सूरए – इब्राहीम -सातवाँ रूकू

और हरगिज़ अल्लाह को बेख़बर न जानना ज़ालिमों के काम से(1)
(1) इसमें मज़लूम को तसल्ली दी गई कि अल्लाह तआला ज़ालिम से उसका बदला लेगा.
उन्हें ढील नहीं दे रहा है मगर ऐसे दिन के लिये जिसमें (2){42}
(2)हौल और दहशत से.
आंखे खुली की खुली रह जाएंगी, बेतहाशा दौड़ते निकलेंगे (3)
(3)हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम की तरफ़ जो उन्हें मेहशर के मैदान की तरफ़ बुलाएंगे.
अपने सर उठाए हुए कि उनकी पलक उनकी तरफ़ लौटती नहीं(4)
(4) कि अपने आप को देख सकें.
और उनके दिलों में कुछ सकत न होगी(5){43}
(5) आश्चर्य और दहशत की शिद्दत से. क़तादा ने कहा कि दिल सीनों से निकल कर गलो में आ फंसेंगे, न बाहर निकल सकेंगे न अपनी जगह वापस जा सकेंगे. मानी ये हें कि उस दिन हौल और दहशत की तीव्रता का यह आलम होगा कि सर ऊपर उठे होंगे, आँखे खुली की खुली रह जाएंगी. दिल अपनी जगह ठहर न पाएंगे.
और लोगों को इस दिन से डराओ(6)
(6) यानी काफ़िरों को क़यामत के दिन का ख़ौफ़ दिलाओ.
जब उनपर अज़ाब आएगा तो ज़ालिम (7)
(7) यानी काफ़िर.
कहेंगे ऐ हमारे रब थोड़ी देर हमें (8)
(8) दुनिया में वापस भेज दे और.
मुहलत दे कि हम तेरा बुलाना मानें(9)
(9)और तेरे एक होने यानि तेरी तौहीद पर ईमान लाएं.
और रसूलों की ग़ुलामी करें(10)
(10) और हमसे जो क़ुसूर हो चुके उसकी तलाफ़ी करें. इसपर उन्हें फटकारा जाएगा और फ़रमाया जाएगा.
तो क्या तुम पहले(11)
(11) दुनिया में.
क़सम न खा चुके थे कि हमें दुनिया से कहीं हटकर जाना नहीं(12){44}
(12) और क्या तुमने मरने के बाद उठाए जाने और आख़िरत का इन्कार न किया था.
और तुम उनके घरों में बसे जिन्होंने अपना बुरा किया था (13)
(13) कुफ़्र और गुनाह करके, जैसे कि क़ौमे नूह व आद व समूद वग़ैरह.
और तुमपर ख़ूब खुल गया हमने उनके साथ कैसा किया(14)
(14) और तुमने अपनी आँखों से उनकी मंज़िलों में अज़ाब के निशान देखे और तुम्हें उनकी हलाकत और बर्बादी की ख़बरें मिलीं.
और हम ने तुम्हें मिसालें देकर बता दिया(15){45}
(15) ताकि तुम तदबीर न करो और समझो और अज़ाब और हलाकत से अपने आप को बचाओ.
और बेशक वो(16)
(16) इस्लाम को बचाने और कुफ़्र की सहायता करने के लिये नबीये अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ.
अपना सा दाव चले(17)
(17) कि उन्होंने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के क़त्ल करने या क़ैद करने या निकाल देने का इरादा किया.
और उनका दाव अल्लाह के क़ाबू में है और उनका दाव कुछ ऐसा न था कि जिससे ये पहाड़ टल जाएं(18){46}
(18)यानी अल्लाह की आयतें और रसूल की शरीअत के अहकाम जो अपनी मज़बूती में अडिग पहाड़ों की तरह है, मुहाल है कि काफ़िरों के छल और उनकी बहाने बाज़ियों से अपनी जगह से टल सके.
तो हरगिज़ ख़याल न करना कि अल्लाह अपने रसूलों से वादा ख़िलाफ़ करेगा(19)
(19) यह तो सम्भव ही नहीं है. वह ज़रूर वादा पूरा करेगा और अपने रसूल की मदद फ़रमाएगा, उनके दीन को ग़ालिब करेगा. उनके दुश्मनों को हलाक करेगा.
बेशक अल्लाह ग़ालिब है बदला लेने वाला {47} जिस दिन (20)
(20) इस दिन से क़यामत का दिन मुराद है.
बदल दी जाएगी ज़मीन इस ज़मीन के सिवा और आसमान(21)
(21) ज़मीन और आसमान की तबदीली में मुफ़स्सिरों के दो क़ौल हैं, एक यह कि उनकी विशेषताएं बदल दी जाएंगी जैसे ज़मीन समतल हो जाएंगी, न उसपर पहाड़ बाक़ी रहेंगे, न ऊंचे टीले, न गहरे ग़ार, न दरख़्त, न इमारत, न किसी बस्ती और सल्तनत के निशान. आसमान पर कोई सितारा बाक़ी न रहेगा और सूरज चांद की रौशनियाँ ख़त्म हो जाएंगी. यह तबदीली विशेषताओ की है, ज़ात की नहीं. दूसरा क़ौल यह है कि आसमान और ज़मीन की ज़ात ही बदल दी जाएगी. इस ज़मीन की जगह एक दूसरी चांदी की ज़मीन होगी. सफ़ेद और साफ़, जिसपर न कभी ख़ून बहाया गया हो न गुनाह किया गया हो और आसमान सोने का होगा. यह दो क़ौल अगरचे आपस में अलग अलग मालूम होते हैं मगर इनमें से हर एक सही है. और जमा की वजह यह है कि पहले गुण बदले जाएंगे और दूसरी बार हिसाब के बाद दूसरा परिवर्तन होगा, उसमें ज़मीन और आसमान की ज़ाते ही बदल जाएंगी.
और लोग सब निकल खड़े होंगे(22)
(22) अपनी क़ब्रो से.
एक अल्लाह के सामने जो सब पर ग़ालिब है {48} और उस दिन तुम मुजरिमों(23)
(23) यानी काफ़िरों.
को देखोगे कि बेड़ियों में एक दूसरे से जुड़े होंगे(24){49}
(24) अपने शैतानों के साथ बन्धे हुए.
उनके कुर्ते राल के होंगे(25)
(25) काले रंग बदबूदार जिनसे आग के शोले और ज़्यादा तेज़ हो जाएं (मदारिक व ख़ाज़िन). तफ़सीरें बैज़ावी में है कि उनके बदनों पर राल लीप दी जाएगी. वह कुर्ते की तरह हो जायगी. उसकी जलन और उसके रंग की वहशत और बदबू से तकलीफ़ पाएंगे.
और उनके चेहरे आग ढांप लेगी {50} इसलिये कि अल्लाह हर जान को उसकी कमाई का बदला दे, बेशक अल्लाह को हिसाब करते कुछ देर नहीं लगती {51} यह (26)
(26) क़ुरआन शरीफ़.
लोगों को हुक्म पहुंचाना है और इसलिये कि वो उससे डराए जाएं और इसलिये कि वो जान लें कि वह एक ही मअबूद है(27)
(27) यानी इन आयतों से अल्लाह तआला की तौहीद की दलीलें पाएं.
और इसलिये कि अक़्ल वाले नसीहत मानें {52}
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