जुमल). और अपने करम और अता से जिसको वह नवाज़े.

(14) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है, आप फ़रमाते थे कि मैं पक्का इल्म जानने वालों मे से हूँ और मुजाहिद से रिवायत है कि मैं उनमें से हूँ जो रहस्य वाली आयतों की तावील या व्याख्या जानते हैं. हज़रत अनस बिन मालिक से रिवायत है कि पक्का इल्म जानने वाले वो हैं जिनमें चार विशेषताएं हों, अल्लाह से डर, लोगों से अच्छा व्यवहार, दुनिया के जीवन में पाकीज़गी, और नफ़्स के साथ निरन्तर लड़ाई. (ख़ाज़िन)

(15) कि वह अल्लाह की तरफ़ से है और जो मानी उसकी मुराद हैं. सच्ची हैं और उसका नाज़िल फ़रमाना हिकमत है.

(16) अहकाम हों या रहस्य.

(17) और पक्के इल्म वाले कहते है.

(18) हिसाब या बदले के वास्ते.

(19) वह क़यामत का दिन है.

(20) तो जिसके दिल में कजी या टेढ़ापन हो वह हलाक हो गए, और जो तेरे एहसान से हिदायत पाए वह नसीब वाला होगा. निजात पाएगा. इस आयत से मालूम हुआ कि झूट उलूहियत यानी अल्लाह होने के विरूद्ध है. लिहाज़ा अल्लाह की तरफ़ झूट का ख़याल और निस्बत सख़्त बेअदबी है. (मदारिक व अबू मसऊद वग़ैरह)

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