सूरए आले इमरान – दूसरा रूकू

सूरए आले इमरान – दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,
बेशक वो जो काफ़िर हुए (1)
उनके माल और उनकी औलाद अल्लाह से उन्हें कुछ न बचा सकेंगे और वही दोज़ख़ के ईंधन हैं
(10) जैसे फिरऔन वालों और उनसे अगलों का तरीक़ा, उन्होंने हमारी आयतें झुठलाईं तो अल्लाह ने उनके गुनाहों पर उनको पकड़ा  और अल्लाह का अज़ाब सख़्त(11) फ़रमा दो क़ाफिरों से, कोई दम जाता है कि तुम मग़लूब (पराजित) होंगे  और दोज़ख़ की तरफ़ हांके जाओगे (2)
और वह बहुत बुरा बिछौना (12) बेशक तुम्हारे लिये निशानी थी (3)
दो दलों में जो आपस मे भिड़ पड़े (4)
एक जत्था अल्लाह की राह में लड़ता (5)
और दूसरा काफ़िर (6)
कि उन्हें आँखों देखा अपने से दूना समझें और अल्लाह अपनी मदद से ज़ोर देता है जिसे चाहता है(7)
बेशक इसमें अक़्लमंदों के लिये ज़रूर देखकर सीखना है (13) लोगों के लिये सजाई गई उन ख़्वाहिशों की महब्बत (8)  औरतें और बेटे और तले उपर सोने चांदी के ढेर और निशान किये हुए घोड़े और चौपाए और खेती, यह जीती दुनिया की पूंजी है  (9)
और अल्लाह है जिसके पास अच्छा ठिकाना (10)(14) तुम फ़रमाओ क्या मैं तुम्हें इससे (11)
बेहतर चीज़ बतादूं परहेज़गारों के लिये, उनके रब के पास जन्नतें है जिनके नीचे नहरें जारी, हमेशा उनमें रहेंगे  और सुथरी बीबियां (12)
अल्लाह की ख़ुशनूदी (रज़ामंदी)(13)
और अल्लाह बन्दों को देखता है (14) (15)
वो जो कहते हैं, ऐ रब हमारे हम ईमान लाए तू हमारे गुनाह माफ़ कर और हमें दोज़ख़ के अज़ाब से बचाले, सब्र वाले (15)(16)
और सच्चे (16)
और अदब वाले और ख़ुदा की राह में ख़र्चने वाले और पिछले पहर से माफ़ी मांगने वाले (17)(17)
अल्लाह ने गवाही दी कि उसके सिवा कोई मअबूद नहीं (18)
और फ़रिश्तों ने और आलिमों ने (19)
इन्साफ़ से क़ायम होकर, उसके सिवा किसी की इबादत नहीं, इज़्ज़त वाला हिकमत वाला(18)
बेशक अल्लाह के यहां इस्लाम ही दीन है (20)
और फूट में न पड़े किताब (21)
मगर बाद इसके कि उन्हें इल्म आचुका (22)
अपने दिलों की जलन से (23)
और जो अल्लाह की की आयतों का इन्कारी हो तो बेशक अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है (19)
फिर ऐ मेहबूब, अगर वो तुम से हुज्जत (तर्क वितर्क) करें तो फ़रमादो मैं अपना मुंह अल्लाह के हुज़ूर झुकाए हुँ  और जो मेरे अनुयायी हुए (24)
और किताबियों और अनपढ़ों से फ़रमाओ (25)
क्या तुमने गर्दन रखी (26)
तो अगर वो गर्दन रखे तो जब तो राह पा गए और अगर मुंह फेरें तो तुम पर तो यही हुक्म पहुंचा देना है (27)
और अल्लाह बन्दों को देख रहा है (20)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – दूसरा रूकू

(1) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का विरोध करके.

(2) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब बद्र में काफ़िरों को रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम परास्त कर चुके और मदीनए तैय्यिबह वापस तशरीफ़ लाए तो हुज़ूर ने यहूदियों को जमा किया और फ़रमाया कि तुम अल्लाह से डरो और इस्लाम लाओ, इससे पहले कि तुम पर ऐसी मुसीबत आए जैसी बद्र में क़ुरैश पर आई. तुम जान चुके हो मैं अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूं. तुम अपनी किताब में यह लिखा हुआ पाते हो. इस पर उन्होंने कहा कि क़ुरैश तो जंग की कला से अनजान हैं, अगर हम से मुक़ाबला हुआ तो आपको मालूम हो जाएगा कि लड़ने वाले ऐसे होते हैं. इस पर यह आयत उतरी और उन्हें ख़बर दी गई कि वो परास्त होंगे और क़त्ल किये जाएंगे, गिरफ़तार किये जाएंगे, उन पर जिज़िया मुक़र्रर होगा. चुनांचे ऐसा ही हुआ कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने एक रोज़ में छ: सौ की तादाद को क़त्ल फ़रमाया और बहुतों को गिरफ़तार किया और ख़ेबर वालों पर जिज़िया मुक़र्रर फ़रमाया.

(3) इसके मुख़ातब यहूदी हैं, पर कुछ का कहना है कि सारे काफ़िर और कुछ के अनुसार ईमान वाले. (जुमल).

(4) बद्र की लड़ाई में.

(5) यानी नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा, उनकी कुल संख्या तीन सौ तेरह थी. सत्तर मुहाजिर और 236 अनसारी, मुहाजिरीन के सलाहकार हज़रत अली मुरतज़ा थे और अनसार के हज़रत सअद बिन उबादा रदियल्लाहो अन्हुम. इस पूरे लश्कर में कुल दो घोड़े, सत्तर ऊंट और छ ज़िरहें, आठ तलवारें थीं. और इस घटना में चौदह सहाबा शहीद हुए, छ मुहाजिर और आठ अनसार.

(6) काफ़िरों की संख्या नौसो पचास थी उनका सरदार उतबा बिन रबीआ था. और उनके पास सौ घोड़े थे, और सात सौ ऊंट और बहुत सी ज़िरहें और हथियार थे. (जुमल)

(7) चाहे उसकी संख्या कम हो और सामान की कितनी ही कमी हो.

(8) ताकि वासना के पुजारियों और अल्लाह की इबादत करने वालों के बीच फ़र्क़ और पहचान ज़ाहिर हो, जैसा कि दूसरी आयत में इरशाद फ़रमाया “इन्ना जअलना मा अलल अर्दे ज़ीनतल लहा लिनबलूहुम अय्युहुम अहसना अमला” (यानी बेशक हमने ज़मीन का सिंगार किया जो कुछ उस पर है कि उनहें आज़माएं उनमें किस के काम बेहतर हैं) (सूरए अल-कहफ, आयत सात)

(9) इससे कुछ अर्सा नफ़ा पहुंचता है, फिर नष्ट हो जाती है. इन्सान को चाहिये कि दुनिया के माल को ऐसे काम में ख़र्च करे जिसमें उसकी आख़िरत की दुरूस्ती और सआदत हो.

(10) जन्नत, तो चाहिये कि इसकी रग़बत की जाय और नाशवान दुनिया की नश्वर चीज़ों से दिल न लगाया जाए.

(11) दुनिया की पूंजी से.

(12) जो ज़नाना बीमारियों और हर नापसन्द और नफ़रत के क़ाबिल चीज़ से पाक.

(13) और यह सबसे उत्तम नेअमत है.

(14) और उनके कर्म और अहवाल जानता और उनका अज्र या बदला देता है.

(15)  जो ताअत और मुसीबत पर सब्र करें और गुनाहों से रूके रहे.

(16) जिनके क़ौल और इरादे और नियतें सब सच्ची हो.

(17) इसमें रात के आख़िर में नमाज़ पढ़ने वाले भी. यह वक़्त तन्हाई और दुआ क़ुबूल होने का है. हज़रत लुक़मान ने अपने बेटे से फ़रमाया, मुर्गे़ से कम न रहना कि वह तो सुबह से पुकार लगाए और तुम सोते रहो.

(18) शाम के लोगों में से दो व्यक्ति हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए. जब उन्होंने मदीनए तैय्यिबह को देखा तो एक दूसरे से कहने लगा कि आख़िरी ज़माने के नबी के शहर की यह विशेषता है जो इस शहर में पाई जाती है. जब हुज़ूर के आस्ताने पर हाज़िर हुए तो उन्होंने हुज़ूर की शक्ले पाक और हुलिये को तौरात के मुताबिक देखकर पहचान लिया और अर्ज़ किया, आप मुहम्मद हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया, हाँ. फिर अर्ज़ किया कि आप अहमद हैं (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) फ़रमाया, हाँ.  अर्ज़ किया, हम एक सवाल करते है, अगर आपने ठीक ठीक जवाब दे दिया तो हम आप पर ईमान ले आएंगे. फ़रमाया, पूछो. उन्होंने अर्ज़ किया कि अल्लाह की किताब में सब से बड़ी शहादत कौन सी है ? इस पर आयते करीमा उतरी और इसको सुनकर वह दोनो व्यक्ति मुसलमान हो गए. हज़रत सईद बिन जुबैर रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि काबए मुअज़्ज़मा में तीन सौ साठ बुत थे. जब मदीनए तैय्यिबह में यह आयत उतरी तो काबे के अन्दर वो सब सिजदे में गिर गए.

(19) यानी नबियों और वलियों ने.

(20) उसके सिवा कोई और दीन अल्लाह का पसन्दीदा नहीं. यूहूदी और ईसाई वग़ैरह काफ़िर जो अपने दीन को अफ़ज़ल और मक़बूल कहते है, इस आयत में उनके दावे को बातिल कर दिया.

(21) यह आयत यहूदियों और ईसाईयों के बारे में उतरी. जिन्हों ने इस्लाम को छोड़ा और सैयदुल अंबिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत में विरोध किया.

(22) वो अपनी किताबों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात और सिफ़त देख चुके और उन्होंने पहचान लिया कि यही वह नबी हैं जिनकी आसमानी किताबों में ख़बरें दी गई है.

(23) यानी उनके विरोध का कारण उनका हसद और दुनियावी नफ़े का लालच है.

(24) यानी मैं और मेरे मानने वाले पूरी तरह अल्लाह तआला के फ़रमाँबरदार और मुतीअ हैं, हमारा दीन तौहीद का दीन है जिसकी सच्चाई भी साबित हो चुकी है वह भी ख़ुद तुम्हारी अपनी किताबों से, तो इसमें तुम्हारा हमसे झगड़ना बिल्कुल ग़लत है.

(25 जितने क़ाफ़िर ग़ैर किताबी हैं वो “उम्मीयीन” (अनपढ़ों) में दाख़िल हैं, उन्हीं में से अरब के मुश्रिक भी है.

(26) और दीने इस्लाम के सामने सर झुकाया या खुले प्रमाण क़ायम होने के बावुजूद तुम अभी तक अपने कुफ़्र पर हो. यह दावते इस्लाम का एक अन्दाज़ है, और इस तरह उन्हें सच्चे दीन की तरफ़ बुलाया जाता है.

(27) वह तुमने पुरा कर ही दिया. इस से उन्होंने नफ़ा न उठाया तो नुक़सान में वो रहे. इसमें हुज़ूर सैयदुल अंबिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तस्कीन फ़रमाई गई है कि आप उनके ईमान न लाने से दुखी न हों.

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