सूरए बक़रह _ तीसरा रूकू

सूरए बक़रह _ तीसरा रूकू

ऐ लोगों(1)
अपने रब को पूजो जिसने तुम्हें और तुम से अगलों को पैदा किया ये उम्मीद करते हुए कि तुम्हें परहेज़गारी मिले (2)
और जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना और आसमान को इमारत बनाया और आसमान से पानी उतारा (3)
तो उससे कुछ फल निकाले तुम्हारे खाने को तो अल्लाह के लिये जानबूझकर बराबर वाले न ठहराओ (4)
और अगर तुम्हें कुछ शक हो उसमें जो हमने अपने  (उन ख़ास) बन्दे(5)
पर उतारा तो उस जैसी सूरत तो ले आओ (6)
और अल्लाह के सिवा अपने सब हिमायतियों को बुला लो अगर तुम सच्चे हो, फिर अगर न ला सको और हम फ़रमाए देते है कि हरगिज़ न ला सकोगे तो डरो उस आग से जिसका ईंधन आदमी और पत्थर हैं (7)
तैयार रखी है काफ़िरों के लिये (8)
और ख़ुशख़बरी दे उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये कि उनके लिये बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहें(9)
जब उन्हें उन बागों से कोई फल खाने को दिया जाएगा (सूरत देखकर) कहेंगे यह तो वही रिज्क़ (जीविका) है जो हमें पहले मिला था (10)
और वह (सूरत में) मिलता जुलता उन्हें दिया गया और उनके लिये उन बाग़ों में सुथरी बीबियां हैं (11)
और वो उनमें हमेशा रहेंगे (12)
बेशक अल्लाह इस से हया नहीं फ़रमाता कि मिसाल समझाने को कैसी ही चीज़ का जि़क्र या वर्णन फ़रमाए मच्छर हो या उससे बढ़कर(13)
तो वो जो ईमान लाए वो तो जानते हैं कि यह उनके रब की तरफ़ से हक़ (सत्य) है (14)
रहे काफ़िर वो कहते हैं एसी कहावत में अल्लाह का क्या मक़सूद है, अल्लाह बहुतेरों को इससे गुमराह करता है (15)
और बहुतेरों को हिदायत फ़रमाता है और उससे उन्हें गुमराह करता है जो बेहुक्म हैं (16)
वह जो अल्लाह के अहद (इक़रार) को तोड़ देते हैं (17)
पक्का होने के बाद और काटते हैं उस चीज़ को जिसके जोड़ने का ख़ुदा ने हुक्म दिया है और जमीन में फ़साद फैलाते हैं (18)
वही नुक़सान में हैं भला तुम कैसे ख़ुदा का इन्कार करोगे हालांकि तुम मुर्दा थे उसने तुम्हें जिलाया (जीवंत किया) फिर तुम्हें मारेगा फिर तुम्हें ज़िन्दा करेगा फिर उसी की तरफ़ पलटकर जाओगे (19)
वही है जिसने तुम्हारे लिये बनाया जो कुछ ज़मीन में है (20) फिर आसमान की तरफ़ इस्तिवा (क़सद, इरादा) फ़रमाया तो ठीक सात आसमान बनाए और वह सब कुछ जानता हैं (21)

तफ़सीर : सूरए बक़रह  तीसरा रूकू

(1) सूरत के शुरू में बताया गया कि यह किताब अल्लाह से डरने वालों की हिदायत के लिये उतारी गई है, फिर डरने वालों की विशेषताओ का ज़िक्र फरमाया, इसके बाद इससे मुंह फेरने वाले समुदायो का और उनके हालात का ज़िक्र फरमाया कि फ़रमांबरदार  और क़िस्मत वाले इन्सान हिदायत और तक़वा की तरफ़ राग़िब हों और नाफ़रमानी व बग़ावत से बचें. अब तक़वा हासिल करने का तरीक़ा बताया जा रहा है. “ऐ लोगो” का ख़िताब (सम्बोधन) अकसर मक्के वालों को और “ऐ ईमान वालों” का सम्बोधन मदीने वालों को होता है. मगर यहां यह सम्बोधन ईमान वालों और काफ़िर सब को आम है, इसमें इशारा है कि इन्सानी शराफ़त इसी में है कि आदमी अल्लाह से डरे यानी तक़वा हासिल करे और इबादत में लगा रहे. इबादत वह संस्कार (बंदगी) है जो बन्दा अपनी अब्दीयत और माबूद की उलूहियत (ख़ुदा होना) के एतिक़ाद और एतिराफ़ के साथ पूरे करे. यहां इबादत आम है अर्थात पूजा पाठ की सारी विधियों, तमाम उसूल और तरीको को समोए हुए है. काफ़िर इबादत के मामूर (हुक्म किये गए) हैं जिस तरह बेवुज़ू नमाज़ के  फर्ज़  होने को नहीं रोकता उसी तरह काफ़िर होना इबादत के वाजिब होने को मना नहीं करता और जैसे बेवुज़ू व्यक्ति पर नमाज़ की अनिवार्यता बदन की पाकी को ज़रूरी बनाती है ऐसे ही काफ़िर पर इबादत के वाजिब होने से कुफ़्र का छोड़ना अनिवार्य ठहरता है.

(2) इससे मालूम हुआ कि इ़बादत का फ़ायदा इबादत करने वाले ही को मिलता है, अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसको इबादत या और किसी चीज़ से नफ़ा हासिल हो.

(3) पहली आयत में बयान फ़रमाया कि तुम्हें और तुम्हारे पूर्वजों को शून्य से अस्तित्व किया और दूसरी आयत में गुज़र बसर, जीने की सहूलतों, अन्न और पानी का बयान फ़रमाकर स्पष्ट कर दिया कि अल्लाह ही सारी नेअमतों का मालिक है. फिर अल्लाह को छोडकर दूसरे की पूजा सिर्फ बातिल है.

(4) अल्लाह तआला के एक होने के बयान के बाद हुज़ूर सैयदुल अंबिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और क़ुरआने करीम के देववाणी और नबी का मोजिज़ा होने की वह ज़बरदस्त दलील बयान फरमाई जाती है जो सच्चे दिल वाले को इत्मीनान बख्शे  और इंकार करने वालों को लाजवाब कर दे.

(5) ख़ास बन्दे से हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुराद हैं.

(6) यानी ऐसी सूरत बनाकर लाओ   जो फ़साहत (अच्छा कलाम) व बलाग़त और शब्दों के सौंदर्य और प्रबंध और ग़ैब की ख़बरें देने में क़ुरआने पाक की तरह हो.

(7) पत्थर से वो बुत मुराद हैं जिन्हे काफ़िर पूजते हैं और उनकी महब्बत में क़ुरआने पाक और रसूले करीम का इन्कार दुश्मनी के तौर पर करते हैं.

(8) इस से मालूम हुआ कि दोज़ख पैदा हो चुकी है. यह भी इशारा है कि ईमान वालों के लिये अल्लाह के करम से हमेशा जहन्नम में रहना नहीं.

(9) अल्लाह तआला की सुन्नत है कि किताब में तरहीब (डराना) के साथ तरग़ीब ज़िक्र फ़रमाता है. इसीलिये काफ़िर और उनके कर्मों और अज़ाब के ज़िक्र के बाद ईमान वालों का बयान किया और उन्हे जन्नत की बशारत दी. “सालिहातुन” यानी नेकियां वो कर्म हैं जो शरीअत की रौशनी में अच्छे हों. इनमें फ़र्ज़ और नफ़्ल सब दाख़िल हैं. (जलालैन) नेक अमल का ईमान पर अत्फ़ इसकी दलील है कि अमल ईमान का अंग नहीं. यह बशारत ईमान वाले नेक काम करने वालों के लिये बिना क़ैद है और गुनाहगारों को जो बशारत दी गई है वह अल्लाह की मर्ज़ी की शर्त के साथ है कि अल्लाह चाहे तो अपनी कृपा से माफ़ फ़रमाए, चाहे गुनाहों की सज़ा देकर जन्नत प्रदान करें. (मदारकि)

(10) जन्नत के फल एक दूसरे से मिलते जुलते होंगे और उनके मज़े अलग अलग. इतलिये जन्नत वाले कहेंगे कि यही फल तो हमें पहले मिल चुका है, मगर खाने से नई लज़्ज़त पाएंगे तो उनका लुत्फ़ बहुत ज़्यादा हो जाएगा.

(11) जन्नती बीबियां चाहें हूरें हों या और, स्त्रियों की सारी जिस्मानी इल्लतों (दोषों)और तमाम नापाकियों और गंदगियों से पाक होंगी, न जिस्म पर मैल होगा, न पेशाब पख़ाना, इसके साथ ही वो बदमिज़ाजी और बदख़ल्क़ी (बुरे मिजाज़) से भी पाक होंगी.(मदारिक व ख़ाज़िन)

(12) यानी जन्नत में रहने वाले न कभी फ़ना होंगे, न जन्नत से निकाले जाएंगे, इससे मालूम हुआ कि जन्नत और इसमें रहने वालों के लिये फ़ना नही.

(13) जब अल्लाह तआला ने आयत मसलुहुम कमसलिल लज़िस्तौक़दा नारा (उनकी कहावत उसकी तरह है जिसने आग रौशन की) और आयत “कसैय्यिबिम मिनस समाए” (जैसे आसमान से उतरता पानी) में मुनाफ़िक़ो की दो मिसालें बयान फ़रमाई तो मुनाफ़िको ने एतिराज किया कि अल्लाह तआला इससे बालातर है कि ऐसी मिसालें बयान फ़रमाए. उसके रद में यह आयत उतरी.

(14) चूंकि मिसालों का बयान हिकमत (जानकारी, बोध ) देने और मज़मून को दिल में घर करने वाला बनाने के लिये होता है और अरब के अच्छी ज़बान वालों का तरीक़ा है, इसलिये मुनाफ़िक़ो का यह एतिराज ग़लत और बेजा है और मिसालों का बयान सच्चाई से भरपूर है.

(15) “युदिल्लो बिही” (इससे गुमराह करता है) काफ़िरों के उस कथन का जवाब है कि अल्लाह का इस कहावत से क्या मतलब है. “अम्मल लज़ीना आमनू” (वो जो ईमान लाए) और “अम्मल लज़ीना कफ़रू” (वो जो काफ़िर रहे), ये दो जुम्ले जो ऊपर इरशाद हुए, उनकी तफ़सीर है कि इस कहावत या मिसाल से बहुतो को गुमराह करता है जिनकी अक़्लो पर अज्ञानता या जिहालत ने ग़लबा किया है और जिनकी आदत बड़ाई छांटना और दुश्मनी पालना है और जो हक़ बात और खुली हिकमत के इन्कार और विरोध के आदी हैं और इसके बावजूद कि यह मिसाल बहुत मुनासिब है, फिर भी इन्कार करते हैं और इससे अल्लाह तआला बहुतों को हिदायत फ़रमाता है जो ग़ौर और तहक़ीक़ (अनुसंधान) के आदी हैं और इन्साफ के ख़िलाफ बात नही कहते कि हिकमत (बोध) यही है कि बड़े रूत्बे वाली चीज़ की मिसाल किसी क़द्र वाली चीज़ से और हक़ीर (तुच्छ) चीज़ की अदना चीज़ से दी जाए जैसा कि ऊपर की आयत में हक़ (सच्चाई) की नूर (प्रकाश) से और बातिल (असत्य) की ज़ुलमत (अंधेरे) से मिसाल दी गई.

(16) शरीअत में फ़ासिक़ उस नाफ़रमान को कहते हैं जो बड़े गुनाह करे. “फिस्क़” के तीन दर्जे हैं – एक तग़ाबी, वह यह कि आदमी इत्तिफ़ाक़िया किसी गुनाह का मुर्तकिब (करने वाला) हुआ और उसको बुरा ही जानता रहा, दूसरा इन्हिमाक कि बड़े गुनाहों का आदी हो गया और उनसे बचने की परवाह न रही, तीसरा जुहूद कि हराम को अच्छा जान कर इर्तिकाब करे. इस दर्जे वाला ईमान से मेहरूम हो जाता है, पहले दो दर्जो में जब तक बड़ो में बड़े गुनाह (शिर्क व कुफ़्र) का इर्तिकाब न करे, उस पर मूमिन का इतलाक़ (लागू होना) होता है, यहां “फ़ासिकीन” (बेहुक्म) से वही नाफ़रमान मुराद हैं जो ईमान से बाहर हो गए. क़ुरआने करीम में काफ़िरों पर भी फ़ासिक़ का इत्लाक़ हुआ है: इन्नल मुनाफ़िक़ीना हुमुल फ़ासिक़ून” (सूरए तौबह, आयत 67) यानी बेशक मुनाफिक़ वही पक्के बेहुक्म है. कुछ तफ़सीर करने वालों ने यहां फ़ासिक़ से काफ़िर मुराद लिये कुछ ने मुनाफिक़, कुछ ने यहूद.

(17) इससे वह एहद मुराद है जो अल्लाह तआला ने पिछली किताबो में हूजुर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने की निस्बत फ़रमाया. एक क़ौल यह है कि एहद तीन हैं- पहला एहद वह जो अल्लाह तआला ने तमाम औलादे आदम से लिया कि उसके रब होने का इक़्रार करें. इसका बयान इस आयत में है “व इज़ अख़ज़ा रब्बुका मिम बनी आदमा….” (सूरए अअराफ, आयत 172) यानी और ऐ मेहबूब, याद करो जब तुम्हारे रब ने औलादे आदम की पुश्त से उनकी नस्ल निकाली और उन्हे ख़ुद उन पर गवाह किया, क्या मैं तुम्हारा रब नहीं, सब बोले- क्यों नहीं, हम गवाह हुए. दूसरा एहद नबियों के साथ विशेष है कि रिसालत की तबलीग़ फ़रमाएं और दीन क़ायम करें. इसका बयान आयत “व इज़ अख़ज़ना मिनन नबिय्यीना मीसाक़हुम” (सूरए अलअहज़ाब, आयत सात) में है, यानी और ऐ मेहबूब याद करो जब हमने नबियो से एहद लिया और तुम से और नूह और इब्राहीम और मूसा और ईसा मरयम के बेटे से और हम ने उनसे गाढ़ा एहद लिया. तीसरा एहद उलमा के साथ ख़ास है कि सच्चाई को न छुपाएं. इसका बयान “वइज़ अख़ज़ल्लाहो मीसाक़ल्लजीना उतुल किताब” में है, यानी और याद करो जब अल्लाह ने एहद लिया उनसे जिन्हे किताब अता हुई कि तुम ज़रूर उसे उन लोगो से बयान कर देना और न छुपाना. (सूरए आले इमरान, आयत 187)

(18) रिश्ते और क़राबत के तअल्लुक़ात (क़रीबी संबंध) मुसलबानों की दोस्ती और महब्बत, सारे नबियों को मानना, आसमानी किताबो की तस्दीक, हक़ पर जमा होना, ये वो चीज़े है जिनके मिलाने का हुकम फरमाया गया. उनमें फूट डालना, कुछ को कुछ से नाहक़ अलग करना, तफ़र्क़ो (अलगाव) की बिना डालना हराम करार दिया गया.

(19) तौहीद और नबुव्वत की दलीलों और कुफ़्र और ईमान के बदले के बाद अल्लाह तआला ने अपनी आम और ख़ास नेअमतो का, और क़ुदरत की निशानियों, अजीब बातों और हिकमतो का ज़िक्र फ़रमाया और कुफ़्र की ख़राबी दिल में बिठाने के लिये काफ़िरों को सम्बोधित किया कि तुम किस तरह ख़ुदा का इन्कार करते हो जबकि तुम्हारा अपना हाल उस पर ईमान लाने का तक़ाज़ा करता है कि तुम मुर्दा थे. मुर्दा से बेजान जिस्म मुराद है. हमारे मुहावरे में भी बोलते हैं- ज़मीन मुर्दा हो गई. मुहावरे में भी मौत इस अर्थ में आई. ख़ुद क़ुरआने पाक में इरशाद हुआ “युहयिल अरदा बअदा मौतिहा” (सूरए रूम, आयत 50) यानी हमने ज़मीन को ज़िन्दा किया उसके मरे पीछे. तो मतलब यह है कि तुम बेजान जिस्म थे, अन्सर (तत्व) की सुरत में, फिर ग़िजा की शक्ल में, फिर इख़लात (मिल जाना) की शान में, फिर नुत्फ़े (माद्दे) की हालत में. उसने तुमको जान दी, ज़िन्दा फ़रमाया. फिर उम्र् की मीआद पूरी होने पर तुम्हें मौत देगा. फिर तुम्हें ज़िन्दा करेगा. इससे या क़ब्र की ज़िन्दगी मुराद है जो सवाल के लिये होगी या हश्र की. फिर तुम हिसाब और जज़ा के लिये उसकी तरफ़ लौटाए जाओगे. अपने इस हाल को जानकर तुम्हारा कुफ़्र करना निहायत अजीब है. एक क़ौल मुफ़स्सिरीन का यह भी है कि “कैफ़ा तकफ़ुरूना” (भला तुम कैसे अल्लाह के इन्कारी हो गए) का ख़िताब मूमिनीन से है और मतलब यह है कि तुम किस तरह काफ़िर हो सकते हो इस हाल में कि तुम जिहालत की मौत से मुर्दा थे, अल्लाह तआला ने तुम्हें इल्म और ईमान की ज़िन्दगी अता फ़रमाई, इसके बाद तुम्हारे लिये वही मौत है जो उम्र गुज़रने के बाद सबको आया करती है. उसके बाद तुम्हें वह हक़ीक़ी हमेशगी की ज़िन्दगी अता फ़रमाएगा, फिर तुम उसकी तरफ़ लौटाए जाओगे और वह तुम्हें ऐसा सवाब देगा जो न किसी आंख ने देखा, न किसी कान ने सुना, न किसी दिल ने उसे मेहसूस किया.

(20) यानी खानें, सब्ज़े, जानवर, दरिया, पहाड जो कुछ ज़मीन में है सब अल्लाह तआला ने तुम्हारे दीनी और दुनियावी नफ़े के लिये बनाए. दीनी नफ़ा इस तरह कि ज़मीन के अजायबात देखकर तुम्हें अल्लाह तआला की हिकमत और कुदरत की पहचान हो और दुनियावी मुनाफ़ा यह कि खाओ पियो, आराम करो, अपने कामों में लाओ तो इन नेअमतो के बावुजूद तुम किस तरह कुफ़्र करोगे. कर्ख़ी और अबूबक्र राज़ी वग़ैरह ने “ख़लक़ा लकुम” (तुम्हारे लिये बनाया) को फ़ायदा पहुंचाने वाली चीज़ों की मूल वैघता (मुबाहुल अस्ल) की दलील ठहराया है.

(21) यानी यह सारी चीज़ें पैदा करना और बनाना अल्लाह तआला के उस असीम इल्म की दलील है जो सारी चीज़ों को घेरे हुए है, क्योंकि ऐसी सृष्टि का पैदा करना, उसकी एक-एक चीज़ की जानकारी के बिना मुमकिन नहीं. मरने के बाद ज़िन्दा होना काफ़िर लोग असम्भव मानते थे. इन आयतों में उनकी झूठी मान्यता पर मज़बूत दलील क़ायम फ़रमादी कि जब अल्लाह तआला क़ुदरत वाला (सक्षम) और जानकार है और शरीर के तत्व जमा होने और जीवन की योग्यता भी रखते हैं तो मौत के बाद ज़िन्दगी कैसे असंभव हो सकती है, आसमान और ज़मीन की पैदाइश के बाद अल्लाह तआला ने आसमान में फरिश्तों को और ज़मीन में जिन्नों को सुकूनत दी. जिन्नों ने फ़साद फैलाया तो फ़रिश्तो की एक जमाअत भेजी जिसने उन्हें पहाडों और जज़ीरों में निकाल भगाया.

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