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47 सूरए मुहम्मद
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَن سَبِيلِ اللَّهِ أَضَلَّ أَعْمَالَهُمْ
وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَآمَنُوا بِمَا نُزِّلَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَهُوَ الْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۙ كَفَّرَ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَأَصْلَحَ بَالَهُمْ
ذَٰلِكَ بِأَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا اتَّبَعُوا الْبَاطِلَ وَأَنَّ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّبَعُوا الْحَقَّ مِن رَّبِّهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ لِلنَّاسِ أَمْثَالَهُمْ
فَإِذَا لَقِيتُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا فَضَرْبَ الرِّقَابِ حَتَّىٰ إِذَا أَثْخَنتُمُوهُمْ فَشُدُّوا الْوَثَاقَ فَإِمَّا مَنًّا بَعْدُ وَإِمَّا فِدَاءً حَتَّىٰ تَضَعَ الْحَرْبُ أَوْزَارَهَا ۚ ذَٰلِكَ وَلَوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَانتَصَرَ مِنْهُمْ وَلَٰكِن لِّيَبْلُوَ بَعْضَكُم بِبَعْضٍ ۗ وَالَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَلَن يُضِلَّ أَعْمَالَهُمْ
سَيَهْدِيهِمْ وَيُصْلِحُ بَالَهُمْ
وَيُدْخِلُهُمُ الْجَنَّةَ عَرَّفَهَا لَهُمْ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن تَنصُرُوا اللَّهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْ
وَالَّذِينَ كَفَرُوا فَتَعْسًا لَّهُمْ وَأَضَلَّ أَعْمَالَهُمْ
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَرِهُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأَحْبَطَ أَعْمَالَهُمْ
۞ أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ دَمَّرَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ ۖ وَلِلْكَافِرِينَ أَمْثَالُهَا
ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ مَوْلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَأَنَّ الْكَافِرِينَ لَا مَوْلَىٰ لَهُمْ
सूरए मुहम्मद मदीने में उतरी, इसमें 38 आयतें, चार रूकू हैं,
-पहला रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) मदनी है. इसमें चार रूकू, अड़तीस आयतें, पाँच सौ अट्ठावन कलिमे और दो हज़ार चार सौ पछतर अक्षर है.
जिन्होंने कुफ़्र किया और अल्लाह की राह से रोका(2)
(2) यानी जो लोग ख़ुद इस्लाम में दाख़िल न हुए और दूसरों को उन्होंने इस्लाम से रोका.
अल्लाह ने उनके कर्म बर्बाद किये(3){1}
(3) जो कुछ भी उन्होंने किए हों, भूखों को खिलाया हो या क़ैदियों को छुड़ाया हो या ग़रीबों की मदद की हो या मस्जिदे हराम यानी ख़ानए काबा की इमारत में कोई ख़िदमत की हो, सब बर्बाद हुई. आख़िरत में उसका कुछ सवाब नहीं. ज़ुहाक का क़ौल है कि मुराद यह है कि काफ़िरों ने सैयदे आलम सल्ल्ल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिये जो मक्र सोचे थे और बहाने बनाए थे अल्लाह तआला ने उनके वो तमाम काम बातिल कर दिये.
और जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और उसपर ईमान लाए जो मुहम्मद पर उतारा गया(4)
(4) यानी क़ुरआने पाक.
और वही उनके रब के पास से हक़ है अल्लाह ने उनकी बुराइयाँ उतार दीं और उनकी हालतें संवार दीं(5){2}
(5) दीन के कामों में तौफ़ीक़ अता फ़रमाकर और दुनिया में उनके दुश्मनों के मुक़ाबिल उनकी मदद फ़रमाकर. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो तआला अन्हुमा ने फ़रमाया कि उनकी ज़िन्दगी के दिनों में उनकी हिफ़ाज़त फ़रमाकर कि उनसे कोई गुनाह ने हो.
यह इसलिये कि काफ़िर बातिल (असत्य) के पैरो (अनुयायी) हुए और ईमान वालों ने हक़ (सत्य) की पैरवी (अनुकरण) की जो उनके रब की तरफ़ से है (6)
(6) यानी क़ुरआन शरीफ़
अल्लाह लोगों से उनके अहवाल यूंही बयान फ़रमाता है(7){3}
(7) यानी पक्षों के कि काफ़िरों के कर्म अकारत और ईमान वालों की ग़ल्तियाँ भी माफ़.
तो जब काफ़िरों से तुम्हारा सामना हो(8)
(8) यानी जंग हो.
तो गर्दनें मारना है(9)
(9) यानी उनको क़त्ल करो.
यहाँ तक कि जब उन्हें ख़ूब क़त्ल कर लो(10)
(10) यानी बहुतात से क़त्ल कर चुको और बाक़ी को क़ैद करने का मौक़ा आ जाए.
तो मज़बूत बांधो, फिर उसके बाद चाहे एहसान करके छोड़ दो चाहे फिदिया ले लो(11)
(11) दोनों बातों का इख़्तियार है. मुश्रिकों के क़ैदियों का हुक्म हमारे नज़्दीक यह है कि उन्हें क़त्ल किया जाए या ग़ुलाम बना लिया जाए और एहसान से छोड़ना और फ़िदिया लेना जो इस आयत में बयान किया गया है वह सूरए बराअत की आयत “उक़्तलुल मुश्रिकीन” से मन्सूख़ हो गया.
यहाँ तक कि लड़ाई अपना बोझ रख दे(12)
(12) यानी जंग ख़त्म हो जाए इस तरह कि मुश्रिक इताअत क़ुबूल कर लें और इस्लाम लाएं.
बात यह है, और अल्लाह चाहता तो आप ही उनसे बदला ले लेता (13)
(13) बग़ैर क़िताल के उन्हें ज़मीन में धंसा कर या उन पर पत्थर बरसाकर या और किसी तरह.
मगर इसलिये(14)
(14) तुम्हें क़िताल का हुक्म दिया.
कि तुम में एक को दूसरे से जांचे (15)
(15) क़िताल में ताकि मुसलमान मक़तूल सवाब पाएं और काफ़िर अज़ाब.
और जो अल्लाह की राह में मारे गए अल्लाह हरगिज़ उनके अमल ज़ाया न फ़रमाएगा(16){4}
(16) उनके कर्मों का सवाब पूरा पूरा देगा.
जल्द उन्हें राह देगा(17)
(17) ऊंचे दर्जों की तरफ़.
और उनका काम बना देगा{5} और उन्हें जन्नत में ले जाएगा उन्हें उसकी पहचान करा दी है (18){6}
(18) वो जन्नत की मंज़िलों में अजनबी और अनजान की तरह न पहुंचेगें जो किसी जगह जाता है तो उसको हर चीज़ पूछने की हाजत होती है. बल्कि वो जाने पहचाने अन्दाज़ में दाख़िल होंगे अपनी मंज़िलों और ठिकानों को पहचानते होंगे अपनी बीवी और ख़ादिमों को जानते होंगे. हर चीज़ का मौक़ा उनकी जानकारी में होगा जैसे कि वो हमेशा से यहीं के रहने वाले हों.
ऐ ईमान वालो अगर तुम ख़ुदा के दीन की मदद करोगे अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा(19)
(19) तुम्हारे दुश्मन के मुक़ाबिल.
और तुम्हारे क़दम जमा देगा(20){7}
(20) जंग में और हुज्जते इस्लाम पर और पुले सिरात पर.
और जिन्होंने कुफ़्र किया तो उनपर तबाही पड़े और अल्लाह उनके अअमाल (कर्म) बर्बाद करे {8} यह इसलिये कि उन्हें नागवार हुआ जो अल्लाह ने उतारा (21)
(21) यानी क़ुरआने पाक. इसलिये कि उसमें शहवात और लज़्ज़तो को छोड़ने और फ़रमाँबरदारी और इबादतों में मेहनत उठाने के आदेश है जो नफ़्स पर भारी गुज़रते हैं.
तो अल्लाह ने उनका किया धरा अकारत किया {9} तो क्या उन्हों ने ज़मीन में सफ़र न किया कि देखते उनसे अगलों का(22)
(22) यानी पिछली उम्मतों का.
कैसा अंजाम हुआ, अल्लाह ने उनपर तबाही डाली(23)
(23) कि उन्हें और उनकी औलाद और उनके माल को सब को हलाक कर दिया.
और उन काफ़िरों के लिये भी वैसी कितनी ही हैं (24){10}
(24) यानी अगर ये काफ़िर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान न लाएं तो उनके लिये पहले जैसी बहुत सी तबाहियाँ हैं.
यह(25)
(25) यानी मुसलमानों का विजयी होना और काफ़िरों का पराजित और ज़लील होना.
इसलिये कि मुसलमानों का मौला अल्लाह है और काफ़िरों का कोई मौला नहीं{11}
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बेशक अल्लाह दाख़िल फ़रमाएगा उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये बाग़ों में जिनके नीचे नेहरें बहें, और काफ़िर बरतते हैं और खाते हैं(1)
(1) दुनिया में थोड़े दिन ग़फ़लत के साथ, अपने अंजाम को भुलाए हुए.
जैसे चौपाए खाएं(2)
(2) और उन्हें तमीज़ न हो कि इस ख़ाने के बाद वो ज़िब्ह किये जाएंगे. यही हाल काफ़िरों का है जो गफ़लत के साथ दुनिया हासिल करने में लगे हुए हैं और आने वाली मुसीबतों का ख़याल भी नहीं करते.
और आग में उनका ठिकाना है{12} और कितने ही शहर कि इस शहर से(3)
(3) यानी मक्के वालों से.
क़ुव्वत में ज़्यादा थे जिसने तुम्हें तुम्हारे शहर से बाहर किया, हमने उन्हें हलाक फ़रमाया तो उनका कोई मददगार नहीं(4) {13}
(4) जो अज़ाब और हलाकत से बचा सके. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मक्के से हिजरत की और ग़ार की तरफ़ तशरीफ़ ले चले तो मक्के की तरफ़ मुतवज्जह होकर फ़रमाया अल्लाह तआला के शहरों में तू अल्लाह तआला को बहुत प्यारा है और अल्लाह तआला के शहरों में तू मुझे बहुत प्यारा है अगर मुश्रिक मुझे न निकालते तो मैं तुझसे न निकलता. इसपर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी.
तो क्या जो अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हो (5)
(5) और वो ईमान वाले हैं कि वो क़ुरआन और नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के चमत्कारों की खुली निशानियों पर भरपूर यक़ीन रखते हैं.
उस(6)
(6) उस काफ़िर मुश्रिक.
जैसा होगा जिसके बुरे अमल (कर्म) उसे भले दिखाए गए और वह अपनी ख़्वाहिशों के पीछे चले(7){14}
(7) और उन्हों ने कुफ़्र और बुतपरस्ती इख़्तियार की, हरगिज़ वो मूमिन और ये काफ़िर एक से नहीं हो सकते और इन दोनों में कुछ भी निस्बत नहीं.
अहवाल उस जन्नत का जिसका वादा परहेज़गारों से है, उसमें ऐसी पानी की नेहरें हैं जो कभी न बिगड़ें (8)
(8) यानी ऐसा लतीफ़ कि न सड़े न उसकी बू बदले न उसके मज़े में फ़र्क़ आए.
और ऐसे दूध की नेहरें हैं जिसका मज़ा न बदला(9)
(9) दुनिया के दूध के विपरीत कि ख़राब हो जाते हैं.
और ऐसी शराब की नेहरें हैं जिसके पीने में लज़्ज़त है(10)
(10) ख़ालिस लज़्ज़त ही लज़्ज़त. व दुनिया की शराबों की तरह उसका मज़ाब ख़राब, न उसमें मैल कुचैल, न ख़राब चीज़ों की मिलावट. न वो सड़कर बनी, न उसके पीने से अक़्ल घटे, न सर चकराए, न ख़ुमार आए, न दर्दे सर पैदा हो, ये सब आफ़तें दुनिया ही कि शराब में हैं, वहाँ की शराब इन सारे दोषों से पाक, अत्यन्त मज़ेदार, फ़रहत देने वाली और अच्छी लगने वाली.
और ऐसी शहद की नेहरें हैं साफ़ किया गया(11)
(11) पैदाइश में यानी साफ़ ही पैदा किया गया. दुनिया के शहद की तरह नहीं जो मक्खी के पेट से निकलता है और उसमें मोम वग़ैरह की मिलावट होती है.
और उनके लिये उसमें हर क़िस्म के फ़ल हैं और अपने रब की मग़फ़िरत (12)
(12) कि वह रब उनपर एहसान फ़रमाता है और उनसे राज़ी है और उनपर से सारे तकलीफ़ी अहकाम उठा लिये गए हैं. जो चाहे ख़ाएं जितना चाहें खाएं, न हिसाब न सज़ा.
क्या ऐसे चैन वाले उनके बराबर हो जाएंगे जिन्हें हमेशा आग में रहना और उन्हें खोलता पानी पिलाया जाए कि आंतों के टुकड़े टुकड़े कर दे {15} और उन(13)
(13)काफ़िर लोग.
में से कुछ तुम्हारे इरशाद (प्रवचन) सुनते हैं (14)
(14) ख़ुत्बे वग़ैरह में अत्यन्त बेइल्तिफ़ाती के साथ.
यहाँ तक कि जब तुम्हारे पास से निकल कर जाएं(15)
(15) ये मुनाफ़िक़ लोग तो.
इल्म वालों से कहते हैं (16)
(16) यानी आलिम सहाबा जैसे इब्ने मसऊद और इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा, से मज़ाक के तौर पर.
अभी उन्होंने क्या फ़रमाया(17)
(17) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने, अल्लाह तआला इन मुनाफ़िक़ों के हक़ में फ़रमाता है.
ये हैं वो जिनके दिलों पर अल्लाह ने मोहर कर दी(18)
(18)यानी जब उन्होंने सत्य का अनुकरण छोड़ दिया तो अल्लाह तआला ने उनके दिलों को मुर्दा कर दिया.
और अपनी ख़्वाहिशों के ताबेअ (अधीन) हुए (19) {16}
(19) और उन्होंने. दोहरी प्रवृति इख़्तियार कर ली.
और जिन्होंने राह पाई (20)
(20) यानी वो ईमान वाले जिन्होंने नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का कलाम ग़ौर से सुना और उससे नफ़ा उठाया.
अल्लाह ने उनकी हिदायत(21)
(21) यानी दृष्टि या बसीरत और दिल की बात जानने का इल्म.
और ज़्यादा फ़रमाई और उनकी परहेज़गारी उन्हें अता फ़रमाई(22){17}
(22) यानी परहेज़गारी की तौफ़ीक़ दी और उस पर मदद फ़रमाई या ये मानी हैं कि उन्हें परहेज़गारी की जज़ा दी और उसका सवाब अता फ़रमाया.
तो काहे के इन्तिज़ार में हैं (23)
(23) काफ़िर और मुनाफ़िक़ लोग.
मगर क़यामत के कि उनपर अचानक आ जाए, कि उसकी अलामतें (चिन्ह) तो आही चुकी हैं(24)
(24) जिनमें से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म का तशरीफ़ लाना और चाँद का दो टुकड़े होना है.
फिर जब वह आ जाएगी तो कहाँ वो और कहाँ उनका समझना {18} तो जान लो कि अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी नहीं और ऐ मेहबूब अपने ख़ासों और आम मुसलमान मर्दों और औरतों के गुनाहों की माफ़ी मांगो(25)
(25) यह इस उम्मत पर अल्लाह तआला की मेहरबानी है कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि उनके लिये मग़फ़िरत तलब फ़रमाएं और आप ऐसे सिफ़ारिशी है कि आपकी सिफ़ारिश अल्लाह तआला के यहाँ मक़बूल है. इसके बाद ईमान वालों और बेईमानों सबसे आम सम्बोधन है.
और अल्लाह जानता है दिन को तुम्हारा फिरना (26)
(26) अपने मशालों में और रोज़ी के कामों में.
और रात को तुम्हारा आराम लेना(27) {19}
(27) यानी वो तुम्हारे तमाम हालात का जानने वाला है, उसमें कुछ छुपा हुआ नहीं है.
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47 सूरए मुहम्मद -तीसरा रूकू
और मुसलमान कहते हैं कोई सूरत क्यों न उतारी गई(1)
(1) ईमान वालों को अल्लाह तआला की राह में जिहाद का बहुत ही शौक़ था वो कहते थे कि ऐसी सूरत क्यों नहीं उतरती जिसमें जिहाद का हुक्म हो ताकि हम जिहाद करें. इसपर यह आयत उतरी.
फिर जब कोई पुख़्ता सूरत उतारी गई(2)
(2) जिसमें साफ़ खुला खुला बयान हो और उसका कोई हुक्म मन्सूख़ होने वाला न हो.
और उसमें जिहाद का हुक्म फ़रमाया गया तो तुम देखोगे उन्हें जिन के दिलों में बीमारी है(3)
(3) यानी मुनाफ़ि क़ों को.
कि तुम्हारी तरफ़(4)
(4) परेशान होकर.
उसका देखना देखते हैं जिसपर मुर्दनी छाई हो तो उनके हक़ में बेहतर यह था कि फ़रमाँबरदारी करते (5){20}
(5) अल्लाह तआला और रसूल की.
और अच्छी बात कहते फिर जब नातिक़ हुक्म हो चुका(6)
(6) और जिहाद फ़र्ज़ कर दिया गया.
तो अगर अल्लाह से सच्चे रहते(7)
(7) ईमान और फ़रमाँबरदारी पर क़ायम रहकर.
तो उनका भला था {21} तो क्या तुम्हारे ये लक्षण नज़र आते हैं कि अगर तुम्हें हुकूमत मिले तो ज़मीन में फ़साद फ़ैलाओ (8)
(8) रिशवतें लो, ज़ुल्म करो, आपस में लड़ों, एक दूसरे को क़त्ल करो.
और अपने रिश्ते काट दो {22} ये हैं वो(9)
(9) फ़साद करने वाले.
लोग जिन पर अल्लाह ने लअनत की और उन्हें हक़ (सत्य) से बेहरा कर दिया और उनकी आँखे फोड़ दीं(10){23}
(10) कि सच्चाई की राहे, नहीं देखते.
तो क्या वो क़ुरआन को सोचते नहीं(11)
(11) जो सत्य को पहचानें.
या कुछ दिलों पर उनके क़ुफ़्ल (ताले) लगे हैं (12) {24}
(12) कुफ़्र के, कि सच्चाई की बात उनमें पहुंचने ही नहीं पाती.
बेशक वो जो अपने पीछे पलट गए (13)
(13)दोहरी प्रवृति से.
बाद इसके कि हिदायत उनपर खुल चुकी थी (14)
(14) और हिदायत का रास्ता साफ़ हो चुका था. क़तादा ने कहा कि यह एहले किताब के काफ़िरों का हाल है जिन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को पहचाना और आपकी तारीफ़ अपनी किताबों में देखी फिर पहचानने और जानने के बावुजूद कुफ़्र इख़्तियार किया. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा और ज़ुहाक और सदी का क़ौल है कि इससे मुनाफ़िक़ मुराद हैं जो ईमान लाकर कुफ़्र की तरफ़ फिर गए.
शैतान ने उन्हें धोखा दिया(15)
(15) और बुराइयों को उनकी नज़र में ऐसा सजाया कि उन्हें अच्छा समझे.
और उन्हें दुनिया में मुद्दतों रहने की उम्मीद दिलाई (16){25}
(16) कि अभी बहुत उम्र पड़ी है. ख़ूब दुनिया के मज़े उठालो और उनपर शैतान का फ़रेब चल गया.
यह इसलिये कि उन्होंने (17)
(17) यानी एहले किताब या मुनाफ़िक़ों ने छुपवाँ तौर पर.
कहा उन लोगों से (18)
(18) यानी मुश्रिकों से.
जिन्हें अल्लाह का उतारा हुआ (19)
(19) क़ुरआन और दीन के अहकाम.
नागवार है एक काम में हम तुम्हारी मानेंगे (20)
(20) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दुश्मनी और हुज़ूर के ख़िलाफ़ उनके दुश्मनों की मदद करने में और लोगों को जिहाद से रोकने में.
और अल्लाह उनकी छूपी हुई जानता है {26} तो कैसा होगा जब फ़रिश्ते उनकी रूह क़ब्ज़ करेंगे उनके मुंह और उनकी पीठें मारते हुए (21){27}
(21) लोहे के गदाओं से.
यह इसलिये कि वो ऐसी बात के ताबेअ हुए जिसमें अल्लाह की नाराज़ी है(22)
(22) और वह बात रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ जिहाद को जाने से रोकना और काफ़िरों की मदद करना है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वह बात तौरात के उन मज़ामीन का छुपाना है जिनमें रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नअत शरीफ़ है.
और उसकी ख़ुशी (23) उन्हें गवारा न हुई तो उसने उनके कर्म अकारत कर दिये{28}
(23) ईमान फ़रमाँबरदारी और मुसलमानों की मदद और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ जिहाद में हाज़िर होना.
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47 सूरए मुहम्मद -चौथा रूकू
क्या जिनके दिलों में बीमारी है(1)
(1) दोहरी प्रवृति की.
इस घमण्ड में हैं कि अल्लाह उनके छुपे बैर ज़ाहिर न फ़रमाएगा(2){29}
(2) यानी उनकी वो दुश्मनियाँ जो वो ईमान वालों के साथ रखते हैं.
और अगर हम चाहें तो तुम्हें उनको दिखा दें कि तुम उनकी सूरत से पहचान लो(3)
(3) हदीस शरीफ़ में हज़रत अनस रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि इस आयत के नाज़िल होने के बाद रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कोई मुनाफ़िक़ छुपा न रहा. आप सब को उनकी सूरतों से पहचानते थे.
और ज़रूर तुम उन्हें बात के उसलूब(अन्दाज़) में पहचान लोगे (4)
(4) और वो अपने ज़मीर का हाल उनसे छुपा सकेंगे. चुनांन्चे इसके बाद जो मुनाफ़िक़ लब हिलाता था हुज़ूर उसके दोग़लेपन को उसकी बात से और उसके बोलो से पहचान लेते थे. अल्लाह तआला ने हुज़ूर को बहुत से इल्म अता फ़रमाए उनमें से सूरत पहचानना भी है. और बात से पहचानना भी.
और अल्लाह तुम्हारे कर्म जानता है (5){30}
(5) यानी अपने बन्दों के सारे कर्म. हर एक को उसके लायक़ जज़ा देगा.
और ज़रूर हम तुम्हें जांचेंगे (6)
(6) आज़माइश में डालेंगे.
यहाँ तक कि देख लें(7)
(7) यानी ज़ाहिर फ़रमा दें.
तुम्हारे जिहाद करने वालों और साबिरों को और तुम्हारी ख़बरें आज़मा लें(8){31}
(8) ताकि ज़ाहिर हो जाए कि फ़रमाँबरदारी और दिल की सच्चाई के दावे में तुम में से कौन अच्छा है.
बेशक वो जिन्होंने कुफ़्र किया और अल्लाह की राह से (9)
(9) उसके बन्दों को.
रोका और रसूल की मुख़ालिफ़त (विरोध) की बाद इसके कि हिदायत उनपर ज़ाहिर हो चुकी थी वो हरगिज़ अल्लाह को कुछ नुक़सान न पहुंचाएंगे, और बहुत जल्द अल्लाह उनका किया धरा अकारत कर देगा(10){32}
(10) और वो सदक़े वग़ैरह किसी चीज़ का सवाब न पाएंगे क्योंकि जो काम अल्लाह तआला के लिये न हो, उसका सवाब ही क्या. जंगे बद्र के लिये जब क़ुरैश निकले तो वह साल दुष्काल का था. लश्कर का खाना क़ुरैश के अमीरों ने बारी बारी अपने ज़िम्मे ले लिया था. मक्कए मुकर्रमा से निकल कर सबसे पहला खाना अबू जहल की तरफ़ से था जिसके लिये उसने दस ऊंट ज़िब्ह किये थे. फिर सफ़वान ने मक़ामे उस्फ़ान में नौ ऊंट, फिर सहल ने मक़ामे क़दीद में दस, यहाँ से वो लोग समन्दर की तरफ़ फिर गए और रस्ता गुम हो गया. एक दिन ठहरे. वहाँ शैबा की तरफ़ से खाना हुआ, नौ ऊंट ज़िब्ह हुए. फिर मक़ामे अबवा में पहुंचे वहाँ मुक़ैयस जहमी ने नौ ऊंट ज़िब्ह किये. हज़रत अब्बास की तरफ़ से भी दावत हुई. उस वक़्त तक आप इस्लाम नहीं लाए थे. आपकी तरफ़ से दस ऊंट ज़िब्ह किये गए फिर हारिस की तरफ़ से नौ और अबुल बख़्तरी की तरफ़ से बद्र के चश्मे पर दस ऊंट. इस खाना देने वालों के बारे में यह आयत उतरी.
ऐ ईमान वालों अल्लाह का हुक्म मानो और रसूल का हुक्म मानो(11)
(11) यानी ईमान और फ़रमाँबरदारी पर क़ायम रहो.
और अपने कर्म बातिल न करो(12) {33}
(12) दिखावे या दोग़लेपन से. कुछ लोगों का ख़याल था कि जैसे शिर्क की वजह से सारी नेकियाँ नष्ट हो जाती है उसी तरह ईमान की बरकत से कोई गुनाह नुक़सान नहीं पहुंचाता. उनके बारे में यह आयत उतरी और बताया गया कि मूमिन के लिये अल्लाह और रसूल की फ़रमाँबरदारी ज़रूरी है, गुनाहों से बचना अनिवार्य है. इस आयत में कर्मों के बातिल करने की मुमानिअत फ़रमाई गई तो आदमी जो अमल शुरू से करे, चाहे वह नफ़्ल ही हो, नमाज़ या रोज़ा या कोई और, लाज़िम है कि उसको बातिल न करे.
बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया और अल्लाह की राह से रोका फिर काफ़िर ही मर गए तो अल्लाह हरगिज़ उन्हें न बख़्शेगा(13){34}
(13) यह आयत क़लीब वालो के बारे में उतरी. क़लीब बद्र में एक कुँवा है जिसमें मरने वाले काफ़िर डाले गए थे. अबू जहल और उसके साथी और आयत का हुक्म हर काफ़िर के लिये आम है. जो कुफ़्र पर मरा हो अल्लाह तआला उसकी मग़फ़िरत न फ़रमाएगा. इसके बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा को सम्बोधित किया जा रहा है और हुक्म में तमाम मुसलमान शामिल हैं.
तो तुम सुस्ती न करो(14)
(14) यानी दुश्मन के मुक़ाबले में कमज़ोरी न दिखाओ.
और आप सुलह की तरफ़ न बुलाओ (15)
(15) काफ़िरों को. क़रतबी में है कि इस आयत के हुक्म में उल्मा का मतभेद है. कुछ ने कहा है कि यह आयत “व इन जनहू” की नासिख़ है क्योंकि अल्लाह ने मुसलमानों को सुलह की तरफ़ झुकने को मना फ़रमाया है जबकि सुलह की हाजत न हो और कुछ उलमा ने कहा कि यह आयत मन्सूख़ है और आयत “व इन जनहू” इसकी नासिख़ और एक क़ौल यह है कि यह आयत मोहकम है और दोनों आयतें दो अलग अलग वक़्तों और अलग अलग हालतों में उतरीं और एक क़ौल यह है कि आयत “व इन जनहू” का हुक्म एक निश्चित क़ौम के साथ ख़ास है और यह आयत आम है कि काफ़िरों के साथ समझौता जायज़ नहीं मगर ज़रूरत के लिहाज़ से जबकि मुसलमान कमज़ोर हों और मुक़ाबला न कर सकें.
और तुम ही ग़ालिब आओगे, और अल्लाह तुम्हारे साथ है और वह हरगिज़ तुम्हारे कर्मों में तुम्हें नुक़सान न देगा(16) {35}
(16) तुम्हें कर्मों का पूरा पूरा इनाम अता फ़रमाएगा.
दुनिया की ज़िन्दगी तो यही खेल क़ूद है(17)
(17) अत्यन्त जल्द गुज़रने वाली और इसमें लग जाना कुछ भी नफ़ा देने वाला नहीं है.
और अगर तुम ईमान लाओ और परहेज़गारी करो तो वह तुम को तुम्हारे सवाब अता फ़रमाएगा और कुछ तुम से तुम्हारे माल न मांगेगा (18){36}
(18)हाँ राहे ख़ुदा में ख़र्च करने का हुक्म देगा, ताकि तुम्हें इसका सवाब मिले.
अगर उन्हें(19)
(19) यानी अमवाल को.
तुम से तलब करे और ज़्यादा तलब करे तुम बुख़्ल (कंजूसी) करोगे और वह बुख़्ल तुम्हारे दिलों के मैल ज़ाहिर कर देगा {37} हाँ हाँ यह जो तुम हो बुलाए जाते हो कि अल्लाह की राह में ख़र्च करो (20)
(20) जहाँ ख़र्च करना तुम पर फ़र्ज़ किया गया है.
तो तुम में कोई बुख़्ल करता है और जो बुख़्ल करे(21)
(21) सदक़ा देने और फ़र्ज़ अदा करने में.
वह अपनी ही जान पर बुख़्ल करता है और अल्लाह बेनियाज़ है (22)
(22) तुम्हारे सदक़ात और ताअत से.
और तुम सब मोहताज़ (23)
(23) उसके फ़ज़्ल और रहमत के.
और अगर तुम मुंह फेरो(24)
(24) उसकी और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी से.
तो वह तुम्हारे सिवा और लोग बदल लेगा फिर वो तुम जैसे न होंगे(25){38}
(25) बल्कि अत्यन्त मुतीअ और फ़रमाँबरदार होंगे.
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छब्बीसवाँ पारा – हा मीम
46 सूरए अहक़ाफ़
सूरए अहक़ाफ़ मक्का में उतरी, इसमें 35 आयतें, चार रूकू हैं.
-पहला रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए अहक़ाफ़ मक्का में उतरी मगर कुछ के नज़्दीक इसकी कुछ आयतें मदनी हैं जैसे कि आयत ” क़ुल अरएतुम” और “फ़स्बिर कमा सबरा” और तीन आयतें “ववस्सैनल इन्साना बिवालिदैहे”. इस सूरत में चार रूकू, पैंतीस आयतें, छ सौ चवालीस कलिमे और दो हज़ार पाँच सौ पचानवे अक्षर हैं.
हा-मीम {1} यह किताब (2)
(2) यानी क़ुरआन शरीफ़
उतारना है अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत (बोध) वाले की तरफ़ से {2} हमने न बनाए आसमान और ज़मीन और जो कुछ इन के बीच है मगर हक़ के साथ(3)
(3) कि हमारी क़ुदरत और एक होने के प्रमाणित करें.
और एक मुक़र्रर (निश्चित) मीआद पर (4)
(4) वह निश्चित अवधि क़यामत का दिन है जिस के आ जाने पर आसमान और ज़मीन नष्ट हो जाएंगे.
और काफ़िर उस चीज़ से कि डराए गए (5)
(5) इस चीज़ से मुराद या अज़ाब है या क़यामत के दिन की घबराहट या क़ुरआने पाक जो मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब का डर दिलाता है.
मुंह फेरे हैं(6){3}
(6) कि उस पर ईमान नहीं लाते.
तुम फ़रमाओ भला बताओ तो वो जो तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो(7)
(7) यानी बुत जिन्हे मअबूद ठहराते हो.
मुझे दिखाओ उन्होंने ज़मीन का कौन सा ज़र्रा (कण) बनाया या आसमान में उनका कोई हिस्सा है, मेरे पास लाओ इससे पहली कोई किताब (8)
(8) जो अल्लाह तआला ने क़ुरआन से पहले उतारी हो. मुराद यह है कि वह किताब यानी क़ुरआने मजीद तौहीद की सच्चाई और शिर्क के बातिल होने का बयान करती है और जो किताब भी इससे पहले अल्लाह तआला की तरफ़ से आई उसमें यही बयान है. तुम अल्लाह तआला की किताबों में से कोई एक किताब तो ऐसी ले आओ जिसमें तुम्हारे दीन (बुत-परस्ती) की गवाही हो.
या कुछ बचा खुचा इल्म(9)
(9) पहलों का.
अगर तुम सच्चे हो(10){4}
(10) अपने इस दावे में कि ख़ुदा का कोई शरीक है जिसकी इबादत का उसने तुम्हें हुक्म दिया है.
औऱ उससे बढ़कर कौन गुमराह जो अल्लाह के सिवा ऐसो को पूजे(11)
(11) यानी बुतों को.
जो क़यामत तक उसकी न सुनें और उन्हें उनकी पूजा की ख़बर तक नहीं(12){5}
(12) क्योंकि वो पत्थर और बेजान है.
और जब लोगों का हश्र होगा वो उनके दुश्मन होंगे(13)
(13) यानी बुत, अपने पुजारियों के.
और उनसे इन्कारी हो जाएंगे(14){6}
(14) और कहेंगे कि हमने उन्हें अपनी इबादत की दावत नहीं दी. अस्ल में ये अपनी ख़्वाहिशों के पुजारी थे.
और जब उनपर(15)
(15) यानी मक्के वालों पर.
पढ़ी जाएं हमारी रौशन आयतें तो काफ़िर अपने पास आए हुए हक़ को(16)
(16)यानी क़ुरआन शरीफ़ को बग़ैर ग़ौरो फ़िक्र किये और अच्छी तरह सुने.
कहते हैं यह खुला जादू है(17){7}
(17) कि इसके जादू होने में शुबह नहीं और इससे भी बुरी बात कहते हैं जिसका आगे बयान है.
क्या कहते हैं उन्होंने उसे जी से बनाया (18)
(18) यानी सैयदे आलम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने.
तुम फ़रमाओ अगर मैं ने उसे जी से बना लिया होगा तो तुम अल्लाह के सामने मेरा कुछ इख़्तियार नहीं रखते (19)
(19) यानी अगर फ़र्ज़ करो मैं दिल से बनाता और उसको अल्लाह तआला का कलाम बताता तो वह अल्लाह तआला पर लांछन होता और अल्लाह तआला ऐसे लांछन लगाने वाले को जल्द मुसीबत और अज़ाब में गिरफ़्तार करता है. तुम्हें तो यह क़ुदरत नहीं कि तुम उसके बज़ाब से बचा सको या उसके अज़ाब को दूर कर सको तो किस तरह हो सकता है कि मैं तुम्हारी वजह से अल्लाह तआला पर झूट बोलता.
वह ख़ूब जानता है जिन बातों में तुम मश्ग़ूल हो(20)
(20)और जो कुछ क़ुरआने पाक की निस्बत कहते हो.
और वह काफ़ी है मेरे और तुम्हारे बीच गवाह और वह बख़्शने वाला मेहरबान है(21){8}
(21) यानी अगर तूम कुफ़्र से तौबह करके ईमान लाओ तो अल्लाह तआला तुम्हारी मग़फ़िरत फ़रमाएगा. और तुम पर रहमत करेगा.
तुम फ़रमाओ मैं कोई अनोखा रसूल नहीं(22)
(22) मुझसे पहले भी रसूल आ चुके हैं तो तुम क्यों नबुव्वत का इन्कार करते हो.
और मैं नहीं जानता मेरे साथ क्या किया जाएगा और तुम्हारे साथ क्या(23)
(23) इसके मानी में मुफ़स्सिरों के कुछ क़ौल हैं एक तो यह कि क़यामत में जो मेरे और तुम्हारे साथ किया जाएगा वह मुझे मालूम नहीं. यह मानी हों तो यह आयत मन्सूख़ है. रिवायत है कि जब यह आयत नाज़िल हुई तो मुश्रिक ख़ुश हुए और कहने लगे लात और उज़्ज़ा की क़सम, अल्लाह के नज़्दीक हमारा और मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का एक सा हाल है. उन्हें हम पर कुछ फ़ज़ीलत नहीं. अगर यह क़ुरआन उनका अपना बनाया हुआ न होता तो उनका भेजने वाला उन्हें ज़रूर ख़बर देता कि उनके साथ क्या करेगा. तो अल्लाह तआला ने आयत “लियग़फ़िरा तकल्लाहो मा तक़द्दमा मिन ज़ंबिका वमा तअख़्ख़रा” यानी ताकि अल्लाह तुम्हारे कारण से गुनाह बख़्शे तुम्हारे अगलों के और तुम्हारे पिछलों के और अपनी नेअमतें तुमपर पूरी कर दे. (सूरए फ़त्ह, आयत 2) नाज़िल फ़रमाई. सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हुज़ूर को मुबारक हो आपको मालूम हो गया कि आप के साथ क्या किया जाएगा. यह इन्तिज़ार है कि हमारे साथ क्या करेगा. इसपर अल्लाह ने यह आयत उतारी “लियुदख़िलल मूमिनीना वल मूमिनाते जन्नातिन तजरी मिन तहतिहल अन्हारो” यानि ताकि ईमान वाले मर्दो और ईमान वाली औरतों को बाग़ों में ले जाए जिनके नीचे नहरें बहें हमेशा उनमें रहें. (सूरए फ़त्ह, आयत 5) और यह आयत उतरी “बश्शिरिल मूमिनीना बिअन्ना लहुम मिनल्लाहे फ़दलन कबीरा” यानी और ईमान वालो को ख़ुशख़बरी दो कि उनके लिये अल्लाह का बड़ा फ़ज़्ल है. (सूरए अहज़ाब, आयत 47) तो अल्लाह तआला ने बयान फ़रमाया कि हुज़ूर के साथ क्या करेगा और मूमिनीन के साथ क्या. दूसरा क़ौल आयत की तफ़सीर में यह है कि आख़िर का हाल तो हुज़ूर को अपना भी मालूम है और मूमिनीन का भी और झूठलाने वालों का भी. मानी ये हैं कि दुनिया में क्या किया जाएगा, यह नहीं मालूम. अगर ये मानी लिये जाएं तो भी यह आयत मन्सूख़ है, अल्लाह तआला ने हुज़ूर को यह भी बता दिया “लियुज़हिरहू अलद दीने कुल्लिही” कि उसे सब दीनों पर ग़ालिब करे. (सूरए तौबह, आयत 33) और “माकानल्लाहो लियुअज्ज़िबहुम व अन्ता फ़ीहिम” यानी जबतक ऐ मेहबूब, तुम उनमें तशरीफ़ फ़रमा हो और अल्लाह उन्हें अज़ाब करने वाला नहीं. (सूरए अनफ़ाल, आयत 33) बहरहाल अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुज़ूर के साथ और हुज़ूर की उम्मत के साथ पेश आने वाले उमूर पर मुत्तला फ़रमा दिया चाहे वो दुनिया के हों या आख़िरत के और अगर “दरायत” अक़्ल से जानने के अर्थ में लिया जाए तो मज़मून और भी ज़्यादा साफ़ है और आयत का इसके बाद वाला वाक्य इसकी पुष्टि करता है. अल्लामा नीशापुरी ने इस आयत के अन्तर्गत फ़रमाया कि इसमें नफ़ी अपनी ज़ात से जानने की है, वही के ज़रिये जानने का इन्कार नहीं है.
मैं तो उसी का ताबेअ हूँ जो मुझे वही होती है(24)
(24) यानी मैं जो कुछ जानता हूँ अल्लाह तआला की तालीम से जानता हूँ.
और मैं नहीं मगर साफ़ डर सुनाने वाला {9} तुम फ़रमाओ भला देखो तो अगर वह क़ुरआन अल्लाह के पास से हो और तुम ने उसका इन्कार किया और बनी इस्राईल का एक गवाह(25)
(25) वह हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम हैं जो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाए और आपकी नबुव्वत की सच्चाई की गवाही दी.
उस पर गवाही दे चुका(26)
(26) कि वह क़ुरआन अल्लाह तआला की तरफ़ से है.
तो वह ईमान लाया और तुमने घमण्ड किया(27)
(27) और ईमान से मेहरूम रहे तो इसका नतीजा क्या होता है.
बेशक अल्लाह राह नहीं देता ज़ालिमों को{10}
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और काफ़िरों ने मुसलमानों को कहा आग उसमें(1)
(1) यानी दीने मुहम्मदी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम में.
कुछ भलाई होती तो ये (2)
(2) ग़रीब लोग.
हमसे आगे उस तक न पहुंच जाते(3)
(3) यह आयत मक्के के मुश्रिकों के बारे में उतरी जो कहते थे कि अगर दीने मुहम्मदी सच्चा होता तो फ़लाँ और फ़लाँ उसका हम से पहले कैसे क़ुबूल कर लेते.
और जब उन्हें उसकी हिदायत न हुई तो अब (4)
(4) दुश्मनी से, क़ुरआन शरीफ़ की निस्बत.
कहेंगे कि यह पुराना बोहतान {11} और इससे पहले मूसा की किताब (5)
(5) तौरात.
है पेशवा और मेहरबानी, और यह किताब है तस्दीक़ (पुष्टि) फ़रमाती(6)
(6) पहली किताबों की.
अरबी ज़बान में कि ज़ालिमों को डर सुनाए, और नेकों को बशारत {12} बेशक वो जिन्होंने कहा हमारा रब अल्लाह है फिर साबित क़दम रहे (डटे रहे)(7)
(7) अल्लाह तआला की तौहीद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शरीअत पर आख़िरी दम तक.
न उनपर ख़ौफ़(8)
(8) क़यामत में.
न उनको ग़म(9){13}
(9) मौत के वक़्त.
वो जन्नत वाले हैं हमेशा उसमें रहेंगे, उनके कर्मों का इनाम {14} और हमने आदमी को हुक्म दिया कि अपने माँ बाप से भलाई करे, उसकी माँ ने उसे पेट में रखा तकलीफ़ से और ज़नी उसको तकलीफ़ से और उसे उठाए फिरना और उसका दूध छूड़ाना तीस महीने में है(10)
(10) इस आयत से साबित होता है कि गर्भ की कम से कम मुद्दत छ माह है क्योंकि जब दूध छुडाने की मुद्दत दो साल हुई जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया “हौलैन कामिलैन “तो गर्भ के लिये छ माह बाक़ी रहे. यही क़ौल है इमाम अबू युसूफ़ और इमाम मुहम्मद रहमतुल्लाहे अलैहिमा का और हज़रत इमाम साहिब रदियल्लाहो अन्हो के नज़्दीक इस आयत से रिज़ाअत की मुद्दत ढाई साल साबित होती है. मसअले की तफ़सील दलीलों के साथ उसूल की किताबों में मिलती है.
यहाँ तक कि जब अपने ज़ोर को पहुंचा(11)
(11) और अक़्ल और क़ुव्वत मुस्तहकम हुई और यह बात तीस से चालीस साल तक की उम्र में हासिल होती है.
और चालीस बरस का हुआ (12)
(12) यह आयत हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हों के हक़ में उतरी. आपकी उम्र सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दो साल कम थी. जब हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो की उम्र अटठारह साल की हुई तो आपने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सोहबत इख़्तियार की. उस वक़्त हुज़ूर की उम्र शरीफ़ बीस साल की थी. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की हमराही में तिजारत की ग़रज़ से शाम का सफ़र किया. एक मंज़िल पर ठहरे वहाँ एक बेरी का दरख़्त था. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो वसल्लम उसके साए में तशरीफ़ फ़रमा हुए. क़रीब ही एक पादरी रहता था. हज़रत सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो उसके पास चले गए. उसने आपसे कहा यह कौन साहिब हैं जो इस बेरी के साए में जलवा फ़रमा हैं. हज़रत सिद्दीक़ ने फ़रमाया कि यह मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह हैं, अब्दुल मुत्तलिब के पोते, राहिब ने कहा ख़ुदा की क़सम ये नबी है इस बेरी के साए में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद से आज तक इनके सिवा कोई नहीं बैठा, यही आख़िरी ज़माने के नबी हैं. राहिब की यह बात हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ के दिल में उतर गई और नबुव्वत का यक़ीन आपके दिल में जम गया. और आपने सरकार की सोहबत शरीफ़ की मुलाज़िमत इख़्तियार कर ली. सफ़र व हज़र में आपसे जुदा न होते. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्र शरीफ़ चालीस साल की हुई और अल्लाह तआला ने हुज़ूर को अपनी नबुव्वत और रिसालत का ताज पहनाया तो हज़रत सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो आप पर ईमान ले आए. उस वक़्त आपकी उम्र अड़तीस बरस की थी. जब आप चालीस साल के हुए तो आपने अल्लाह तआला से यह दुआ की.
अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरे दिल में डाल कि मैं तेरी नेअमत का शुक्र करूं जो तूने मुझ पर और मेरे माँ बाप पर की(13)
(13) कि हम सबको हिदायत फ़रमाई और इस्लाम से मुशर्रफ़ किया. हज़रत सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो के वालिद का नाम अबू क़हाफ़ा और वालिदा का नाम उम्मुल ख़ैर था.
और मैं वह काम करूं जो तूझे पसन्द आए(14)
(14) आपकी यह दुआ भी क़ुबूल हुई और अल्लाह तआला ने आपको अच्छे कर्मों की वह दौलत अता फ़रमाई कि सारी उम्मत के कर्म आपके एक कर्म के बराबर नहीं हो सकते. आपकी नेकियों में से एक यह है कि नौ मूमिन जो ईमान की वजह से सख़्त यातनाओ और तकलीफ़ों में जकड़े हुए थे, उनको आपने आज़ाद कराया, उन्हीं में से हज़रत बिलाल रदियल्लाहो अन्हो भी हैं. और आप ने यह दुआ की.
और मेरे लिये मेरी औलाद में सलाह रख(15)
(15) यह दुआ भी क़ुबूल हुई . अल्लाह तआला ने आपकी औलाद में नेकी रखी. आपकी तमाम औलाद मूमिन है और उनमें हज़रत उम्मुल मूमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहो अन्हा का दर्जा किस क़द्र बलन्द है कि तमाम औरतों पर अल्लाह ने उन्हें बुज़ुर्गी अता की है. हज़रत अबूबक्र रदियल्लाहो अन्हो के वालिदेन भी मुसलमान और आपके बेटे मुहम्मद और अब्दुल्लाह और अब्दुल रहमान और आपकी बेटियाँ हज़रत आयशा और हज़रत असमा और आपके पोते मुहम्मद बिन अब्दुर रहमान, ये सब मूमिन और सब सहाबियत की बुज़ुर्गी रखने वाले हैं. आपके सिवा कोई ऐसा नहीं है जिसको यह फ़ज़ीलत हासिल हो कि उसके वालिदैन भी सहाबी हों, ख़ुद भी सहाबी, औलाद भी सहाबी, पोते भी सहाबी, चार पुश्तें सहाबियत का शरफ़ रखने वाली.
मैं तेरी तरफ़ रूजू लाया(16)
(16) हर उस काम में जिसमें तेरी रज़ा हो.
और मैं मुसलमान हूँ (17){15}
(17) दिल से भी और ज़बान से भी.
ये हैं वो जिनकी नेकियाँ हम क़ुबूल फ़रमाएंगे (18)
(18) उनपर सवाब देंगे.
और उनकी तक़सीरों से दरग़ुज़र फ़रमाएंगे जन्नत वालों में, सच्चा वादा जो उन्हें दिया जाता था (19){16}
(19)दुनिया में नबीए अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़बाने मुबारक से.
और वह जिसने अपने माँ बाप से कहा(20)
(20) इससे मुराद कोई ख़ास व्यक्ति नहीं है बल्कि काफ़िर जो मरने के बाद उठाए जाने का इन्कारी हो और माँ बाप का नाफ़रमान और उसके माँ बाप उसको सच्चे दीन की तरफ़ बुलाते हों और वह इन्कार करता हो.
उफ़ तुम से दिल पक गया क्या मुझे यह वादा देते हो कि फिर ज़िन्दा किया जाऊंगा हालांकि मुझसे पहले संगते गुज़र चुकीं(21)
(21) उनमें से कोई मरकर ज़िन्दा न हुआ.
और वो दोनों(22)
(22) माँ बाप.
अल्लाह से फ़रियाद करते हैं तेरी ख़राबी हो ईमान ला बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है(23)
(23)मुर्दे ज़िन्दा फ़रमाने का.
तो कहता है ये तो नहीं मगर अगलों की कहानियां {17} ये वो हैं जिन पर बात साबित हो चुकी(24)
(24) अज़ाब की.
उन गिरोहों में जो उन से पहले गुज़रे जिन्न और आदमी, बेशक वो ज़ियाँकार थे {18} और हर एक के लिये कर्म के अपने अपने (25)
(25) मूमिन हो या काफ़िर.
दर्जे हैं(26)
(26)यानी अल्लाह तआला के नज़्दीक मन्ज़िलों और दर्जों में. क़यामत के दिन जन्नत के दर्जे बलन्द होते चले जाते हैं और जहन्नम के दर्जे पस्त होते जाते हैं तो जिनके कर्म अच्छे हो वो जन्नत के ऊंचे दर्जे में होंगे और जो कु़फ़्र और गुमराही में चरम सीमा को पहुंच गए हों वो जहन्नम के सब से नीचे दर्जे में होंगे.
और ताकि अल्लाह उनके काम उन्हें पूरे भर दे(27)
(27) यानी मूमिन और काफ़िरों को फ़रमाँबरदारी और नाफ़रमानी की पूरी जंज़ा दे.
और उनपर ज़ुल्म न होगा {19} और जिस दिन काफ़िर आग पर पेश किये जाएंगे उनसे फ़रमाया जाएगा, तुम अपने हिस्से की पाक चीज़ें अपनी दुनिया ही की ज़िन्दगी में फ़ना कर चुके और उन्हें बरत चुके(28)
(28) यानी लज़्ज़त और ऐश जो तुम्हें पाना था. वह सब दुनिया में तुमने ख़त्म कर दिया. अब तुम्हारे लिये आख़िरत में कुछ भी बाक़ी न रहा और कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि “तैय्यिबात” से शरीर के अंग और जवानी मुराद है और मानी ये हैं कि तुम ने अपनी जवानी और अपनी क़ुव्वतों को दुनिया के अन्दर कुफ़्र और गुनाहों में ख़र्च कर दिया.
तो आज तुम्हें ज़िल्लत का अज़ाब बदला दिया जाएगा सज़ा उसकी कि तुम ज़मीन में नाहक़ घमण्ड करते थे और सज़ा उसकी कि हुक्मअदूली (नाफ़रमानी) करते थे(29) {20}
(29) इस आयत में अल्लाह तआला ने दुनियावी लज़्ज़तें इख़्तियार करने पर काफ़िरों को मलामत फ़रमाई तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हुज़ूर के सहाबा ने दुनिया की लज़्ज़तों से किनारा कशी इख़्तियार फ़रमाई. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात तक हुज़ूर के घर वालों ने कभी जौ की रोटी भी दो दिन बराबर न खाई. यह भी हदीस में है कि पूरा पूरा महीना गुज़र जाता था, सरकार के मकान में आग न जलती थी. कुछ खजूरों और पानी पर गुज़ारा कर लिया जाता था. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है आप फ़रमाते थे कि मैं चाहता तो तुमसे अच्छा खाना खाता और तुम से बेहतर लिबास पहनता लेकिन मैं अपना ऐश और राहत अपनी आख़िरत के लिये बाक़ी रखना चाहता हूँ.
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