सूरए बक़रह – इकत्तीसवाँ रूकू

सूरए बक़रह – इकत्तीसवाँ रूकू
तुम पर कुछ मुतालिबा (अभियाचना)  नहीं (1)  तुम औरतों को तलाक़ दो जब तक तुम ने उनको हाथ न लगाया हो या कोई मेहर (रक़म,दैन)  निश्चित कर लिया हो, (2)
और उनको कुछ बरतने को दो. (3)
हैसियत वाले पर उसके लायक़ और तंगदस्त पर उसके लायक़, दस्तूर के अनुसार कुछ बरतने की चीज़, ये वाजिब है भलाई वालों पर (4)
और अगर तुमने औरतों को बे छुए तलाक़ दे दी और उनके लिये कुछ मेहर निश्चित कर चुके थे तो जितना ठहरा था उसका आधा अनिवार्य है मगर यह कि औरतें कुछ छोड़ दें (5)
या वह ज़्यादा दे(6)
जिसके हाथ में निकाह की गिरह है (7)
और ऐ मर्दों, तुम्हारा ज़्यादा देना परहेज़गारी से नज़्दीकतर है और आपस में एक दूसरे पर एहसान को भुला न दो बेशक अल्लाह तुम्हारे काम देख रहा है (8)
निगहबानी करो सब नमाज़ों की (9)
और बीच की नमाज़ की (10)
और खड़े हो अल्लाह के हुज़ूर अदब से (11)
फिर अगर डर में हो तो प्यादा या सवार जैसे बन पड़े, फिर जब इत्मीनान से हो तो अल्लाह की याद करो जैसा उसने सिखाया जो तुम न जानते थे और जो तुम में मरें और बीवियां छोड़ जाएं वो अपनी औरतों के लिये वसीयत कर जाएं (12)
साल भर तक नान नफ़क़ा देने की बे निकाले (13)
फिर अगर वो ख़ुद निकल जाएं तो तुम पर उसका कोई हिसाब नहीं जो उन्होंने अपने मामले में मुनासिब तौर पर किया और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है और तलाक वालियों के लिये भी मुनासिब तौर पर नान नफ़क़ा है ये वाजिब है परहेज़गारों पर अल्लाह यूं ही बयान करता है तुम्हारे लिये अपनी आयतें कि कहीं तुम्हें समझ हो (242)

तफ़सीर :
सूरए बक़रह – इकत्तीसवाँ रूकू
(1) मेहर का.

(2) यह आयत एक अन्सारी के बारे में नाज़िल हुई जिन्हों ने बनी हनीफ़ा क़बीले की एक औरत से निकाह किया और कोई मेहर निश्चित न किया. फिर हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दी. इससे मालूम हुआ कि जिस औरत का मेहर निश्चित न किया हो, अगर उसको छूने से पहले तलाक़ दे दी तो मेहर की अदायगी लाज़िम नहीं. हाथ लगाने या छूने से हम बिस्तरी मुराद है, और ख़िलवते सहीहा यानी भरपूर तनहाई उसके हुक्म में है. यह भी मालूम हुआ कि मेहर का ज़िक्र किये बिना भी निकाह दुरूस्त है, मगर उस सूरत में निकाह के बाद मेहर निश्चित करना होगा. अगर न किया तो हमबिस्तरी के बाद मेहरे मिस्ल लाज़िम हो जाएगा, यानी वो मेहर जो उसके ख़ानदान में दूसरों का बंधता चला आया है.

(3) तीन कपड़ों का एक जोड़ा.

(4) जिस औरत का मेहर मुक़र्रर न किया हो, उसको दुख़ूल यानी संभोग से पहले तलाक़ दी हो उसको तो जोड़ा देना वाजिब है. और इसके सिवा हर तलाक़ वाली औरत के लिये मुस्तहब है. (मदारिक)

(5) अपने इस आधे में से.

(6) आधे से जो इस सूरत में वाजिब है.

(7) यानी शौहर.

(8) इसमें सदव्यवहार और महब्बत और नर्मी से पेश आने की तरग़ीब है.

(9) यानी पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ों को उनके औक़ात पर भरपूर संस्कारों और शर्तों के साथ अदा करते रहो. इसमें पाँचों नमाज़ों के फ़र्ज़ होने का बयान है. और औलाद और बीवी के मसाइल और अहकाम के बीच नमाज़ का ज़िक्र फ़रमाना इस नतीजे पर पहुंचाता है कि उनको नमाज़ की अदायगी से ग़ाफ़िल न होने दो और नमाज़ की पाबन्दी से दिल की सफ़ाई होती है, जिसके बिना मामलों के दुरूस्त होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

(10) हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा और अक्सरो बेशतर सहाबा का मज़हब यह है कि इससे अस्त्र की नमाज़ मुराद है. और हदीसों में भी प्रमाण मिलना है.

(11) इससे नमाज़ के अन्दर क़याम का फ़र्ज़ होना साबित हुआ.

(12) अपने रिश्तेदारों को.

(13) इस्लाम की शुरूआत में विधवा की इद्दत एक साल की थी और पूरे एक साल व शौहर के यहाँ रहकर रोटी कपड़ा पाने की अधिकारी थी. फिर एक साल की इद्दत तो “यतरब्बसना बि अन्फ़ुसेहिन्ना अरबअता अशहुरिन व अशरा” (यानी चार माह दस दिन अपने आप को रोके रहें – सूरए बक़रह – आयत 234) से स्थगित हुई, जिसमें विधवा की इद्दत चार माह दस दिन निश्चित फ़रमा दी गई और साल भर का नान नफ़्क़ा मीरास की आयत से मन्सूख़ यानी रद्द हुआ जिसमें औरत का हिस्सा शौहर के छोड़े हुए माल से मुक़र्रर किया गया. लिहाज़ा अब वसिय्यत का हुक्म बाक़ी न रहा. हिकमत इसकी यह है कि अरब के लोग अपने पूर्वज की विधवा का निकलना या ग़ैर से निकाह करना बिल्कुल गवारा नहीं करते थे,  इसको बड़ी बेशर्मी समझते थे. इसलिये अगर एक दम चार माह दस रोज़ की इद्दत मुक़र्रर की जाती तो यह उन पर बहुत भारी होता. इसी लिये धीरे धीरे उन्हें राह पर लाया गया.

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सूरए बक़रह – बत्तीसवाँ रूकू

सूरए बक़रह – बत्तीसवाँ रूकू

ऐ  मेहबूब क्या तुमने न देखा था उन्हें जो अपने घरों से निकले और वो हज़ारों थे मौत के डर से तो अल्लाह ने उनसे फ़रमाया मर जाओ फिर उन्हें ज़िन्दा फ़रमाया बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल (कृपा) करने वाला है मगर अकसर लोग नाशुक्रे हैं  (1)
और लड़ों अल्लाह की राह में (2)
और जान लो कि अल्लाह सुनता जानता है , है कोई जो अल्लाह को क़र्ज़ हसन दे   (3)
तो अल्लाह उसके लिये बहुत गुना बढ़ा दे  और अल्लाह तंगी और कुशायश (वृद्धि)  करता है(4)
और तुम्हें उसी की तरफ़ फिर जाना  ऐ मेहबूब क्या तुमने न देखा बनी इस्त्राईल के एक दल को जो मूसा के बाद हुआ   (5)
जब अपने एक पैगम्बर से बोले हमारे लिये खड़ा कर दो एक बादशाह कि हम ख़ुदा की राह में लड़ें. नबी ने फ़रमाया क्या तुम्हारे अन्दाज़ ऐसे हैं कि तुम पर जिहाद फ़र्ज़  किया जाए तो फिर न करो, बोले हमें क्या हुआ कि हम अल्लाह की राह में न लड़ें हालांकि हम निकाले गए हैं अपने वतन  और अपनी  औलाद से  (6)
तो फिर जब उनपर जिहाद फर्ज़ किया गया, मुंह फेर गए मगर उनमें के थोड़े (7)
और अल्लाह ख़ूब जानता है ज़ालिमों को (246)

तफ़सीर :
सूरए बक़रह – बत्तीसवाँ रूकू

(1) बनी इस्त्राईल की एक जमाअत थी जिसकी बस्तियों में प्लेग हुआ तो वो मौत के डर से अपनी बस्तियाँ छोड़ भागे और जंगल में जा पड़े. अल्लाह का हुक्म यूं हुआ कि सब वहीं मर गए. कुछ अर्से बाद हज़रत हिज़क़ील अलैहिस्सलाम की दुआ से उन्हें अल्लाह तआला ने ज़िन्दा फ़रमाया और वो मुद्दतों ज़िन्दा रहे. इस घटना से मालूम होता है कि आदमी मौत के डर से भागकर जान नहीं बचा सकता तो भागना बेकार है. जो मौत निश्चित है, वह ज़रूर पहुंचेगी. बन्दे को चाहिये कि अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहे. मुजाहिदों को समझना चाहिये कि जिहाद से बैठ रहना मौत को रोक नहीं सकता. इसलिये दिल मज़बूत रखना चाहिये.

(2) और मौत से न भागे, जैसा बनी इस्त्राईल भागे थे, क्योंकि मौत से भागना काम नहीं आता.

(3) यानी ख़ुदा की राह में महब्बत के साथ ख़र्च करने को क़र्ज़ से ताबीर फ़रमाया. यह बड़ी ही दया और मेहरबानी है. बन्दा उसका बनाया हुआ और बन्दे का माल उसी का दिया हुआ, हक़ीक़ी मालिक वह और बन्दा उसकी अता से नाम भर का मालिक है. मगर क़र्ज़ से ताबीर फ़रमाने में यह बताना मजूंर है कि जिस तरह क़र्ज़ देने वाला इत्मीनान रखता है कि उसका माल बर्बाद नहीं हुआ, वह उसकी वापसी का मुस्तहिक है, ऐसा ही खुदा की राह में ख़र्च करने वाले को इत्मीनान रखना चाहिये कि वह इस ख़र्च करने का बदला और इनाम ज़रूर ज़रूर पाएगा और बहुत ज़्यादा पाएगा.

(4) जिसके लिये चाहे रोज़ी तंग करे, जिसके लिये चाहे खोल दे. बन्द करना और खोल देना रोज़ी का उसके क़ब्ज़े में है, और वह अपनी राह में ख़र्च करने वाले से विस्तार या वुसअत का वादा करता है.

(5) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद जब बनी इस्त्राईल की हालत खराब हुई और उन्होंने अल्लाह का एहद भुला दिया. मूर्ति पूजा में मशग़ूल हुए, सरकशी और कुकर्म चरम सीमा पर पहुंचे, उन पर जालूत की क़ौम छा गई जिसको इमालिक़ा कहते हैं. जालूत अमलीक़ बिन आस की औलाद से एक बहुत ही अत्याचारी बादशाह था. उसकी क़ौम के लोग मिस्त्र और फ़लस्तीन के बीच रोम सागर के तट पर रहते थे. उन्होंने बनी इस्त्राईल के शहर छीन लिये, आदमी गिरफ़तार किये, तरह तरह की सख्तियाँ कीं. उस ज़माने में कोई नबी बनी इस्त्राईल में मौजूद न थे. ख़ानदाने नबुव्वत से सिर्फ़ एक बीबी रही थीं जो गर्भ से थीं. उनके बेटा हुआ. उनका नाम शमवील रखा. जब वो बड़े हुए तो उन्हें तौरात का इल्म हासिल करने के लिये बैतुल मक़दिस में एक बूढ़े विद्वान के हवाले किया गया. वह आपको बहुत चाहते और अपना बेटा कहते. जब आप जवान हुए तो एक रात आप उस आलिम के पास आराम कर रहे थे कि हज़रत जिब्रीले अमीन ने उसी आलिम की आवाज़ में “या शमवील” कहकर पुकारा. आप आलिम के पास गए और फ़रमाया कि आपने मुझे पुकारा है. आलिम ने यह सोचकर कि इन्कार करने से कहीं आप डर न जाएं, यह कह दिया, बेटे तुम सो जाओ. दोबारा फिर हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने उसी तरह पुकारा, और हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम आलिम के पास गए. आलिम ने कहा ऐ बेटे, अब अगर मैं तुम्हें फिर पुकारूं तो तुम जवाब न देना. तीसरी बार हज़रत जिब्रील अमीन अलैहिस्सलाम ज़ाहिर हो गए और उन्होंने बशारत दी कि अल्लाह तआला ने आपको नबी बनाया, आप अपनी क़ौम की तरफ़ जाइये और अपने रब के आदेश पहुंचाइये. जब आप अपनी क़ौम की तरफ़ तशरीफ़ लाए, उन्होंने झुटलाया और कहा, आप इतनी जल्दी नबी बन गए. अच्छा अगर आप नबी हैं तो हमारे लिये एक बादशाह क़ायम कीजिये.  (ख़ाज़िन वग़ैरह)

(6) कि क़ौमे जालूत ने हमारी क़ौम के लोगों को उनके वतन से निकाला, उनकी औलाद को क़त्ल किया. चार सौ चालीस शाही ख़ानदान के फ़रज़न्दों को गिरफ़तार किया. जब हालत यहाँ तक पहुंच चुकी तो अब हमें जिहाद से क्या चीज़ रोक सकती है. तब नबी ने अल्लाह से दुआ की जिसकी बदौलत अल्लाह तआला ने उनकी दरख़ास्त क़ुबूल फ़रमाई और उनके लिये एक बादशाह मुक़र्रर किया और जिहाद फ़र्ज़ फ़रमाया. (ख़ाज़िन)

(7) जिनकी संख्या बद्र वालों के बराबर यानी तीन सौ तेरह थी.

(8) तालूत, बिनयामीन बिन हज़रते याक़ूब अलैहिस्सलाम की औलाद से हैं. आपका नाम क़द लम्बा होने की वजह से तालूत है. हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला की तरफ़ से एक लाठी मिली थी और बताया गया था कि जो व्यक्ति तुम्हारी क़ौम का बादशाह होगा उसका क़द इस लाठी के बराबर होगा. आपने उस लाठी से तालूल का क़द नाप कर फ़रमाया कि मैं तुम को अल्लाह के हुक्म से बनी इस्त्राईल का बादशाह मुक़र्रर करता हूँ और बनी इस्त्राईल से फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने तालूत को तुम्हारा बादशाह बना कर भेजा है. (ख़ाज़िन व जुमल)
(9) बनी इस्त्राईल के सरदारों ने अपने नबी हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम से कहा कि नबुव्वत तो लावा बिन याक़ूब अलैहिस्सलाम की औलाद में चली आती है, और सल्तनत यहूद बिन याक़ूब की औलाद में, और तालूत इन दोनों ख़ानदानों में से नहीं है, तो बादशाह कैसे हो सकते है.
(10) वो ग़रीब व्यक्ति हैं. बादशाह को माल वाला होना चाहिये.
(11) यानी सल्तनत विरासत नहीं कि किसी नस्ल व ख़ानदान के साथ विशेष हो. यह केवल अल्लाह के करम पर है. इसमें शियों का रद है जिनका अक़ीदा है कि इमामत विरासत है.
(12) यानी नस्ल व दौलत पर सल्तनत का अधिकार नहीं. इल्म व क़ुव्वत सल्तनत के लिये बड़े मददगार हैं और तालूत उस ज़माने में सारे बनी इस्त्राईल में ज़्यादा इल्म रखते थे और सबसे ज़्यादा मज़बूत जिस्म वाले और ताक़तवर थे.
(13) इसमें विरासत को कुछ दख़्ल नहीं.
(14) जिसे चाहे ग़नी यानी मालदार कर दे और माल में विस्तार फ़रमा दे. इसके बाद बनी इस्त्राईल ने हज़रत शमवील अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया कि अगर अल्लाह ने उन्हें सल्तनत के लिये मुक़र्रर किया है तो इसकी निशानी क्या है.
(ख़ाज़िन व मदारिक)
(15) यह ताबूत शमशाद की लकड़ी का एक सोने से जड़ाऊ सन्दूक़ था जिसकी लम्बाई तीन हाथ की और चौड़ाई दो हाथ की थी. इसको अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पर उतारा था. इसमें सारे नबियों की तस्वीरें थीं उनके रहने की जगहें और मकानों की तस्वीरे थीं और आख़िर में नबियों के सरदार मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की और हुज़ूर के मुक़द्दस मकान की तस्वीर एक सुर्ख़ याक़ूत में थी कि हुज़ूर नमाज़ की हालत में खड़े हैं और आपके चारों तरफ़ सहाबए किराम. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने इन सारी तस्वीरों को देखा. यह सन्दूक़ विरासत में चलता हुआ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तक पहुंचा. आप इसमें तौरात भी रखते थे और अपना ख़ास सामान भी. चुनान्वे इस ताबूत में तौरात की तख़्तियों के टुकडे थी थे, और हज़रत मूसा की लाठी और आपके कपड़े, जूते और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम की पगड़ी और उनकी लाठी और थोड़ा सा मन्न, जो बनी इस्त्राईल पर उतरता था. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जंग के अवसरों पर इस सन्दूक़ को आगे रखते थे, इससे बनी इस्त्राईल के दिलों को तस्कीन रहती थीं. आपके बाद यह ताबूत बनी इस्त्राईल में लगातार विरासत में चला आया. जब उन्हें कोई मुश्किल पेश आती, वो इस ताबूत को सामने रखकर दुआएं करते और कामयाब होते. दुश्मनों के मुक़ाबले में इसकी बरकत से फ़तह पाते. जब बनी इस्त्राईल की हालत ख़राब हुई और उनके कुकर्म बहुत बढ़ गए तो अल्लाह तआला ने उन पर अमालिक़ा को मुसल्लत किया तो वो उनसे ताबूत छीन ले गए और इसको अपवित्र और गन्दे स्थान पर रखा और इसकी बेहुरमती यानी निरादर किया और इन गुस्ताख़ियों की वजह से वो तरह तरह की मुसीबतों में गिरफ़तार हुए. उनकी पाँच बस्तियाँ तबाह हो गईं और उन्हें यक़ीन हो गया कि ताबूत के निरादर से उन पर बर्बादी और मौत आई है. तो उन्होंने एक बेल गाड़ी पर ताबूत रखकर बैलों को हाँक दिया और फ़रिश्ते उसको बनी इस्त्राईल के सामने तालूत के पास लाए और इस ताबूत का आना बनी इस्त्राईल के लिये तालूत की बादशाही की निशानी मुक़र्रर हुआ. बनी इस्त्राईल यह देखकर उसकी बादशाही पर राज़ी हो गए और फ़ौरन जिहाद के लिये तैयार हो गए क्योंकि ताबूत पाकर उन्हें अपनी फ़तह का यक़ीन हो गया. तालूत ने बनी इस्त्राईल में से सत्तर हज़ार जवान चुने जिनमें हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम भी थे. (जलालैन व जुमल व ख़ाज़िन व मदारिक वग़ैरह) इससे मालूम हुआ कि बुज़ुर्गों की चीज़ों का आदर और एहतिराम लाज़िम है. उनकी बरकत से दुआएं क़ूबूल होती हैं और हाजतें पूरी होती हैं और तबर्रूकात का निरादर गुमराहों का तरीक़ा और तबाही का कारण है. ताबूत में नबियों की जो तस्वीरें थीं वो किसी आदमी की बनाई हुई न थीं, अल्लाह की तरफ़ से आई थीं.

सूरए बक़रह – तैंतीसवाँ रूकू

सूरए बक़रह – तैंतीसवाँ रूकू
फिर जब तालूत लश्करों को लेकर शहर से जुदा हुआ (1)
बोला बेशक अल्लाह तुम्हें एक नहर से आज़माने वाला है तो जो उसका पानी पिये वह मेरा नहीं और जो न पिये वह मेरा है मगर वह जो एक चुल्लू अपने हाथ से ले ले (2)
सब ने उससे पिया मगर थोड़ों ने (3)
फिर जब तालूत और उसके साथ के मुसलमान नहर के पार गए बोले हम में आज ताक़त नहीं जालूत और उसके लश्करों को बोले वो जिन्हें अल्लाह से मिलने का यक़ीन था कि अकसर कम जमाअत ग़ालिब आई है ज़्यादा गिरोह पर अल्लाह के हुक्म से और अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है  (4)
फिर जब सामने आए जालूत और उसके लश्करों के, अर्ज़ की ऐ रब हमारे हम पर सब्र उंडेल और हमारे पाँव जमे रख काफ़िर लोगों पर हमारी मदद कर  तो उन्होंने उनको भगा दिया अल्लाह के हुक्म से और क़त्ल किया दाऊद ने जालूत को (5)
और अल्लाह ने उसे सल्तनत और हिकमत (बोध) (6)
अता फ़रमाई और उसे जो चाहा सिखाया  (7)
और अगर अल्लाह लोगों में कुछ से कुछ को दफ़ा (निवारण)  न करे (8)
तो ज़रूर तबाह हो जाए मगर अल्लाह सारे जहान पर फ़ज़्ल (कृपा) करने वाला है ये अल्लाह की आयतें हैं कि हम ऐ मेहबूब तुमपर ठीक ठीक पढ़ते हैं और तुम बेशक रसूलों में हो (9)(252)

तफ़सीर :
सूरए बक़रह – तैंतीसवाँ रूकू
(1) यानी बैतुल मक़दिस से दुश्मन की तरफ़ रवाना हुआ. वह वक़्त निहायत सख़्त गर्मी का था. लश्करियों ने तालूत से इसकी शिकायत की और पानी की मांग की.

(2) यह इम्तिहान मुक़र्रर फ़रमाया गया था कि सख़्त प्यास के वक़्त जो फ़रमाँबरदारी पर क़ायम रहा वह आगे भी क़ायम रहेगा और सख़्तियों का मुक़ाबला कर सकेगा और जो इस वक़्त अपनी इच्छा के दबाव में आए और नाफ़रमानी करे वह आगे की सख़्तियों को क्या बर्दाश्त करेगा.

(3) जिनकी तादाद तीन सौ तेरह थी, उन्होंने सब्र किया और एक चूल्लू उनके और उनके जानवरों के लिये काफ़ी हो गया और उनके दिल और ईमान को क़ुव्वत हुई और नहर से सलामत गुज़र गए और जिन्होंने ख़ूब पिया था उनके होंट काले हो गए, प्यास और बढ़ गई और हिम्मत टूट गई.

(4) उनकी मदद फ़रमाता है और उसी की मदद काम आती है.

(5) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के वालिद ऐशा तालूत के लश्कर में थे और उनके साथ उनके सारे बेटे भी. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम उन सब में सबसे छोटे थे, बीमार थे, रंग पीला पड़ा हुआ था, बकरियाँ चराते थे. जब जालूत ने बनी इस्त्राईल को मुक़ाबले के लिये ललकारा, वो उसकी जसामत देख कर घबराए, क्योंकि वह लम्बा चौड़ा ताक़तवार था. तालूत ने अपने लश्कर में ऐलान किया कि जो शख़्स जालूत को क़त्ल करे, मैं अपनी बेटी उसके निकाह में दूंगा और आधी जायदाद उसको दूंगा. मगर किसी ने उसका जवाब न दिया तो तालूत ने अपने नबी शमवील अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया कि अल्लाह के सामने दुआ करें. आपने दुआ कि तो बताया गया कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम जालूत को क़त्ल करेंगे. तालूत ने आपसे अर्ज़ की कि अगर आप जालूत को क़त्ल करें तो मैं अपनी लड़की आपके निकाह में दूँ और आधी जायदाद पेश करूँ. आपने क़ुबूल फ़रमाया और जालूत की तरफ़ रवाना हो गए. मुक़ाबले की सफ़ क़ायम हुई. हज़रत दाऊद  अलैहिस्सलाम अपने मुबारक हाथों में ग़ुलेल या गोफन लेकर सामने आए. जालूत के दिल में आपको देखकर दहशत पैदा हुई मगर उसने बड़े घमण्ड की बातें कीं और आपको अपनी ताक़त के रोब में लाना चाहा. आपने गोफन में पत्थर रखकर मारा वह उसकी पेशानी को तोड़कर पीछे से निकल गया और जालूत गिर कर मर गया. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने उसको लाकर तालूत के सामने डाल दिया. सारे बनी इस्त्राईल बहुत ख़ुश हुए और तालूत ने वादे के मुताबिक़ आधी जायदाद दी और अपनी बेटी का आपके साथ निकाह कर दिया. सारे मुल्क पर हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की सल्तनत हुई. (जुमल वग़ैरह)

(6) हिकमत से नबुव्वत मुराद है.

(7) जैसे कि ज़िरह बनाना और जानवरों की बोली समझना.

(8) यानी अल्लाह तआला नेकों के सदक़े में दूसरों की बलाएं भी दूर फ़रमाता है. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो तआला अन्हो से रिवायत है कि रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला एक नेक मुसलमान की बरकत से उसके पड़ोस के सौ घर वालों की बला दूर करता है. सुब्हानल्लाह ! नेकों के साथ रहना भी फ़ायदा पहुंचाता है. (ख़ाज़िन)

(9) ये हज़रात जिनका ज़िक्र पिछली आयतों में और ख़ास कर आयत “इन्नका लमिनल मुरसलीन” (और तुम बेशक रसूलों में हो) में फ़रमाया गया.

पारा दो समाप्त
तीसरा पारा – तिल्कर रूसुल
तैंतीसवाँ रूकू (जारी)

(10) इससे मालूम हुआ कि नबियों के दर्जे अलग अलग हैं. कुछ हज़रात से कुछ अफ़ज़ल हैं. अगरचे नबुव्वत में कोई फ़र्क़ नहीं, नबुव्वत की ख़ूबी में सब शरीक हैं, मगर अपनी अपनी विशेषताओं, गुणों और कमाल में अलग अलग दर्जे हैं. यही आयत का मज़मून है और इसी पर सारी उम्मत की सहमति है. (ख़ाज़िन व जुमल)

(11) यानी बिला वास्ता या बिना माध्यम के, जैसे कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को तूर पहाड़ पर संबोधित किया और नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मेराज में. (जुमल).

(12) वह हुज़ूर पुरनूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं कि आपको कई दर्जों के साथ सारे नबियों पर अफ़ज़ल किया. इस पर सारी उम्मत की सहमति है. और कई हदीसों से साबित है. आयत में हुज़ूर के इस बलन्द दर्जे का बयान फ़रमाया गया और नामे मुबारक की तसरीह यानी विवरण न किया गया. इससे भी हुज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम की शान की बड़ाई मक़ूसद है, कि हुज़ूर की मुबारक ज़ात की यह शान है कि जब सारे नबियों पर फ़ज़ीलत या बुजुर्गी का बयान किया जाए तो आपकी पाक ज़ात के सिवा किसी और का ख़याल ही न आए और कोई शक न पैदा हो सके. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वो विशेषताएं और गुण जिनमें आप सारे नबियों से फ़ायक़ और अफ़ज़ल हैं और आपका कोई शरीक नहीं, बैशुमार हैं कि क़ुरआने पाक में यह इरशाद हुआ “दर्जों बलन्द किया” इन दर्जों की कोई गिनती क़ुरआन शरीफ़ में ज़िक्र नहीं फरमाई, तो अब कौन हद लगा सकता है. इन बेशुमार विशेषताओं में से कुछ का इजमाली और संक्षिप्त बयान यह है कि आपकी रिसालत आम है, तमाम सृष्टि आपकी उम्मत है. अल्लाह तआला ने फ़रमाया “वमा अरसलनाका इल्ला काफ्फ़तल लिन्नासे बशीरौं व नज़ीरा” (यानी ऐ मेहबूब हमने तुमको न भेजा मगर ऐसी रिसालत से जो तमाम आदमियों को घेरने वाली है, खुशख़बरी देता और डर सुनाता) (34 :28). दूसरी आयत में फ़रमाया : “लियकूना लिलआलमीना नज़ीरा” (यानी जो सारे जहान को डर सुनाने वाला हो) (25:1). मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में इरशाद हुआ “उरसिलतो इलल ख़लाइक़े काफ्फ़तन” (और आप पर नबुव्वत ख़त्म की गई). क़ुरआने पाक में आपको ख़ातिमुन्नबीय्यीन फ़रमाया हदीस शरीफ़ में इरशाद हुआ “ख़ुतिमा बियन नबिय्यूना”. आयतों और मोजिज़ात में आपको तमाम नबियों पर अफ़ज़ल फ़रमाया गया. आपकी उम्मत को तमाम उम्मतों पर अफ़ज़ल किया गया. शफ़ाअते कुबरा आपको अता फ़रमाई गई. मेराज में ख़ास क़ुर्ब आपको मिला. इल्मी और अमली कमालात में आपको सबसे ऊंचा किया और इसके अलावा बे इन्तिहा विशेषताएं आपको अता हुई. (मदारिक, जुमल, ख़ाज़िन, बैज़ावी वग़ैरह).

(13) जैसे मुर्दे को ज़िन्दा करना, बीमारों को तन्दुरूस्त करना, मिट्टी से चिड़ियाँ बनाना, ग़ैब की ख़बरें देना वग़ैरह.

(14) यानी जिब्रील अलैहिस्सलाम से जो हमेशा आपके साथ रहते थे.

(15) यानी नबियों के चमत्कार.

(16) यानी पिछले नबियों की उम्मतें भी ईमान और कुफ़्र में विभिन्न रहीं, यह न हुआ कि तमाम उम्मत मुतीअ हो जाती.

(17) उसके मुल्क में उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं हो सकता और यही ख़ुदा की शान है.

सूरए बक़रह – चौंतीसवाँ रूकू

सूरए बक़रह – चौंतीसवाँ रूकू
ऐ ईमान वालो अल्लाह की राह में हमारे दिये में से ख़र्च करो वह दिन आने से पहले जिसमें न ख़रीद फ़रोख़्त (क्रय.विक्रय) है न काफ़िरों के लिये दोस्ती और न शफ़ाअत (सिफ़ारिश) और काफ़िर ख़ुद ही ज़ालिम हैं (1)
अल्लाह है जिसके सिवा कोई मअबूद नहीं (2)
वह आप ज़िन्दा, औरों का क़ायम रखने वाला (3)
उसे न ऊंघ आए न नींद (4)
उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में (5)
वह कौन है जो उसके यहां सिफ़रिश करे बे उसके हुक्म के  (6)
जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे (7)
और वो नहीं पाते उसके इल्म में से मगर जितना वह चाहे (8)
उसकी कुर्सी में समाए हुए है आसमान और ज़मीन (9)
और उसे भारी नहीं उनकी निगहबानी और वही है बलन्द बड़ाई वाला  (10)
कुछ ज़बरदस्ती नहीं (11)
दीन में बेशक ख़ूब जुदा हो गई है नेक राह गुमराही से तो जो शैतान को न माने और अल्लाह पर ईमान लाए (12)
उसने बड़ी मज़बूत गिरह थामी जिसे कभी खुलना नहीं और अल्लाह सुनता जानता है अल्लाह वाली है मुसलमानों का उन्हें अंधेरियों से (13)
नूर की तरफ़ निकालता है और काफ़िरों के हिमायती शैतान हैं वो उन्हें नूर से अंधेरियों की तरफ़ निकालते हैं यही लोग दोज़ख़ वाले हैं, उन्हें हमेशा उसमें रहना (257)

तफ़सीर :
सूरए बक़रह – चौंतीसवाँ रूकू
(1) कि उन्होंने दुनिया की ज़िन्दगानी में हाजत के दिन यानी क़यामत के लिये कुछ न किया.

(2) इसमें अल्लाह तआला की उलूहियत और उसके एक होने का बयान है. इस आयत को आयतल कुर्सी कहते हैं. हदीसों में इसकी बहुत सी फ़ज़ीलत आई है.

(3) यानी वाजिबुल वुजूद और आलम का ईजाद करने वाला और तदबीर फ़रमाने वाला.

(4) क्योंकि यह दोष है और वह दोष और ऐब से पाक है.

(5) इसमें उसकी मालिकियत और हुक्म के लागू करने की शक्ति का बयान है, और बहुत ही सुंदर अन्दाज़ में शिर्क का रद है कि जब सारी दुनिया उसकी मिल्क है तो शरीक कौन हो सकता है, मुश्रिक या तो सितारों को पूजते हैं जो आसमानों में हैं या दरियाओं, पहाड़ों, पत्थरों और दरख़्तों और जानवरों वग़ैरह को कि जो ज़मीन में हैं. जब आसमान और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की मिल्क है तो ये कैसे पूजने के क़ाबिल हो सकते हैं.

(6) इसमें मुश्रिकों का रद है जिनका गुमान था कि मुर्तियाँ सिफ़ारिश करेंगी. उन्हें बता दिया गया कि काफ़िरों के लिये सिफ़ारिश या शफ़ाअत नहीं. अल्लाह के दरबार से जिन्हें इसकी इजाज़त मिली है उनके सिवा कोई शफ़ाअत नहीं कर सकता और इजाज़त वाले नबी, फरिश्ते और ईमान वाले हैं.

(7) यानी गुज़रे हुए या आगे आने वाले दुनिया और आख़िरत के काम.

(8) और जिनको वह मुत्तला फ़रमाए, वो नबी और रसूल हैं जिनको ग़ैब पर सूचित फ़रमाना, उनकी नबुव्वत का प्रमाण है. दूसरी आयत में इरशाद फ़रमाया “ला युज़हिरो अला ग़ैबिही अहदन इल्ला मनिर तदा मिर रसूलिन” (यानी अपने ग़ैब पर किसी को मुत्तला नहीं करता सिवाय अपने पसन्दीदा रसूलों के. (72 : 26) (ख़ाज़िन).

(9) इसमें उसकी शान की अज़मत का इज़हार है, और कुर्सी से या इल्म और क्षमता मुराद है या अर्श या वह जो अर्श के नीचे और सातों आसमानों के ऊपर है. और मुमकिन है कि यह वही हो जो “फ़लकुल बुरूज” के नाम से मशहूर है.

(10) इस आयत में इलाहिय्यात के ऊंचे मसायल का बयान है और इससे साबित है कि अल्लाह तआला मौजूद है. अपने अल्लाह होने में एक है, हयात यानी ज़िन्दगी के साथ मुत्तसिफ़ है. वाजिबुल वुजूद, अपने मासिवा का मूजिद है. तग़ैय्युरो हुलूल से मुनज़्ज़ा और तबदीली व ख़राबी से पाक है, न किसी को उससे मुशाबिहत, न मख़लूक़ के अवारिज़ को उस तक रसाई, मुल्को मलकूत का मालिक, उसूलो फरअ का मुब्देअ, क़वी गिरफ़्त वाला, जिसके हुज़ूर सिवाए माज़ून के कोई शफ़ाअत नहीं कर सकता. सारी चीज़ों का जानने वाला, ज़ाहिर का भी और छुपी का भी, कुल का भी, और कुछ का भी. उसका मुल्क वसीअ और क़ुदरत लामेहदूद, समझ और सोच से ऊपर.

(11) अल्लाह की सिफ़ात के बाद “ला इकराहा फ़िद दीन” (कुछ ज़बरदस्ती नहीं दीन में) फ़रमाने में यह राज़ है कि अब समझ वाले के लिये सच्चाई क़ुबूल करने में हिचकिचाहट की कोई वजह बाक़ी न रही.

(12) इसमें इशारा है कि काफ़िर के लिये पहले अपने कुफ़्र से तौबह और बेज़ारी ज़रूरी है, उसके बाद ईमान लाना सही होता है.

(13) कुफ़्र और गुमराही की रौशनी, ईमान और हिदायत की रौशना और……….

सूरए बक़रह – पैंतीसवाँ रूकू

सूरए बक़रह – पैंतीसवाँ रूकू
ऐ मेहबूब क्या तुमने न देखा था उसे जो इब्राहिम से झगड़ा उसके रब के बारे में इस पर(1)
कि अल्लाह ने उसे बादशाही दी(2)
जब कि इब्राहीम ने कहा कि मेरा रब वह है कि जिलाता और मारता है (3)
बोला मै जिलाता और मारता हूँ (4)
इब्राहीम ने फ़रमाया तो अल्लाह सूरज को लाता है पूरब से, तू उसको पश्चिम से ले आ(5)
तो होश उड़ गए काफ़िर के और अल्लाह राह नहीं दिखाता ज़ालिमों को या उसकी तरह जो गुज़रा एक बस्ती पर (6)
और वह ढई पड़ी थी अपनी छतों पर (7)
बोला इसे कैसे जिलाएगा अल्लाह इसकी मौत के बाद, तो अल्लाह ने उसे मुर्दा रखा सौ बरस फिर ज़िन्दा कर दिया, फ़रमाया तू यहां कितना ठहरा, अर्ज़ की दिन भर ठहरा हूंगा या कुछ कम, फ़रमाया नहीं, तुझे सौ बरस गुज़र गए और अपने खाने और पानी को देख कि अब तक बू न लाया और गधे को देख कि जिसकी हड्डियां तक सलामत न रहीं, और यह इसलिये कि तुझे हम लोगों के वास्ते निशानी करें, और उन हड्डियों को देखकर कैसे हम उन्हें उठान देते फिर उन्हें गोश्त पहनाते हैं. जब यह मामला उसपर ज़ाहिर हो गया बोला मैं ख़ूब जानता हूँ कि अल्लाह सब कुछ कर सकता है और जब अर्ज़ की इब्राहीम ने (8)
ऐ रब मेरे मुझे दिखादे तू किस तरह मुर्दें जिलाएगा, फ़रमाया क्या तुझे यक़ीन नहीं(9)
अर्ज़ की यक़ीन क्यों नहीं मगर यह चाहता हूँ कि मेरे दिल को क़रार आजाए (10)
फ़रमाया तो अच्छा चार परिन्दे लेकर अपने साथ हिला ले (11)
फिर उनका एक एक टुकड़ा हर पहाड़ पर रख दे फिर उन्हें बुला वो तेरे पास चले आएंगे पाँव से दौड़ते (12)
जान रख कि अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है (260)

तफ़सीर : सूरए बक़रह – पैंतीसवाँ रूकू

(1) घमण्ड और बड़ाई पर.

(2) और तमाम ज़मीन की सल्तनत अता फ़रमाई, इस पर उसने शुक्र और फ़रमाँबरदारी के बजाय घमण्ड किया और ख़ुदा होने का दावा करने लगा, उसका नाम नमरूद बिन कनआन था. सब से पहले सर पर ताज रखने वाला यही है. जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उसको ख़ुदा परस्ती की दावत दी, चाहे आग में डाले जाने से पहले या इसके बाद, तो वह कहने लगा कि तुम्हारा रब कौन है जिसकी तरफ़ तुम हमें बुलाते हो.

(3) यानी जिस्मों में मौत और ज़िन्दगी पैदा करता है, एक ख़ुदा को न पहचानने वाले के लिये यह बेहतरीन हिदायत थी, और इसमें बताया गया था कि ख़ुद तेरी ज़िन्दगी उसके अस्तित्व की गवाह है कि तू एक बेजान नुत्फ़ा था, उसने उसे इन्सानी सूरत दी और ज़िन्दगी प्रदान की. वह रब है और ज़िन्दगी के बाद फिर ज़िन्दा जिस्मों को मौत देता है. वो परवर्दिगार है, उसकी क़ुदरत की गवाही ख़ुद तेरी अपनी मौत और ज़िन्दगी में मौजूद है. उसके अस्तित्व से बेख़बर रहना अत्यन्त अज्ञानता और सख़्त बद-नसीबी है. यह दलील ऐसी ज़बरदस्त थी कि इसका जवाब नमरूद से न बन पड़ा और इस ख़याल से कि भीड़ के सामने उसको लाजवाब और शर्मिन्दा होना पड़ता है, उसने टेढ़ा तर्क अपनाया.

(4) नमरूद ने दो व्यक्तियों को बुलाया. उनमें से एक को क़त्ल किया, एक को छोड़ दिया और कहने लगा कि मैं भी जिलाता मारता हुँ, यानी किसी को गिरफ़्तार करके छोड़ देना उसको जिलाना है. यह उसकी अत्यन्त मूर्खता थी, कहाँ क़त्ल करना और छोड़ना और कहाँ मौत और ज़िन्दगी पैदा करना. क़त्ल किये हुए शख़्स को ज़िन्दा करने से आजिज़ रहना और बजाय उसके ज़िन्दा के छोड़ने को जिलाना कहना ही उसकी ज़िल्लत के लिये काफ़ी था. समझ वालों पर इसी से ज़ाहिर हो गया कि जो तर्क हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने क़ायम किया है वह अन्तिम है, और उसका जवाब मुमकिन नहीं. लेकिन चूंकि नमरूद के जवाब में दावे की शान पैदा हो गई तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उस पर मुनाज़िरे वाली गिरफ़्त फ़रमाई कि मौत और ज़िन्दगी का पैदा करना तो तेरी ताक़त से बाहर है, ऐ ख़ुदा बनने के झूटे दावेदार, तू इससे सरल काम ही कर दिखा जो एक मुतहर्रिक जिस्म की हरकत का बदलना है.

(5) यह भी न कर सके तो ख़ुदा होने का दावा किस मुंह से करता है. इस आयत से इल्मे कलाम में मुनाज़िरा करने का सुबूत मिलता है.

(6) बहुतों के अनुसार यह घटना हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम की है और बस्ती से मुराद बैतुल मक़दिस है. जब बुख़्तेनस्सर बादशाह ने बैतुल मक़दिस को वीरान किया और बनी इस्त्राईल को क़त्ल किया, गिरफ़तार किया, तबाह कर डाला, फिर हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम वहाँ गुज़रे. आपके साथ एक बरतन खजूर और एक प्याला अंगूर का रस और आप एक गधे पर सवार थे. सारी बस्ती में फिरे, किसी शख़्स को वहाँ न पाया. बस्ती की इमारतों को गिरा हुआ देखा तो आपने आश्चर्य से कहा “अन्ना युहयी हाज़िहिल्लाहो बादा मौतिहा” (कैसे जिलाएगा अल्लाह उसकी मौत के बाद) और आपने अपनी सवारी के गधे को वहाँ बाँध दिया, और आपने आराम फ़रमाया. उसी हालत में आपकी रूह क़ब्ज़ कर ली गई और गधा भी मर गया. यह सुबह के वक़्त की घटना है. उससे सत्तर बरस बाद अल्लाह तआला ने फ़ारस के बादशाहों में से एक बादशाह को मुसल्लत किया और वह अपनी फ़ौजें लेकर बैतुल मक़दिस पहुंचा और उसको पहले से भी बेहतर तरीक़े पर आबाद किया और बनी इस्त्राईल में से जो लोग बाक़ी रहे थे, अल्लाह तआला उन्हें फिर यहाँ लाया और वो बैतुल मक़दिस और उसके आस पास आबाद हुए और उनकी तादाद बढ़ती रही. इस ज़माने में अल्लाह तआला ने हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम को दुनिया की आँखो से छुपाए रखा और कोई आपको न देख सका. जब आपकी वफ़ात को सौ साल गुज़र गए तो अल्लाह तआला ने आपको ज़िन्दा किया, पहले आँखो में जान आई, अभी तक सारा बदन मुर्दा था. वह आपके देखते देखते ज़िन्दा किया गया. यह घटना शाम के वक़्त सूरज डूबने के क़रीब हुई. अल्लाह तआला ने फ़रमाया, तुम यहाँ कितने दिन ठहरे. आपने अन्दाज़े से अर्ज़ किया कि एक दिन या कुछ कम. आप का ख़याल यह हुआ कि यह उसी दिन की शाम है जिसकी सुबह को सोए थे. फ़रमाया बल्कि तुम सौ बरस ठहरे. अपने खाने और पानी यानी खजूर और अंगूर के रस को देखो कि वैसा ही है, उसमें बू तक न आई और अपने गधे को देखो. देखा कि वह मरा हुआ था, गल गया था, अंग बिखर गए थे, हड्डियाँ सफ़ेद चमक रही थीं. आपकी निगाह के सामने उसके अंग जमा हुए, हड्डियों पर गोश्त चढ़ा, गोश्त पर खाई आई, बाल निकले, फिर उसमें रूह फूंकी गई. वह उठ खड़ा हुआ और आवाज़ करने लगा. आपने अल्लाह तआला की क़ुदरत का अवलोकन किया और फ़रमाया मैं ख़ूब जानता हुँ कि अल्लाह तआला हर चीज़ पर क़ादिर है. फिर आप अपनी उसी सवारी पर सवार होकर अपने महल्ले में तशरीफ़ लाए. सरे अक़दस और दाढ़ी मुबारक के बाल सफ़ेद थे, उम्र वही चालीस साल की थी, कोई आपको पहचानता न था. अन्दाज़े से अपने मकान पर पहुंचे. एक बुढ़िया मिली, जिसके पाँव रह गए थे, वह अन्धी हो गई थी. वह आपके घर की दासी थी. उसने आपको देखा था. आपने उससे पूछा कि यह उज़ैर का मकान है, उसने कहा हाँ. और उज़ैर कहाँ, उन्हें ग़ायब हुए सौ साल गुज़र गए. यह कहकर ख़ूब रोई. आपने फ़रमाया, मैं उज़ैर हुँ. उसने कहा सुब्हानल्लाह, यह कैसे हो सकता है, आपने फ़रमाया, अल्लाह तआला ने मुझे सौ साल मुर्दा रखा, फिर ज़िन्दा किया. उसने कहा, हज़रत उज़ैर दुआ की क़ुबुलियत वाले थे, जो दुआ करते, क़ुबुल होती. आप दुआ कीजिये कि मैं देखने वाली हो जाऊं, ताकि मैं अपनी आँखो से आपको देखूँ आपने दुआ फ़रमाई, वह आँखों वाली हो गई. आपने उसका हाथ पकड़ कर फ़रमाया, उठ ख़ुदा के हुक्म से. यह फ़रमाते ही उसके मारे हुए पाँव दुरूस्त हो गए. उसने आपको देखकर पहचाना और कहा, मैं गवाही देती हुँ कि आप बेशक उज़ैर हैं. वह आपको बनी इस्त्राईल के महल्ले में ले गई. वहाँ एक बैठक में आपके बेटे थे, जिनकी उम्र एक सौ अठारह साल की हो चुकी थी और आपके पोते भी, जो बूढ़े हो चुके थे. बुढ़िया ने बैठक में पुकारा कि यह हज़रत उज़ैर तशरीफ़ ले आए. बैठक में मौजूद लोगों ने उसे झुटलाया. उसने कहा मुझे देखो, आपकी दुआ से मेरी यह हालत हो गई. लोग उठे और आपके पास आए. आपके बेटे ने कहा कि मेरे वालिद साहब के कन्धों के बीच काले बालों का एक हिलाल था. जिस्में मुबारक खोलकर दिखाया गया तो वह मौजूद था. उस ज़माने में तौरात की कोई प्रतिलिपि यानी नुस्ख़ा न रहा था. कोई उसका जानने वाला मौजूद न था. आपने सारी तौरात ज़बानी पढ़ दी. एक शख़्स ने कहा कि मुझे अपने वालिद से मालूम हुआ कि बुख़्तेनस्सर के अत्याचारों के बाद गिरफ़्तारी के ज़माने में मेरे दादा ने तौरात एक जगह दफ़्न कर दी थी उसका पता मुझै मालूम है. उस पते पर तलाश करके तौरात का वह नुस्ख़ा निकाला गया और हज़रत उज़ैर अलैहिस्सलाम ने अपनी याद से जो तौरात लिखाई थी, उससे मुक़ाबला किया गया तो एक अक्षर का फ़र्क़ न था. (जुमल)

(7) कि पहले छतें गिरीं फिर उन पर दीवारें आ पड़ीं.

(8) मुफ़स्सिरों ने लिखा है कि समन्दर के किनारे एक आदमी मरा पड़ा था. ज्वार भाटे में समन्दर का पानी चढ़ता उतरता रहता है. जब पानी चढ़ता तो मछलियाँ उसकी लाश को खातीं, जब उतर जाता तो जंगल के दरिन्दे खाते, जब दरिन्दे जाते तो परिन्दे खाते. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने यह देखा तो आपको शौक़ हुआ कि आप देखें कि मुर्दे किस तरह ज़िन्दा किये जाएंगे. आपने अल्लाह तआला की बारगाह में अर्ज़ किया, या रब मुझे यक़ीन है कि तू मुर्दों को ज़िन्दा फ़रमाएगा और उनके अंग दरियाई जानवरों और दरिन्दों के पेट और परिन्दों के पेटों से जमा फ़रमाएगा. लेकिन मैं यह अजीब दृश्य देखने की इच्छा रखता हुँ. मुफ़स्सिरीन का एक क़ौल यह भी है कि जब अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपना ख़लील यानी दोस्त किया, मौत के फ़रिश्ते इज़्राईल अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला से इजाज़त लेकर आपको यह ख़ुशख़बरी देने आए. आपने बशारत सुनकर अल्लाह की तारीफ़ की और फ़रिश्ते से फ़रमाया कि इस ख़ुल्लत यानी ख़लील बनाए जाने की निशानी क्या है ? उन्होंने अर्ज़ किया, यह कि अल्लाह तआला आपकी दुआ क़ुबूल फ़रमाए और आपके सवाल पर मुर्दे ज़िन्दा कर दे. तब आपने यह दुआ की. (ख़ाज़िन)

(9) अल्लाह तआला हर ज़ाहिर छुपी चीज़ का जानने वाला है, उसको हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के ईमान और यक़ीन के कमाल यानी सम्पूर्णता का इल्म है. इसके बावजूद यह सवाल फ़रमाना कि क्या तुझे यक़ीन नहीं, इसलिये है कि सुनने वालों को सवाल का मक़सद मालूम हो जाए और वो जान लें कि यह सवाल किसी शक व शुबह की बुनियाद पर न था. (बैज़ावी व जुमल वग़ैरह)

(10) और इन्तिज़ार की बेचैनी दूर हो. हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, मानी ये हैं कि इस निशानी से मेरे दिल को तसल्ली हो जाए कि तूने मुझे अपना ख़लील यानी दोस्त बनाया.

(11) ताकि अच्छी तरह पहचान हो जाए.

(12) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने चार चिड़ियाँ लीं, मोर, मुर्ग़, कबूतर और कौवा. उन्हें अल्लाह के हुक्म से ज़िब्ह किया, उनके पर उख़ाड़े और क़ीमा करके उनके अंग आपस में मिला दिये और इस मजमूए के कई हिस्से किये. एक एक हिस्से को एक एक पहाड़ पर रखा और सबके सर अपने पास मेहफ़ूज रखे. फिर फ़रमाया, चले आओ अल्लाह के हुक्म से. यह फ़रमाना था, वो टुकडे दौड़े और हर हर जानवर के अंग अलग अलग होकर अपनी तरतीब से जमा हुए और चिड़ियाँ की शक्लें बनकर अपने पाँव से दौड़ते हुए हाज़िर हुए और अपने अपने सरों से मिलकर जैसे पहले थे वैसे ही सम्पूर्ण बनकर उड़ गए. सुब्हानल्लाह !