सूरए आले इमरान – चौथा रूकू

सूरए आले इमरान – चौथा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला,
ऐ मेहबूब, तुम फ़रमादो कि लोगो अगर तुम अल्लाह को दोस्त रखते हो तो मेरे फ़रमाँबरदार हो जाओ अल्लाह तुम्हें दोस्त रखेगा(1)
और तुम्हारे गुनाह बख़्श देगा और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (31) तुम फ़रमादो कि हुक्म मानो अल्लाह और रसूल का (2)
फिर अगर वो मुंह फेरें तो अल्लाह को ख़ुश नहीं आते काफ़िर (32) बेशक अल्लाह ने चुन लिया आदम  और नूह और इब्राहीम की सन्तान और इमरान की सन्तान को सारे जहान से (3)(33)
यह एक नस्ल है एक दूसरे से (4)
और अल्लाह सुनता जानता है (34) जब इमरान की बीबी ने अर्ज़ की (5)
ऐ रब मेरे में मन्नत मानती हूँ  जो मेरे पेट में है कि ख़ालिस तेरी ही ख़िदमत में रहे(6)
तो तू मुझसे क़ुबूल करले बेशक तू ही सुनता जानता (35) फिर जब उसे जना बोली ऐ रब मेरे यह तो मैंने लड़की जनी (7)
और अल्लाह को ख़ूब मालूम है जो कुछ वह जनी और वह लड़का जो उसने मांगा इस लड़की सा नहीं (8)
और में ने उसका नाम मरयम रखा(9)
और मैं उसे और उसकी  औलाद को तेरी पनाह में देती हूँ  रांदे हुए शैतान से (36) तो उसे उसके रब ने अच्छी तरह क़ुबूल किया (10)
और उसे अच्छा परवान चढ़ाया (11)
और उसे ज़करिया की निगहबानी में दिया जब ज़करिया उसके पास उसकी नमाज़ पढ़ने की जगह जाते उसके पास नया रिज़्क (जीविका) पाते (12)
कहा ऐ मरयम यह तेरे पास कहां से आया बोली वह अल्लाह के पास से है बेशक अल्लाह जिसे चाहे बे गिनती दे (13)(37)
यहाँ (14)
पुकारा ज़करिया ने अपने रब को बोला ऐ रब मेरे मुझे अपने पास से दे सुथरी औलाद बेशक तू ही है दुआ सुनने वाला (38)
तो फ़रिश्तों ने उसे आवाज़ दी और वह अपनी नमाज़ की जगह खड़ा नमाज़ पढ़ रहा था(15)
बेशक अल्लाह आपको खु़शख़बरी देता है यहया की जो अल्लाह की तरफ़ के एक कलिमे की (16)
पुष्टि करेगा और सरदार (17)
हमेशा के लिये औरतों से बचने वाला और नबी हमारे ख़ासों से (18)(39)
बोला ऐ मेरे रब मुझे लड़का कहां से होगा मुझे तो पहुंच गया बुढ़ापा (19)
और मेरी  औरत बांझ(20)
फ़रमाया अल्लाह यूं ही करता है जो चाहे (21)(40)
अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरे लिये कोई निशानी कर दे (22)
फ़रमाया तेरी निशानी यह है कि तीन दिन तू लोगों से बात न करे मगर इशारे से और अपने रब की बहुत याद कर (23)
और कुछ दिन रहे और तड़के उसकी पाकी बोल (41)

तफ़सीर :
सूरए आले इमरान – चौथा रूकू

(1) इस आयत से मालूम हुआ कि अल्लाह की महब्बत का दावा जब ही सच्चा हो सकता है जब आदमी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का अनुकरण करने वाला हो और हुज़ूर की इताअत इख़्तियार करे. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम क़ुरैश के पास ठहरे जिन्होंने ख़ानए काबा में बुत स्थापित किये थे और उन्हें सजा सजा कर उनको सिज्दा कर रहे थे. हुज़ूर ने फ़रमाया, ऐ क़ुरैश, ख़ुदा की क़सम तुम अपने पूर्वजों हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल के दीन के ख़िलाफ़ हो गए. क़ुरैश ने कहा, हम इन बुतों को अल्लाह की महब्बत में पूजते हैं ताकि ये हमें अल्लाह से क़रीब करें. इस पर यह आयत उतरी और बताया गया कि अल्लाह की महब्बत का दावा सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अनुकरण और फ़रमाँबरदारी के बिना क़ाबिले क़ुबूल नहीं. जो इस दावे का सुबूत देना चाहे, हुज़ूर की ग़ुलामी करे और हुज़ूर ने बुतों को पूजने से मना फ़रमाया, तो बुत परस्ती करने वाला हुज़ूर का नाफ़रमान और अल्लाह की महब्बत के दावे में झूटा है.

(2) यही अल्लाह की महब्बत की निशानी है और अल्लाह तआला की इताअत रसूल के अनुकरण के बिना नहीं हो सकती. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है, जिसने मेरी नाफ़रमानी की उसने अल्लाह की नाफ़रमानी की.

(3) यहूदियों ने कहा था कि हम हज़रत इब्राहीम व इसहाक़ व याकूब अलैहिमुस्सलाम की औलाद से हैं और उन्हीं के दीन पर हैं. इस पर यह आयत उतरी. और बता दिया गया कि अल्लाह तआला ने इन हज़रात को इस्लाम के साथ बुज़ुर्गी अता फ़रमाई थी और तुम ऐ यहूदियों, इस्लाम पर नहीं हो, तुम्हारा यह दावा ग़लत है.

(4) उनमें आपस में नस्ल के सम्बन्ध भी है और आपस में ये हज़रात एक दूसरे के सहायक और मददगार भी.

(5) इमरान दो हैं, एक इमरान बिन यसहूर बिन फ़ाहिस बिन लावा बिन याक़ूब, ये तो हज़रत मूसा व हारून के वालिद हैं, दूसरे इमरान बिन मासान, यह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की वालिदा मरयम के वालिद हैं. दोनों इमरानों के बीच एक हज़ार आठ सौ साल का अन्तर है. यहाँ दूसरे इमरान मुराद हैं. उनकी बीवी साहिबा का नाम हन्ना बिन्ते फ़ाक़ूज़ा है. यह मरयम की वालिदा हैं.

(6) और तेरी इबादत के सिवा दुनिया का कोई काम उसके मुतअल्लिक़ न हो. बैतुल मक़दिस की ख़िदमत इसके ज़िम्मे हो. उलमा ने वाक़िआ इस तरह ज़िक्र किया है कि हज़रत ज़करिया और इमरान दोनों हमज़ुल्फ़ थे, यानी दो सगी बहनें एक एक के निकाह में थीं. फ़ाक़ूज़ा की बेटी ईशाअ जो हज़रत यहया की वालिदा हैं और उनकी बहन हन्ना जो फ़ाक़ूज़ा की दूसरी बेटी और हज़रत मरयम की वालिदा है. वह इमरान की बीबी थीं. एक ज़माने तक हन्ना के औलाद नहीं हुई यहाँ तक कि बुढ़ापा आ गया और मायूसी हो गई. ये नेकों का ख़ानदान था और ये सब लोग अल्लाह के मक़बूल बन्दे थे. एक रोज़ हन्ना ने एक दरख़्त के साए में एक चिड़िया देखी जो अपने बच्चे को दाना चुगा रही थी. यह देखकर आपके दिल में औलाद का शौक़ पैदा हुआ और अल्लाह की बारगाह में दुआ की कि ऐ रब अगर तू मुझे बच्चा दे तो मैं उसे बैतुल मक़दिस का सेवक बनाऊं और इस ख़िदमत के लिये हाज़िर कर दूँ. जब वह गर्भवती हुई और उन्होंने यह नज़्र मान ली तो उनके शौहर ने फ़रमाया कि यह तुमने क्या किया. अगर लड़की हो गई तो वह इस क़ाबिल कहाँ है. उस ज़माने में लड़कों को बैतुल मक़दिस की ख़िदमत के लिये दिया जाता था और लड़कियाँ औरतों की क़ुदरती मजबूरियों और ज़नाना कमज़ोरियों और मर्दों के साथ न रह सकने की वजह से इस क़ाबिल नहीं समझी जाती थीं. इसलिये इन साहिबों को सख़्त फ़िक्र हुई. हन्ना की ज़चगी से पहले इमरान का देहान्त हो गया.

(7) हन्ना ने ये कलिमा ऐतिज़ार के तौर पर कहा और उनको हसरत व ग़म हुआ कि लड़की हुई तो नज़्र किस तरह पूरी हो सकेगी.

(8) क्योंकि यह लड़की अल्लाह तआला की अता है और उसकी मेहरबानी से बेटे से ज़्यादा बुज़ुर्गी रखने वाली है. यह बेटी हज़रत मरयम थीं और अपने ज़माने की औरतों में सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत और अफ़ज़ल थीं.

(9) मरयम के मानी हैं आबिदा यानी इबादत करने वाली.

(10) और नज़्र में लड़के की जगह हज़रत मरयम को क़ुबूल फ़रमाया. हन्ना ने विलादत के बाद हज़रत मरयम को एक कपड़े में लपेट कर बैतुल मक़दिस में पादरियों के सामने रख दिया. ये पादरी हज़रत हारून की औलाद में थे और बैतुल मक़दिस में इनका बड़ा मान था. चूंकि हज़रत मरयम उनके इमाम और उनकी क़ुरबानियों के सरदार की बेटी थीं और इल्म वालों का ख़ानदान था, इसलिये उन सब ने, जिनकी संख्या सत्ताईस थी, हज़रत मरयम को लेने और उनका पालन पोषण करने की अच्छा दिखाई. हज़रत ज़करिया ने फ़रमाया मैं इनका (मरयम का) सब से ज़्यादा हक़दार हूँ क्योंकि मेरी बीबी इनकी ख़ाला हैं. मामला इस पर ख़त्म हुआ कि क़ुरआ डाला जाए. क़ुरआ हज़रत ज़करिया ही के नाम पर निकला.

(11) हज़रत मरयम एक दिन में इतना बढ़ती थी जितना और बच्चे एक साल में.

(12) बे फ़स्ल मेवे जो जन्नत से उतरते और हज़रत मरयम ने किसी औरत का दूध न पिया.

(13) हज़रत मरयम ने छोटी उम्र में बात शुरू की, जबकि वह पालने में परवरिश पा रही थीं, जैसा कि उनके बेटे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने भी पालने से ही कलाम फ़रमाया. यह आयत वलियों की करामतों अथवा चमत्कारों के सुबूत में है कि अल्लाह तआला उनके हाथों पर चमत्कार ज़ाहिर कर देता है. हज़रत ज़करिया ने जब यह देखा तो फ़रमाया जो पाक ज़ात मरयम को बेवक़्त बेफ़स्ल और बिना साधन के मेवे अता फ़रमाने की क्षमता रखती है, वह बेशक इस पर भी क़ादिर है कि मेरी बांझ बीबी को नई तंदुरूस्ती दे और मुझे इस बुढ़ापे की उम्र में उम्मीद टूट जाने के बाद भी बेटा अता फ़रमाएं. इसी ख़याल से आप ने दुआ की जिसका बयान अगली आयत में है.

(14) यानी बैतुल मक़दिस की मेहराब में दरवाज़े बन्द करके दुआ की.

(15) हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम बहुत बड़े विद्वान थे. अल्लाह के हुज़ूर क़ुरबानियाँ आप ही पेश करते थे और मस्जिद शरीफ़ में आपकी आज्ञा के बिना कोई दाख़िल नहीं हो सकता था. जिस वक़्त मेहराब में आप नमाज़ पढ़ रहे थे और बाहर आदमी दाख़िले की आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे, दर्वाज़ा बन्द था, अचानक आपने एक सफ़ेदपोश जवान देखा. वो हज़रत जिब्रील थे. उन्हों ने आपको बेटे की ख़ुशख़बरी सुनाई जो “अन्नल्लाहा युबश्शिरूका”  (बेशक अल्लाह आपको ख़ुशख़बरी देता है) में बयान फ़रमाई गई.

(16) “कलिमा” से मुराद मरयम के बेटे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम हैं, कि उन्हें अल्लाह तआला ने “कुन” (होजा) फ़रमाकर बिना बाप के पैदा किया और उनपर सबसे पहले ईमान लाने और उनकी तस्दीक़ करने वाले हज़रत यहया हैं जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से उम्र में छ माह बड़े थे. ये दोनों ख़ाला ज़ाद भाई थे. हज़रत यहया की वालिदा अपनी बहन मरयम से मिलीं तो उनहें गर्भवती होने की सूचना दी. हज़रत मरयम ने फ़रमाया मैं भी गर्भ से हूँ. हज़रत यहया की वालिदा ने कहा ऐ मरयम मुझे मालूम होता है कि मेरे पेट का बच्चा तुम्हारे पेट के बच्चे को सज्दा करता है.

(17) सैय्यिद उस रईस को कहते है जो बुज़ुर्गी वाला हो और लोग उसकी ख़िदमत और इताअत करें. हज़रत यहया ईमान वालों के सरदार और इल्म, सहिष्णुता और दीन में उनके रईस अर्थात सरदार थे.

(18) हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम ने आश्चर्य के साथ अर्ज़ किया.

(19) और उम्र एक सौ बीस साल की हो चुकी.

(20) उनकी उम्र अठानवे साल की. सवाल का मक़सद यह है कि बेटा किस तरह अता होगा, क्या मेरी जवानी लौटाई जाएगी और बीबी का बांझपन दूर किया जाएगा, या हम दोनों अपने हाल पर रहेंगे.

(21) बुढ़ापे में बेटा देना उसकी क़ुदरत से कुछ दूर नहीं.

(22) जिससे मुझे अपनी बीबी के गर्भ का समय मालूम हो ताकि मैं और ज़्यादा शुक्र और इबादत में लग जाऊं.

(23) चुनांचे ऐसा ही हुआ कि आदमियों के साथ बातचीत करने से ज़बाने मुबारक तीन रोज़ तक बन्द रही, अल्लाह का ज़िक्र तथा तस्बीह आप कर सकते थे. यह एक बड़ा चमत्कार है कि जिस आदमी के शरीर के सारे अंग सही और सालिम हों और ज़बान से तस्बीह और ज़िक्र अदा होती रहे मगर लोगों के साथ बातचीत न कर सके. और यह निशानी इसलिये मुक़र्रर की गई थी कि इस अज़ीम इनाम का शुक्र अदा करने के अलावा ज़बान और किसी बात में मशग़ूल न हो.

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