सूरए आले इमरान – तीसरा रूकू

सूरए आले इमरान – तीसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,
वो जो अल्लाह की आयतों से इन्कारी होते और पैगम्बरों को नाहक़ शहीद करते (1)
और इन्साफ़ का हुक्म करने वालों को क़त्ल करते हैं उन्हें ख़ुशखबरी दो दर्दनाक अज़ाब की (21) ये हैं वो जिनके कर्म अकारत गए दुनिया और आख़िरत में (2)
और उनका कोई मददगार नहीं (3)(22)
क्या तुमने उन्हें न देखा जिन्हें किताब का एक हिस्सा मिला(4)
अल्लाह की किताब की तरफ़ बुलाए जाते हैं कि वह उनका फ़ैसला करे फिर इनमें का एक दल उससे मुंह फेर कर फिर जाता है (5)(23)
यह साहस (6)
उन्हें इसलिये हुआ कि वो कहते हें कभी हमें आग न छुएगी मगर गिनती के दिनों(7)
और उनके दीन में उन्हें धोखा दिया उस झूठ ने जो बांधते थे(8) (24)
तो कैसी होगी जब हम उन्हें इकट्ठा करेंगे उस दिन के लिये जिसमें शक नहीं (9)
और हर जान को उसकी कमाई पूरी भर दी जाएगी और उनपर जुल्म न होगा (25)
यूं अर्ज़ कर ऐ अल्लाह मुल्क के मालिक तू जिसे चाहे सल्तनत दे और जिसे चाहे सल्तनत छीन ले और जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत दे, सारी भलाई तेरे ही हाथ है बेशक तू सब कुछ कर सकता है (10)(26)
तू दिन का हिस्सा रात में डाले और रात का हिस्सा दिन में डाले(11)
और  मुर्दा से ज़िन्दा निकाले और ज़िन्दा से मुर्दा निकाले (12)
और जिसे चाहे बेगिनती दे (27) मुसलमान काफ़िरों को अपना दोस्त न बना लें मुसलमानों के सिवा (13)
और जो ऐसा करेगा उसे अल्लाह से कुछ इलाका़ नहीं , मगर यह कि तुम उनसे कुछ डरो (14)
और अल्लाह तुम्हें अपने क्रोध से डराता है और अल्लाह ही की तरफ़ फिरना है(28) तुम फ़रमादो कि अगर तुम अपने जी की बात छुपाओ या ज़ाहिर करो, अल्लाह को सब मालूम है और जानता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है और हर चीज़ पर अल्लाह का क़ाबू है (29) जिस दिन हर जान ने जो भला काम किया हाज़िर पाएगी (15)
और जो बुरा काम किया उम्मीद करेगी काश मुझमें और इसमें दूर का फ़ासला होता (16)
और अल्लाह तुम्हें अपने अज़ाब से डराता है और अल्लाह बन्दों पर मेहरबान है (30)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – तीसरा रूकू

(1) जैसा कि बनी इस्त्राईल ने सुबह को एक साअत के अन्दर तैंतालीस नबियों को क़त्ल किया फिर जब उनमें से एक सौ बारह आबिदों यानी नेक परहेज़गार लोगो ने उठकर उन्हें नेकियों का हुक्म दिया और गुनाहों से रोका, उसी शाम उन्हें भी क़त्ल कर दिया. इस आयत में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने के यहूदियां को फटकार है, क्योंकि वो अपने पूर्वजों के ऐसे बदतरीन कर्म से राज़ी हैं.

(2) इस आयत से मालूम हुआ कि नबियों की शान में बेअदबी कुफ़्र है. और यह भी कि कुफ़्र से तमाम कर्म अकारत हो जाते हैं.

(3) कि उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचाए.

(4) यानी यहूदी, कि उन्हें तौरात शरीफ़ के उलूम और अहकाम सिखाए गए थे, जिनमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की विशेषताएं और अहवाल और इस्लाम की सच्चाई का बयान है. इससे लाज़िम आता था कि जब हुज़ूर तशरीफ़ फ़रमा हों और उन्हें क़ुरआने करीम की तरफ़ बुलाएं तो वो हुज़ूर पर और क़ुरआन शरीफ़ पर ईमान लाएं और उसके आदेशों का पालन करें, लेकिन उनमें से बहुतों ने ऐसा नहीं किया. इस पहलू से मिनल किताब से तौरात और किताबुल्लाह से क़ुरआन शरीफ़ मुराद है.

(5) इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से एक रिवायत आई है कि एक बार सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बैतुल मक़दिस में तशरीफ़ ले गए और वहाँ यहूदियों को इस्लाम की तरफ़ बुलाया. नुएम इब्ने अम्र और हारिस इब्ने ज़ैद ने कहा कि ऐ मुहम्मद ( सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) आप किस दीन पर है ? फ़रमाया, मिल्लते इब्राहीमी पर. वो कहने लगे, हज़रत इब्राहीम तो यहूदी थे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया तौरात लाओ, अभी हमारे तुम्हारे बीच फ़ैसला हो जाएगा. इसपर न जमे और इन्कारी हो गए. इस पर यह आयते करीमा नाज़िल हुई. इस पहलू से आयत में किताबुल्लाह से तौरात मुराद है. इन्हीं हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से एक रिवायत यह भी है कि ख़ैबर के यहूदियों में से एक मर्द ने एक औरत के साथ बलात्कार किया था और तौरात में ऐसे गुनाह की सज़ा पत्थर मार मार कर हलाक कर देना है. लेकिन चूंकि ये लोग यहूदियों में ऊंचे ख़ानदान के थे, इसलिये उन्होंने उनका संगसार करना गवारा न किया और इस मामले को इस उम्मीद पर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास लाए कि शायद आप पत्थरों से हलाक करने का हुक्म न दें. मगर हुज़ूर ने उन दोनों को संगसार करने का हुक्म दिया. इस पर यहूदी ग़ुस्से में आ गए और कहने लगे कि इस गुनाह की यह सज़ा नहीं. आपने ज़ुल्म किया. हुज़ूर ने फ़रमाया, फ़ैसला तौरात पर रखो. कहने लगे यह इन्साफ़ की बात है. तौरात मंगाई गई और अब्दुल्लाह बिन सूरिया बड़े यहूदी आलिम ने उसको पढ़ा. उसमे संगसार करने का जो हुक्म था, उस को छोड़ गया. हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम ने उसका हाथ हटाकर आयत पढ़ दी. यहूदी बहुत ज़लील हुए और वो यहूदी मर्द औरत हुज़ूर के हुक्म से संगसार किये गए. इस पर यह आयत उतरी.

(6) अल्लाह की किताब से मुंह फेरने की.

(7) यानी चालीस दिन या एक हफ़्ता, फिर कुछ ग़म नहीं.

(8) और उनका यह क़ौल था कि हम अल्लाह के बेटे हैं और उसके प्यारे हैं, वह हमें गुनाहों पर अज़ाब न करेगा, मगर बहुत थोड़ी मुद्दत के लिये.

(9) और वह क़यामत का दिन है.

(10) फ़त्हे मक्का के वक़्त सैयदुल अंबिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी उम्मत को मुल्के फ़ारस और रोम की सल्तनत का वादा दिया तो यहूदी और मुनाफ़िक़ों ने उसको असम्भव समझा और कहने लगे, कहाँ मुहम्मद और कहाँ फ़ारस और रोम के मुल्क. वो बड़े ज़बरदस्त और निहायत मज़बूत हैं. इस पर यह आयते करीमा उतरी. और आख़िरकार हुज़ूर का वह वादा पूरा होकर रहा.

(11) यानी कभी रात को बढ़ाए और दिन को घटाए और कभी दिन को बढ़ाकर रात को घटाए. यह उसकी क़ुदरत है, तो फ़ारस और रोम से मुल्क लेकर मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ग़ुलामों को अता करना उसकी ताक़त से क्या दूर है.

(12) मुर्दे से ज़िन्दा का निकालना इस तरह है जसे कि ज़िन्दा इन्सान को बेजान नुत्फ़े से और चिड़िया के ज़िन्दा बच्चे को बेरूह अण्डे से, और ज़िन्दा दिल मूमिन को मुर्दा दिल क़ाफ़िर से, और ज़िन्दा इन्सान से बेजान नुत्फ़े और ज़िन्दा चिड़िया से बेजान अण्डे और ज़िन्दा दिल मूमिन से मुर्दा दिल काफ़िर.

(13) हज़रत उबादा बिन सामित ने अहज़ाब की जंग के दिन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया कि मेरे साथ पाँच सौ यहूदी है जो मेरे हिमायती हैं. मेरी राय है कि मैं दुश्मन के मुक़ाबले उनसे मदद हासिल करूं. इस पर यह आयत उतरी और काफ़िरों को दोस्त और मददगार बनाने से मना फ़रमाया गया. (14) काफ़िरों से दोस्ती और महब्बत मना और हराम है, उन्हें राज़दार बनाना, उनसे व्यवहार करना नाजायज़ है. अगर जान या माल का डर हो तो ऐसे वक़्त में सिर्फ़ ज़ाहिरी बर्ताव जायज़ है.

(15) यानी क़यामत के दिन हर नफ़्स को कर्मों की जज़ा यानी बदला मिलेगा और उसमें कुछ कमी व कोताही न होगी. (16)

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